चरणजीत सिंह चन्नी सिक्ख हैं या रामदसिया सिक्ख? डायरी (25 सितंबर 2021)

नवल किशोर कुमार

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जो हमारे धर्म के नहीं हैं, वे हमसे अलग हैं। उनके मत अलग हैं और उनके रहने-सहने का तरीका अलग होता है। यही सिखाया जाता था मुझे स्कूल में जब मैं बच्चा था। सिखाने का तरीका भी कोई एक नहीं था। अलग-अलग तरीकों से यह बताया जाता कि हम हिंदू हैं। हालांकि ऐसा तभी तक हुआ जबतक कि मैं एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ता रहा। हालांकि उस स्कूल का नाम बड़ा क्रांतिकारी था- नक्षत्र मालाकार उच्च विद्यालय। नक्षत्र मालाकार बिहार के बड़े नेता रहे, जिन्होंने सामंतवाद के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया।
तो स्कूल में होता यह था कि दो बार प्रार्थनाएं होतीं। एक तो सुबह में कक्षाएं शुरू होने के पहले और एक छुट्टी के पहले। पहली वाली प्रार्थना के समय तो मूड ठीक रहता था। लेकिन अंतिम प्रार्थना के समय मूड अक्सर खराब ही रहता था। बच्चा ही था, भूख लग जाती थी और चौराहे पर चाट-पकौड़ी की दुकानें इंतजार कर रही होती थीं। ऐसे में प्रार्थना करने में भला किसका मन लगेगा।
खैर, एक साल ऐसा हुआ कि गायत्री मंत्र का जोर चला। दोनों प्रार्थनाओं में यह मंत्र शामिल कर लिया गया। फिर तो हम बच्चों को रटाया जाने लगा यह मंत्र। मैं संस्कृत नहीं सीखना चाहता था। कई वजहें थीं। एक तो यही कि इसका व्याकरण बहुत जटिल है। हिंदी के जैसी सहज नहीं है। दूसरा यह कि संस्कृत पढ़कर हम बनेंगे क्या। पंडित तो कोई ब्राह्मण बनने नहीं देगा। फिर संस्कृत का क्या लाभ। आज अभी जो सवाल मेरी जेहन में है, उसका संबंध इसीसे है।
यदि कोई गैर-ब्राह्मण संस्कृत पढ़ भी ले तो क्या वह उतना पूज्य हो जाएगा जितना कि एक अनपढ़ ब्राह्मण होता है? जाहिर तौर पर यह मुमकिन नहीं है। वजह यह कि हिंदू धर्म पाखंड से भरा धर्म है और इसमें तर्क के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन सिक्ख धर्म?
सिक्ख धर्म को लेकर मेरे अपने कुछ ही अनुभव रहे हैं। अच्छे हैं या बुरे, अभी निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दबाजी में नहीं हूं। दरअसल, सिक्ख भी धर्म होता है, यह बात बचपन में ही जान गया था। हालांकि मैं गांव में रहता था और एक कसाई और रजाई बुनने वालों को छोड़कर मेरे गांव में शायद ही कोई गैर हिंदू आता होगा। कसाई तो इसलिए कि वह गांव की बूढ़ी और बेकार हो चुकी गाय-भैंसों-बैलों का खरीदार होता था। हम गांव के लोग उसे बेचते भी थे। आखिर करते भी क्या? चारा कितना महंगा था उन दिनों भी। मुझे तो अभी भी याद है कि उन दिनों चोकर, खल्ली, व अन्य पशु आहार में होनेवाले व्यय को जोड़ लें तो वह उत्पादित दूध से प्राप्त होनेवाली राशि के बराबर ही होती थी। कई बार जब भैंसें बिसुक जातीं तो आमदनी चवन्नी और खर्चा रुपैया वाला हाल हो जाता।
खैर, गांव का अर्थशास्त्र मुनाफा-नुकसान पर ध्यान नहीं देता। एक किसान को चाहे कितना भी नुकसान हो जाय, वह अगले मौसम में बीज जरूर डालेगा। वह अपनी खेत परती नहीं छोड़ेगा।

यह सवाल इसलिए भी कि पंजाब कांग्रेस के एक मंझोले स्तर के नेता से कल देर रात बात हो रही थी। तो उनका कहना था कि कांग्रेस को एक सिक्ख को ही सीएम बनाना चाहिए था। मैंने उनसे पूछा कि क्या रामदसिया सिक्ख, सिक्ख नहीं होते? मेरे सवाल पर वे चौंके। उन्होंने संभलते हुए कहा कि नहीं, ऐसी बात नहीं है कि रामदसिया सिक्ख सिक्ख नहीं होते। वे भी सिक्ख ही होते हैं। लेकिन सामान्य वाले सिक्ख नहीं होते जैसे कि कैप्टन साहब थे। वे खांटी सिक्ख थे। शिरोमणि अकाली दल के सिक्ख जैसे पक्के वाले सिक्ख हैं।

