आज अपने चारों ओर बुने जा रहे झूठ से कैसे लड़ते भगतसिंह

डॉ. राजू पाण्डेय

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भगत सिंह की शहादत के दिन वायरल होने वाली अनेक सोशल मीडिया पोस्टों को देखकर आश्चर्य से अधिक चिंता और भय उत्पन्न होते हैं। साम्प्रदायिक एकता के प्रबल समर्थक और जातिगत भेदभाव तथा अस्पृश्यता के घोर विरोधी इस नास्तिक क्रांतिकारी को कभी सांप्रदायिक हिंसा के पोस्टर बॉय की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास होता है तो कभी समावेशी राष्ट्रवाद से भी आगे निकलकर अंतरराष्ट्रीयतावाद की वकालत करने वाले इस वाम विचारक को संकीर्ण राष्ट्रवाद को ताकत देने वाले हिंसक उन्माद के हिमायती के रूप में चित्रित करने की कोशिश होती है। अनेक बार महात्मा गांधी के साथ भगत सिंह के मतभेदों को आधार बनाकर युवा वर्ग में यह धारणा उत्पन्न करने की कोशिश होती है कि गांधी भगत सिंह की फांसी के लिए उत्तरदायी हैं।

4 मई 1930 को अपनी गिरफ्तारी से एक दिन पहले उन्होंने वाइसराय को लिखा- आपने कानूनी देरी को आधार बनाकर भगत सिंह के मामले में एक शार्ट कट हासिल कर लिया है और इस प्रकार सामान्य प्रक्रिया से छुटकारा पा लिया है। यदि मैं इन सरकारी गतिविधियों को मार्शल लॉ का एक ढका छिपा रूप कहूं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

यह देखना आश्चर्यजनक है कि महात्मा गांधी को एक संकीर्ण, अनुदार और पक्षपाती नेता के रूप में स्थापित करने की चालाक और षड्यंत्रपूर्ण कोशिशों के लिए भगत सिंह और उनके साथियों की शहादत का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक अभियान सा चल रहा है जिसके अनुसार गांधी ने भगत सिंह की फांसी की सजा माफ कराने में कोई रुचि नहीं ली और बड़ी ठंडी सैद्धांतिक नृशंसता दिखाते हुए वे इस प्रकरण में मौन बने रहे। इस अभियान को आधार देने के लिए भगत सिंह के प्रति गहन सहानुभूति रखने वाले उनके समकालीन मित्रों, अतिशय भावुक जीवनीकारों तथा उनकी विचारधारा से सहमति रखने वाले विद्वानों के पूर्ववर्ती कार्यों को आधार बनाया जाता है। चाहे वे भगत सिंह के साथी और महात्मा गांधी के कटु आलोचक यशपाल हों या मन्मथनाथ गुप्त हों, भगत सिंह के जीवनीकार बीएस देओल हों या वाम रुझान के विचारक एजी नूरानी हों – सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भगत सिंह के मामले में गांधीजी की अरुचि और अनिच्छा को रेखांकित करते रहे हैं। इन विद्वानों ने तब यह नहीं सोचा होगा कि उनके लेखन और विचारों का उपयोग भारतीय स्वाधीनता संग्राम की इन दो महान विभूतियों को परस्पर शत्रुओं के रुप मे प्रस्तुत करने हेतु किया जाएगा। कालांतर में वीएन दत्ता तथा चंदर पाल सिंह जैसे इतिहासकारों ने इस प्रकरण में गांधी और भगत सिंह की प्राथमिकताओं और उनके व्यवहार की यथातथ्य प्रस्तुति करने की महत्वपूर्ण और स्तुत्य चेष्टा की है।

