विनिवेश में प्राथमिकता मिले गैर-हिंदू उद्यमियों को  

एचएल दुसाध

1 261

एयर इंडिया के कॉकपिट में टाटा 

नयी सदी में विनिवेश मंत्रालय गठित कर लाभजनक सरकारी कंपनियां व परिसंपत्तियां बिकने का जो सिलसिला स्वयंसेवी अटल बिहारी वाजपेयी से शुरू हुआ, वह मोदी राज में इस हद तक तुंग पर पहुँच गया है कि लगता है सरकार के पास कुछ रहेगा ही नहीं: सब कुछ निजी हाथों में चला जायेगा। बहरहाल मोदी राज में विनिवेशीकरण के जरिये  देश का सबकुछ निजी क्षेत्र में जाने का जो अंधाधुन सिलसिला शुरू हुआ, उसमे 27 जनवरी, 2022 एक ऐसा दिन रहा जब देश ने कुछ राहत की सांस ली। उस दिन करीब 69 साल बाद आधिकारिक तौर पर टाटा समूह के हाथों में उस एयर इंडिया की कमान आई, जिसकी शुरुआत टाटा ग्रुप्स ने 1932 में की और जिसका 1953 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने राष्ट्रीयकरण कर लिया था। इस बात की पुष्टि करते हुए टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने बताया है कि टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टैलेस प्राइवेट लिमिटेड ने आठ अक्टूबर, 2021 को कर्ज में डूबी एयर इंडिया के अधिग्रहण की बोली जीत ली थी। इसके बाद अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने में करीब तीन महीने लग गए। अब आधिकारिक तौर पर एयर इंडिया की कमान टाटा समूह को मिल गई है। इस अधिग्रहण प्रक्रिया के बाद भारत की एविएशन इंडस्ट्री में टाटा समूह का दबदबा बढ़ गया है इसकी अब तीन एयरलाइन- विस्तारा, एयर एशिया और एयर इंडिया हो गई है। टाटा समूह को एयर इंडिया में शत प्रतिशत हिस्सेदारी मिली है। विस्तारा एयरलाइन, टाटा संस प्राइवेट लिमिटेड और सिंगापुर एयरलाइंस लिमिटेड (एसआईए) का एक ज्वाइंट वेंचर है। इसमें टाटा संस की 51 फीसदी हिस्सेदारी है तो सिंगापुर एयरलाइन का स्टेक 49 फीसदी है। अगर एयर एशिया की बात करें तो इसमें टाटा संस की हिस्सेदारी 83.67 फीसदी है।

अंबानी – अडानी के हाथों में जाने पर शुरू होता धरना-प्रदर्शनों का सिलसिला 

69 साल बाद एयर इंडिया के कॉकपिट में टाटा के सवार होने की खबर अगले दिन तमाम अख़बारों में बहुत महत्व के साथ प्रकाशित हुई। अधिकांश अख़बारों ने खबर के साथ प्रधानमंत्री आवास के लॉन में आमने-सामने बैठे टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर भी प्रकाशित की थी, जिसमे प्रधानमंत्री के मुस्कुराते चेहरे पर अपार संतोष का भाव परिलक्षित हो रहा था। मैंने यह खबर अपने कुछेक मित्रों से शेयर की: हर कोई इससे राहत की सांस लेते मिला। इस क्रम में मैंने एयर इंडिया में बड़े अधिकारी तौर पर कार्यरत अपने एक परिचित से यह जानने का प्रयास किया कि एयर इंडिया के टाटा के हाथों में जाने से कर्मचारियों में क्या प्रतिक्रिया हुई है। उन्होंने एक लाइन में कहा यदि यह अंबानी-अडानी के हाथ में गयी होती तो अबतक धरना-प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हो गया होता। उसके अगले दिन मुझे एक एनिमेटेड वीडियो कहीं दिख गया, जिसमे देखा जा रहा है कि एयरपोर्ट बैठे महाराजा जहाजों को उड़ते देखकर रोये जा रहे हैं। इसी बीच तेजी से रन वे पर एक कार आती है। कार से निकलते है रतन टाटा और प्यार से महाराजा को अपने पास बुलाते हैं। रतन टाटा को देखकर महाराजा की आंखे ख़ुशी से चमक उठती हैं। वह दौड़कर उनके पास पहुँचते हैं, टाटा उनको गले लगा लेते हैं। उसके बाद वाले दृश्य में दिखाई पड़ रहा है कि टाटा महाराजा की दाढ़ी साफ़ करते है। फिर उनको नए कपड़े और जूते देकर उनकी हुलिया बदल डालते हैं और महाराजा पहले की तरह खुश दिखने लगते हैं।

