Sunday, May 26, 2024
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क्या असर होगा राहुल की घोषणापत्र का बहुजन राजनीति पर

देश की राजनीति मे युगांतरकारी बदलाव लाने वाली चुनिंदा राजनीतिक यात्राओं मे शुमार की जा रही राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू हो कर नगालैंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, प. बंगाल, झारखंड, ओडिशा, छतीसगढ़  और  बिहार होते हुए अब देश के  राजनीति की  दिशा तय करने वाले उत्तर […]

देश की राजनीति मे युगांतरकारी बदलाव लाने वाली चुनिंदा राजनीतिक यात्राओं मे शुमार की जा रही राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू हो कर नगालैंड, असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, प. बंगाल, झारखंड, ओडिशा, छतीसगढ़  और  बिहार होते हुए अब देश के  राजनीति की  दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश में पहुंच चुकी है। जहां तक भारत के इतिहास की चर्चित युगांतरकारी राजनीतिक यात्राओं का सवाल है, तो महात्मा गांधी के दांडी यात्रा का स्थान सर्वोच्च है, जिन्होंने 12 मार्च, 1930 को गुजरात के साबरमती आश्रम से समुद्र के किनारे अवस्थित दांडी गाँव तक कीयात्रा की थी। यह करीब 400 किमी की पैदल यात्रा 4 जिलों और 48 गांवों से होकर 24 दिन बाद 6 अप्रैल, 1930  को दांडी गाँव पहुंची थी, जहां उन्होंने मुट्ठी भर नमक लेकर अंग्रेजों के बनाए ‘नमक कानून’ को तोड़ा था। दांडी यात्रा ने अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे स्वाधीनता संग्राम की शक्ल बदल दी और भारत की आजादी का सबब बनी।

राहुल गांधी से पहले भी हुईं अनेक राजनैतिक यात्राएं 

स्वाधीन भारत मे गांधी  की दांडी यात्रा से प्रेरणा लेकर पहली महत्वपूर्ण राजनीतिक यात्रा आंध्र प्रदेश के जनप्रिय अभिनेता एनटी रामाराव ने की। 29 मार्च, 1982 को तेलगु देशम पार्टी(टीडीपी) की स्थापना कर एनटीआर उसी दिन जनता का आशीर्वाद लेने के लिए ‘चैतन्य रथंम  यात्रा’ निकाले थे। 75 हजार किमी की उस यात्रा ने कुछ माह के अंतराल में एक बेहद पॉपुलर इस फिल्मी हीरो को आंध्र प्रदेश के इतिहास में सबसे बड़े राजनेता के रूप में पहचान दिलाई। उस दरम्यान एनटीआर रोज करीब 150 किमी की यात्रा करते। यात्रा के दौरान वह खेतों मे काम कर रहे लोगों से मिलते और रैलियाँ करते। रथ ही उनका प्रचार कार्यालय, घर और मंच था। यात्रा से आम जनता के मन में  उनके प्रति ऐसा क्रेज पैदा किया कि लोग उनका 72- 72 घंटों  तक इंतजार करते और पहुँचने पर महिलाएं उनकी आरती उतारतीं। इस यात्रा का क्या असर या हुआ कि  टीडीपी की स्थापना के 9 माह बाद ही विधानसभा का जो चुनाव में  उनकी पार्टी को 294 में से 199 सीटों पर कामयाबी मिली और एनटीआर मुख्यमंत्री बन गए। उसके बाद वहाँ टीडीपी एक अभेद्य किला बन गई।

आश्चर्य की बात कि दो दशक बाद 2004 मे वाईएस राजशेखर ने एक यात्रा के जरिए ही टीडीपी के किले को भेदा! वाईएसआर के रूप में मशहूर राजशेखर रेड्डी ने 2003 मे वहाँ 1500 किमी की ‘प्रजा प्रस्थानम यात्रा’ निकाली ,जिसका 2004 के विधानसभा चुनाव में यह असर हुआ कि वहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी 294 में  से 185 सीटे जीतने कामयाब रही और वाईएसआर पाँच साल के लिए मुख्यमंत्री बने।

