नेहरू और सुभाष के बीच पत्र व्यवहार

लज्जा शंकर हरदेनिया

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पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा संपादित एक ग्रंथ है जिसमें उन्हें संबोधित अनेक पत्र प्रकाशित किए गए हैं। इन पत्रों का चयन स्वयं श्री जवाहरलाल नेहरू ने किया था। इस पुस्तक का नाम है ए बंच ऑफ ओल्ड लेटर्स। इस ग्रंथ में 368 पत्र संग्रहित हैं। उनमें से बहुसंख्यक नेहरू जी को संबोधित किए गए हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नेहरू जी ने अन्य लोगों को लिखे हैं। संग्रह में उस समय के लगभग सभी भारत के और विदेश के महान व्यक्तियों के पत्र शामिल किए गए हैं। इनमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, नेहरू जी के पिता मोतीलाल नेहरू, रवीन्द्र नाथ टेगौर, अबुलकलाम आजाद, राजेन्द्र प्रसाद, सरोजनी नायडू, सरदार वल्लभ भाई पटेल आदि द्वारा नेहरू को संबोधित पत्र शामिल हैं। नेहरू जी के अनेक विदेशी मित्रों के पत्र भी इसमें शामिल हैं। जिनमें चीन के तत्कालीन शासक च्यांगकाईशेक, महान नाटककार जार्ज बर्नाड शा, एडवर्ट थामसन, स्टेफर्ड क्रिप्स आदि अनेक विश्व विख्यात व्यक्ति शामिल हैं। इस संग्रह में सुभाष चंद्र बोस द्वारा लिखे गए अनेक पत्र शामिल किए गए हैं। पुस्तक में प्रकाशित तमाम पत्रों से उस समय की राजनीति, आजादी के आंदोलन, विश्व की परिस्थितियों आदि का ज्ञान होता है।

इस लेख में सुभाष चंद्र बोस द्वारा लिखे कुछ पत्रों का उल्लेख किया जा रहा है। इस संग्रह में सबसे पहला पत्र नेहरू जी के पिता मोतीलाल नेहरू ने सुभाषचन्द्र बोस को लिखा था। यह पत्र जुलाई 1928 में लिखा गया था। उस पत्र में इस बात का उल्लेख है कि कांग्रेस के अगले अधिवेशन के लिए जिन लोगों के नाम  उल्लेखित हैं जिन्हें अगले कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया जाना था। सुभाष चंद्र बोस ने मोतीलाल नेहरू से अनुरोध किया था कि वे अगले अधिवेशन की अध्यक्षता स्वीकार करें, परंतु उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उसके बाद कुछ लोगों ने जवाहर लाल नेहरू का नाम प्रस्तावित किया था। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए मोतीलाल नेहरू ने कहा था कि इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मैं अध्यक्ष बनता हूं या जवाहरलाल। अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनना चाहिए जो भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग से सहमत हो। एक और पत्र जो 4 अक्टूबर 1935 को लिखा गया था, में सुभाष चंद्र बोस, नेहरू जी की पत्नि के स्वास्थ्य के बारे में चिंता प्रगट करते हैं और उनके पिता मोतीलाल नेहरू की मृत्यु पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 4 मार्च 1936 को लिखे पत्र में सुभाषचंद्र बोस कहते हैं कि कांग्रेस के उच्च नेतृत्व में तुम ही (नेहरू) ऐसे हो जो प्रगतिशील विचार रखता है। हमें यह भी मालूम है कि महात्मा गांधी आपके विचारों को सुनते हैं और सम्मान भी करते हैं। इस तरह गांधी जी तक हमारे विचारों को पहुंचाने के आप सबसे सशक्त माध्यम हैं।