विनिवेश की हिस्ट्री में एयर इंडिया का टाटा के हाथों में जाना एक नयी और सुखद घटना थी, इसलिए इस पर लोगों की राय जानने के लिए मैंने एक बड़े अख़बार में इससे जुड़ी खबर की फोटो की खींचकर उसके साथ फेसबुक पर इस शीर्षक- अपने ईष्ट से प्रार्थना करें कि देश हिंदुओं के बजाय गैर- हिंदू व्यवसायियों के हाथ में बिके- के साथ निम्न पोस्ट डाल दिया।

देश हिंदुओं के बजाय गैर- हिंदू व्यवसायियों के हाथ में बिके

विनिवेश की हिस्ट्री में एयर इंडिया का टाटा के हाथों में जाना एक नयी और सुखद घटना थी, इसलिए इस पर लोगों की राय जानने के लिए मैंने एक बड़े अख़बार में इससे जुड़ी खबर की फोटो की खींचकर उसके साथ फेसबुक पर इस शीर्षक- अपने ईष्ट से प्रार्थना करें कि देश हिंदुओं के बजाय गैर- हिंदू व्यवसायियों के हाथ में बिके- के साथ निम्न पोस्ट डाल दिया।

‘गनीमत है महाराजा किसी हिंदू के हाथ में न जाकर एक महान इंडियन पारसी के घर पनाह लिए हैं। वह यदि किसी हिंदू के हाथ में जाते तो देश और मानवता के लिए ज्यादा घातक होता क्योंकि ये मुख्यतः व्यवसाय के एक ही मोटिव: प्रॉफिट मोटिव को ध्यान में रखते हैं। व्यवसाय का दूसरा मोटिव: सर्विस मोटिव इनके एजेंडे में होता ही नहीं! इस कारण इनमें से विरले ही कोई वारेन बफेट और बिल गेट्स की भूमिका में अवतरित होता है। ये सर्विस मोटिव के नाम पर स्कूल- कॉलेज- हॉस्पिटल इत्यादि नहीं, अपनी फैक्टरियों में मंदिर और तीर्थ स्थलों में धर्मशालाओं का निर्माण कराते हैं। हिंदू- जैनी व्यवसायियों में एक बड़ा ऐब यह भी होता है कि ये विविधता विरोधी होते हैं, इसलिए अपने वर्कफोर्स में विविध समुदायों के बजाय स्व- जाति/वर्ण को ही तरजीह देते हैं। ऐसे में जब देश की तमाम सरकारी कंपनियां, रेलवे, हवाई अड्डे, स्कूल, कॉलेज इत्यादि निजी क्षेत्र देने की कवायद जोर- शोर से जारी है, आप अपने सुपर पॉवर से प्रार्थना करें कि वह सब पारसी- सिख- मुस्लिम- ईसाई इत्यादि गैर- हिंदू व्यवसायियों के हाथ में जाए।’

यह भी पढें:

5 राज्यों के चुनाव के आइने में 73 वें गणतंत्र दिवस पर संकल्प!