इस प्रकरण में पहली गलत धारणा यह है कि गांधीजी ने भगत सिंह के मामले में बहुत विलम्ब से, लगभग अंत में, तब रुचि ली जब कुछ किया जाना संभव नहीं था। जबकि वास्तविकता एकदम अलग है- जब वाइसराय ने भगत सिंह और उनके साथियों के मामले की त्वरित सुनवाई के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल का गठन किया तो गांधीजी ने उनकी तीखी आलोचना की। 4 मई. 1930 को अपनी गिरफ्तारी से एक दिन पहले उन्होंने वाइसराय को लिखा-  आपने कानूनी देरी को आधार बनाकर भगत सिंह के मामले में एक शार्टकट हासिल कर लिया है और इस प्रकार सामान्य प्रक्रिया से छुटकारा पा लिया है। यदि मैं इन सरकारी गतिविधियों को मार्शल लॉ का एक ढका-छिपा रूप कहूं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

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एक दूसरा भ्रम जो फैलाया जा रहा है वह यह है कि गांधीजी ने कभी भी भगत सिंह की फांसी की सजा को अनुचित नहीं ठहराया। वस्तुस्थिति पुनः भिन्न है। 31 जनवरी, 1931 को इलाहाबाद में गांधीजी ने कहा- जिन्हें मृत्यु दंड मिला है उन्हें फांसी पर नहीं लटकाना चाहिए। मेरा व्यक्तिगत धर्म तो यह कहता है कि भगत सिंह और उनके साथियों को न केवल फांसी न दी जाए बल्कि उन्हें जेल में रखना भी गलत है। जो भी हो यह मेरी निजी राय है और हम उनकी रिहाई को शर्त नहीं बना सकते। इसी प्रकार 7 मार्च, 1931 को दिल्ली की एक जनसभा में उन्होंने कहा कि मैं किसी को भी फांसी के तख्ते पर भेजने के खिलाफ हूं फिर भगत सिंह जैसे वीर पुरुष की तो बात ही क्या है।

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यह भी कहा जाता है कि गांधीजी यह कभी नहीं चाहते थे कि भगत सिंह की फांसी की सजा माफ हो। वह केवल भगत सिंह की सजा को कुछ समय के लिए टालना चाहते थे। तथ्य इस बात की ओर इशारा करते हैं कि भगत सिंह की फांसी की सजा के कम्युटेशन के लिए कानूनी पहलुओं को गांधीजी ने बड़ी बारीकी से खंगाला था और उन्हें जब यह अच्छी तरह ज्ञात हो गया कि कानूनी रूप से ब्रिटिश सरकार को भगत सिंह की फांसी की सजा माफ करने हेतु बाध्य करना संभव नहीं है तब उन्होंने फांसी की सजा को निलंबित या स्थगित करने का प्रस्ताव दिया। यह फांसी को टालकर ब्रिटिश सरकार से समय प्राप्त करने की रणनीति का एक भाग था। गांधीजी को विश्वास था कि आगे चलकर वे भगत सिंह एवं उनके साथियों को हिंसा त्यागने हेतु सहमत कर लेंगे और अधिक अनुकूल वातावरण में उनकी फांसी की सजा माफ करने का प्रस्ताव पुनः रखा जा सकेगा। चंदर पाल सिंह ने गांधी मार्ग के दिसंबर 2010 के अंक में गांधी के सी. विजयराघवचारी को लिखे पत्र को उद्धृत किया है जिसके अनुसार- फांसी की सजा की कानूनी वैधता पर सर तेजबहादुर ने वाइसराय के साथ गहन चर्चा की थी, आप जानते हैं कि वाइसराय पर उनका कैसा प्रभाव है। किंतु कोई लाभ नहीं हुआ। संभवतः गांधी यह जान चुके थे कि प्रीवी कौंसिल के निर्णय के बाद वाइसराय द्वारा फांसी की सजा के कम्युटेशन की संभावना कानूनी रूप से लगभग खत्म हो गई थी।

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गांधीजी पर यह भी आक्षेप लगाया जाता है कि उन्होंने लार्ड इरविन पर भगत सिंह की सजा माफी के लिए दबाव नहीं बनाया। जबकि वास्तविक स्थिति यह थी कि उन्होंने लार्ड इरविन को फांसी की सजा टालने के लिए लगभग सहमत कर ही लिया था।

