हाफ सर्कल फुल सर्कल

चन्द्रदेव यादव

1 1,302

सन् 2018 के मध्य जून की एक शाम।

स्थान- ओखला बैराज। यमुना का किनारा

यह कोई पिकनिक स्थल तो नहीं है, मगर यहाँ पर आसपास के बहुत-से लोग सुबह-शाम टहलने के लिए ज़रूर आते हैं। सुबह  की अपेक्षा शाम को यहाँ कुछ ज़्यादा ही भीड़ होती है। अनधिकृत कॉलोनियों की तंग गलियों में ऊब महसूस करने वाले शाम को यहाँ खुली हवा में आकर राहत की सांस लेते हैं। लोगों की चहल-पहल से कुछ समय तक यह वीरान-सी जगह गुलज़ार हो जाया करती है। शाम के वक़्त दीवार या कि झाड़ियों की ओट लिए जन संकुल एकांत में बैठे प्रेमी जोड़ों की सांय-सांय और खुसुर-फुसुर से नहर का किनारा तरंगित हो उठता है। प्रेमी युगलों के लिए नदी और नहर की दुर्गन्ध सुगंध में परिवर्तित होती लगती है। ऐसा लगता है जैसे यहाँ पर किसी आधुनिक इत्र-विक्रेता ने बदबू में भी ख़ुशबू का एहसास कराने वाला इत्र छिड़कवा दिया हो ताकि नारकीय स्थितियों में भी प्रेमी युगल स्वर्गीय आनंद ले सकें। ऐसे में फिजा में बहुत देर तक प्रेम की मादकता का एहसास होता रहता है। एक बार रामा भाई ने यहाँ घूमते हुए ऐसा ही दृश्य देखा तो कहा कि यह इश्क़ नहीं, इश्क़ का प्रदर्शन है। ढोंग है यह बेहयाई वाला इश्क़। ये दोनों लड़का-लड़की बेशरम हैं। इनके पीछे चार डंडा लगाओ, सारी बेशरमी कपूर की तरह उड़ जाएगी। रामा भाई ठहरे खाँटी देसी आदमी। उन्हें क्या पता कि आज के महानगरों के लोग किस तरह इश्क़ करते हैं। यहाँ ‘खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे’ का मतलब ‘सरेआम निर्लज्जता’ होता है। सड़क और गली-कूचे, पब्लिक पार्क और उपवन, पुल और पुलिया आने-जाने और घूमने-फिरने के लिए होते हैं, इश्क़ फरमाने के लिए नहीं। शहर के बेशर्म इश्क़ के बारे में उनकी टिप्पणियां हवा में उड़ा देने वाली नहीं हैं।

आगरा नहर

खैर, बात ओखला बैराज की। सच्ची में, विषयांतर के लिए खेद है। बहुत-से लोग कहेंगे कि महानगरीय जीवन पर एक देहाती की टिप्पणी का क्या अर्थ है? वह तो नकारात्मक होगी ही! मगर भई वह है, तो है! महानगरीय इश्क़ पर सकारात्मक टिप्पणी के लिए बॉलीवुड के ‘ए’ मार्का फिल्म के किसी समीक्षक को तो पकड़ कर लाने से रहा! कोई चाहे तो एक प्रतिलेख तैयार कर ले!

ओखला बैराज से ही आगरा नहर निकली है। यह बैराज अंग्रेजों के ज़माने का बना हुआ है। इसका उद्घाटन सर विलियम मुईर,केसीएसआई ने 1874 ई. में किया था। बैराज पर लगी मिश्र धातु से बनी उसकी नामपट्टिका को हाल ही में कोई उखाड़ ले गया था, लेकिन सिंचाई विभाग, उत्तर प्रदेश के अधिकारियों ने वहाँ नई नाम पट्टिका लगवा दी है। बैराज अभी भी जस का तस है। बदली है तो सिर्फ यमुना। वह नदी नहीं रही, अब नाला बन गई है। आधुनिक सभ्यता ने भौतिक विकास के नाम पर सर्वाधिक ज़ुल्म नदियों और वनों पर किया है। व्यापारिक पूँजीवाद ने अपने मुनाफ़े के लिए पूरी मानव जाति को विनाश के गर्त में धकेल दिया है। गर्मियों में यमुना के पास से गुज़रना नरक में गुज़रने जैसा लगता है। उसके पानी से उठता हुआ बदबूदार भभका मन को विचलित कर देता है।

हम भी कम थोड़े बदले हैं। पवन, पानी, धूल-मिट्टी सबको बिगाड़कर हम नये हो गए हैं। सभ्यता के शिखर पर हम इसी तरह पहुँच सकते थे। इसी को कहते हैं अपने पाँव में कुल्हाड़ी मारना!