मेरे उपरोक्त पोस्ट पर आश्चर्यजनक रूप से इकतरफा सकारात्मक कमेन्ट आये। पहला कमेन्ट एक सुविख्यात लेखिका की ओर से आया। उन्होंने लिखा, ‘सुपर्ब! मैने ठीक यही सोचा कितना सही हुआ ना। जब बिकना ही तय था तो यही सही’ उनके कमेन्ट को कई लोगों ने लाइक किया। एक प्रख्यात लेखक ने लिखा, ‘बेहद सटीक और सही टिप्पणी’। एक और वरिष्ठ लेखक ने लिखा, ‘अद्भुत विचार! किसी ने अबतक इस नजरिये से सोचा नहीं। यह राष्ट्रहित में बेहद जरुरी सुझाव है।’ इसी तरह और कई लोगों ने मेरे पोस्ट के समर्थन में एक दूसरे से होड़ लगाया। कहने का मतलब मेरे पोस्ट पर तमाम लोगों ने सकारात्मक कमेन्ट करके एयर इंडिया को टाटा के हाथ में जाने का भरपूर स्वागत किया। देश बिकने के दौर में एयर इंडिया का टाटा के हाथों में जाना एक सुखद हवा का झोंका है, शायद इसलिए ही वित्त मंत्री निर्मला सीता रमण ने एयर इंडिया के निजीकरण को सबसे बड़ी उपलब्धि बताई हैं। इसके पहले देश बेचवा सरकार की ओर से कभी इस तरह ख़ुशी जाहिर नहीं की गयी थी। बहरहाल एयर इंडिया के टाटा के हाथों में जाने पर जिस तरह खुद एयर इंडिया के कर्मचारियों से लेकर बिक्रेता भारत सरकार और बुद्दिजीवी वर्ग ने राहत की सांस लिया है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि नयी सदी में विनिवेश की हिस्ट्री में इससे एक सुखद अध्याय जुड़ा है। और यदि यह सुखद अध्याय है तब क्यों न निजीकरण का विरोधी बुद्धिजीवी वर्ग सरकारी कंपनियों-परिसंपत्तियों को हिन्दू व्यापारियों के हाथों में जाने से रोकने का एक नया अभियान छेड़े!

काबिलेगौर है कि 24 जुलाई, 1991 को प्रधानमन्त्री नरसिंह राव द्वारा अंगीकृत नवउदारवादी नीति को हथियार बनाकर, जिस तरह प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी ने आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने और आंबेडकर के संविधान को व्यर्थ करने के लिए लाभजनक सरकारी कंपनियों तक को निजी क्षेत्र में देने का अभियान छेड़ा, उसे रोकने में निजीकरण विरोधी बुद्धिजीवी वर्ग पूरी तरह असमर्थ रहा है।

सरकारी कंपनियों को हिन्दू व्यापारियों के हाथों में जाने से रोकना क्यों है जरुरी

काबिलेगौर है कि 24 जुलाई, 1991 को प्रधानमन्त्री  नरसिंह राव द्वारा अंगीकृत नवउदारवादी नीति को हथियार बनाकर, जिस तरह प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के बाद नरेंद्र मोदी ने आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने और आंबेडकर के संविधान को व्यर्थ करने के लिए लाभजनक सरकारी कंपनियों तक को निजी क्षेत्र में देने का अभियान छेड़ा, उसे रोकने में निजीकरण विरोधी बुद्धिजीवी वर्ग पूरी तरह असमर्थ रहा है। अब तो लोग इतने असहाय व निराश हैं कि देश का सारा कुछ निजी क्षेत्र में जाते देखकर टीका-टिप्पणी तक करना छोड़ दिए हैं। ऐसे में जब एयर इंडिया के टाटा के हाथों में जाने से देश बिकने की हिस्ट्री में एक बेहतर दृष्टांत स्थापित हुआ है, तब क्यों न विनिवेश में सिख- पारसी- मुस्लिम- इसाई व्यापारियों को प्राथमिकता दिए जाने का अभियान छेड़ा जाय। ऐसा करने के पहले व्यवसाय के उद्देश्यों पर जरा आलोकपात कर लिया जाय।