11 फरवरी, 1931 को प्रिवी कौंसिल में अपील के लिए दायर स्पेशल लीव पिटीशन खारिज हो गई और यह तय हो गया कि अब वाइसराय के हस्तक्षेप के बिना भगत सिंह की फांसी रुक नहीं सकती। गांधी और इरविन के मध्य बातचीत 17 फरवरी से शुरू हुई। भगत सिंह की रिहाई को बातचीत की शुरुआत की पूर्वशर्त नहीं बनाया गया। गांधीजी ने यंग इंडिया में अपना पक्ष रखा-  कांग्रेस कमेटी मुझसे इस बात पर सहमत हुई थी कि (भगत सिंह आदि की) सजा को कम करने को समझौते की पूर्व शर्त न बनाया जाए। इसलिए मैं इस बात का उल्लेख समझौते से बाहर ही कर सकता था।

प्रसिद्ध पत्रकार रॉबर्ट बरनेस जो न्यूज़ क्रॉनिकल से जुड़े हुए थे एक डायरी रखते थे जिसमें वे भारतीय और ब्रिटिश नेताओं के साथ अपनी मुलाकात को दर्ज करते थे। यह डायरी 1932 में प्रकाशित हुई। यह उस समय हुई घटनाओं का महत्वपूर्ण क्रोनोलॉजिकल रिकॉर्ड मानी जाती है। इससे यह पता चलता है कि गांधी जी 21 मार्च 1931 को कराची अधिवेशन में जाने के लिए विलंब करते हैं ताकि वे भगत सिंह के मामले पर वाइसराय से चर्चा कर सकें।

18 फरवरी 1931 को गांधीजी ने भगत सिंह की फांसी की सजा का मामला लार्ड इरविन के साथ उठाया। उन्होंने कहा- इस बात का हमारी बातचीत से कोई संबंध नहीं है और शायद इस बात की चर्चा करना हमारे लिए अनुचित है किन्तु यदि आप वर्तमान वातावरण को और अनुकूल बनाना चाहते हैं तो आपको भगत सिंह की फांसी की सजा को निलंबित रखना चाहिए। लार्ड इरविन ने कहा कि मैं आपका आभारी हूँ कि आपने यह विषय इस रूप में प्रस्तुत किया, सजा कम करना कठिन है किंतु फांसी निलंबित रखना अवश्य विचारणीय है।

19 मार्च, 1931 को जब गांधी इरविन समझौते के नोटिफिकेशन की तैयारी चल रही थी तब गांधीजी ने पुनः यह मामला इरविन के समक्ष रखा और 24 मार्च की फांसी की सजा को निलंबित रखने की अपील की।

प्रसिद्ध पत्रकार रॉबर्ट बरनेस जो न्यूज़ क्रॉनिकल से जुड़े हुए थे एक डायरी रखते थे जिसमें वे भारतीय और ब्रिटिश नेताओं के साथ अपनी मुलाकात को दर्ज करते थे। यह डायरी 1932 में प्रकाशित हुई। यह उस समय हुई घटनाओं का महत्वपूर्ण क्रोनोलॉजिकल रिकॉर्ड मानी जाती है। इससे यह पता चलता है कि गांधीजी 21 मार्च 1931 को कराची अधिवेशन में जाने के लिए विलंब करते हैं ताकि वे भगत सिंह के मामले पर वाइसराय से चर्चा कर सकें। वे 21 और 22 मार्च, 1931 को इरविन से मिलकर भगत सिंह के विषय में चर्चा करते हैं और 23 मार्च को उन्हें व्यक्तिगत पत्र भी लिखते हैं। वे आखिरी उपाय के रूप में आसफ अली को भगत सिंह से मिलने के लिए भेजते हैं और कोशिश करते हैं कि वे हिंसक गतिविधियां छोड़ने का वादा ब्रिटिश सरकार से करें।

