Sunday, May 26, 2024
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शिक्षण संस्थानों में बढ़ती हुई फीस गरीब छात्रों के लिए संकट

आज मैंने अपने विद्यालय के कुछ ऐसे भूतपूर्व छात्रों से बात की जो किसी ने किसी कारणवश अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं। पूरी बातचीत के बाद निष्कर्ष निकाल पाया कि अधिकतर बच्चों ने आर्थिक कारणों से ही पढ़ाई छोड़ी है। जो बच्चे रेंगते-रेंगते उच्च शिक्षा तक पहुंच गए हैं, उनके पास कोई बड़ा कोर्स कर […]

आज मैंने अपने विद्यालय के कुछ ऐसे भूतपूर्व छात्रों से बात की जो किसी ने किसी कारणवश अपनी पढ़ाई छोड़ चुके हैं। पूरी बातचीत के बाद निष्कर्ष निकाल पाया कि अधिकतर बच्चों ने आर्थिक कारणों से ही पढ़ाई छोड़ी है। जो बच्चे रेंगते-रेंगते उच्च शिक्षा तक पहुंच गए हैं, उनके पास कोई बड़ा कोर्स कर पाने का साहस नहीं है, क्योंकि हमारे देश में शिक्षा की ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है जिसमें गरीब बच्चे आठवीं कक्षा के बाद कायदे से पढ़ सकें। ये बच्चे मजदूरी करके या रेस्तरां में काम करके किसी इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेज में दाखिला तो ले नहीं सकते, न ही उनके मां-बाप इतने सक्षम हैं कि उन्हें इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज में एडमिशन दिलवा सकें। वरना कौन नहीं चाहता कि उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई करके अपने भविष्य को उज्ज्वल और सुनहरा बना सकें। ये बच्चे हमेशा सरकारी विद्यालयों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों का ही सहारा लेते हैं, जहां निजी कॉलेजों की अपेक्षा फीस बहुत कम होती है।

पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न कॉलेजों की फीस में भारी मात्रा में वृद्धि हुई है। यह फीस ऐसे समय में बढ़ी है जब देश की जीडीपी और बेरोजगारी दर सबसे न्यूनतम स्तर पर तथा महंगाई चरम पर है। भुखमरी में भारत अपने पड़ोसी देशों म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश, चीन और पाकिस्तान को पीछे छोड़कर 121 देशों में 107 में रैंक पर आ गया है। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज की तरह विश्वविद्यालयों में भी गरीब बच्चों के लिए पढ़ाई का बोझ बढ़ने लगा है। ऐसे समय में उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेना न सिर्फ गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वालों के लिए, अपितु मध्यवर्ग के लिए भी बड़ी चुनौती है।

वर्ष 2020-21 में जेएनयू में भारी फीस वृद्धि हुई थी, जिसके कारण वहां के छात्र-छात्राओं का लंबे समय तक आंदोलन चला। अंत में उनकी बढ़ी हुई फीस को आधा करके आंदोलन को किसी तरह शांत कराया गया। इस दौरान जेएनयू के भूतपूर्व छात्र कन्हैया कुमार ने टेलीविजन चैनल पर बयान दिया कि मेरी मां एक आंगनबाड़ी सेविका है और मैं जेएनयू में इसलिए पढ़ सका क्योंकि वहां की फीस और हॉस्टल के खर्च कम थे। अगर पहले भी इतनी अधिक मात्रा में फीस रही होती तो शायद ही मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर पाता।

[bs-quote quote=”मौजूदा दौर में शिक्षा बिजनेस बनकर रह गया है। देश में ज्यादातर शिक्षण संस्थान अमीरों के हैं। उनमें भी अपराधी और नेता किस्म के लोग ज्यादा हैं। लोग अंग्रेजी माध्यम का निजी स्कूल या कॉलेज इसलिए खोलना चाहते हैं ताकि सरकारी संस्थानों को कमजोर किया जा सके और अवैध रूप से मनमानी फीस वसूल कर गरीब छात्रों का शोषण किया जा सके। जमीन पर ऐसा होता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। कभी इस विषय की भी जांच होनी चाहिए कि एक निजी संस्थान चलाने वाला व्यक्ति चार-पांच सालों में अपनी असीमित आय कैसे बढ़ा लेता है?” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