आमतौर पर लोग यही मानते है कि व्यवसाय का एकमात्र उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ कमाना अर्थात आर्थिक उद्देश्य है।लेकिन बिजिनेस मेथड की किताबों में लिखा है कि व्यवसाय –व्यापार के उद्देश्य आर्थिक के साथ सामाजिक, मानवीय, राष्ट्रीय और वैश्विक इत्यादि उद्देश्य भी होते हैं। इसलिए एक आदर्श उद्यमी खासकर कार्पोरेट व्यवसाय इकाई के लिए आर्थिक के साथ सामाजिक, मानवीय, राष्ट्रीय, वैश्विक इत्यादि उद्देश्यों को समान रूप से ध्यान में रखना जरुरी होता है। चूँकि एक कार्पोरेट इकाई समाज की एक आर्थिक संस्था होती इसलिए सामाजिक उद्देश्य के तहत उचित मूल्य पर वांछित गुणवत्ता युक्त वस्तुओं की आपूर्ति के साथ मुनाफाखोरी और असामाजिक कार्यों से बचने के लिए जमाखोरी, कालाबाजारी इत्यादि से दूर रहना इसके अत्याज्य कर्तव्य में आता है। चूँकि एक कार्पोरेट इकाई का उत्पादन उसमे कार्यरत लोगों के सामूहिक प्रयास से होता है, इसलिए मानवीय उद्देश्यों के तहत कर्मचारियों को उचित मजदूरी देने के साथ उनके स्वास्थ्य व  सुख–सुविधाओं का ख्याल रखना उसका एक अनिवार्य कर्तव्य है। इसी तरह राष्ट्रीय उद्देश्यों के तहत एक कंपनी को राष्ट्र का हिस्सा होने के नाते राष्ट्रीय योजनाओं और सामाजिक न्याय तथा राष्ट्र की आत्म-निर्भरता और निर्यात के विकास को ध्यान में रख कर अपनी व्यवसायिक गतिविधियाँ चलानी चाहिए। यदि उपरोक्त उद्देश्यों की कसौटी पर हिन्दुओं (हिन्दू- जैनियों)  द्वारा संचालित कंपनियों की गतिविधियों पर नजर दौड़ाया जाय तो साफ़ नजर आएगा कि ये सामाजिक, मानवीय, राष्ट्रीय और वैश्विक उद्देश्यों की पूर्ति के क्षेत्र काफी हद व्यर्थ रहती हैं। इनका एकमेव उद्देश्य आर्थिक लाभ नजर आता है। इसलिए ये अपने कर्मचारियों को उचित वेतन व अन्य सुविधाएँ प्रदान करने में बहुत ही पीछे तो जमाखोरी – कालाबाजारी इत्यादि अनैतिक कार्यो में काफी आगे नजर आती हैं।

कोलकाता के औद्योगिक इलाके का अनुभव

यह लेखक एक ज़माने में कोलकाता के औद्योगिक इलाके जगतदल में एक ब्रिटिश कंपनी में जॉब करता था। वहां शानदार वेतन के साथ कैंटीन, लाइब्रेरी, इनडोर–आउटडोर गेम्स, नाट्य मंचन इत्यादि की इतनी सुविधाएँ मिलती थीं कि उस इलाके के लोग एक्साइड बैटरी फैक्ट्री को राजा फैक्ट्री मानकर इर्ष्या करते थे। उसमें  नॉमिनी सिस्टम था जिसके तहत किसी कर्मचारी के नौकरी छोड़ने या निधन होने पर उसके द्वारा नामित व्यक्ति को जॉब लग जाता था। इसी सुविधा को ध्यान में रखते हुए मैंने कभी सरकारी सर्विस के लिए एप्लाई नहीं किया। नौकरी की उम्र होने पर मैंने उसमे कार्यरत अपने पिताजी को इस्तीफा देने का अनुरोध किया और वह मान गए। मैं उनकी जगह जॉब पाकर जीवन को भरपूर एन्जॉय करने के साथ अपने बच्चो को सही शिक्षा सुलभ कराकर बेहतर भविष्य देने में समर्थ हुआ। उस इलाके में कुछेक और भी ब्रिटिश कंपनियां थी, जिनमें बढ़िया वेतन के साथ कर्मचारियों के रहने के लिए बढ़िया आवास, स्वास्थ्य की देखभाल के लिए हॉस्पिटल, बच्चो के लिए बढ़िया स्कूल और प्ले ग्राउंड की सुविधाएँ थीं। इसके साथ वहां मारवाड़ियों द्वारा चलाये जाने वाले जूट मिल व दूसरे कल-कारखाने थे ,जहां के कर्मचारियों की दशा देख कर हम द्रवित हो जाया करते थे। उनके द्वारा सुलभ कराये गए एक-एक कमरों में भेड़-बकरियों की तरह दस-दस, बारह-बारह लोग रहने के लिए विवश रहे।मारवाड़ियों के कारखानों में एक ही अच्छी बात दिखती की सभी में साफ़-सुथरे मंदिर होते थे। उनके कारखानों में हिंदी पट्टी के ठाकुर-ब्राह्मण ही दरवान से लेकर बाबू के रूप में नजर आते। ट्रेड यूनियनों पर भी उन्हीं उच्च वर्णों का दबदबा रहता, जिनकों कुछ सुख- सहूलियते देकर निरीह व असहाय मजदूरों का शोषण किया जाता। मैंने मारवाड़ियों के मिल- फैक्टरियों में काम करने वालों में किसी को बड़ा सपना पालते नहीं देखा।1996 में जगतदल छोड़ने के बाद आज भी साल-दो साल पर वहां के मित्रं से मिलने जाता हूँ तो पाता हूँ कि मारवाड़ी मिलों के कर्मचारियों की दशा पहले से भी बदतर हो गयी है।

