काँख ढँकने के फेरे में पड़े तो इंकलाब ज़िंदाबाद कैसे कहोगे पार्टनर !

देवेंद्र आर्य

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दरअसल विरोध जब चिढ़ौनी बन जाए या बना दिया जाए तो विकल्प की तलाश भटक रही आत्मा बन जाती है। सत्ता की क्षमता का प्रदर्शन ही इसमें है कि वह अपने विरुद्ध चल रहे विरोध को चिढ़ौनी बना दे।

हमारा विपक्ष पूरी तरह अविश्वसनीय और जनता की निगाह में अप्रासांगिक, सुविधाजीवी ,भ्रष्ट और राष्ट्रीयता की भावना से च्युत, स्थापित किया जा चुका है। यह सरकार इस काम में पुरानी सरकारों से अधिक माहिर और सफल है कि उसने आपके तमाम जेन्युविन विरोधों को भी चिढ़ौनी बना दिया है।

भाषा और भंगिमा का इतना बेहतर इस्तेमाल आज तक कोई सरकार नहीं कर पायी है। किसी सरकार की वैचारिकी इतनी स्पष्ट नहीं रही जितनी इस सरकार की है कि उसे क्या पाना है। अपने उद्देश्य के लिए दूरगामी और जमीनी तैयारी किसी पार्टी ने उतनी नहीं दिखाई जितनी भाजपा ने। किसी ने सत्ता के लिये इतना लम्बा इंतज़ार नहीं किया है जितना भाजपा ने। अपनी जनता, अपने वोटरों पर इतना विश्वास किसी पार्टी ने नहीं दिखाया है और न ही उसे विश्वास में लिया है । गलत सही का फैसला सिर्फ़ हमीं नहीं करेंगे, और भी लोग हैं गलत सही पर राय रखने वाले।

ज़ाहिर है इसका दूसरा पहलू यही है कि हमारा विरोध ही लचर, बेमानीभरा, बेमन का, ऊपर-झापर वाला, आपसी गलाकाट और फेसबुकिया है।

राजनीति में ही नहीं, साहित्य में भी इतनी तमीज़ आवश्यक है कि क्या न बोला जाए और कब न बोला जाए। फालतू का बोलना उन्हें और चिढ़ाता है और आपको चिढ़ौनी बना देता है। गुस्सा होने से अधिक ज़रूरी है गुस्से को बचा कर रखना।

इतने बड़े मजदूर पलायन और उनकी प्रताड़ना के दौरान मजदूर के नाम पर राजनीति चमकाने वाले लोग कहीं नज़र नहीं आए। पूरा देश महामारी के बहाने लूटा जा रहा है, कोई पार्टी सड़क पर उतरने को तैयार नहीं। ईडी और इन्कमटैक्स छापे का इतना ख़ौफ़ ! तो क्या सच यही है कि पूर्ववर्ती सारी सरकारें भ्रष्ट और निकम्मी रही हैं और उनके लीडरान सर पर लटकती तलवार से ख़औफ़ज़दा हैं कि कहीं अंदर न कर दिए जाएं। कौन लालू यादव बनना चाहेगा? जो थोड़े पाक-साफ़ हैं और खरीदी मीडिया के पप्पू-प्रचार के बाद भी तने हैं उन पर देश विरोध का प्रक्षेपास्त्र एक बटन की प्रतीक्षा में हैं।

चीन के बहाने उनके राष्ट्रवाद में सेंध लगाने की कोई तार्किक और सुनियोजित योजना किसी के पास नहीं है। सियासत आपको मौक़े देती है पर आप उनका फ़ायदा न उठा पाएं तो अक्षमता किसकी है ? पश्चिम बंगाल ने आपको फिर एक राह दिखाई है , देखना चाहें तब न !

वे ही मजदूर आज वापस जा रहे हैं जिनके लिए हम फेसबुक पर और लाइव होकर आठ-आठ आंसू बहा रहे थे और उनसे उम्मीद लगाए थे कि यह लोग सत्ता व्यवस्था से बदला लेंगे । मंहगाई,  बीमारी और इलाज के अभाव में हर परिवार तबाह है। शिक्षा और स्वास्थ्य पर कुठाराघात है । पर क्या गारंटी कि यह चुनावी मुद्दा बनेगा ही । और बना भी तो आपसी वोट कटान भाजपा को नुकसान पहुंचाएगा ।

पता नहीं कि चुनाव तक आम जनता का ग़म और गुस्सा कितना पिघल चुका होगा, परंतु हम उनके ग़म और गुस्से में कितने साझीदार हुए ? उनके लिए क्या किया ? उन्हें अपनी तरफ़ लाने में क्यों असफल हैं ?

करोना का डर सरकारी डर से हाथ मिलाता रहा। आज भी सड़क पर कौन है?  सबसे ज्यादा परेशान वे ही दिखते हैं जिनको मलाई चाटने की आदत रही है और अब लतिया कर किनारे कर दिए गए हैं।

इन सारी बातों का यह कतई मतलब नहीं कि हम भाजपा के साथ खड़े हैं , या उसकी ओर टुकड़े की आस लगाए बैठे हैं। अनावश्यक रूप से हम अपने ही लोगों पर तलवार भांज रहे हैं , अपने को अधिक वामपंथी जताने के लिए दूसरे को शक के दायरे में घसीट रहे हैं ।

आपके पास एक मात्र जनतांत्रिक विकल्प चुनाव ही है। अपनी सीमा भी समझिए और अपनी ताक़त भी। अपने संवैधानिक अधिकार और चुनावी हथियार पर भरोसा रखिए, उसे आने वाले समय के लिए पहटते रहिए । सोचिए कि जनता ने आपको क्यों ठुकराया और आप उसे कौन सी पट्टी पढ़ाएं कि वह उन्हें छोड़कर आपको चुन ले।

है कोई तैयारी ?

फिर तो साम्प्रदायिकता, तानाशाही, अडानी अम्बानी और एवीएम का झुनझुना ही बचता है। बजाइए।

इस सम्भावना पर भी नज़र रखिए कि  प्रगतिशीलता और ग़ैर साम्प्रदायिकता के नाम पर बेमतलब ढेर टिर्र पिर्र करिएगा तो ‘पुतिन’ वाला रास्ता भी अपनाया जा सकता है । वे सक्षम हैं ।

राजनीति में ही नहीं, साहित्य में भी इतनी तमीज़ आवश्यक है कि क्या न बोला जाए और कब न बोला जाए। फालतू का बोलना उन्हें और चिढ़ाता है और आपको चिढ़ौनी बना देता है। गुस्सा होने से अधिक ज़रूरी है गुस्से को बचा कर रखना।

तानाशाही का एक ही रंग नहीं होता। तानाशाही का राष्ट्रवादी रंग बहुत मोहक होता है पार्टनर।

हमें हिंदुस्तान को कब्रिस्तान बनाने वाली सोच और उनके नुमाइंदों से टकराना ही होगा। जिनके धर्म , जिनकी आस्थाएं चूं  चूं का मुरब्बा हैं वे बेहतर है, नास्तिक हो जाएं। उनका अपना ऊपरवाला, अब नीचे वालों के रहमो करम पर जिंदा है, अगर वाक़ई है तो।

अपनी अपनी सीलन खाई धराऊं किताबों के बाहर आओ इंसानों वरना इंसान कहलाने लायक नहीं बचोगे।

अपने भीतर के हिटलर से नफ़रत करना ही हिंदुस्तान को बचाने की बुनियाद है ।

देवेंद्र आर्य जाने-माने कवि और ग़ज़लकार हैं । गोरखपुर में रहते हैं ।

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