हिंदुत्व और फासीवाद (डायरी 11 मई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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यह सवाल बचपन में अधिक परेशान करता था कि वह कौन है जो परिभाषायें तय करता है। दरअसल होता यह था कि हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण पढ़ानेवाले शिक्षक परिभाषायें खूब याद कराया करते थे। नहीं याद करने पर दंड का डर रहता था। तो होता यही था कि दंड के डर से रट्टा मारना पड़ता था। संस्कृत के कारण परेशानी सबसे अधिक होती थी। संस्कृत के शिक्षक कोई और नहीं स्कूल के प्रिंसिपल सर होते थे। स्कूल का नाम था– नक्षत्र मालाकार हाई स्कूल। यह मेरे गांव के उत्तर में बेऊर मोड़ पर अवस्थित था। यह एक निजी विद्यालय था। तब फीस 75 रुपए लगते थे। किताब-कॉपी विद्यालय से ही खरीदने के लिए अलग से दबाव बनाए जाने की शुरुआत ही हुई थी। अब तो यह लगभग सभी निजी विद्यालयों का धंधा है।
खैर, मैं परिभाषाओं की बात कर रहा था। होता यह था कि बिना समझे रट्टा मारने पर दस दिनों के बाद कुछेक परिभाषाएं भूल भी जाता था। तब यह सोचता था कि मेरे शिक्षक परिभाषाओं को सहज तरीके से समझाते क्यों नहीं हैं और क्यों उन्हें परिभाषायें शब्दश: चाहिए। हम बच्चे अपने हिसाब से भी परिभाषायें तय कर सकते हैं। मसलन संज्ञा की परिभाषा के बारे में हम कह सकते हैं कि हर भौतिक चीज का संबोधन हम जिस शब्द से करते हैं, वह संज्ञा है। या फिर ऐसे कि जिसे हम देख-सुन-सुंघ-छू सकते हैं, उन्हें संबोधित करने के लिए जिन शब्दों का उपयोग करते हैं, वे संज्ञा हैं। लेकिन नहीं, शिक्षक महोदय को तो वही चाहिए था जो उन्होंने लिखवाया था।
तो उस समय यही लगता था कि परिभाषाएं हमारे शिक्षक ही तय करते हैं और हमें उनकी परिभाषाओं को ही मानना चाहिए। लेकिन यह तो बचपन की बातें थीं।

अकादमिक गतिविधियों में सरकार का हस्तक्षेप कितना महत्वपूर्ण है? क्या यह हस्तक्षेप होना चाहिए? या फिर परिभाषाओं को अकादमिक जगत के विद्वानों के हवाले ही कर दिया जाना चाहिए? ये सारे सवाल महत्वपूर्ण हैं। वजह यह कि हस्तक्षेप ना होने से हुक्मरानों सी निरंकुशता अकादमिक जगत के विद्वानों में भी आ जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे नामवर सिंह एक समय के बाद निरंकुश हो गए थे। कांग्रेसी हुक्मरान ने उन्हें पूरी आजादी दे रखी थी। वे अपने जाति व वर्ग के हिसाब से चीजों को देखते थे और व्याख्यायित करते थे

 

अब तो परिभाषाएं बनते-बिगड़ते रोज-ब-रोज देख रहा हूं। दिलचस्प यह कि यह काम भारतीय अकादमिक जगत के लोग नहीं कर रहे। या कहिए कि कर तो वे ही रहे हैं, लेकिन उनके केवल शब्द हैं और मूल भाव हमारे देश के हुक्मरान के हैं। तो हमारा हुक्मरान जिस शब्द की जैसी परिभाषा गढ़ना चाहता है, हमारे अकादमिक जगत के लोग वैसी ही परिभाषा न केवल गढ़ रहे हैं, बल्कि उसका महिमामंडन भी कर रहे हैं।
यह सवाल है कि अकादमिक गतिविधियों में सरकार का हस्तक्षेप कितना महत्वपूर्ण है? क्या यह हस्तक्षेप होना चाहिए? या फिर परिभाषाओं को अकादमिक जगत के विद्वानों के हवाले ही कर दिया जाना चाहिए? ये सारे सवाल महत्वपूर्ण हैं। वजह यह कि हस्तक्षेप ना होने से हुक्मरानों सी निरंकुशता अकादमिक जगत के विद्वानों में भी आ जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे नामवर सिंह एक समय के बाद निरंकुश हो गए थे। कांग्रेसी हुक्मरान ने उन्हें पूरी आजादी दे रखी थी। वे अपने जाति व वर्ग के हिसाब से चीजों को देखते थे और व्याख्यायित करते थे। आज भी भारतीय अकादमिक जगत के केंद्रक से बहुसंख्यक वर्ग के विद्वान शामिल नहीं हैं। एक अंतर है कि आरएसएस ने अपने द्विज विद्वानों के मुंह में भी लगाम पहना रखा है।
एक उदाहरण देखिए। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने शारदा विश्वविद्यालय से एक मामले में जवाब तलब किया है। शारदा विश्वविद्यालय एक निजी विश्वविद्यालय है जो ग्रेटर नोएडा में है। मामला यह है कि मूल्यांकन परीक्षा के दौरान इस विश्वविद्यालय ने एक सवाल पूछा, जिससे भारत का मौजूदा हुक्मरान आहत हो गया। अब हुआ यह कि यूजीसी ने शारदा विश्वविद्यालय पर दबाव बनाया। हालांकि यह मामला सामने आते ही हुक्मरान के डर से शारदा विश्वविद्यालय ने पहले ही अपने उस शिक्षक को निलंबित कर दिया, जिसने यह सवाल तैयार किया था– ‘क्या आप फासीवाद/नाजीवाद और हिंदू दक्षिणपंथ/हिंदुत्व के बीच समानता पाते हैं? तर्कों के साथ बताएं’ यह सवाल बीए प्रथम वर्ष की परीक्षा में राजनीति विज्ञान के प्रश्नपत्र में शामिल था।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में फासीवाद की परिभाषा और क्या हो सकती है जब हिंदुत्व के अवैज्ञानिक और अमानवीय मूल्यों को बरकरार रखने के लिए दिनदहाड़े मॉब लिंचिंग की जा रही है? क्या यह काफी नहीं है यह बताने के लिए कि जिस तरह जर्मनी में हिटलर ने खास समुदाय के लोगों के हित में मारकाट किया था, और जिसे फासीवाद कहा गया, वैसे ही हालात भारत में हैं।