कल 22 जून की शाम को ओखला बैराज पर वाकिंग करते हुए मैंने दो युवकों को देखा। उनके हाथ में ब्राउन कलर की शीतल पेय की प्लास्टिक की बोतलें थीं। थोड़ी-थोड़ी पीते हुए वे मस्ती से टहल रहे थे। उनके चेहरे पर किसी तरह की हड़बड़ी के निशान नहीं थे। हड़बड़ी में गड़बड़ी हो जाती है, इसलिए वे अपनी हड़बड़ी को महीने भर से पहनी जा चुकी गन्दी जीन्स की पैंट में धुलने के लिए घर छोड़ आए थे। वे परम संतुष्ट लग रहे थे। उनको इस तरह पीते-पीते टहलते हुए देखकर आधुनिक युवाओं की जीवनशैली और खान-पान को लेकर मेरे मन में कई तरह के सवाल आए-गए। लेकिन उस शीतल पेय को देखकर मुझे एक बहुत पुरानी घटना की याद हो आई।

गाँव में आकर दंद-फंद करने से पहले रोज़ी-रोटी के लिए उसने बनारस में एक कोचिंग सेंटर खोला था, दारा नगर में। यह 1980-82 की बात है। उस समय मैं भी बनारस में था, मगर वहाँ उससे मेरी मुलाक़ात नहीं हुई कभी। कोचिंग में भी कोई फ्रॉड किया था उसने। पुलिस उसे ढूँढते हुए दारा नगर पहुँचगई थी।

एक था चेतनारायण

चेतनारायण को आप नहीं जानते। जानेंगे भी कैसे! वह कोई प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री या कोई टाटा-बिरला तो था नहीं! वह कोई कवि-लेखक या चिन्तक या प्रोफ़ेसर भी तो नहीं था। मैंने भी तो अभी नहीं बताया उसके बारे में कि आप जानेंगे! वैसे मैं ही कहाँ पूरा जान पाया उसे अब तक। गाँव के कुछ लोग उसे जीनियस तो कुछ लोग सिरफिरा कहते थे। लेकिन था वह अपने ढंग का अकेला युवक। दरअसल चेतनारायण मेरे गाँव का एक युवक था। जाति का लोहार था। हमारे इलाक़े में लोहार लोग ही बढ़ई का भी काम करते हैं। लोहे और लकड़ी का काम करने वाले उन लोगों को लोग लोहार ही कहते हैं। इस तरह लोहारों का टोला ‘लोहरान’ कहलाता है, जैसे कोंहारों का टोला कोहरान, अहीरों का अहिरान और गंड़ेरियों का गड़ेरान। चेतनारायण के पिता लकड़ी के अच्छे कारीगर थे। अगर चेतनारायण  पढ़ता-लिखता नहीं तो शायद लोहे या लकड़ी का एक अच्छा कारीगर होता। पढ़ने-लिखने में बहुत ज़हीन था वह। गणित और विज्ञान में पारंगत, ख़ासतौर से गणित का विशेषज्ञ। अंग्रेजी भी अच्छी थी उसकी। बालिग़ होने से पहले अपनी पढ़ाई के दौरान ही उसनेकई सवर्ण साथिनों को गणित पढ़ाया था और गणित पढ़ाते-पढ़ाते उनके साथकुछ प्रमेय भी सिद्ध किए थे। कई रसिक किस्म के रेखियाउठान छोकरों के लिए उसकी यह प्रमेय-सिद्धि ईर्ष्या का विषय बनी हुई थी। मुझे यह बात गाँव के ही एक युवक ने बताई थी, बहुत बाद में। यह प्रमेय कुछ और नहीं, कै नवां मुँह चुम्मी क चुम्मा वाला गँवईं पहाड़ा था।

