जिनपिंग का सच और मोदी का झूठ (डायरी 4 फरवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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सियासत में सच और झूठ दोनों का महत्व है। आनेवाली पीढ़ी वर्तमान के इस घटनाक्रम को जरूर याद रखेगी। ठीक वैसे ही जैसे हम यह याद रखते हैं कि अमरीका ने वियतनाम के साथ क्या किया और वियतनाम के लोगों ने अमरीका के साथ क्या किया। ऐसे ही हम यह याद रखते हैं 1971 में भारत ने पाकिस्तान के साथ क्या किया और पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने पश्चिमी पाकिस्तान के साथ क्या किया। हम तो यह भी याद रखते हैं 1925 में आरएसएस की स्थापना किन उद्देश्यों को लेकर की गई और कैसे जिन्ना अलग मुस्लिम राष्ट्र की बात करने लगते हैं। हम न तो हिटलर को भूले हैं और ना ही मार्टिन लूथर किंग और ब्लादिमीर लेनिन को।

खैर, आज का घटनाक्रम भी बहुत महत्वपूर्ण है। मामला सच और झूठ का है। दोनों का सियासती इस्तेमाल किया जा रहा है। मेरे पास सच और झूठ काे जांचने का कोई जरिया नहीं है। मुमकिन है कि मेरे इस आकलन में खामियां हों, लेकिन आज समय है कि इस सच और झूठ को दर्ज किया जाय।

दरअसल, मामला यह है कि पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में किसका कब्जा है, इसे लेकर सियासत की जा रही है। गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच नियंत्रण रेखा है। चीन यह पूरे विश्व को बताना चाहता है कि उसने गलवान के अधिकांश हिस्से को अपने कब्जे में ले रखा है। यही संदेश देने के लिए चीन ने ओलंपिक खेलों के शीतकालीन सत्र के दौरान मशालवाहक की फाबाओ नामक अपने सैनिक को बनाया है। चीन ने अपनी पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) के इस सैनिक को वीरता सम्मान से सम्मानित भी किया है।

पूर्वी लद्दाख के गलवान घाटी में किसका कब्जा है, इसे लेकर सियासत की जा रही है। गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच नियंत्रण रेखा है। चीन यह पूरे विश्व को बताना चाहता है कि उसने गलवान के अधिकांश हिस्से को अपने कब्जे में ले रखा है। यही संदेश देने के लिए चीन ने ओलंपिक खेलों के शीतकालीन सत्र के दौरान मशालवाहक की फाबाओ नामक अपने सैनिक को बनाया है।

जाहिर तौर पर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के इरादे स्पष्ट हैं। वह इस सच को पूरी दुनिया के सामने लाना चाहते हैं कि गलवान के अधिकांश हिस्से पर कब्जा है। इनमें वे हिस्से भी हैं जो पहले भारत के कब्जे में थे। इसके लिए दोनों मुल्कों के सैनिकों के बीच संघर्ष भी हुए। याद करिए 5 मई, 2020 की तारीख जब चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर हमला बोला था और उस संघर्ष के दौरान बीस भारतीय जवान मारे गए थे (चूंकि हम भारतीय हैं तो शहीद होना भी कह सकते हैं)। हालांकि भारतीय हुकूमत ने पहले तो यह कहना प्रारंभ किया कि गलवान में चीन ने घुसपैठ किया है। लेकिन 5 मई वाली घटना हो गई तब भारतीय हुकूमत ने यह कहना शुरू किया कि उस संघर्ष में चीनी सैनिक भी मारे गए थे। भारतीय मीडिया में मारे गए चीनी सैनिकों की संख्या 40 बताई गयी, जिसकी पुष्टि आजतक नहीं हो सकी।

खैर, हम भारतवासी हैं तो हमें अपने हुक्मरान की बात करनी चाहिए। नरेंद्र मोदी हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने अपने बारे में एक बार खुद कहा था कि उनके पास 56 इंच का सीना है। वह और उनका पूरा तंत्र चीन के मामले में घुटनों पर बैठा है। वह यह झूठ फैला रहे हैं कि गलवान में चीन ताकतवर नहीं है और उसने अधिकांश हिस्से पर कब्जा नहीं किया हुआ है। अभी जब ओलंपिक के शीतकालीन सत्र के दौरान गलवान में तैनात रहे सैनिक को मशालवाहक बनाए जाने की सूचना के बाद भारतीय हुकूमत ने ओलंपिक के शीतकालीन सत्र का बहिष्कार करने की घोषणा की है।

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अब समझा जा सकता है कि कूटनीतिक मामले में हमारे हुक्मरान कितना पीछे हैं। शी जिनपिंग ने एक मूव से पूरे विश्व को यह बता दिया कि गलवान में उसका सच क्या है। जबकि हमारे हुक्मरान अब उसको खारिज करने की स्थिति में भी नहीं है। उलटा उन्होंने बहिष्कार कर जिनपिंग की चाल को मजबूती दी है।

बात बहुत पुरानी नहीं है। करीब एक सप्ताह पहले ही यह खबर आयी कि चीन और भारत के बीच व्यापार में पिछले दो वर्षों के दौरान करीब 30 गुणा वृद्धि हुई है। जाहिर तौर पर चीन उत्पादक देश है और भारत खरीदार।

खैर, मैं तो यह देख रहा हूं एक शी जिनपिंग सच बोल रहे हैं तो उनके सच बोलने से उनके देश को लाभ हो रहा है। वहीं हमारे नरेंद्र मोदी झूठ बोल रहे हैं और उनके झूठ बोलने हमारे ही देश को नुकसान हो रहा है। और यह पहली बार नहीं हो रहा है कि नरेंद्र मोदी झूठ बोल रहे हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कल अपने बयान में कहा कि चीन खेल के नाम पर राजनीति कर रहा है और इसके लिए वह सेना का इस्तेमाल कर रहा है।

चीन ने यदि अरुणाचल और गलवान में अपना हस्तक्षेप बढ़ाया है तो हमारे हुक्मरान को यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाना चाहिए। वह चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते खत्म करने का साहस दिखाये। आखिर कब तक हमारे देश के हुक्मरान कागजी शेर और बाघ बनकर नकली दहाड़ मारते रहेंगे?

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मैं तो पुलवामा की घटना को याद कर रहा हूं। फिर उसके बाद बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक (इसकी विश्वसनीयता संदिग्ध है और मेरे पास कोई प्रमाण नहीं है) की राजनीति हुई। अभी हाल ही में इंडिया गेट के पास अमर जवान ज्योति को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में विलय किया गया। सवाल है कि क्या यह राजनीति के लिए सेना का उपयोग नहीं है?

निस्संदेह चीन ने जो किया है, हम भारत के लोग उसकी निंदा करते हैं। हमारे हुक्मरान को इस पूरे मामले में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। चीन ने यदि अरुणाचल और गलवान में अपना हस्तक्षेप बढ़ाया है तो हमारे हुक्मरान को यह मामला संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाना चाहिए। वह चीन के साथ व्यापारिक रिश्ते खत्म करने का साहस दिखाये। आखिर कब तक हमारे देश के हुक्मरान कागजी शेर और बाघ बनकर नकली दहाड़ मारते रहेंगे?

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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