ह पत्र जुलाई 1928 में लिखा गया था। उस पत्र में इस बात का उल्लेख है कि कांग्रेस के अगले अधिवेशन के लिए जिन लोगों के नाम उल्लेखित हैं जिन्हें अगले कांग्रेस अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया जाना था। सुभाष चंद्र बोस ने मोतीलाल नेहरू से अनुरोध किया था कि वे अगले अधिवेशन की अध्यक्षता स्वीकार करें, परंतु उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उसके बाद कुछ लोगों ने जवाहर लाल नेहरू का नाम प्रस्तावित किया था। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए मोतीलाल नेहरू ने कहा था कि इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि मैं अध्यक्ष बनता हूं या जवाहरलाल। अध्यक्ष उस व्यक्ति को बनना चाहिए जो भारत की पूर्ण स्वतंत्रता की मांग से सहमत हो।

एक और पत्र में, जो उन्होंने अक्टूबर 1938 में लिखा था, सुभाषचंद्र बोस ने कहा कि यूरोप के समाचार पत्र आपकी गतिविधियों को और आपके द्वारा जारी किए गए वक्तव्यों को प्रमुखता से छापते हैं। इस कारण भारत की स्थिति का प्रचार-प्रसार यूरोप में बड़े पैमाने पर होता है। उन्होंने उस पत्र में देश के सामने मौजूद अनेक समस्याओं का जिक्र किया है, जिनमें सबसे बड़ी समस्या है हिन्दू मुसलमानों का संबंध। सुभाषचंद्र बोस पत्र में लिखते हैं कि जिन्ना साहब का रवैया हठीला है। वे इस बात का भी उल्लेख करते हैं कि कांग्रेस इस समय दो गुटों में विभाजित है- दक्षिणपंथी एवं वामपंथी। यह विभाजन शायद महात्मा गांधी की चिंता का विषय है। पुस्तक में जवाहरलाल नेहरू द्वारा 4 फरवरी 1939 को लिखा पत्र भी शामिल है। इस पत्र के ऊपर लिखा हुआ है ‘‘व्यक्तिगत एवं गुप्त‘‘। इस पत्र में नेहरू जी लिखते हैं कि तुमने जो चुनाव लड़ा उसके कुछ अच्छे पहलू भी हैं और कुछ ऐसे पहलू भी हैं जो नुकसानदायक हैं, कांग्रेस के साथ-साथ देश के लिए भी। वे कहते हैं कि देश के सामने जो समस्याएं हैं उनके रहते हुए इस तरह के मतभेदों का औचित्य प्रतीत नहीं होता है। पत्र में महात्मा गांधी की भूमिका और दक्षिणपंथी और वामपंथियों की कांग्रेस में स्थिति की विस्तृत चर्चा है। वे वामपंथियों की भूमिका के महत्व पर प्रकाश डालते हैं और कहते हैं कि इस मामले में सावधानी बरतना चाहिए। इसी तरह हिन्दू-मुस्लिम सवाल के ऊपर भी बहुत सावधानी से नीति निर्धारित करने की आवश्यकता है।

यहां पर यह उल्लेखनीय है कि 1939 में मध्यप्रदेश के त्रिपुरी (जबलपुर के पास) नामक स्थान पर आयोजित होने वाले कांग्रेस के अधिवेशन के लिए सुभाषचंद्र बोस राष्ट्रपति चुने गए थे (उस समय कांग्रेस अध्यक्ष को राष्ट्रपति कहा जाता था)। उस समय तक ऐसी स्थिति निर्मित हो गई थी जब सुभाषचंद्र बोस की नीतियों और महात्मा गांधी की नीतियों में विरोधाभास सामने आने लगा था। गांधी जी ने सुभाषचंद्र बोस की उम्मीदवारी का विरोध किया था और डॉ.  पट्टाभि सीतारमैया ने सुभाषचंद्र बोस के विरूद्ध चुनाव लड़ा था। चुनाव में डॉ. पट्टाभि सीतारमैया की हार हुई थी। हार के बाद महात्मा गांधी ने कहा था कि डॉ. पट्टाभि की हार मेरी हार है। त्रिपुरी कांग्रेस के दौरान सबसे बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न कांग्रेस की कार्यकारिणी के गठन का था। जवाहरलाल नेहरू का कहना था कि इस तरह की कार्यकारिणी होनी चाहिए जिस पर सभी का विश्वास हो। यदि ऐसी कार्यकारिणी नहीं बनती है तो कांग्रेस संगठन की गतिविधियां ठीक ढंग से संचालित नहीं हो सकेंगी।

