Wednesday, September 23, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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ग्राउंड रिपोर्ट

किसने देवी कश्यप की जान ली

मोदी सरकार के समय गरीब की परिभाषा बदल गई है। अब गरीबी की सीमा बहुत ऊपर हो गई है। सबसे गरीब लोग उसी तरह बाहर रह गए हैं जैसे दलित जातियों के लोग व्यवस्था से बाहर रह गए थे। उनकी श्रेणी का कोई नाम नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे जाति व्यवस्था में बहिष्कृत लोगों की कोई श्रेणी का नाम नहीं था। उनमें से कुछ लोगों के पास अब आधार कार्ड के लिए आवश्यक जन्म संबंधी दस्तावेज तक नहीं हैं, जिसके बिना किसी भी कल्याणकारी योजना का लाभ उठाना असंभव है। पढ़िए लखनऊ की देवी कश्यप की दर्दनाक कहानी।

बिहार : ईंटों के बीच दबे भट्ठा मजदूरों की व्यथा

ईंट भट्ठों में काम करने वाले मजदूर हमारी सभ्यता की नींव हैं। वे हमारी इमारतें बनाते हैं, हमारे घरों को खड़ा करते हैं, लेकिन उनके अपने घर रहने लायक नहीं होते। अगर हमें एक विकसित समाज बनाना है, तो हमें इन मजदूरों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। वरना उनकी गरीबी की ये ईंटें हमेशा उनकी तरक्की का रास्ता रोकती रहेंगी।

रामपुर गांव : ‘क्राफ्ट हैंडलूम विलेज’ में बुनकरों का अधूरा सपना और टूटती उम्मीदें

रामपुर गांव की कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं है, बल्कि यह उन लाखों कारीगरों और बुनकरों की कहानी है, जो सरकारी योजनाओं के अधूरे वादों और बाजार की बेरुखी के बीच फंसे हुए हैं। यह समय है कि सरकार और समाज मिलकर इनके सपनों को साकार करने के लिए कदम उठाए। अगर समय रहते इनकी मदद नहीं की गई, तो यह अद्वितीय कला और कौशल हमेशा के लिए खो जाएगा। पढ़िए नाजिश महताब की ग्राउंड रिपोर्ट।

बिहार में ‘हर घर नल का जल’ की हकीकत : बरमा गांव की प्यास

पिछले कई वर्षों से हर घर नल जल योजना की धूम मची हुई है और इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में प्रचारित किया जा रहा है लेकिन वास्तविकता प्रचार के बिलकुल उलट है। लगातार बढ़ते साफ पानी के संकट के मद्देनज़र यह योजना एक मज़ाक बनकर रह गई है। बिहार के लाखों ग्रामीण गंदे और ज़हरीले पानी का इस्तेमाल करने को विवश हैं। गया जिले के बरमा गांव में पानी का कैसा संकट है और सरकार की योजना किस हालत में है इस पर नाज़िश मेहताब की रिपोर्ट।

अवधी में गानेवाली यूट्यूबर महिलाएं : कहीं गरीबी से रस्साकसी कहीं वायरल हो जाने की चाह

पिछले कुछ ही वर्षों में अवधी भाषी महिलाओं ने बड़ी संख्या में यूट्यूब पर अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई है। यह ऐसी महिलाओं की कतार है जो निम्न मध्यवर्गीय और खेतिहर परिवारों से ताल्लुक रखती हैं और घर-गृहस्थी की व्यस्त दिनचर्या के बावजूद अपने गीतों से एक बड़े दर्शक समूह को प्रभावित किया है। इनमें से कई अब पूर्णकालिक और स्टार यूट्यूबर बन चुकी हैं। अपने बचपन में सीखे गीतों को वे बिना साज-बाज के गाती हैं और लाखों की संख्या में देखी-सुनी जाती हैं। यू ट्यूब पर गाना उनके लिए न केवल अपनी आत्माभिव्यक्ति है बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी है। इसके लिए उन्होंने कठिन मेहनत किया है। परिवार के भीतर संघर्ष किया है। जौनपुर, आजमगढ़ और अंबेडकर नगर जिलों के सुदूर गांवों की इन महिलाओं पर अपर्णा की यह रिपोर्ट।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी बाणसागर नहर परियोजना

मीरजापुर। सुनिये... सुनिये... सुनिये.. प्रधानमंत्रीजी को सुनिये। उनको सुनिये, जिन्होंने आपके लिए करोड़ों का सौगात दिया है। उन करोड़ों के सौगात की हकीकत को...

क्या रामप्रीत नट ने बनारसी मुसहर की हत्या की थी ?

पिछले वर्ष 24 मई की सुबह उस समय हडकंप मच गया जब गाँववालों ने दो व्यक्तियों को सड़क की दो तरफ गिरा पाया। एक व्यक्ति में थोड़ी-बहुत सांस चल रही थी जबकि दूसरे का सर धड़ से अलग कर दिया गया था और ऑंखें भी फोड़ डाली गयी थीं। पहचान करने पर पता चला कि मृतक व्यक्ति का नाम बनारसी मुसहर था और वह कोइलसवा गाँव के निवासी थे।

गाँव देस आज 19 जुलाई

गाजीपुरअफवाह फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का ऐलानमरदह थाना परिसर में शनिवार की देर शाम को क्षेत्राधिकारी विजय आनंद शाही की...

गाँव देस आज

आज से यानी 15 जुलाई 2021 से हम रोज सुबह और शाम दो बार भारत के सभी राज्यों के जनजीवन, राजनीति, समाज, घटनाओं और...

आखिर कब मिलेगा बनारसी मुसहर को न्याय?

जैसे जैसे मुसहर समाज अपने अधिकारों के लिए सजग हो रहा है वैसे वैसे जातिवादी ताकतें भी उनके आत्म सम्मान को षड्यंत्रपूर्वक तोड़ने का प्रयास कर रही हैं । इसलिए यह आवश्यक है कि प्रशासन और सरकार इस बात को गंभीरता से ले ताकि समाज के इस सबसे दबे-कुचले समुदाय को न्याय मिले और वह भी राष्ट्र की मुख्यधारा में आकर अपना योगदान कर सके।

अपने पे हंसके जग को हंसाया, बन के तमाशा मेले में आया..

ये सभी समुदाय पूर्णतः भूमिहीन हैं और किसी भी गाँव में उनके रहने के लिए लोगों के दिल अभी तक बड़े नहीं हुए। छुआछूत और जातीय भेदभाव है लेकिन नाम मुस्लिम है इसलिए अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग का होना का लाभ नहीं मिलता। न ग्रामीण भारत में विकास के नाम पर वो किसी के एजेंडे में और न ही हिन्दू-मुस्लिम या अन्य किसी जाति के लिए महत्वपूर्ण। अब समय आ गया है कि पसमांदा आन्दोलन के लोग और स्वाभिमान के लिए संघर्षरत अम्बेडकरवादी आन्दोलन के साथी इन जातियों तक पहुंचें और बाबा साहेब अम्बेडकर का सन्देश उन तक पहुंचाएँ ताकि वे सभी अपने समाज में बदलाव ला सकें और रुढ़िवादी परम्पराओं से बाहर निकलकर सम्मानपूर्वक जिंदगी जी सकें।
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