बोर्ड की परीक्षाओं के दौरान उसका भाव बेहद बढ़ जाता था। नक़ल कराने वाले गिरोह या कोई रसूखदार आदमी उसे पकड़ कर परीक्षा केंद्र ले जाते थे। पेपर बंटते ही उसे प्रश्नपत्र उपलब्ध करा दिया जाता था और 15-20 मिनट मेंउसे हल करने के लिए कहा जाता था। प्रश्नपत्र पर एक नज़र डालने के बाद वह उसको हल करने लगता था। उन प्रश्नों के उत्तर वह इस तरह से लिखता था जैसे किसी के हल किए हुए प्रश्न के उत्तर की नकल कर रहा हो। सुविधासंपन्न लोग उसके द्वारा हल किए हुए प्रश्नोत्तर की कॉपी कराके विभिन्न परीक्षा केन्द्रों पर परीक्षा दे रहे ‘अपने बच्चों’ के पास पहुँचा देते थे। उन बच्चों का भविष्य सँवारने के एवज में उसे हज़ार-दो हज़ार नक़द मिल जाते थे। खातिर-भाव होता, सो अलग। प्रश्नपत्र हल करने के दौरान उसके पसंदीदा कोल्ड ड्रिंक्स और पान की विशेष व्यवस्था की जाती थी।

पैसे के लेन-देन को लेकर कभी-कभी विवाद भी हो जाता था। इसी चक्कर में एक बार उसकी पिटाई भी हो गई थी। उस दिन उसे खाली हाथ घर आना पड़ा था। किसी ‘मोछू’ यानी बाबू साहेब से पंगा ले लिया था उसने। पिटने के बाद ‘हीरामन’ की तरह उसने भी शायद पहली क़सम खाई थी और उस घटना के बाद से उसने चाँदी के चम्मच से खाने वाले ‘भविष्य के कुशाग्र बुद्धि वाले बच्चों’ की तकदीर सँवारने का काम नये ज़हीन लोगों पर छोड़ दिया था। पिटाई खाकर उसे बहुत ग्लानि हुई थी। उसकी अंतरात्मा ने बहुत धिक्कारा था उसे। खुद को लानत भेजते हुए कहा था उसने—भाड़ में जाए ऐसा काम! साला दिमाग भी खपाओ और लात भी खाओ। हुँह!

मुझे बाद में पता चला कि वह दुनिया भर के दंद-फंद में फँसा हुआ है।

चेतनारायण बेरोज़गार था। माता-पिता की इकलौती संतान होने की वजह से वह बचपन से ही थोड़ा बिगडैल स्वभाव का था। उसकी वृद्धा माँ अशक्त थी और बूढ़े पिता का उस पर कोई नियंत्रण नहीं था। इसलिए वह इधर-उधर घूमता रहता था।

गाँव में आकर दंद-फंद करने से पहले रोज़ी-रोटी के लिए उसने बनारस में एक कोचिंग सेंटर खोला था, दारा नगर में। यह 1980-82 की बात है। उस समय मैं भी बनारस में था, मगर वहाँ उससे मेरी मुलाक़ात नहीं हुई कभी। कोचिंग में भी कोई फ्रॉड किया था उसने। पुलिस उसे ढूँढते हुए दारा नगर  पहुँचगई थी।

दारानगर से ठीक पहले, नुक्कड़ पर ही, संयोग से उसकी मुलाकात पुलिस से हो गई। पुलिस ने छरहरे बदन के एक दुबले-पतले युवक को अपनी ओर आता देखा तो रुक कर उसी से पूछा, “चेतन लहरी को जानते हो?” यह जानकर कि पुलिस उसी को ढूँढ़ रही है और उसके बारे में उसी से पूछ रही है, वह तनिक भी नहीं घबराया। बोला, “हाँ।”

“कहाँ रहता है वह?” पुलिस का अगला सवाल था।

“पता नहीं साहेब। शायद बम्बई में। उसका गाना खूब चल रहा है आजकल—आया मैं डिस्को डांसर…”

“अरे धत”, एक पुलिस वाले ने कड़क कर कहा, “साले मजाक करते हो? आंय! दारा नगर में क्या करने आएगा बप्पी लहरी?” फिर थोड़ा नरम होकर बोला, “हम बप्पी लहरी के बारे में नहीं, चेतन लहरी के बारे में पूछ रहे हैं, चेतन लहरी ! समझे?”

