एक बुरी रात का सुखद अंत (डायरी 3 जुलाई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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मेरी शिक्षा नियतिवाद को खारिज करती है और इस कारण मेरी अपनी जिंदगी आडंबरों से मुक्त है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मेरे जीवन में जुड़े सभी लोग ऐसे ही हों। मेरे अपने घर में एक मुझे छोड़ अन्य सभी नियतिवाद को मानते ही हैं। उन्हें लगता है कि कोई है जो इस सृष्टि को चला रहा है और बिना उसकी मर्जी के पत्ता भी नहीं डोलता। यही मान्यता उन्हें अंधविश्वास के गहरे कुएं में धकेल देता है।
कल कुछ खास हुआ मेरे साथ। दिन बहुत सुहाना था। जीवन के तमाम रंग थे दिन में। कल गांव में साप्ताहिक बाजार था। पत्नी का सहयोगी बन बाजार में गया। वहां तमाम लोगों से मुलाकातें हुईं। एक आदमी ने तो मुझे चौंका ही दिया। वह मुझे लगातार देखे जा रहा था और मैं उसके व्यवहार से असहज था। फिर उसने कहा कि आप कौशल जी के भाई हैं न? मैंने कहा कि हां, लेकिन मैं आपको नहीं पहचानता। फिर उसने कहा कि वह मेरे घर से दूध खरीदने आता था। अब यह बात कम से कम 18-20 साल पुरानी है। इतने लंबे समय तक किसी को याद रखना मुश्किल ही है। उस व्यक्ति को भी मैं शायद इसलिए याद रह सका, क्योंकि वह मेरे परिवार से किसी न किसी रूप में संपर्क में जरूर रहा होगा। भैया तो वैसे भी पूरे इलाके का आदमी है। हमदोनों के चेहरे में समानताएं हैं तो बाजदफ़ा लोगों को कंफ्यूजन हो जाता है।
खैर, कल बाजार से लौट रहा था तो गांव की एक भौजाई ने हमदोनों (मैं और मेरी पत्नी) को देखकर टिप्पणी की– ‘एकदम गेंठी जोड़ाकर चलते ह नवल’ (नवविवाहित की तरह गांठ जोड़कर चलना)। उनकी टिप्पणी का मेरी पत्नी ने माकूल जवाब दिया। मगही में इस तरह के संवाद सुनने में अच्छे लगते हैं। दूसरा यह कि महिलाएं एक-दूसरे के साथ संवाद करने के लिए किस तरह के संवाद का उपयोग करती हैं, यह समझने का इससे बेहतर कोई तरीका नहीं है।
तो कल का दिन इसलिए भी खास रहा कि मैंने सुबह और शाम का खाना अपने परिवार के लिए खुद बनाया। दरअसल, हुआ यह कि मैंने सुबह में दाल तड़का बनाया और सभी ने उसकी तारीफ की। परिजनों ने शाम में भी दाल तड़का की इच्छा व्यक्त की। लेकिन सिर्फ दाल तड़का से काम तो चलता नहीं, सो मैंने पंजाबी स्टाइल में आलू दम की सब्जी भी बनायी। सब ठीक ही चल रहा था। घर इन दिनों आम के कारण गुलजार है। वैसे भी कल एक साथी ने तोहफे में खूब सारे आम दिये। तो रात के खाने में तमाम तरह के स्वाद थे। बिहार से लेकर पंजाब तक के स्वाद।

कल बाजार से लौट रहा था तो गांव की एक भौजाई ने हमदोनों (मैं और मेरी पत्नी) को देखकर टिप्पणी की– 'एकदम गेंठी जोड़ाकर चलते ह नवल' (नवविवाहित की तरह गांठ जोड़कर चलना)। उनकी टिप्पणी का मेरी पत्नी ने माकूल जवाब दिया। मगही में इस तरह के संवाद सुनने में अच्छे लगते हैं। दूसरा यह कि महिलाएं एक-दूसरे के साथ संवाद करने के लिए किस तरह के संवाद का उपयोग करती हैं, यह समझने का इससे बेहतर कोई तरीका नहीं है।

