कहीं आप किसी को गालियां तो नहीं दे रहे? (डायरी 10 मई, 2022)  

नवल किशोर कुमार

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मेरी स्पष्ट मान्यता है कि न तो कोई ग्रंथ आसमानी होता है और ना ही गालियां। आज ग्रंथों की बात नहीं करना चाहता। गालियों के बारे में सोच रहा हूं। बिहार की राजधानी पटना के जिस गांव में मेरा जन्म हुआ, गालियां वहां के लोग भी देते हैं। पुरुषों और महिलाओं की गालियाें में अंतर होता है। यह केवल मेरे गांव का मामला नहीं है। यहां दिल्ली में भी लोग खूब गंदी-गंदी गालियां देते हैं। बाजदफा तो मन होता है कि कान के नीचे एक थप्पड़ रसीद करूं। लेकिन हिंसा किसी भी तरीके की हो, गलत ही होती है। अपना फलसफा यही है।
खुद का आकलन कर रहा हूं तो अब मैं गालियां नहीं देता। मन में किसी के बारे में कोई विचार आता भी है तो मेरा व्यक्तिगत अनुशासन उसे रोक देता है। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता। खैर, ऐसा हुए भी अब लंबा समय बीत गया है।
पिछले डेढ़ दशक के दौरान खबरों को लेकर विभिन्न दलों के नेताओं और नौकरशाहों से पाला पड़ा है। कुछेक तो बहुत करीब भी रहे हैं। लेकिन जो करीब रहे हैं, उनके आधार पर ही मेरा आकलन है कि सभी ऑफइलान मोड में आने के बाद गालियां खूब देते हैं। फिर चाहे बिहार के वर्तमान राजा हों या फिर पूर्व के। अलबत्ता वामपंथियों को गालियां देते नहीं सुना। यह उनके राजनीतिक प्रशिक्षण के कारण मुमकिन है।
लेकिन यह जरूरी नहीं है कि गालियां देनेवाला नेता एकदम से बुरा ही हो। लालू प्रसाद अलहदा रहे हैं। उनके संबोधन की शैली उन्हें खास बनाती है। व्यक्तिगत बातचीत में वे अलग तरह के शब्दों का उपयोग करते ही हैं। ऐसे ही नीतीश कुमार भी हैं। लेकिन इन दोनों को कभी कोई ऐसी बात कहते नहीं सुना जिससे लोग भड़क जाएं और हिंसा करने को उतारू हो जाएं। जबकि भाजपा के कई नेता ऐसे रहे हैं, जो यह जानकर कि सामने कोई पत्रकार है, भले ही अपशब्दों का उपयोग ना करें, लेकिन उनके शब्द बड़े विषैले होते हैं।

सभी ऑफइलान मोड में आने के बाद गालियां खूब देते हैं। फिर चाहे बिहार के वर्तमान राजा हों या फिर पूर्व के। अलबत्ता वामपंथियों को गालियां देते नहीं सुना। यह उनके राजनीतिक प्रशिक्षण के कारण मुमकिन है।

 