एक अन्य वायरल पोस्ट यह दर्शाती है कि शहीद भगत सिंह से जेल में मिलने के लिए कोई कांग्रेस नेता नहीं गया था। दरअसल इस पोस्ट का उद्गम माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा कर्नाटक में 9 मई 2018 को एक जनसभा में दिए गए भाषण को माना जा सकता है।

यतीन्द्र नाथ सान्याल और अरुणा आसफ़अली का यह मानना है कि वाइसराय गांधीजी के दबाव के आगे असमंजस में पड़ गए थे लेकिन ब्रिटिश आईसीएस कैडर के हठ के आगे उन्हें झुकना पड़ा। कहा तो यह भी जाता है कि पंजाब के गवर्नर ने इस्तीफे तक की धमकी दी थी। बहरहाल, भगत सिंह और उनके साथियों ने जो अनूठा माफीनामा पंजाब के गवर्नर को 20 मार्च को भेजा उसके बाद उनकी फांसी रुकने की सारी संभावनाएं खत्म हो गईं- आपके न्यायालय के आदेश के अनुसार हमने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जंग छेड़ी है इस प्रकार हम युद्ध बंदी हुए। और हम चाहते हैं कि हमारे साथ युद्ध बंदी की भांति व्यवहार किया जाए यथा हम मांग करते हैं कि हमें फांसी के फंदे पर लटकाने के स्थान पर गोली से उड़ा दिया जाए। देश के लिए हंसते हंसते जान कुर्बान कर लाखों नवयुवकों में आजादी की लड़ाई में मर मिटने का जज्बा पैदा करने की चाहत रखने वाले भगत सिंह को रोक पाना नामुमकिन था। भगत सिंह की यह इच्छा कोई नई नहीं थी। समय समय पर उन्होंने आत्मोत्सर्ग के अपने संकल्प को अनेक निकट सहयोगियों के साथ व्यक्त किया था। जेल के दिनों में ही भगत सिंह के साथ ही कारागार में बंद पंजाब कांग्रेस नेता भीमसेन सच्चर ने उनसे पूछा था- आप और आपके साथियों ने लाहौर षड्यंत्र  मामले में अपनी रक्षा क्यों नहीं की? भगत सिंह का उत्तर था-क्रांतिकारियों को मृत्यु का वरण करना ही होता है, क्योंकि उनके मरने से ही उनका अभियान मजबूत होता है, अदालत में अपील करने से नहीं।

एक अन्य वायरल पोस्ट यह दर्शाती है कि शहीद भगत सिंह से जेल में मिलने के लिए कोई कांग्रेस नेता नहीं गया था। दरअसल इस पोस्ट का उद्गम प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कर्नाटक में 9 मई, 2018 को एक जनसभा में दिए गए भाषण को माना जा सकता है। प्रधानमंत्री ने कहा- जब देश की आजादी की लड़ाई लड़ते लड़ते शहीद भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त और वीर सावरकर जेल में बन्द थे तब क्या कोई कांग्रेस नेता उनसे जेल में मिलने के लिए गया था?

अनेक लेखकों ने यह भी उल्लेख किया है कि अपने वकील और मित्र प्राणनाथ मेहता से फांसी के चंद घण्टों पहले हुई अपनी अंतिम मुलाकात में भगत सिंह ने उनसे खास अनुरोध किया था कि वे जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस का विशेष रूप से आभार व्यक्त करें क्योंकि उन्होंने भगतसिंह के मामले में गहन रुचि ली थी।

तथ्य पुनः इस वायरल पोस्ट को गलत साबित करते हैं। सच्चाई यह है कि 8 अगस्त, 1929 को जवाहरलाल नेहरू, भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त तथा उनके साथियों से मिले थे। नई दिल्ली स्थित नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी में 10 अगस्त, 1929 के ट्रिब्यून अखबार के लाहौर से प्रकाशित सांध्य संस्करण की प्रति उपलब्ध है जिसमें इस मुलाकात का समाचार प्रकाशित हुआ था। समाचार का शीर्षक है – पंडित जवाहर लाल नेहरू इंटरव्यूज हंगर स्ट्राइकर्स। समाचार के अनुसार- पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गोपीचंद (एमएलसी) के साथ लाहौर सेंट्रल तथा बोर्स्टल जेल का आज (8 अगस्त) को दौरा किया और लाहौर कॉन्सपिरेसी केस के अभियुक्तों का इंटरव्यू लिया। पंडित नेहरू पहले सेंट्रल जेल गए जहां वे सरदार भगत सिंह और बीके दत्त (बटुकेश्वर दत्त) से मिले और उनसे भूख हड़ताल के विषय में चर्चा की।