बहरहाल स्वाधीन भारत मे एनटीआर के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण यात्रा 1983 मे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने की। कहा जाता है जैसे पराधीन भारत में पदयात्रा के जरिए गांधी ने भारत को मथा, वैसे ही स्वाधीन भारत की समस्याओं को चंद्रशेखर ने अपने पैरों से नापने का प्रयास किया। भारत को जानने के इरादे से चंद्रशेखर ने 6 जनवरी, 1983 से कन्याकुमारी से अपनी यात्रा शुरू की और जिस दिन भारत कपिलदेव के नेतृत्व में भारत विश्व कप जीता उसी 25 जून, 1983 को उन्होंने समापन दिल्ली के राजघाट पर किया था। चंद्रशेखर ने अपनी उस यात्रा को अराजनीतिक करार दिया था, किन्तु वास्तविकता यह है कि इससे उनका राजनीतिक कद बहुत बढ़ गया, जिसके फलस्वरूप परवर्तीकाल में वह कुछ समय के लिए भारत का पीएम बने।

स्वाधीन भारत के इतिहास मे एनटीआर और चंद्रशेखर के बाद तीसरी महत्वपूर्ण यात्रा भाजपा के आडवाणी ने की। 7 अगस्त,1990 को मण्डल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद, जब हजारों साल की वंचित जातियों के आर्थिक और राजनीतिक सशक्तिकरण का सबसे प्रभावी दौर शुरू हुआ, आडवाणी ने यह कहकर कि मण्डल से समाज टूट रहा है: 25 सितंबर, 1990 से राम जन्मभूमि मुक्ति के लिए गुजरात के सोमनाथ से  अयोध्या के लिए रथ-यात्रा शुरू की। आडवाणी की रथ-यात्रा भारत के यात्राओं के इतिहास मे दुःस्वप्न साबित हुई। इस यात्रा ने हिंदुओं में धार्मिक और उग्रवादी दोनों भावनाओं को उभारा। इससे समाज जुड़ने  की जगह और विभाजित हुआ। यात्रा जहां-जहां से गुजरी दंगे भड़के और जनहानि हुई, जिसे देखते हुए बिहार पहुँचने पर लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को गिरफ्तार कार लिया। खैर! आडवाणी की रथ-यात्रा भले ही दुःस्वप्न साबित हुई पर,  इसी के फलस्वरूप परवर्तीकाल मे भाजपा की अप्रतिरोध्य सत्ता कायम हुई, जिसकी जोर से उसने आरक्षण के खात्मे के लिए निजीकरण का सैलाब पैदा किया।

बहरहाल आडवाणी की रथ यात्रा के फलस्वरूप कालांतर में निजीकरण और नफरत का जो माहौल बना, उसी के खिलाफ राहुल गांधी ने 2022 मे ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के जरिए नफरत के बाजार मे मोहब्बत की दुकान खोलने का अभियान छेड़ा। इस यात्रा मे राहुल गांधी कन्याकुमारी से कश्मीर तक करीब 4000 किमी की पैदल यात्रा किए। अब भारत जोड़ो यात्रा का दूसरा चरण 14 जनवरी से शुरू हुआ है। यह यात्रा अभूतपूर्व रूप से लोगों को उद्वेलित करते हुए 16 फरवरी को उत्तर प्रदेश की सीमा मे प्रवेश कर चुकी है। भारत जोड़ो न्याय यात्रा के प्रभाव को म्लान करने के लिए मोदी सरकार द्वारा तरह-तरह के उपक्रम चलाए पर, यह तमाम बाधाओं को पार कर आगे बढ़ती रही। इस यात्रा मे राहुल गांधी को लेकर जो क्रेज पैदा हुआ, वैसा चार दशक पूर्व एनटीआर की यात्रा में  ही देखा गया था। इस यात्रा ने लोगों को किस तरह उद्वेलित किया।