एक घटना याद आ रही है। उस समय सुशील कुमार मोदी बिहार के उपमुख्यमंत्री नहीं थे। उनकी जगह तेजस्वी यादव थे। बिहार विधान परिषद की कार्यवाही चल रही थी। सुशील कुमार मोदी मीडिया फ्रेंडली व्यक्तित्व के मालिक हैं। वे हर साल पटना के पत्रकारों को चाट का भोज भी देते हैं। हालांकि मैं कभी उनके इस भोज में शामिल नहीं हुआ। वजह यह नहीं कि मुझे चाट और पकौड़े पसंद नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि नेताओं के चाट और पकौड़े मुझे नहीं जंचते। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मैंने नेताओं से परहेज किया है। मसलन, भाकपा माले के दफ्तर की नींबू वाली चाय का स्वाद आज भी मेरी जेहन में है। संतोष सहर तब भाकपा माले के राज्य कार्यालय के सचिव थे। तब उनका कार्यालय कामरेड रामनरेश राम का सरकारी आवास था और यह पटना के वीरचंद पटेल पथ पर अवस्थित था। एक बार संतोष सहर से मैंने अनुरोध करके सुधा (बिहार में दूध बेचनेवाली सहकारी समिति) का रसगुल्ला खाया था।
खैर मैं सुशील मोदी की बात कर रहा था। विधान परिषद में वे अपने कक्ष में प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे। मैं थोड़ा पहले पहुंच गया था। मेरे साथ कुछ और पत्रकार भी थे। तब मोदी ऑफलाइन मोड में थे। उन्होंने यादव जाति को लेकर ऐसी बात कही कि मैं आक्रोशित हो गया। लेकिन मैं अपना आक्रोश लिखकर व्यक्त करना जानता हूं तो मैंने वही किया। बाद में कई पत्रकारों से मोदी ने कहलवाया भी कि उनका इरादा नेक था।
दरअसल, सियासी जुबान की अहमियत होती है। ठीक वैसे ही जैसे हम जैसे लोगों के जुबान की जो लिखते-पढ़ते हैं। नेताओं के कहे का असर बहुत अधिक होता है। वजह यह कि उनके समर्थक बड़ी संख्या में होते हैं। मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के लखनऊ पीठ के जज भी यही कह रहे हैं। मामला लखीमपुर खीरी कांड से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा टेनी की जमानत याचिका पर सुनवाई 25 मई तक के लिए टाल दी। पीठ ने कल सुनवाई के दौरान बेहद खास टिप्पणी की कि यदि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी ने किसानों के खिलाफ कटु वक्तव्य नहीं दिये होते तो ऐसी घटना नहीं होती।
बताते चलें कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे पर किसानों के ऊपर गाड़ियां चढ़ाकर मारने का आरोप है।

दूसरे को अश्लील गालियां देना भारतीय दंड संहिता की धारा 294 में दंडनीय अपराध है। धारा 294 राजीनामे के योग्य धारा भी नहीं है, अर्थात इस धारा में दोनों पक्ष का राजीनामा भी नहीं कर सकते क्योंकि गालियां देने से केवल पीड़ित पक्षकार को तकलीफ नहीं होती है अपितु समस्त समाज को तकलीफ होती है। इसलिए इस धारा में राजीनामा भी नहीं किया जा सकता। ऐसे ही हिंसा भड़कानेवाले बयानों को लेकर भी कानूनी प्रावधान हैं।

 

मैं सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजद्रोह के मामले में चल रही सुनवाई के बारे में भी सोच रहा हूं। दरअसल, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया है और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोदी को मानवाधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध बताया गया है। हलफनामे के शब्द ऐसे हैं कि कोई यकीन नहीं कर सकता कि ये शब्द उसी आदमी के लिए हैं, जिसने खास धर्म के लोगों की पहचान उसके पोशाक से करने की बात कही थी। या फिर जिसने गुजरात दंगे में मारे गए लोगों की तुलना कुत्तों के पिल्लों से की थी।
बहरहाल, अपशब्द गलत हैं और मेरा मानना तो यह है कि अपशब्द बोलनेवाले कायर होते हैं। और लोगों को भड़काकर समाज की शांति भंग करनेवाले सबसे बड़े अपराधी। फिर चाहे जो कोई हो। हालांकि भारतीय दंड संहिता में इसके लिए प्रावधान है। मसलन दूसरे को अश्लील गालियां देना भारतीय दंड संहिता की धारा 294 में दंडनीय अपराध है। धारा 294 राजीनामे के योग्य धारा भी नहीं है, अर्थात इस धारा में दोनों पक्ष का राजीनामा भी नहीं कर सकते क्योंकि गालियां देने से केवल पीड़ित पक्षकार को तकलीफ नहीं होती है अपितु समस्त समाज को तकलीफ होती है। इसलिए इस धारा में राजीनामा भी नहीं किया जा सकता। ऐसे ही हिंसा भड़कानेवाले बयानों को लेकर भी कानूनी प्रावधान हैं।
लेकिन मूल सवाल तो यही है कि इन प्रावधानों को लेकर न तो पुलिस संवेदनशील है और ना ही समाज के लोग। हम ऐसे ही समाज में रहने के आदी हो गए हैं, जहां कोई भी कहीं भी अपशब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। जैसे वह अपशब्दों का उपयोग करने के लिए ही पैदा हुआ है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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