हमारे यहाँ लड़कियां बारात में नहीं जाती हैं..

अपर्णा

5 693

बिहार के आरा जिले के एक गाँव के शादी घर में गए। बिहार में किसी शादी में जाने का पहला मौका था। घर में खूब चहल-पहल थी। बारात शाम चार बजे प्रस्थान करनी थी और उसके पहले दूल्हे को आखिरी बार तेल लगाया जाना था। महिलाओं को मंदिर जाना था, साथ ही परछन किया जाना था ताकि बारात समय पर लड़की वाले के घर पहुँच सके और वहाँ  के सारे कार्यक्रम भी समय पर हो सकें। काम बहुत था और समय कम। इस कारण घर के अंदर महिलायें अपने हिस्से की जिम्मेदारी को समय पर पूरा कर लेना चाह रही थीं और इसीलिए अफर-तफरी मची हुई थी।

अपवाद छोड़ दें तो स्त्रियों को यदि जिम्मेदारीपूर्ण काम दिए जाएँ और किसी निर्णय लेने में शामिल किया जाए तो वे उस काम को बहुत ही बेहतर तरीके से ख़ुशी-ख़ुशी पूरा करती हैं। लेकिन अक्सर घर-परिवार-समाज में उन्हें इंसान का नहीं, बल्कि एक स्त्री का दर्जा दिया जाता है।  हमेशा उन्हें घर के अंदर शारीरिक मेहनत वाले काम ही सौंपे जाते हैं।  बात-बेबात कमअक्ल और बाहर की दुनिया से अनभिज्ञ समझा ही नहीं जाता, बल्कि इस बात का गाहे-बगाहे ताना भी दिया जाता है। यहाँ पर भी घर के अंदर स्त्रियाँ शादी के तामझाम और तैयारियों में लगीं थीं। अनेक स्त्रियाँ खुद को सजा-धजा कर तैयार करने में व्यस्त थीं, शादी वाले घर में आपस में चचेरी-ममेरी बहनें, फुआ, चाची, मौसी, ताई और दीदियों की भीड़ थी। जो छोटी-सी जगह में शादी के लिए लाये गए भारी-भरकम कपड़ों और गहनों को पहनकर एक-दूसरे की तारीफ कर संतुष्ट और खुश हो रही थीं क्योंकि अधिकाँश स्त्रियों के जीवन का यही मतलब होता है, बुद्धिमान होने के बावजूद उनका कभी इस तरह का बौद्धिक विकास नहीं होता या  करवाया नहीं जाता जिसमें वे देश-समाज की बातें कर सकें,और न ही कभी ये स्त्रियाँ खुद से पहल कर इसके लिए खुद को तैयार ही कर पाती हैं।

 

बारात के लिए तैयार टोकरी

जिस तरह लड़के या पुरुष समूह में बैठकर या चौक-चौराहे की पान की दुकानों पर खड़े होकर वहां चल रही बहस में हिस्सा लेते हैं, लेकिन स्त्रियों के लिए तो ऐसा सोचना भी कुफ़्र है। इसीलिए उन्हें पुरुषों के लिए ही जीना सिखाया जाता है। उन्हीं की पसंद का खाना, पहनना, सजना और बात करना बचपन से ही सिखाया जाता है। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुष ही महत्त्वपूर्ण और प्रमुख कामों में आगे रहते हैं। लेकिन औरतों को निर्णय लेने की जिम्मेदारी छोड़, अन्य वे सभी जिम्मेदारियाँ सौंप या थोप दी जाती हैं, जिन्हें करने से पुरुष बचते हैं। अर्थात किसी काम को व्यवस्थित करने और सम्पन्न करने का काम उन्हें ही दिया जाता है। ऐसा ही इस शादी वाले घर में भी हो रहा था। ऐसे अनेक मौकों पर महिलायें  बहुत उत्साहित रहती हैं और बेहतरीन तरीके से अपने काम को अंजाम देती हैं और साबित करती हैं, क्योंकि अधिकांशत: उन्हें सामाजिक रूप से कोई मंच वैसे हासिल नहीं होता है।

