अगर रामनाथ कोविंद दलित के बजाय ब्राह्मण होते! डायरी (26 जनवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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जाति कभी नहीं जाती। अक्सर यह बात सुनता हूं और कभी–कभार तो मैं भी लिख देता हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जाति नामक यह सामाजिक बीमारी स्थायी बीमारी है और इसका कोई इलाज नहीं है। मेरा मानना है कि इस बीमारी का खात्मा भी संभव है। हालांकि यह इतना आसान नहीं है जितना कि इस बात की कल्पना करने में कि डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखे गए ‘जाति का विनाश’ का अनुसरण करने से इसे खत्म किया जा सकता है।
दरअसल, मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर किन कारणों से मेरे जैसा आदमी भी यह लिखने को बाध्य होता है कि जाति कभी नहीं जाती। फिलहाल तो मैं इस बात को दर्ज करना चाहता हूं कि आज मेरी जेहन में यह बात क्यों आयी।
असल में कल हुआ यह कि रेडियो पर गाने सुन रहा था। साथ में खुद के लिए डिनर बनाने की तैयारी कर रहा था। दिल्ली आने के बाद एक यह गुण मेरे अंदर आया है कि मैं अब भूखा नहीं रह सकता। नहीं तो पहले जब खाना बनाना नहीं आता था तब अनेक अवसरों पर भूखे रह जाया करता था। खासकर ठंड के दिनों में। और पिछले दो साल तो गजब के थे। कोरोना के कारण लॉकडाउन की स्थिति थी। ढाबे आदि भी बंद रहते थे।

हमारे यहां के राष्ट्रपति ऐसे ही होते हैं। फिर इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास उनका अपना विवेक नहीं होता। लेकिन हमारे यहां का ढांचा ही ऐसा है कि राष्ट्रपति के पद पर बैठा बेचारा आदमी महज बेचारा ही बना रहता है।

 

खैर, रेडियो पर अचानक 73वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का भाषण प्रसारित हो रहा था। वह अंग्रेजी में देश की जनता को संबोधित कर रहे थे। मैंने कल पहली बार उनका भाषण सुना। अंग्रेजी के शब्दों का उनका उच्चारण निस्संदेह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा किए जानेवाले उच्चारण से बहुत बढ़िया था। कोविंद एकदम संतुलित वाणी में अपनी बात कह रहे थे। हालांकि वह जो कह रहे थे, उससे सहमत होने का सवाल ही नहीं उठता है। दरअसल वे देश की जनता के सामने कोई नई बात नहीं कह पाए। नई बात का मतलब यह कि देश को कोई नई राह नहीं दिखा पाए। उनका संबोधन मानो नरेंद्र मोदी हुकूमत की शान में प्रशस्ति पत्र का पाठ हो।
यह कोई ऐसी बात नहीं है कि जिसके लिए कोविंद की आलोचना की जाय। अक्सर हमारे यहां के राष्ट्रपति ऐसे ही होते हैं। फिर इसका मतलब यह नहीं है कि उनके पास उनका अपना विवेक नहीं होता। लेकिन हमारे यहां का ढांचा ही ऐसा है कि राष्ट्रपति के पद पर बैठा बेचारा आदमी महज बेचारा ही बना रहता है। वह चाहे भी तो कुछ नहीं कर सकता। अगर कोई ढंग का आदमी राष्ट्रपति होता तो वह शासन, प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों के कान उमेठता और बताता कि पिछले कुछ सालों में देश की दुर्दशा क्या हुई है। महंगाई और बेरोजगारी दर कैसे बढ़ी है और इसके लिए कौन लोग जिम्मेदार हैं। जमीर और रीढ़दार राष्ट्रपति होता तो वह सरकार से सवाल पूछता कि जब इतनी सशक्त सेना हमारे पास है फिर चीन हमारी सीमा में गांव कैसे बसा रहा है?

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा कल किए गए देश के नाम संबोधन को दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता जैसे अखबार ने भी पहले स्थान पर जगह नहीं दिया है। जबकि इसी पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित ऐरे--गैरे--नत्थू--खैरे सभी का बयान प्रकाशित है। राष्ट्रपति के संबोधन को इस अखबार ने आठवें पन्ने पर जगह दिया है।

खैर, कहां मैं ख्वाब देखने लगा कि इस देश को एक दिन ऐसा भी राष्ट्रपति नसीब होगा। मैं तो इस शब्द का ही विरोध करता हूं। वजह यह कि इस शब्द में पितृसत्ता की बू आती है। इस पद का नाम बदल दिया जाना चाहिए ताकि पितृसत्ता को बढ़ावा ना मिले। प्रधानमंत्री शब्द ठीक है लेकिन राष्ट्रपति तो सुनने में ही अजीब लगता है।
बहरहाल, इन तमाम बातों के बीच एक बात तो महत्वपूर्ण है कि राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक होते हैं। कार्यपालिका सहित सभी शासकीय तंत्र के प्रत्यक्ष–अप्रत्यक्ष प्रमुख। यहां तक कि सेना के तीनों अंगों के कमांडर इन चीफ राष्ट्रपति ही होते हैं। लेकिन मैं यह देख रहा हूं कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा कल किए गए देश के नाम संबोधन को दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता जैसे अखबार ने भी पहले स्थान पर जगह नहीं दिया है। जबकि इसी पन्ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित ऐरे–गैरे–नत्थू–खैरे सभी का बयान प्रकाशित है। राष्ट्रपति के संबोधन को इस अखबार ने आठवें पन्ने पर जगह दिया है।
ऐसा क्यों हुआ है या फिर जनसत्ता ने ऐसा क्यों किया है? यह बात आप भी सोचिए। यह भी सोचिए कि रामनाथ कोविंद यदि दलित नहीं ब्राह्मण होते तो क्या तब भी जनसत्ता ने ऐसा ही किया होता?
फिलहाल तो गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मेरे जेहन में एक कविता–
मुनादी है कि
कल देश में मनाया जाएगा
गणतंत्र दिवस
और सभी को
एक सुर में गाने हैं
जन-गण-मन का गीत
और लगाने हैं
वंदे मातरम के गगनभेदी नारे।
यह मुनादी तुम्हारे लिए भी है
सड़कों पर जीने-मरनेवालों।
जो नहीं लगाएंगे
मारे जाएंगे।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

2 Comments
  1. राजेश पाल says

    मै कई बार सोचता हूँ कि तमाम निगम स्वार्थो की कमजोरी के बावजूद सर्वोच्च पद पर पहुच कर भी अब इन्हें और क्या पद चाहिये, कम से कम अब तो इन्हें अपने समाज के हित के लिये assert करना ही चाहिये। अगर अब नही तो कब। शायद समझौते की आदत यहा तक पपहुँचते पहुचते उनकी मानसिकता ही दब्बू बन गयी हैं ।

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