अनेक लेखकों ने यह भी उल्लेख किया है कि अपने वकील और मित्र प्राणनाथ मेहता से फांसी के चंद घण्टों पहले हुई अपनी अंतिम मुलाकात में भगत सिंह ने उनसे खास अनुरोध किया था कि वे जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस का विशेष रूप से आभार व्यक्त करें क्योंकि उन्होंने भगतसिंह के मामले में गहन रुचि ली थी।

बिपिन चंद्र ने भगत सिंह पर बहुत शोध किया और कक्षा बारहवीं के विद्यार्थियों हेतु मॉडर्न इंडिया नामक पाठ्य पुस्तक में उनके योगदान को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया। इसके बाद उन्होंने अपनी पुस्तक इंडियाज स्ट्रगल फ़ॉर इंडिपेंडेंस में भगत सिंह को एक नए रूप में प्रस्तुत करते हुए भारतीय राजनीतिक चिंतन में उनके स्थान को निर्धारित किया।

तीसरी वायरल पोस्ट के अनुसार भगत सिंह और उनके साथियों को वैलेंटाइन-डे अर्थात 14 फरवरी, 1931 को फांसी दी गई थी। इसलिए वैलेंटाइन-डे को इनकी शहादत के दिन के रूप में मनाया जाना चाहिए। सच्चाई यह है भगत सिंह और उनके साथियों को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। इन क्रांतिकारियों को पहले 24 मार्च, 1931 की सुबह फांसी दी जानी थी किन्तु अचानक ब्रिटिश सरकार ने इनकी फांसी की तिथि बदल दी और इन्हें पूर्वनिर्धारित समय से 11 घण्टे पहले 23 मार्च, 1931 को संध्या साढ़े सात बजे लाहौर जेल में फांसी दे दी गई। इस वायरल पोस्ट का झूठ बड़ी आसानी से पकड़ा गया तब इसके दो अन्य रूप सामने आए। पहले रूप के अनुसार भगत सिंह को 14 फरवरी, 1931 को फांसी की सजा सुनाई गई। यह तथ्य भी गलत था। दरअसल, भगतसिंह और उनके साथियों को 7 अक्टूबर, 1930 को फांसी की सजा सुनाई गई थी। दूसरे रूप के अनुसार, 14 फरवरी, 1931 को पंडित मदन मोहन मालवीय ने भगत सिंह के लिए मर्सी पिटीशन दायर की थी जिसे वाइसराय ने खारिज कर दिया था। इतिहासकारों का एक छोटा समूह इस बात का समर्थन करता है किंतु बहुत-से इतिहासकार इससे असहमत हैं। हमें यह समझना होगा कि सच्चा राष्ट्रवाद कभी झूठ की बुनियाद पर पैदा नहीं होता, झूठ फैलाकर केवल हिंसक उन्माद पैदा किया जा सकता है।