उसने बहुत ही मासूमियत से कहा,“अच्छा चेतन लहरी! वो तो वहाँ सामने रहता है। वो जो सामने वाली गल्ली है न! उसी में सीधे चले जाइए। गल्ली में घुसते ही वहाँ बांईं तरफ जो बाड़ा है, उसी में उसका कोचिंग सेंटर है। मतलब वहीँ रहता है वो।”

उसने कलाई घड़ी पर इस तरह नज़र डाली जैसे बहुत ज़रूरी बात को याद कर रहा हो। पुलिस को सावधान करते हुए उसने कहा, “जल्दी जाइए साहेब, नहीं तो कहीं निकल जाएगा। बहुत होशियार आदमी है। आप लोगों के आने की सूचना मिलते ही वह आँखों में धूल झोंककर रफूचक्कर हो जाएगा।”

इतना कहकर वह आगे बढ़ना ही चाहता था कि एक पुलिस वाले ने उसे रोकते हुए पूछा, “क्या नाम है तुम्हारा?”

उसने डरने का अभिनय करते हुए कहा, “म म मेरा? च च चेतन?”

“क्या?” पुलिस वाले दो कदम पीछे हट गए जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो उन्हें।

“जी साहेब चेतन बिसकर्मा। चेतन लहरी नहीं।” पुलिस को अपने ऊपर शंका करते देख उसने स्पष्ट किया।

पुलिस को संदेह तो हो गया था, लेकिन उसने उसकी बात पर यह सोचकर यकीन कर लिया कि एक तो यह मरियल युवक किसी कोचिंग सेंटर का मालिक नहीं हो सकता और दूसरे अगर यह अपराधी होता तो हमसे इतनी देर तक निडर होकर बातें नहीं करता। दूसरे पुलिस वाले ने हंसते हुए कहा “कोई बात नहीं, एक नाम के कई आदमी होते हैं। चलो हमें उसके घर तक पहुँचा दो। हम कहाँ ढूँढ़ते फिरेंगे उसका घर!”

उसने तनिक घबराते हुए कहा, “अरे नहीं साहब, हमें क्यों फँसा रहे हैं। अपनी ही गली की बात है। देर-सबेर उसे यह बात मालूम ही हो जाएगी कि मैंने पुलिस को उसके घर का पता बताया था। फिर तो वह मेरा दुश्मन हो जाएगा। आप जाइए। बिलकुल सीधे। कहीं मुड़ने की ज़रूरत नहीं है। वो सामने रहा उसका कोचिंग सेंटर।”

उसने हाथ को सीधा फैलाकर दारा नगर वाली गली की ओर इशारा किया और पुलिस वालों के चेहरों को पढ़ते हुए उनको सलाम किया। जैसे ही वेथोड़ा आगे बढ़े, वह वहाँ से नौ-दो ग्यारह हो गया।

पुलिस को अपना नाम और पता सही बताया था उसने।

चेतन लहरी यानी चेतनारायण विश्वकर्मा से मेरी पहली मुलाकात मेरे अपने गाँव में राम औतार वर्मा की पान की गुमटी पर हुई थी।

शाम को मैं अकसर गाँव में स्थित अपने डॉक्टर मित्र अभय शंकर सिंह की क्लिनिक पर चला जाता था। वहीं अख़बार पढ़ता था। डॉक्टर के घर से आई चाय पीता था। मेरे अलावा कुछ और लोग जुटते थे वहाँ पर। पान की दुकान बीच रास्ते में पड़ती थी। हम वहीँ पान खाया करते थे। छोटी-मोटी बैठकी वहाँ भी हो जाया करती थी।राम औतार की पत्नी अध्यापिका थीं। बहुत अच्छे स्वभाव की, संस्कारी। कभी-कभी वे भी ज़बरदस्ती चाय पिला देती थीं मुझे। उनका स्कूल गाँव से बहुत दूर था। इसलिए वे बस से आती-जाती थीं। राम औतार उन्हें साइकिल से बस स्टॉप तक छोड़ते थे और शाम को बस स्टॉप से ले भी आते थे। इस दौरान उनकी पान की गुमटी में ताला लगा रहता था। उनकी गुमटी के सामने बिजली के टूटे हुए खम्भे से बने बेंच पर बैठे-बैठे आसपास के कई गाँवों के लोगों से मुलाक़ात भी हो जाया करती थी।