 बहुजनवाद की धरती पर यात्रा का प्रभाव 

इसमें कोई शक नहीं कि उत्तर प्रदेश में भारत जोड़ो न्याय यात्रा चंदौली से बनारस और बनारस से प्रयागराज पहुँचने तक यात्रा के साथ लोगों का हुजूम उत्तरोत्तर बढ़ते गया है। ऐसी स्थिति में बहुजन बुद्धिजीवियों में यह सवाल बड़ा आकार लेते जा रहा है, ‘क्या राहुल गांधी की न्याय यात्रा कांशीराम की प्रयोग भूमि उत्तर प्रदेश को उद्वेलित कर पाएगी?’ ध्यातव्य है कि जिस उत्तर प्रदेश ने देश को 9 प्रधानमंत्री दिये एवं जो देश की राजनीति की दिशा तय करता है, उसकी पहचान हिन्दुत्व की राजनीति के साथ कांशीराम के बहुजनवाद की प्रयोगस्थली के रूप मे भी है। इसी उत्तर प्रदेश में जब आडवाणी की रथ-यात्रा के बाद हिन्दुत्व की राजनीति मे उफान आया, जिसके फलस्वरूप बाबरी मस्जिद टूटने के साथ भाजपा की मजबूत सत्ता कायम होने के आसार दिखने लगे, तब कांशीराम और मुलायम सिंह यादव एक साथ आए। तब यहाँ के गली-कूचों में इस नारे की अनुगूँज सुनाई पड़ने लगी, ‘मिले मुलायम –कांशीराम, हवा मे उड़  गए..!’ जब यहाँ हिन्दुत्व की राजनीति का प्रयोग जोरों पर था, तब यहाँ कांशीराम ने बहुजन राजनीति का प्रयोग किया, जिसके तहत बहुजनों के जाति–चेतना का ऐसा राजनीतिकरण किया कि हजारों साल का शासक वर्ग राजनीतिक रूप से एक लाचार समूह मे तब्दील होने के लिए विवश हुआ। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांशीराम के प्रयासों से दलित, आदिवासी, पिछड़े और धर्मांतरित समुदाय  हिन्दू धर्म द्वारा खड़ी की गई घृणा और शत्रुता की दीवार लांघकर भ्रातृभाव लिए एक दूसरे के निकट आने लगे थे।

 भ्रातृत्व के प्रसार और जाति चेतना के राजनीतिकरण के फलस्वरूप कांशीराम की बसपा ने 2007 में पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता पर काबिज होकर राजनीति की दुनिया में एक चमत्कार सा कर दिया। उन्होंने वंचितों में शासक बनने की महत्वाकांक्षा उभारने के साथ जिस तरह लोगों को ‘पे बैक टू  द सोसाइटी’ के मंत्र से दीक्षित किया, उससे यहाँ सामाजिक परिवर्तनकामी लोगों की विशाल फौज खड़ी हो गई। यही नहीं देश के राजनीति को दिशा देने वाले यूपी में बहुजनवाद के प्रसार के फलस्वरूप जिस तरह बसपा और सपा के प्रभुत्व का विस्तार हुआ, उससे दिल्ली की सत्ता पर बहुजनों के काबिज होने के आसार दिखने लगे। यही नहीं उन्होंने अपने नारे ‘जिसकी-जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ के जरिए वंचितों में हर क्षेत्र मे संख्यानुपात में हिस्सेदारी की जो महत्वाकांक्षा भरी, उससे देश मे बड़े बदलाव की जमीन तैयार होने लगी। ऐसा लगा दलित–पिछड़े और इनसे धर्मांतरित तबके संख्यानुपात में अपनी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए सत्ता हाथ में लेने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। किन्तु उनके असमय निधन के बाद उनके उत्तराधिकारी अपनी निजी कमजोरियों के कारण उन के प्रयोग को आगे बढ़ाने में बुरी तरह विफल रहे, जिसके फलस्वरूप बड़ी तेजी से भाजपा यूपी से लेकर केंद्र तक अप्रतिरोध्य बन गई। सबसे दुखद तो यह रहा कि कांशीराम के महा-क्रांतिकारी दर्शन – जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी – को पलटकर ‘जिसकी जितनी तैयारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी’ कर दिया गया।