हिन्दू उद्यमियों की अनैतिकता के लिए जिम्मेवार: हिन्दू धर्म-संस्कृति !

हिन्दू कंपनियों के मालिक अपने मजदूरों को न्यूनतम सुविधाएँ देने के साथ अपना रिसर्च एंड डेवलपमेंट में भी निवेश नहीं करते। कोलकाता के औद्योगिक इलाके में 33 साल रहने दौरान मैंने हिन्दू कंपनियों का जो रूप देखा, वह आज की तारीख में दु: स्वप्न जैसा लगता है। अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि वे गुणवत्ताहीन घटिया वस्तुओं का उत्पादन व आपूर्ति: जमाखोरी और कालाबाजारी में सर्वशक्ति लगाकर अधिक से अधिक मुनाफा कमाने की जुगत भिड़ाते रहते हैं। ऐसा है तभी तो ऑक्सफाम की 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक मानव जाति पर कोरोना के रूप में आये अभूतपूर्व संकट के दौर में भारतीय अरबपतियों की संख्या में 39 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। भारत के व्यवसायिक जगत में हर्षद मेहता, केतन पारेख , नीरव मोदी, विजय माल्या, राजू लिंगम की एवरेस्ट सरीखी उपस्थिति; जैन बंधुओं: एसके जैन- जेके जैन, बीपी जैन तथा एनके जैन द्वारा अंजाम दिया हवाला कांड जैसे सैकड़ों छोटे-बड़े काण्ड इस बात के संकेतक हैं कि हिन्दू उद्यमी अपना आर्थिक उद्देश्य पूरा करने के लिए सामाजिक-मानवीय- राष्ट्रीय-वैश्विक इत्यादि उद्देश्यों की कोई परवाह नहीं करते। इसके लिए जिम्मेवार हिन्दू धर्म-संस्कृति है, जिसमे मानवता की सेवा निहायत ही गौड़ है। यह संस्कृति बतलाती है कि गंगा में डूबकी लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं। इसलिए हिन्दू उद्यमी अनैतिक मार्गों से कमाई गयी दौलत का प्रायश्चित करने के लिए अपने कर्म स्थल पर मंदिर और तीर्थ स्थलों पर धर्मशाला का निर्माण कराते हैं। दो नम्बरी तरीके से कमाई गयी दौलत का प्रायश्चित करने व अधिक धनार्जन के लिए ही ये बालाजी, शिरडी के साईं बाबा को करोड़ों का स्वर्ण मुकुट अर्पित करते हैं। हिन्दू धर्म-संस्कृति ने इनमें सामाजिक विवेक पैदा नहीं होने दिया, इसलिए जिस तरह अमेरिकी प्रभु वर्ग के उद्यमी वहां की विविधता नीति(डाइवर्सिटी पॉलिसी)के तहत सदियों के शोषित- उपेक्षित ब्लैक्स को फिल्म-टीवी, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि अर्थोपार्जन की समस्त गतिविधियों में शेयर देने के लिए स्वतःस्फूर्त रूप से सामने आये, वैसा दृष्टान्त हिन्दू उद्यमी स्थापित न कर सके।

समाज सेवा और अर्थ-दान में क्यों आगे हैं अहिंदू उद्यमी!