बारात सीधे दरवाजे पर पहुंची। एक-डेढ़ घंटे में वहाँ के कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद सभी को जनवासे में जाने की हड़बड़ी थी। मुझे समझ नहीं आया। फिर लगा कि आराम करना चाह रहे होंगे। खाना खाकर हम भी उधर का रुख कर लिए। वह जगह शादी घर से इतनी ही दूर थी कि डीजे की आवाज आसपास के घरों में अटककर बहुत धीमे-धीमे पहुँच रही थी। लेकिन उस छोटी सी दूरी में बहुत भीड़ दिखाई दी, सब भागे-भागे कर रहे थे। कोई पैदल, कोई साइकिल पर। कोई मोटर साइकिल पर और कोई तो चार पहिये पर भी थे। बाराती तो पहुंचे ही थे लेकिन उस गाँव के हर उम्र के पुरुष वहाँ पहुँच रहे थे लगा जैसे सिनेमा शुरू होने का समय होने वाला है। चाल की तेजी और शरीर की गति मुझे अपने बचपन की याद दिला रहा था

यहाँ शादीघर में महिलायें बहुत ही सजधज के साथ तैयार हुईं, उन्हें देखकर अच्छा भी लग रहा था। लेकिन एक बात जो समझ आई कि टीवी पर सास-बहू और घर-परिवार वाले सीरियल वे बहुत ध्यान से देखती हैं, क्योंकि उनके पहनावे और सजावट में पूरा प्रभाव टीवी का दिखाई दे रहा था। बारात निकासी और परछन से पहले घर की महिलायें बाजे और बिहार के लोकनृत्य लौंडा नाच की पूरी टीम के साथ मंदिर जाने के लिए तैयार होती हैं। देर न हो जाए इस बात की हड़बड़ाहट है।

लौंडा नाच बिहार का एक ऐसा नाच है, जिसमें लड़के लड़कियों की ड्रेस पहनकर पूरी ऊर्जा से नाचते हैं, बिहार में कोई शादी-ब्याह हो या खुशी का कोई भी अवसर हो वहाँ लौंडा नाच होना जरूरी होता है और लौंडा नाच की पार्टी कौन सी है, कहाँ से आई है और कितने पैसे में आई है यह भी प्रतिष्ठा का सवाल होता है। मैंने इस नाच के बारे में सुना तो बहुत था लेकिन देखा पहली बार। नाचने वाला लड़का था लेकिन कोई भी देखकर एकबारगी यह पता नहीं लगा सकता कि वह लड़की नहीं लड़का है। नाचते हुए स्टेप, हावभाव और उसका गेटअप किसी लड़की से कम नहीं था। दो लोग थे, उनकी ऊर्जा गजब की थी क्योंकि दिन  में 11 बजे से नाचना शुरू किए थे और लगातार नाच रहे थे। आखिर उनके पास यही कला है और पेट के लिए मजबूरी और उनके काम का सीजन भी।

बारात के लिए बुलाया गया लौंडा नाच

उत्तर भारत में शादी के उत्सव की तैयारियां महीनों चलती हैं, लाखों खर्च होते हैं लेकिन टाइम मैनेजमेंट के अभाव में शादी वाले घर में सभी अफरा-तफरी में ही दिखाई देते हैं, वही हाल यहाँ भी था लेकिन कार्यक्रम इसी अफरा-तफरी में आगे बढ़ना था सो बढ़ा। घर की महिलायें मंदिर से वापसी के बाद तुरंत नए पहनावे में नजर आईं। आश्चर्य कम ही हुआ, आजकल ऐसा अधिकतर शादी वाले घरों में होता है कि हर नेग-रस्म के लिए अलग-अलग कपड़े-गहने पहने जाते हैं।