संग्रह में प्रकाशित सुभाषचंद्र बोस द्वारा लिखित अंतिम पत्र दिनांक 20 अप्रैल 1939 का है। इस पत्र में सुभाषचंद्र बोस इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं कि महात्मा गांधी कलकत्ता आ रहे हैं। वे उनको आश्वस्त करते हैं कि उनके ठहरने का इंतजाम सुविधाजनक होगा और इस बात को दृष्टिगत रखते हुए होगा कि वे जनता के संपर्क में सतत बने रहें। उन्होंने एक ऐसे स्थान का सुझाव दिया जो नदी के किनारे है। परंतु उन्होंने कहा कि गांधी जी के ठहरने के स्थान का अंतिम निर्णय सतीश बाबू (सतीश बाबू से उनका अर्थ उनके बड़े भाई शरद चंद्र बोस से है) से परामर्श करके होगा। वे इस पत्र में इस बात का भी उल्लेख करते हैं कि एक दिन पहले जवाहरलाल नेहरू कलकत्ता आए थे.

एक और पत्र में जो 10 फरवरी 1939 को सुभाषचंद्र बोस ने लिखा था उसमें उन्होंने इस बात की चेतावनी दी थी कि ब्रिटिश सरकार राजा महाराजाओं को सामने कर हमें विभाजित करना चाहती है। हमें चाहिए कि राजा महाराजाओं से संघर्ष करने के साथ-साथ हम इस बात को न भूलें कि हमारा मुख्य उद्देश्य संपूर्ण स्वराज्य प्राप्त करना है। एक और पत्र जो इस संग्रह में शामिल है वह सुभाषचंद्र बोस ने 28 मार्च 1939 को लिखा था। यह पत्र किताब के बीस पृष्ठों में छापा गया है। यह पत्र इस तथ्य का उदाहरण है कि उस समय लोग कितने लंबे-लंबे पत्र लिखते थे और उन पत्रों में राजनीति, दर्शन, साहित्य सबकुछ हुआ करता था। इस पत्र में सुभाषचंद्र बोस अपनी पीड़ा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि क्या यह उचित था कि कार्यसमिति के कुछ सदस्य मेरी अनुपस्थिति में मेरी पीठ के पीछे डॉ. पट्टाभि को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाए? क्या यह उचित था कि सरदार पटेल, महात्मा गांधी का नाम लेकर मेरे विरूद्ध प्रचार करें? क्या यह उचित था कि सरदार पटेल सार्वजनिक रूप से यह कहें कि यदि मैं राष्ट्रपति बनता हूं तो इससे देश की हानि होगी? क्या यह उचित था कि विभिन्न राज्यों के मंत्रियों का उपयोग मेरे विरूद्ध प्रचार में किया जाए?

फिर जहां तक कार्यकारिणी के गठन का सवाल है मुझपर जिस प्रकार के दबाव बनाए गए क्या वे उचित थे? इस लंबे पत्र में और भी समस्याओं का जिक्र है जिनके बारे में सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के बीच में मतभेद थे। मंत्रियों द्वारा अपने पद का दुरूपयोग करने की बात बार-बार कही गई है। उन्होंने यह जानना चाहा कि क्या मंत्री बिना विधायकों के समर्थन के मंत्री रह सकते हैं? वह अप्रत्यक्ष रूप से यह कहना चाहते थे कि अनेक विधायक उनके साथ हैं। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि कैसे बसों में भरभर कर पंजाब से प्रतिनिधियों को लाया गया था। इस पत्र के उत्तर में नेहरू जी ने भी लगभग उतना ही लंबा पत्र लिखा। जहां सुभाषचंद्र बोस द्वारा लिखा गया पत्र 22 पृष्ठ लंबा है वहीं वहीं जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखा गया पत्र 13 पृष्ठों में छपा है। पत्र में नेहरू जी ने उन तमाम आरोपों को गलत बताया है जो महात्मा गांधी, उनके और सरदार पटेल के विरूद्ध लगाए गए थे। मार्च 25, 1939 को सुभाषचंद्र बोस ने एक और पत्र लिखा। इस पत्र में भी वे इस बात का उल्लेख करते हैं कि गांधी जी चाहते हैं कि कार्यकारिणी ऐसी हो जिसमें एक विचार वाले लोग रहें ताकि कांग्रेस का कार्य ठीक से चल सके। इस संबंध में सुभाषचंद्र बोस महात्मा गांधी को संबोधित पत्र में जानना चाहते हैं कि क्या कोई ऐसी कार्यकारिणी बन सकती है जिसमें सरदार पटेल और मैं शामिल हों? मैं इस तरह की कार्यकारिणी की कल्पना तक नहीं कर सकता।