यू.पी. कॉलेज से 1985 में एम. ए. करने के बाद मेरे गुरु डॉ. सकलदीप सिंह ने मुझसे कहा कि पीएच.डी. कर लो। लेकिन पीएच.डी. में न तो बीएचयू में मेरा रजिस्ट्रेशन हुआ और न ही काशी विद्यापीठ में। कवि-कथाकार अब्दुल बिस्मिल्लाह के साथ मैं कथाकार काशीनाथ सिंह, डॉ. कुमार पंकज, डॉ. अवधेश प्रधान और न जाने किस-किस से मिला था। काशीनाथ सिंह के यहाँ बात बनते-बनते रह गई थी। मैं बीएचयू से खाली हाथ लौट आया था। आर्थिक संकट के कारण मैं बनारस से बाहर भी नहीं जा सकता था। थक-हार कर मैं गाँव जाकर खेती करने लगा। कविताएं पहले से ही लिख रहा था। उस दौरान कुछ कहानियाँ भी लिखी थीं मैंने, जिनमें से दो कहानियाँ ‘कदम’ (संपा. अब्दुल बिस्मिल्लाह) और ‘कहानियाँ मासिक चयन’ (संपा. सत्येन कुमार, भोपाल) में छप चुकी थीं। मेरे गाँव के कुछ लोग इस बात से वाकिफ थे।

जुलाई का महीना था। भयंकर उमस थी। खेती के काम से निवृत्त होकर मैं अखबार पढ़ने निकला था। आषाढ़ की गर्मी से त्रस्त होकर चेतन भी टहलते हुए वहीँ आ गया था, पान खाने। उसी समय मेरे एक दोस्त ने दुआ-सलाम के बाद मेरा नाम लेकर मुझसे कुछ पूछा था। मेरा नाम सुनते ही चेतन ने तपाक से कहा,“आप ही चन्द्रदेव यादव हैं? आप तो ‘कबी’ हैं। मैं हूँ चेतन—चेतनरायन। इसी गाँव का। वो रहा मेरा घर…” उसने अपने घर की ओर हाथ से इशारा करते हुए कहा, जो मुश्किल से बीस-पचीस मीटर आगे था। फिर बोला, “भई हम तो ठहरे सीधे-सादे आदमी। मगर हममें दोस्ती तो हो ही सकती है।”

भला अपने ही गाँव के आदमी के दोस्ती के प्रस्ताव को कौन ठुकरा सकता है। तो उसी दिन से हम दोनों की औपचारिक दोस्ती हो गई।

वहीं पर एक दिन उसने मुझे अपनी योजना के बारे में बताया था। दरअसल बोर्ड में उसकी किसी से जान-पहचान हो गई थी। सो, वह उसी के भरोसे दसवीं-बारहवीं में फेल बच्चों को पास कराने का काम करने लगा था। इस कार्य के लिए वह हर क्लाइंट से हज़ार-दो हज़ार रुपये लेता था। उन रुपयों में पता नहीं उसके हिस्से कितना आता था!

अपनी बेरोज़गारी का दुखड़ा रोते हुए मैं यह भूल ही गया था चेतन भी बेरोज़गार है। कमाने-खाने के लिए मेरे पास कम से कम कुछ खेत थे, उसके पास तो वह भी नहीं था। दस-पाँच बिस्वा रहा भी होगा तो उससे क्या! इसीलिए तो वह इस तरह के धंधे में लिप्त था। मैंने अपनी बात जारी रखी, “इस समय तो मैं बस पान खिला सकता हूँ।

एक गरजमंद को मैंने भी उससे मिलवाया था, लेकिन वह इतने रुपये देने में असमर्थ था। ठेठ किसान परिवार का था वह। उसके बहुत-सी गायें थीं। उससे कहा गया कि पैसे नहीं हैं तोएक गाय बेचकर दो। पैसे हो जाएंगे, मगर उसके घरवाले अपने बेटे के ‘सुनहरे भविष्य’ के लिए एक गाय कुर्बान करने को तैयार नहीं हुए। इसलिए बात नहीं बनी। मुझे उसके घरवालों पर ग़ुस्सा आया कि ये कितने जाहिल लोग हैं। दो हज़ार के मोह में ये अपने बेटे का एक साल बरबाद कर रहे हैं। मुझे तब तक चेतन के इस ‘धंधे’ की विस्तृत जानकारी नहीं थी। हालांकि काम वह पक्का करवाता था। प्रसंग आने पर उसके किसी परिचित ने मुझे बताया था इसके बारे में।

एक दिन मैंने उससे पूछा, “किसी के सर्टिफिकेट में उसके नाम की स्पेलिंग गलत प्रिंट हो गई है। उसको ठीक कराने में कितना खर्चा लगेगा?”