शादी वाले घर में संग-साथ और उत्साह होने पर मौसम का प्रभाव नहीं दिखता। गर्मी हो या कड़कती ठंड लेकिन उनके उत्साह को कोई डिगा नहीं सकता। पूरे घर की महिलायें भरी दुपहरिया में गाजे-बाजे के साथ मंदिर पहुंचीं जो खेत के बीच में था और वहाँ परिसर में लगभग एक घंटे तक हर उम्र की महिलाओं ने रजगज से खूब जमकर नाचा। नाचते हुए हर स्त्री भूल गई कि वह स्त्री है। घर के अंदर हाथ-पैर सिकोड़कर, हाथ भर का घूँघट रखने वाली स्त्रियाँ भी हाथ-पैर फेंक-फेंक कर नाच रही थीं और उस नाच में शामिल नहीं होने वाली अपनी बहन-बुआ-चाची-देवरानी-जेठानी को खींचकर उस मस्ती और मजे को महसूस करवाना चाह रही थीं। उनकी उन्मुक्तता और बिंदासपन मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था। स्त्रियों की आजादी उनके पैदा होते ही समाज-परिवार और पुरुषों के पास गिरवी रख दी जाती है क्योंकि उन्हें सभ्य, सुशील, शालीन और संस्कारवान स्त्री बनना होता है ताकि भविष्य बेहतर हो सके। भविष्य बेहतर होता है? यह तो स्त्री ही बता सकती है। लेकिन उनका आनंद और बिंदास अंदाज देखकर मन खुश हुआ और महसूस हुआ कि स्त्रियाँ ज़िंदगी के हर उस पल को जी लेना चाहती हैं जिनसे वे अछूती रह गई हैं। दो देवथान और जाने के बाद वापसी हुई । वापसी पर बारात निकलने की तैयारी होने लगी। सभी लोग बहुत हड़बड़ी में थे।

अपने में मस्त और व्यस्त शादी घर की स्त्रियाँ

बाकी जगहों का तो नहीं मालूम, लेकिन उत्तर भारत में शादी के उत्सव की तैयारियां महीनों चलती हैं, लाखों खर्च होते हैं लेकिन टाइम मैनेजमेंट के अभाव में शादी वाले घर में सभी अफरा-तफरी में ही दिखाई देते हैं, वही हाल यहाँ भी था लेकिन कार्यक्रम इसी अफरा-तफरी में आगे बढ़ना था सो बढ़ा। घर की महिलायें मंदिर से वापसी के बाद तुरंत नए पहनावे में नजर आईं। आश्चर्य कम ही हुआ, आजकल ऐसा अधिकतर शादी वाले घरों में होता है कि हर नेग-रस्म के लिए अलग-अलग कपड़े-गहने पहने जाते हैं। लेकिन मुझे लगा अब परछन और बारात की तैयारी है और घर की सभी स्त्रियाँ और लड़कियां बारात में जाने के लिए तैयार हुई हैं। बारात भी कोई बहुत दूर नहीं जानी थी, आरा के उस गाँव से मात्र अस्सी किलोमीटर दूर। लेकिन नेग-रस्मों के बीच पता चला घर की कोई भी स्त्री या लड़की बारात में नहीं जाएगी। वैसे तो बहुत जगहों पर स्त्रियाँ बारात में नहीं जाती थीं लेकिन आज के समय में बहुत बदलाव आया है और बारात में लड़कियां तो जाती ही हैं। खैर यह इनके घर-गाँव का चलन है, इस पर कोई बात ही नहीं की जा सकती। इसके लिए घर के बड़े-बूढ़े अपने घर की स्त्रियों के लिए पहले ही नियम बनाकर मानसिक रूप से तैयार कर देते हैं। खैर, घर और गाँव भर के लड़के, युवा, बूढ़े और रिश्तेदार बीस-पचीस गाड़ियों में भरकर बारात गए। जैसा कि होता है बाराती बहुत उत्साहित रहते हैं। सभी आकर्षण का केंद्र होना चाहते हैं खासकर युवा और दूल्हे के दोस्त। बुराई भी नहीं है, क्योंकि शादी घर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन और रिश्तों को निभाने  के  लिए बेहतर समय और जगह होती है।

दक्षिण भारतीय फिल्मों में बढ़ती विविधता और ऑस्कर का सपना!