बहरहाल आज भले ही कांशीराम की खड़ी की गई पार्टी कारुणिक अवस्था में पहुंच गई हो; भले ही उत्तर प्रदेश मे हिंदुत्ववादी भाजपा की अप्रतिरोध्य सत्ता कायम हो गई है, किन्तु कांशीराम ने जो लाखों समाज परिवर्तनकामी योद्धा तैयार किए, वे अभी तक उन के सामाजिक बदलाव के विचार को अपने मन से नहीं निकाले हैं। इसलिए वे ऐसे किसी बहुजन नेतृत्व की चाह मे टकटकी लगाए रहते है, जो बहुजनों को शासक बनाने के साथ जिसकी जितनी संख्या भारी, उतनी उसकी भागीदारी को जमीन पर उतार सके। पर, कोई ऐसा योग्य बहुजन नेता दिखाई नहीं पड़ रहा है। लेकिन जिनके दिलों मे कांशीराम के सामाजिक  बदलाव की आग जल रही है, वे अगर तमाम निराशा को दूर धकेल कर पुनः दो दशक पूर्व की भांति सक्रिय हो जाएं तो आज भी उत्तर प्रदेश मे चमत्कार घटित कर सकते हैं। ऐसे में कांशीरामवादियों को चाहिए कि वे राहुल गांधी का साथ देने का मन बनाएं।

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कई राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि जो राहुल गांधी सड़कों पर उतर कर ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोलने का संदेश दे रहे थे, अब वह भारत जोड़ो न्याय यात्रा में पांच न्याय- भागीदारी न्याय, श्रमिक न्याय, नारी न्याय, किसान न्याय और युवा न्याय का घोषणापत्र जारी कर रहे हैं। वह हर जगह कह रहे हैं हम न्याय के लिए यह यात्रा निकाल रहे हैं। वाराणसी में भी उन्होंने जोर गले से यह बात दुहराई है। इस क्रम में उन्होंने एलान कर दिया है कि 2024 कांग्रेस की सरकार आई तो किसानों को उनके उत्पाद की कीमत एमएस स्वामीनाथन रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर दी जाएगी। ऐसे में एमएसपी की कानूनी गारंटी  लागू करने की बात का आश्वासन देकर उन्होंने किसान न्याय की घोषणा कर दिया है। बाकी चार न्याय की भी टुकड़ों-टुकड़ों मे घोषणा जारी है। जहां तक  दलित, आदिवासी और पिछड़ों के न्याय का सवाल है, सदियों से वर्ण-व्यवस्था के प्रावधानों द्वारा शक्ति के समस्त स्रोतों – आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक से दूर धकेल कर ही इन्हें अन्याय की खाई मे धकेला गया। यही सामाजिक अन्याय है, जिससे निजात दिलाने के लिए सामाजिक न्याय का अभियान शुरू किया गया। लेकिन सामाजिक न्याय के तहत वंचित समूहों को सिर्फ नौकरी, शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में हिस्सेदारी सुनिश्चित किया गया। अवश्य ही दलितों को राजनीति की संस्थाओं में भी हिस्सेदारी मिली। लेकिन दलित बहुजनों को मुकम्मल न्याय तभी मिल सकता है, जब शक्ति के समस्त स्रोतों मे संख्यानुपात में हिस्सेदारी सुनिश्चित हो। आजाद भारत में मुकम्मल सामाजिक न्याय का अजेंडा सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी जारी कर रहे हैं। बहुत पहले से कांशीराम के भागीदारी दर्शन को- ‘ जितनी आबादी – उतना हक’  की घोषणा करने वाले राहुल गांधी अब सड़कों पर उतर लाखों- हजारों की भीड़ में घोषणा कर रहे हैं कि आर्थिक और सामाजिक अन्याय सबसे बड़ी समस्या है और भारत के भविष्य को बेहतर बनाना है तो आर्थिक और सामाजिक न्याय लागू करना ही होगा।