बीते तीन दिनों से मैं भागलपुर जाने की सोच रहा था। लेकिन कोई ना कोई अड़चन आयी और मेरी योजना धरी की धरी रह गई। कल रात भी यह सोचकर जल्दी सोया कि सुबह-सुबह उठकर सवा पांच बजे वाली रेलगाड़ी से भागलपुर के लिए निकल जाऊंगा। गर्मी लग रही थी सो एसी ऑन करके सोने की कोशिश करने लगा। थोड़ी ही देर में ठंड लगने लगी। यह असामान्य था। लेकिन तब मुझे अहसास नहीं था कि मैं ज्वर की गिरफ्त में फंस चुका हूं। पंखा और एसी बंद करने के बावजूद ठंड कुछ अधिक ही लग रही थी। रात का समय था सो परिजनों को जगाना उचित नहीं लगा।
लेकिन करीब तीन बजे रीतू को मेरी याद आयी तो उसने मुझे बुखार में तपता हुआ पाया। घर में थर्मामीटर बच्चों के कारण नहीं टिक पाता। सो यह तो नहीं मापा जा सका कि मुझे कितना बुखार था। लेकिन यह तो था कि बुखार बहुत था। बीते एक दशक में इतना तेज बुखार नहीं हुआ। फिर तो तमाम उपाय शुरू हो गए। बुखार की एक दवा रीतू ने रात में खाने को दी। हालांकि उस अचेतावस्था में भी मैंने उसे मना किया कि सुबह डाक्टर से दिखाकर दवा ले लूंगा। लेकिन उसने कहा कि यह दवा बुखार की ही दवा है। अभी एक सप्ताह पहले खरीदी गई है। फिर वह दवा खाने के बाद के मुझे लगा कि बुखार जाती रहेगी। लेकिन ऐसा ना हुआ।
फिर रीतू ने माथे पर पेट पर कपड़े को पानी में भिंगोकर रखना शुरू किया और तबतक बच्चों की नींद भी खुल गयी। सो बच्चों ने भी पैर के तलवों को रगड़ना शुरू कर दिया। इस बीच रीतू ने उस भौजाई को कोसना शुरू कर दिया, जिसने बाजार से लौटते समय हमारे बारे में टिप्पणी की थी। रीतू के मुताबिक उस महिला की नजर अच्छी नहीं है। उसके कारण ही मुझे बुखार हुआ है। फिर उसकी इच्छा हुई कि वह मेरी नजर उतारे। उसने मिर्च जलाये और मुझे बताया कि मिर्च के जलने की गंध तक नहीं हुई।
यह एक तरह का अंधविश्वास है। मेरे यह समझाने का कोई लाभ तो मुझे मिलना नहीं था। उलटे नसीहतें जरूर मिलीं कि दुनिया मेरे हिसाब से नहीं चलती। हर आदमी की नजर में खास बात होती है। किसी की नजर अच्छी होती है तो किसी की खराब।
खैर, ठंड इतनी लग रही थी कि मेरे उपर दो कंबल और एक रजाई डाल दी गई। करीब साढ़े पांच बज चुके थे। मैंने रीतू से कहा कि वह बगल के डाक्टर को बुला ले, क्योंकि मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ है। उसने फोन भी किया लेकिन डाक्टर भी कम रंग में नहीं रहते। हामी भरने के बावजूद वे नहीं आए। तबतक मुझे आराम मिल चुका था। बस सोने की इच्छा थी। बुखार ने पूरी रात मेरे शरीर पर प्रतिकूल प्रभाव डाला था।
बहरहाल, यह एक बुरी रात के बीतने के जैसा था। मेरी प्रेमिका ने कल एक शब्द दिया था – द्वंद्व। कल शाम में ही लिखा था–
द्वंद्व जैसा कुछ नहीं होता इश्क में
और अंतहीन रातें भी नहीं।
इश्क अलहदा है मेरी जान
एकदम अलहदा
तुम्हारे आलते के रंग
और तुम्हारी मुस्कान की माफिक।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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