“वैसे तो बस दो सौ लगते हैं, लेकिन बंदा अगर आपका ख़ास है तो कम में ही हो जाएगा।” उसने कहा।

“फिर भी कितना?” मैंने पूछा।

उसने बड़े ही फनी अंदाज़ में कहा—“आप सबमें किफ़ायत क्यों करवाते हैं? आपको तो देना नहीं है कि कंजूसी कर रहे हैं। कुछ खर्चा-वर्चा करवाया कीजिए अपने कैंडिडेट्स से।” कुछ देर वह रुका, फिर बोला, “कभी-कभी आप ही कुछ खिला-पिला दिया कीजिए।”

मैंने पूछा, “वो किसलिए?”

उसने कहा, “बस यूँ ही।” इतना कहकर वह मुस्कुराया और फिर प्रतिप्रश्न किया उसने, “कुछ हो तभी खर्चा करते हैं?”

मैंने कहा, “यार, बेरोज़गार आदमी से क्या उम्मीद करते हो। वही मसल है कि घर में नहीं दाने और अम्माँ चलीं भुनाने।”

अपनी बेरोज़गारी का दुखड़ा रोते हुए मैं यह भूल ही गया था चेतन भी बेरोज़गार है। कमाने-खाने के लिए मेरे पास कम से कम कुछ खेत थे, उसके पास तो वह भी नहीं था। दस-पाँच बिस्वा रहा भी होगा तो उससे क्या! इसीलिए तो वह इस तरह के धंधे में लिप्त था। मैंने अपनी बात जारी रखी, “इस समय तो मैं बस पान खिला सकता हूँ। घर का बना कुछ खाना हो तो जब मर्ज़ी हो तब…”

“उंह, छोड़िए।” उसने मेरी बात काटते हुए कहा, “घर का तो कभी भी खा लेंगे। इस समय बाहर का कुछ खाने-पीने का मन कर रहा है…।” वह रुका। फिर बोला “चलिए, कुछ पिलाही दीजिए।”

“क्या पिएंगे?” मैंने पूछा।

वह बिलकुल मेरे नजदीक आया। मेरी दाहिनी बाँह पर अपनी दो उँगलियों से लहर-सी पैदा करते हुए उसने गणित की शब्दावली में तपाक से कहा—“हाफ सर्कल फुल सर्कल हाफ सर्कल ए। हाफ सर्कल फुल सर्कल राइट एंगल ए।”

यह सुनकर मेरी बुद्धि चकरा गई। मैं उसे देखता रह गया। कुछ देर बाद मेरे बोल फूटे—“बाप रे, क्या मतलब?”

मेरी चुटकी लेते हुए उसने कहा, “हम कविता-कहानी नहीं लिख सकते, मगर अपनी भाषा (गणित की भाषा) में अलग ढंग से हम भी तो कुछ कह ही सकते हैं। है कि नहीं!” मेरी अज्ञानता पर देर तक मुझे लज्जित न करते हुए उसने कहा, “नहीं समझे? इसका मतलब है—COCA  CO।A .”

मुझे इस बात का अफ़सोस है कि एक कुशाग्र बुद्धि वाला युवक मार्ग से भटक जाने के कारण बरबाद हो गया। बरसों पहले उसी पान की गुमटी पर पता चला किइस बीच दुर्व्यसनी भी हो गया था वह।उसके घर पर पीने-खाने वालों की भीड़ जुटने लगी थी। पता नहीं क्यों एक दिन उसकी बीवी उसे छोडकर अपनी नवजात बच्ची के साथ कहीं चली गई। गणित के बड़े-बड़े प्रश्नों को चुटकियों में हल करने वाला चेतन अपनी ज़िन्दगी के प्रश्नों को हल नहीं कर पाया। अकेला, अवसादग्रस्त और अभाव में जीता चेतन एक दिन चला गया इस दुनिया से। असमय।