इस समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि पर काफी बवाल चल रहा है। विश्वविद्यालय कमेटी ने वहां की फीस में तीन गुना वृद्धि कर दी है। अब छात्रों को प्रवेश लेने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। पढ़ने-लिखने में तेज-तर्रार विद्यार्थी भी आर्थिक खर्च वहन न कर पाने की वजह से विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने से वंचित होते जा रहे हैं। फीस वृद्धि के खिलाफ छात्र-छात्राओं का आंदोलन जारी है। सरकार को उन छात्रों से बातचीत करके उनकी समस्याओं का हल ढूंढना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि आर्थिक कारणों से किसी बच्चे की पढ़ाई न रुके।

वर्ष 2013-14 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में फीस वृद्धि हुई थी। तब वहां के छात्र-छात्राओं का दस दिनों तक लगातार आंदोलन चला, जिसके दबाव में आकर कुलपति को फीस वृद्धि का फैसला वापस लेना पड़ा था। विश्वविद्यालयों में लगातार फीस बढ़ती जा रही है। हाल-फिलहाल  फिर से काशी हिंदू विश्वविद्यालय में परास्नातक कोर्स की फीस में 50% वृद्धि कर दी गई है, जिस पर वहां के छात्र-छात्राओं को सख्त ऐतराज है‌। यह एतराज होना भी चाहिए। सोशल मीडिया एवं विभिन्न माध्यमों से लोग फीस वृद्धि के विरुद्ध आवाज उठा रहे हैं। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र में आवाज उठाना कोई गलत बात नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि मनरेगा में मजदूरी करने वाले या गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले व्यक्तियों के बच्चों को उच्च शिक्षा कैसे मिलेगी? मजदूर और किसान के बेटे को विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने का सुगम उपाय क्या हो सकता हैं?

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मुझे एक घटना याद आती है। पढ़ाई के दिनों में मेरा एक साथी सुनील तीन बजे तक क्लास करता था और उसके बाद रात ग्यारह बजे तक होटल में काम करके अपनी पढ़ाई का खर्च वहन करता था। होटल में उसे किताब-कॉपी से दूर रहना पड़ता था। यह घटना मुझे आज यह सोचने को विवश करती है कि वह अपने पढ़ने के लिए समय कब निकाल पाता रहा होगा? उसके पारिवारिक हालात क्या रहे होंगे? उसे अब तक कोई नौकरी मिली कि नहीं? आदि। यह समस्या सिर्फ एक सुनील की ही नहीं है, ऐसे तमाम विद्यार्थी विश्वविद्यालयों में अब भी हैं जो मजदूरी करके अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं।

विश्वविद्यालयों में विरोध और आंदोलन के लिए कुछ हद तक लोकतंत्र बचा है, किंतु मैनेजमेंट कॉलेजों में तो तानाशाही चरम पर है‌। बीएड, बीटीसी, मैनेजमेंट, इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में तो वैसे भी फीस बहुत अधिक है, किंतु इसके अलावा अभ्यर्थियों के ऊपर प्रयोगात्मक और आंतरिक मूल्यांकन का दबाव बनाकर अवैध ढंग से मनमानी फीस वसूल की जाती है। जहां विद्यार्थी अपना नंबर कटने के  डर से ‘उनके नियमों के मुताबिक’ फीस भरते रहते है। इंस्टिट्यूट और कॉलेज पहले तो लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से अभ्यर्थियों लुभाते  हैं, प्रचार-प्रसार और सोशल मीडिया के माध्यम से अपने संस्थान का खूब लाभ बताते हैं और अवैध फीस न लिए जाने की बात करते हैं, किंतु एडमिशन का प्रोसेस पूरा होते ही गिरगिट की तरह अपना रंग बदल लेते हैं।

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इसी तरह मैंने सोशल मीडिया पर बनारस के एक कॉलेज श्री जमुना प्रसाद मौर्य महाविद्यालय का विज्ञापन देखा। इसमें साफ-साफ लिखा था कि यहां पर उच्चस्तर की शिक्षा दी जाती है और विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित की गई फीस के अलावा किसी भी प्रकार के अतिरिक्त पैसों की मांग नहीं की जाती है। यहाँ सारे काम पारदर्शिता के साथ होते हैं। वर्ष 2020 में मेरी पत्नी बीएड की उत्तर प्रदेश परीक्षा में क्वालिफाइड हुई। उसकी काउंसलिंग के लिए मैंने इसी कॉलेज को चुना। 52 हजार ऑनलाइन फीस जमा करने के उपरांत जब मैं कॉलेज पहुंचा तो मुझे पहले ही दिन दो हजार रुपये का फार्म दे दिया गया। मुझे समझ में आ गया कि यह कॉलेज ठीक नहीं है, किंतु मेरे 52 हजार वापस तो हो नहीं सकते थे इसलिए कॉलेज के मानदंडों के अनुसार चलना मजबूरी बन गया था। एडमिशन लेने के बाद कॉलेज ने अपनी मौखिक नियमावली जारी कर दी कि स्कूल की ड्रेस कॉलेज द्वारा निर्धारित दुकान से ही लेना होगा। एक दिन के अनुपस्थिति पर 250 रुपये अर्थदंड तथा प्रति सेमेस्टर परीक्षा फार्म का तीन हज़ार पाँच सौ, प्रायोगिक परीक्षा का चार हजार, स्काउट गाइड का उन्तालीस सौ, योगा फीस का चार हजार रुपया और दो हज़ार पाँच सौ शैक्षिक परिभ्रमण का। कॉलेज में जमा होने वाले एक भी कागज की फाइल कोई बाहर से नहीं खरीद सकता था। सारी फाइलें कॉलेज के अंदर से ही खरीदनी होती थी, जिनका दाम निर्धारित मूल्य से 50 गुना अधिक था।

विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित दो वर्ष की फीस 82 हजार रुपए थी, किंतु संस्थान ने येन-केन प्रकारेण लगभग दो लाख तक फीस वसूल कर ली। वैसे तो 82 हजार रुपया भी छात्रों के लिए बहुत अधिक है लेकिन कॉलेज द्वारा शोषण के अलग ही तरीके हैं। मेरी पत्नी ने बताया कि कॉलेज फीस भरने के लिए 50% से अधिक विद्यार्थियों ने कर्ज या लोन लेकर अपनी पढ़ाई पूरी की। इसमें छात्रवृत्ति की कोई गारंटी नहीं थी। 40% से अधिक विद्यार्थी छात्रवृत्ति पाने से वंचित रह गए, जिनमें एक मेरी पत्नी भी थी। मुझे लगा कि बनारस में सबसे अधिक अवैध रूप से फीस लेने वाला एकमात्र यही कॉलेज है। फिर मैंने अन्य कॉलेज के विद्यार्थियों से भी बात की तो पता चला सबकी यही स्थिति है। आशा महाविद्यालय, सुधाकर महिला महाविद्यालय, धीरेंद्र महिला महाविद्यालय, महादेव पीजी कॉलेज आदि सारे संस्थानों में भी इसी तरह वसूली होती है। ऐसे में सवाल यह बनता है कि कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों के लिए स्थायी समाधान क्या है? उच्च शिक्षण संस्थानों में उनकी भागीदारी कैसे बने? सरकार को इस पर विचार करना चाहिए।

वर्ष 2013 में मैंने अंजना इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल एजुकेशन, प्रतापगढ़ से बीटीसी किया था। वहां मुझे पेड सीट पर एडमिशन मिला, जिसकी निर्धारित फीस 44 हजार रुपए थी। काउंसलिंग के बाद निर्धारित फीस का ड्राफ्ट बनाकर मैंने काउंटर पर जमा कर दिया, लेकिन एडमिशन के बाद ही मुझे एक हजार रुपये का एक दूसरा कागज दे दिया गया। वह रजिस्ट्रेशन का कागज था, जिसे भरने के बाद 25 हजार रुपए अलग से कॉलेज में जमा करना पड़ा। उसकी रसीद मांगी तो डांट खानी पड़ी। कुल मिलाकर पहले सेमेस्टर के पहले ही सप्ताह में 70 हजार रुपया संस्थान को देना पड़ा। ये रुपये बहुत कठिनाई से मेरे पिताजी ने जुहा-जुटाकर मुझे दिया था। मुझे बाद में पता चला कि इन रुपयों के लिए उन्हें कई लोगों से कर्ज लेना पड़ा था और दूसरे साल भी इतनी ही फीस जमा करनी पड़ी। वहां एक दिन की अनुपस्थिति पर पाँच सौ रुपये अर्थदंड था। पाँच सौ बचाने के लिए बीमारी में भी मैं कॉलेज जाता था। प्रति सेमेस्टर परीक्षा फार्म और प्रायोगिक परीक्षा के भी मनमाने ढंग से पैसे लिए जाते थे। इन दो सालों में सवा दो लाख के करीब मुझसे फीस ली गई। बड़े बाबुओं से अवैध फीस पर कुछ पूछो तो वह कहते हैं कि फीस मेरे द्वारा निर्धारित नहीं होती है। हम सिर्फ फाइल का काम देखते हैं। यह सवाल आप मैनेजमेंट से क्यों नहीं करते हैं?