 

जाहिर तौर पर सवाल पूछनेवाले शिक्षक ने एक सवाल रखा। और कोई भी सवाल वाजिब है या गैर वाजिब, यह तय करना संबंधित विश्वविद्यालयों के विद्वानों का काम है। अब यदि उपरोक्त सवाल प्रश्नपत्र में शामिल था तो ऐसा सभी की सहमति से हुआ होगा। लेकिन दंड उसे ही क्यों जिसने यह सवाल तैयार किया था? क्या इसकी वजह केवल यह कि वह शिक्षक मुसलमान है और इस कारण उसे दंडित किया जा रहा है?
रही बात फासीवाद और हिंदुत्व के बीच संबंध की तो इसमें कहां कोई बात छिपी नहीं है। हिंदुत्व की अवधारणा वर्णव्यवस्था पर आधारित है, जो कि फासीवाद का ही एक रूप है, जिसके तहत संसाधनों पर अधिकार मुट्ठी भर लोगों को होता है। वे ना केवल संसाधनों पर, बल्कि समाज के हर स्तर पर अपना वर्चस्व बनाकर रखते हैं। वेद-पुराणों को पढ़ने के बाद वेैसे भी केवल यही बात सामने आती है। आखिर भारतीय परिप्रेक्ष्य में फासीवाद की परिभाषा और क्या हो सकती है जब हिंदुत्व के अवैज्ञानिक और अमानवीय मूल्यों को बरकरार रखने के लिए दिनदहाड़े मॉब लिंचिंग की जा रही है? क्या यह काफी नहीं है यह बताने के लिए कि जिस तरह जर्मनी में हिटलर ने खास समुदाय के लोगों के हित में मारकाट किया था, और जिसे फासीवाद कहा गया, वैसे ही हालात भारत में हैं।
मैं तो एक रपट देख रहा हूं। रपट यह बता रही है कि 2014 से लेकर 2019 के बीच राजद्रोह के आरोप में यानी आईपीसी की धारा 124 ए के तहत कुल 326 मामले दर्ज किये गये और केवल छह आरोपियों को दोषी पाया गया। शेष 320 लोगों को जेल की सजा काटनी पड़ी। सामाजिक स्तर पर उनका मानमर्दन किया गया। दिलचस्प यह कि राजद्रोह के तहत 2019 में सबसे अधिक 93 मामले दर्ज किये गये, जब देश में लोकसभा का चुनाव था। राजद्रोह कानून के जरिए केंद्र सरकार ने अपने विरोधियों का दमन किया, इस निष्कर्ष पर पहुंचना अतिश्योक्ति नहीं कही जाएगी। हालांकि इसका आंकड़ा मेरे पास नहीं है, लेकिन अनुमान लगा सकता हूं कि जिन 326 लोगों को 124 ए के तहत बुक किया गया, उनमें 60 फीसदी मुसलमान होंगे। शेष 40 फीसदी में भी दलित और ओबीसी समाज के लोग होंगे। कुछेक ऊंची जातियों के लोग भी होंगे। लेकिन वे अपवाद ही होंगे। ठीक वैसे ही जैसे गौतम नवलखा, वरवरा राव और सुधा भारद्वाज अपवाद हैं।
अब ऐसे हालात में हिंदुत्व फासीवाद नहीं तो और क्या है?

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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