उस समय साधारण लोगों के लिए कोका-कोला पीना महंगा शौक था। आठवें दशक के आसपास इसका चलन भी कम था। छोटे-मोटे बाज़ारों में तो वह मिलता भी नहीं था। आज की बात अलग है। आज तो एक साधारण मजदूर भी रोटी को नमक और प्याज के साथ खाते हुए कोक या पेप्सी पीते हुए मिल जाएगा। लेकिन उस समय इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। अजीब हाल है। प्यास पानी से बुझती है, इस बात को लोग भूलते जा रहे हैं। लस्सी और छाछ में उनकी कोई रुचि नहीं है। गाँव के अधिकतर लोग सोचते हैं कि घर में दही और छाछ तो खाते ही पीते हैं, बाज़ार में जाकर भी छाछ और लस्सी ही पिएं ! इसलिए बाज़ार में प्यास बुझाने के लिए वे किसी शीतल पेय को पसंद करते हैं। कोल्ड ड्रिंक पीकर गैसयुक्त डकार लेने में उन्हें बहुत मज़ा आता है। इस समय गाँवों में जिन घरों में फ्रिज है, वह आसपास के लोगों की कोल्ड ड्रिंक्स की बड़ी बोतलों से भरी होती है। शहरी युवाओं में तो कुछ युवा हद दर्जे के जुनूनी हैं। वे जाड़ों में भी कोल्ड ड्रिंक पीते हैं। कुछ युवक-युवतियाँ तो लंच के नाम पर चिप्स और कोल्ड ड्रिंक पीकर परम तृप्ति महसूस करते हैं। 15-20 साल पहले कोल्ड ड्रिंक्स के विज्ञापन सिर्फ गर्मियों में आते थे। वाकई, ज़माना तेज़ी से बदल रहा है। नई पीढ़ी के लड़के-लड़कियां देसी चीजों को उपेक्षा-भाव से देखने लगे हैं।

तब से अब तक एक लम्बा अन्तराल हो गया। इस बीच बहुत सारी चीजें बदल गईं। कुछ बदलने के कगार पर हैं। गाँव भी बहुत तेज़ी से बदले हैं। गाँवों ने अधिकतर शहरों के उच्छिष्ट को ग्रहण किया है। कुछ चीजें मेरी स्मृति-पटल से ग़ायब हो गई थीं। चेतन लहरी भी मेरी यादों में नहीं आया कभी। और जब याद आया तो वहाँ न तो चेतन था और न ही उसके गुणों-अवगुणों वाली कोई लहरी।

कुछ साल पहले पान की गुमटी से आगे बढ़ते हुए चेतन के घर पर नज़र पड़ी तो दिल में हूक-सी उठी। खंडहर हो चुका था उसका घर, मगर घर के आगे वाला हिस्सा जस का तस था। चेतन के पिता ने अपने कच्चे घर को सजाने में अपनी पूरी कारीगरी झोंक दी थी। नक्कासीदार दरवाज़े, कलात्मक टोंड़े और बच्चियाँ। घर के सामने और साइड में पतली सड़क की ओर की कच्ची दीवार पर लगी ईंटों की छल्लियाँ उसी तरह थीं। उन्हें देखकर लगा, जैसे अपने मालिक का नाम सुनकर हुलस कर मुस्कुरा पड़ेंगी ये। मगर नहीं। वहाँ तो घनघोर उदासी तारी थी चारों तरफ। मेरे मन में एक चीख़-सी निकली और भीतर ही दबकर रह गई कि चेतन, क्या किया तुमने! अपनी विरासत को भी नहीं सँभाल सके तुम कमबख्त!

मुझे इस बात का अफ़सोस है कि एक कुशाग्र बुद्धि वाला युवक मार्ग से भटक जाने के कारण बरबाद हो गया। बरसों पहले उसी पान की गुमटी पर पता चला किइस बीच दुर्व्यसनी भी हो गया था वह।उसके घर पर पीने-खाने वालों की भीड़ जुटने लगी थी। पता नहीं क्यों एक दिन उसकी बीवी उसे छोडकर अपनी नवजात बच्ची के साथ कहीं चली गई। गणित के बड़े-बड़े प्रश्नों को चुटकियों में हल करने वाला चेतन अपनी ज़िन्दगी के प्रश्नों को हल नहीं कर पाया। अकेला, अवसादग्रस्त और अभाव में जीता चेतन एक दिन चला गया इस दुनिया से। असमय।

हाफ सर्कल फुल सर्कल करते-करते वह हाफ सर्कल भी नहीं बन पाया कभी।

चन्द्रदेव यादव जाने-माने कवि-आलोचक और लोकमर्मज्ञ हैं। फिलहाल जामिया मिलिया इसलामिया दिल्ली में प्रोफेसर हैं।

1 Comment
  1. बहुत बढ़िया संस्मरण है।
    हार्दिक बधाई चन्द्रदेव जी!.

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