हर माँ-बाप सपना देखते हैं कि वे अपने बच्चों को अच्छी संस्था में बढ़ाएं उसे डॉक्टर और इंजीनियर बनाएं, किंतु देश की व्यवस्था के अनुसार बहुत से बच्चों और उनके माता-पिता को अपने सपने की बलि देनी पड़ती है, क्योंकि लाखों रुपये लगाकर बच्चों को पढ़ा पाना सबके बस की बात नहीं है। ऐसे में जब एक गरीब योग्य विद्यार्थी अपनी सीट छोड़ता है तब एक अयोग्य अमीर विद्यार्थी उस पर कब्जा जमा लेता है। पिछले कुछ वर्षों में आईआईटी और एमबीबीएस की फीस में दस से बीस गुना तक की बढ़ोतरी हुई है। यह फैसला गरीब और सामान्य परिवार के बच्चों के ऊपर वज्रपात जैसी घटना है। बढ़ी हुई फीस का आकलन यह है कि देश भर के 42 डीम्ड विश्वविद्यालयों में कुल 6204 एमबीबीएस (MBBS) सीटें (मैनेजमेंट और एनआरआई कोटा) उपलब्ध हैं। विभिन्न डीम्ड विश्वविद्यालयों में मैनेजमेंट कोटा के लिए वार्षिक एमबीबीएस कोर्स फीस आम तौर पर काफी अधिक होती है और यह 2,11,000 रुपये से 22,50,000 रुपया के बीच हो सकती है। वहीं प्राइवेट कॉलेजों में मेडिकल की फीस 60 लाख रुपय से लेकर करोड़ों रुपये  तक है। यही कारण है कि मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए छात्र अब रूस, यूक्रेन, स्पेन, जर्मनी, आस्ट्रेलिया आदि देशों में जाते हैं। जहां भारत के अपेक्षा फीस एक चौथाई मात्र है। आईआईटी कॉलेजों में भी लगातार फीस बढ़ने की खबरें आती रहती हैं। आखिर शिक्षा को इतना महंगा क्यों किया जा रहा है? इसे देखते हुए सरकार की मंशा पर भी सवाल उठना लाजमी है।

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मौजूदा दौर में शिक्षा बिजनेस बनकर रह गया है। देश में ज्यादातर शिक्षण संस्थान अमीरों के हैं। उनमें भी अपराधी और नेता किस्म के लोग ज्यादा हैं। लोग अंग्रेजी माध्यम का निजी स्कूल या कॉलेज इसलिए खोलना चाहते हैं ताकि सरकारी संस्थानों को कमजोर किया जा सके और अवैध रूप से मनमानी फीस वसूल कर गरीब छात्रों का शोषण किया जा सके। जमीन पर ऐसा होता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। कभी इस विषय की भी जांच होनी चाहिए कि एक निजी संस्थान चलाने वाला व्यक्ति चार-पांच सालों में अपनी असीमित आय कैसे बढ़ा लेता है? स्पष्ट है कि ऐसे लोगों की सांठ-गांठ ऊपर तक होती है, इसलिए उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती है। अब तो बड़े-बड़े स्कूलों में डोनेशन पर एडमिशन होने लगा है। डोनेशन का पैसा काले धन के रूप में जमा होता है। जिसका रिकॉर्ड नहीं रखा जाता है। इसके अतिरिक्त बैग, किताब, कॉपी, कलम, ड्रेस, जूता, टाई, बेल्ट सारी वस्तुएं स्कूल मनमाने दाम पर उपलब्ध कराते हैं। उनके यहां बस किराया भी मामूली नहीं है। इसलिए गरीब व मध्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए सरकारी संस्थानों का विशेष महत्व है, किंतु सरकारी सेवा में भी सरकार का निजीकरण की ओर कदम बढ़ता हुआ देखकर दुख होता है कि दैनिक मजदूरी करके बच्चों को रोजाना स्कूल भेजने वाले मां-बाप के हालत क्या होगी? मुझे लगता है कि अच्छी शिक्षा के लिए स्कूलों का निजीकरण करना उचित समाधान नहीं है। सरकारी स्कूलों को कैसे बेहतर बनाया जा सके, सरकार को इस चीज पर गहन विचार करना चाहिए। साथ ही हर जिले में आठ-दस संस्थान ऐसे जरूर होने चाहिए, जहां पर उच्च शिक्षा बिल्कुल नि:शुल्क हो। तभी हर वर्ग को उच्च शिक्षा में शामिल किया जा सकता है वरना शिक्षा के हर स्तर पर सिर्फ अमीरों की ही तूती बोलती रहेगी।

दीपक शर्मा युवा कवि-कथाकार हैं।

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