गांधी जी भी सुभाषचंद्र बोस द्वारा लिखे गए पत्रों का समय-समय पर जवाब देते थे। इन पत्रों में महात्मा गांधी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हैं। एक और पत्र में, जो 15 अप्रैल 1939 को लिखा गया है, वे यह जानना चाहते हैं कि क्या महात्मा गांधी कार्यकारिणी को स्वयं घोषित करना चाहेंगे? वे यह भी जानना चाहते हैं कि यदि गांधी जी शीघ्र कार्यकारिणी नहीं बनाना चाहते तो, क्या मैं आॅल इंडिया कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन स्थगित कर दूं?

मतभेदों के बावजूद उस समय के नेता कैसे एक दूसरे की चिंता करते थे इसका अंदाजा 20 अप्रैल 1939 को सुभाषचंद्र बोस द्वारा जवाहरलाल नेहरू को संबोधित पत्र को पढ़ने से होता है। सुभाषचंद्र बोस लिखते हैं कि मुझे यह जानकार भारी चिंता हुई कि गांधी जी बुखार से पीड़ित हैं। मुझे उम्मीद है कि उनकी स्थिति में शीघ्र सुधार होगा और सदा की तरह वे देश का नेतृत्व करने के लिए उपलब्ध रहेंगे। सुभाषचंद्र बोस जो भी पत्र महात्मा गांधी को लिखते थे उन्हें महात्मा जी कहकर ही संबोधित करते थे जबकि अन्य कुछ लोग महात्मा गांधी को बापू कहकर संबोधित करते थे। इस संबोधन से ही यह स्पष्ट होता है कि गंभीर मतभेदों के बावजूद वे एक दूसरे का कितना सम्मान करते थे।

संग्रह में प्रकाशित सुभाषचंद्र बोस द्वारा लिखित अंतिम पत्र दिनांक 20 अप्रैल 1939 का है। इस पत्र में सुभाषचंद्र बोस इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं कि महात्मा गांधी कलकत्ता आ रहे हैं। वे उनको आश्वस्त करते हैं कि उनके ठहरने का इंतजाम सुविधाजनक होगा और इस बात को दृष्टिगत रखते हुए होगा कि वे जनता के संपर्क में सतत बने रहें। उन्होंने एक ऐसे स्थान का सुझाव दिया जो नदी के किनारे है। परंतु उन्होंने कहा कि गांधी जी के ठहरने के स्थान का अंतिम निर्णय सतीश बाबू (सतीश बाबू से उनका अर्थ उनके बड़े भाई शरद चंद्र बोस से है) से परामर्श करके होगा। वे इस पत्र में इस बात का भी उल्लेख करते हैं कि एक दिन पहले जवाहरलाल नेहरू कलकत्ता आए थे। उनको मैंने सुझाव दिया है कि वे अपनी यात्रा स्थगित कर कलकत्ते में रूकें ताकि हम दोनों आपसे संयुक्त रूप से मुलाकात कर सकें।

लज्जाशंकर हरदेनिया  वरिष्ठ पत्रकार हैं

 

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