आर्थिक और सामाजिक न्याय दिलाने का एजेंडा घोषित करने क्रम मे वह सवाल उठा रहे हैं कि  दलित, आदिवासी और ओबीसी की कुल आबादी 73 प्रतिशत है और ये 73 प्रतिशत वाले कितनी कंपनियों, अखबारों, मीडिया, अस्पतालों, प्राइवेट यूनिवर्सिटीज  इत्यादि के मालिक और मैनेजर हैं? वह कह रहे हैं कि जिन सरकारी कंपनियों को निजी हाथों मे दिया गया है, उन्हें  कैसे वापस लाया जाय, यह भी देखेंगे।वह खुलकर कह रहे है कि सारी कंपनियां , मीडिया, अखबार , प्राइवेट यूनिवर्सिटीज , अस्पताल इत्यादि 2 प्रतिशत वालों के हाथ में है । वह घोषणा कर रहे है कि सारी समस्या का हल जाति जनगणना है। कांग्रेस सत्ता में आने पर जाति जनगणना कराने के बाद एक व्यापक वित्तीय सर्वेक्षण कराएगी ताकि संसाधनों के स्वामित्व मे असमानता को प्रकाश मे लाया जा सके और उनका उचित बंटवारा हो सके। प्रयागराज में उन्होंने खुल कर कहा है ,’ऐ 73 प्रतिशत वाले ये देश तुम्हारा है। उठो, जागों और आगे बढ़कर अपना हक ले लो!’

उपरोक्त तथ्यों के आईने में कांशीरामवादी राहुल का साथ देने का मन बनाएं, यह समय की बड़ी जरूरत है। उन्हें यह विचार करना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी छोड़कर जो नेता भाजपा मे शामिल हो रहे हैं, वह इसलिए नहीं कि ईडी–सीबीआई का उन पर दबाव है। वे इसलिए भी पार्टी छोड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हे लगता कि राहुल गांधी सामाजिक न्याय का जो एजेंडा जारी कर रहे हैं:  जाति जनगणना करा कर तमाम सेक्टर में जितनी आबादी- उतना हक की जो घोषणा कर रहे है, उससे भारत के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का बड़ा नुकसान हो जाएगा। चूंकि कांग्रेस छोड़ने वाले नेता मुख्यतः इसी वर्ग से हैं, इसलिए वे अपने वर्गीय हित मे कांग्रेस से नाता तोड़कर भाग रहे।

आज की तारीख में राहुल गांधी की समस्या भाजपा नहीं, खुद कांग्रेस का अपर कास्ट नेतृत्व है, जो उनकी बातें अवाम के बीच पहुंचाने मे कोई रुचि नहीं रहा है। इसलिए यदि राहुल गांधी का आर्थिक और सामाजिक न्याय का एजेंडा  लागू करवाना है तो  खुद वंचित समुदायों के बुद्धिजीवी और एक्टिविस्टों को मजबूती से उनका साथ देने का मन बनाना होगा। यह काम कांशीरामवादी बेहतर तरीके से कर सकते हैं , इसलिए उन्हें कांशीराम का सपना पूरा करने के लिए सामाजिक न्याय के नए आइकॉन राहुल गांधी का साथ देने का मन बनाना चाहिए! लेकिन लाख टकें का सवाल यह है कि क्या सड़कों पर जारी होता राहुल गांधी का घोषणापत्र उनको स्पर्श करेगा!

एच एल दुसाध
एच एल दुसाध
लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

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