 

उन दिनों एक बूढ़े बाबा आया करते थे। कंधे पर कनस्तर टांगे हुए। उन कनस्तरों में बिस्कुट हुआ करते थे। चार आना से लेकर दो रुपए तक के बिस्कुट होते थे। उनकी सफेद दाढ़ी थी और माथे पर पगड़ी बांधकर रखते थे। उनके पास कौड़िया बिस्कुट होता था। वह काजू के आकार का होता था। मैं तो उसी का दीवाना था। एक रुपैया में चार मिल जाता था। अब भी मिलता है शायद। कीमत अधिक हो गई है। एक रुपए की एक।

तो वह बूढ़े बाबा सिक्ख थे। लेकिन किसी से कोई भेदभाव नहीं करते थे। तब मुझे समझ भी नहीं थी कि सिक्ख होने का मतलब हिंदू होना नहीं है। यह तो तब जाना जब पटना के चितकोहरा मुहल्ले में दारोगा प्रसाद राय हाई स्कूल में पढ़ने गया। वहां सिक्ख धर्मावलंबियों की अच्छी संख्या है। मेरी क्लास में ही चार-पांच सिक्ख थे। पगड़ी बांधकर आते थे। उनके पास कृपाण भी होता था। एक बार क्रिकेट खेलते समय एक बार गुरूचरण ने मुझे धमकाया भी था कि यदि मैं उसकी बॉल पर आउट न हुआ तो वह अपनी कृपाण का कमाल दिखाएगा।
अब तो सब केवल मीठी यादें हैं। लेकिन सवाल शेष है। यह सवाल इसलिए भी कि पंजाब कांग्रेस के एक मंझोले स्तर के नेता से कल देर रात बात हो रही थी। तो उनका कहना था कि कांग्रेस को एक सिक्ख को ही सीएम बनाना चाहिए था। मैंने उनसे पूछा कि क्या रामदसिया सिक्ख, सिक्ख नहीं होते? मेरे सवाल पर वे चौंके। उन्होंने संभलते हुए कहा कि नहीं, ऐसी बात नहीं है  कि रामदसिया सिक्ख सिक्ख नहीं होते। वे भी सिक्ख ही होते हैं। लेकिन सामान्य वाले सिक्ख नहीं होते जैसे कि कैप्टन साहब थे। वे खांटी सिक्ख थे। शिरोमणि अकाली दल के सिक्ख जैसे पक्के वाले सिक्ख हैं।
जाहिर तौर पर पंजाब कांग्रेस के इस मंझोले स्तर के नेता के मुंह से सिक्ख समाज का सच सामने आ गया। यह धर्म भी हिंदू धर्म के जैसा ही है। वाहेगुरू को माननेवाला हर व्यक्ति एक तरह का सिक्ख नहीं हो सकता। आज पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री हैं जो कि रामदसिया सिक्ख हैं। वे दलित हैं। इसलिए उन्हें दलित सिक्ख ही कहा जाएगा या फिर रामदसिया सिक्ख।
खैर, जातिवाद को लेकर लड़ाई बहुत लंबी है। अभी तो बस मुठभेड़ों की शुरूआत हुई है। कल एक कविता देर रात जेहन में आई।
देखो, भारत के इतिहासकारों
हम मिहनतकश जानते हैं कि 
यह धरती गोल है
और अपनी धुरी पर नाचती रहती है
और नाचते-नाचते
सूरज की परिक्रमा भी करती है
और हम इससे भी हैं वाकिफ कि
धरती पर पहले कौन आया था
और सच कहो तो
यह भी जानते हैं कि
आगे कौन किस रूप में रहेगा जिंदा
सर्वाइवल ऑफ दी फिटेस्ट केवल
लिखी हुई बात नहीं है
दुनिया भर के शासकों ने
इसे तलवार, भाले, तोपों, मिसाइलों और 
परमाणु बमों के सहारे साबित किया है।
तो भारत के इतिहासकारों
अपनी अकड़ को त्याग खोलो अपनी आंखें
देखो, यह मेसोपाटामिया और हड़प्पा का युग नहीं है
या फिर उसके बाद आए 
आततायी आर्यों का युग  भी नहीं कि
आदमी मां की गर्भ के बजाय
ब्रह्मा के मुख से पैदा होकर 
सत्ता के शीर्ष पर 
बिना किसी मेहनत के 
मेवा मिष्ठान खाए।
देखो, भारत के इतिहासकारों
अब हमने जान लिया है 
इतिहास रचना और लिखना
और अब नहीं चलेगी तुम्हारी कोई कहानी कि
कोई एक राजा था
उसकी कई रानियां थीं
फिर उसके दर्जनों बच्चे थे
और फिर सबने 
पूरे मुल्क पर राज किया।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    बढ़िया। विचारणीय और पठनीय। कविता भी अच्छी लगी। बधाई।

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