बारात सीधे दरवाजे पर पहुंची। एक-डेढ़ घंटे में वहाँ के कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद सभी को जनवासे में जाने की हड़बड़ी थी। मुझे समझ नहीं आया। फिर लगा कि आराम करना चाह रहे होंगे। खाना खाकर हम भी उधर का रुख कर लिए। वह जगह शादी घर से इतनी ही दूर थी कि डीजे की आवाज आसपास के घरों में अटककर बहुत धीमे-धीमे पहुँच रही थी। लेकिन उस छोटी सी दूरी में बहुत भीड़ दिखाई दी, सब भागे-भागे कर रहे थे। कोई पैदल, कोई साइकिल पर। कोई मोटर साइकिल पर और कोई तो चार पहिये पर भी थे। बाराती तो पहुंचे ही थे लेकिन उस गाँव के हर उम्र के पुरुष वहाँ पहुँच रहे थे  लगा जैसे सिनेमा शुरू होने का समय होने वाला है। चाल की तेजी और शरीर  की गति मुझे अपने बचपन की याद दिला रहा था, जब घर के आसपास कोई नट या भालू नचाने वाला या सड़क पर जादू दिखने वाले के आने की भनक  मिलती थी हम ऐसे ही भागते थे, चप्पल पहनना मुश्किल हो जाता था। ऐसा ही कुछ वहाँ का दृश्य था, वहाँ पहुंचे तो असली बात समझ आई। अंदर बहुत जोरों से डीजे बज रहा था और बड़ा सा स्टेज पंडाल के दाहिनी ओर बना था और उस पर सजी हुई पाँच लड़कियां दिखीं। एक गाना गा रही थी और बाकी नाच रही थीं। पूरा पंडाल पुरुषों से भरा हुआ था और स्टेज पर लड़कियां अश्लील इशारों के साथ पुरुषों को बुलाती हुई नाच रही थीं। सबसे पहले तो मेरे लिए ही स्थिति बहुत असहज हो गई। लोगों को अचरज हो रहा था कि आखिर कोई पारिवारिक स्त्री यहाँ कैसे आ सकती है।

बारातियों के मनोरंजन के लिए बुलाया गया नाच (चित्र गूगल से)

वहाँ देखने वाले सारे पुरुष आँखों और इशारों से सुख पा रहे थे और कई नौजवान लड़के उन लड़कियों को अपने होंठों से नोट पकड़वाने के लिए आतुर दिख रहे थे। अक्सर लड़कियाँ हाथ से नोट पकड़ खींचतीं और स्टेज पर फेंक देतीं लेकिन लड़के चाहते थे कि उनके होठों से दबे नोट लडकियाँ अपने होंठों से पकड़ें। उस पंडाल के अंदर चाचा-भतीजे, पिता-पुत्र, भाई, मामा-मौसा सब रहे होंगे लेकिन वहां किसी रिश्ते की कोई मर्यादा नहीं थी। मंच पर नाचती स्त्रियाँ थीं और बाकि सब पुरुष थे। अब सारी असलियत मेरे सामने आ गई कि इनके घरों की स्त्रियों या लड़कियों को बारात में क्यों नहीं ले जाया जाता? आखिर इस पंडाल में वे कहाँ बैठतीं?

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

मुसलमानों पर हमले का एक और टूल

5 Comments
  1. Deepak Sharma says

    बहुत बेहतरीन लेख मैम
    यह लेख पढ़ने के बाद मुझे भी अपने बचपन से अब तक की सारे बारात नाच और आर्केस्ट्रा के दृश्य याद आने लगे हैं, यहां वर्णन संभव नहीं है कभी किसी कहानी या संस्मरण में लिखूंगा।
    अभी आपको बहुत बधाई

    1. Aparna says

      शुक्रिया दीपक

  2. Gulabchand Yadav says

    अपर्णा जी आपने बहुत बढ़िया और यथार्थ चित्रण किया है आज के उत्तरी बिहार की शादी की विभिन्न रस्मों, प्रक्रियाओं और परंपराओं का। कमोबेश कुछ ऐसा ही पटकथा/दृश्य हमें पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों/कस्बों की शादियों में भी देखने को मिलता है। महानगरों और बड़े शहरों में स्त्रियों/लड़कियों ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा दी है किंतु गांवों/ छोटे कस्बों में अभी भी उनके लिए उजाला और वास्तविक आजादी आनी बाकी है। रोचक किंतु गंभीर मुद्दों को उठाती आपकी इस बढ़िया रिपोर्टिंग के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.