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एक अन्य विवाद जो भगत सिंह को लेकर आजकल चर्चा में रहा है उसके अनुसार वामपंथी इतिहासकारों की दृष्टि में भगत सिंह एक टेररिस्ट थे। यह कहा जाता है कि सुप्रसिद्ध वामपंथी इतिहासकार बिपिनचंद्र ने भगत सिंह को आतंकवादी कहा। दरअसल, बिपिनचंद्र ने भगत सिंह के लिए रेवोल्यूशनरी टेररिस्ट शब्द का प्रयोग किया था। 1920 के दशक में भूमिगत हिंसा का प्रवेश भारतीय राजनीति में हुआ। यह हिंसा अलोकप्रिय और अत्याचारी ब्रिटिश अफसरों को निशाना बनाने तक सीमित थी। उस समय इस प्रवृत्ति को रेवोल्यूशनरी टेररिज्म कहा जाता था। बाद में विशेषकर 1980 के दशक में टेररिज्म शब्द ने बिल्कुल अलग अर्थ ले लिया और टेररिज्म निर्दोष लोगों की बेरहमी से हत्या और अविचारित हिंसा, क्रूरता तथा बर्बरता का पर्याय बन गया। बिपिन चंद्र में 1920 में क्रांतिकारियों के लिए प्रचलित तकनीकी शब्दावली का ही उपयोग किया था। आज यदि हम भगत सिंह को एक क्रांतिकारी, समाजवादी, तर्कवादी, नास्तिक, प्रखर धर्मनिरपेक्षतावादी और प्रारंभिक मार्क्सवादी विचारक के रूप में जानते हैं तो इसका बहुत कुछ श्रेय बिपिनचंद्र को है। उन्हें 1931 में कारावास में भगत सिंह द्वारा लिखे गए निबंध मैं नास्तिक क्यों हूं… की प्रति उपलब्ध हुई। उन्होंने इसकी भूमिका लिखकर पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस से इसके प्रकाशन में योगदान दिया और एक रुपए मूल्य वाली यह पुस्तिका आम लोगों तक भगत सिंह के बौद्धिक और वैचारिक पक्ष को पहुंचाने का प्रथम माध्यम बनी। बिपिन चंद्र ने भगत सिंह पर बहुत शोध किया और कक्षा बारहवीं के विद्यार्थियों हेतु मॉडर्न इंडिया नामक पाठ्य पुस्तक में उनके योगदान को प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया। इसके बाद उन्होंने अपनी पुस्तक इंडियाज स्ट्रगल फ़ॉर इंडिपेंडेंस में भगत सिंह को एक नए रूप में प्रस्तुत करते हुए भारतीय राजनीतिक चिंतन में उनके स्थान को निर्धारित किया। उन्होंने 2007 में एक साक्षात्कार में भगत सिंह के प्रति अपने सम्मान और रेवोल्यूशनरी टेररिस्ट शब्द के प्रयोग के संबंध में विस्तार से बताया। अपनी मृत्यु से पहले वे भगत सिंह की जीवनी पर कार्य कर रहे थे जो पूरी न हो सकी।

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भगतसिंह वैज्ञानिक दृष्टिसंपन्न थे और उनमें इतनी अधिक वैचारिक प्रगतिशीलता और लचीलापन था कि वे बहुत जल्द आतंकवाद की सीमाओं को समझ गए थे। फरवरी, 1931 के अपने ऐतिहासिक मसविदा दस्तावेज़ में भगतसिंह ने स्पष्ट कहा था- आतंकवाद हमारे समाज में क्रान्तिकारी चिन्तन की पकड़ के अभाव की अभिव्यक्ति है या एक पश्चाताप। इसी तरह यह अपनी असफलता का स्वीकार भी है।… आतंकवाद अधिक से अधिक साम्राज्यवादी शक्तियों को समझौते के लिए मजबूर कर सकता है। ऐसे समझौते, हमारे उद्देश्य, पूर्ण स्वतंत्रता, से हमेशा ही कहीं दूर रहेंगे। इस प्रकार आतंकवाद केवल एक समझौता, सुधारों की एक क़िस्त निचोड़कर निकाल सकता है।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो भगत सिंह को न डरा पाया न हरा पाया किन्तु वैज्ञानिकता की बुनियाद पर टिके आधुनिक भारत के निर्माण की भगत सिंह की संकल्पना से एकदम विपरीत एक अतार्किक, अराजक और धर्मांध भारत बनाने कोशिशों का मुकाबला वे किस तरह करते इसकी तो कल्पना ही की जा सकती है।

डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र लेखन करते हैं और रायगढ़ में रहते हैं।

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