हिन्दू उद्यमियों के विपरीत के विपरीत यदि सिख, इसाई, मुसलमान, पारसी इत्यादि अ-हिन्दू उद्यमियों की गतिविधियों पर गौर किया जायेगा तो पाएंगे कि वे आर्थिक के साथ सामाजिक, राष्ट्रीय, वैश्विक इत्यादि उद्देश्यों के प्रति समान रूप से समर्पित रहते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनका धर्म गरीब-दुखियों की सेवा में ही लौकिक और परलौकिक सुख पाने का उपदेश करता है। इसलिए गैर-हिन्दू व्यापारी सदियों से ही आधुनिक वारेन बफेट, बिल गेट्सों की भूमिका में अवतरित होते रहे हैं। इसलिए भारत में भी इन धर्मों से जुड़े उद्यमी अपने कर्मचारियों का बेहतर ख्याल रखते हैं। देश और समाज के लिए बड़ा से बड़ा अर्थदान करते हैं। गरीब- गुरुबों की सेवा में विश्वास के कारण मुस्लिम समुदाय में जन्मे विप्रो के अज़ीम प्रेम जी, सिप्ला के युसूफ हमीद, हाबिल खोराकीवाला, रियल एस्टेट उद्योग के इरफ़ान रजाक, टाटा के साथ पारसी समुदाय के पालोंजी मिस्त्री, सायरस पूनावाला, आदि गोदरेज; सिख समुदाय के बर्जर पेंट्स की ढीगरा फैमिली, ली मेरिडियन, ओबेरॉय होटल, मैक्स हेल्थ केयर, रैनबक्सी-फोर्टिस ग्रुप के सिख उद्यमियों का चरित्र हर्षद मेहता, नीरव मोदी, विजय माल्या के भाई- बंधुओं से बहुत अलग है। 2020 और 2021 में आई कोरोना महामारी ने भारत सहित पूरे विश्व में अभूतपूर्व निराशा और भय का माहौल पैदा किया। उस दौर में दुनिया के दूसरे देशों के उद्योगपतियों की भांति भारतीय उद्योगपति भी दिल खोलकर दान करने के लिए सामने आये। 2020 में 90 सबसे बड़े दान दाताओं ने कुल 9324 करोड़ दान दिए, जिनमे विनिवेश का सर्वाधिक लाभ उठाने वाले मुकेश अम्बानी और अडानी का नाम भी शामिल है। इनमें अज़ीम प्रेमजी ने मुकेश अंबानी से 17 गुना  ज्यादा कुल7904 करोड़ का दान दिया, जबकि अडानी ग्रुप की ओर से महज 100 करोड़ दान किये गए। कोरोना में जब हिन्दू अरबपतियों की संख्या में लम्बवत विकास हो रहा था, सिख उद्यमी गुरु द्वारों के जरिये मानवता की सेवा का दुर्लभ इतिहास रचने में व्यस्त दिखे।

अगोरा प्रकाशन की किताबें अब किंडल पर भी उपलब्ध हैं:

विश्व के टॉप दानवीरों में कोई हिन्दू नहीं 

समय-समय पर दानवीरों को लेकर रपटे प्रकाशित होती रहती हैं। पिछले दिनों कोरोना महामारी में ढेरों भारतीय दानवीरों का नाम उभर कर आया। लेकिन जब भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दानवीरों की सूची प्रकाशित होती है, उसमे किसी हिन्दू उद्यमी का नाम ढूंढे नहीं मिलता, कारण ये इस स्तर का काम ही नहीं करते कि उनका नाम विश्व स्तर की तालिका में आये। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भारत में कोई अंतर्राष्ट्रीय स्तर का दानवीर नहीं है। मार्च  2020 में दुनिया के 9 सबसे बड़े दानवीरों की एक तालिका प्रकाशित हुई थी, भारत के मुसलमान उद्यमी अज़ीम प्रेम जी पांचवे स्थान पर थे। इसी तरह जून 2021 में ‘एडेलगिव फाउन्डेशन’ द्वारा सदी के 50 टॉप दानवीरों की जो लिस्ट जारी हुई थी, उसमे भारत के दिग्गज पारसी उद्योगपति और  टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा को सदी के सबसे बड़े परोपकारी के रूप में चिन्हित किया गया था। रिपोर्ट में बताया गया था कि पिछले 100 सालों में दान करने के मामले में उनके जैसा परोपकारी दुनिया कोई और नहीं हुआ। उस रिपोर्ट में जमशेदजी टाटा 102 अरब अमेरिकी डॉलर दान के साथ टॉप पर थे, जबकि बिल और मेलिंडा गेट्स 76. 6 अरब डॉलर दान कर दूसरे नंबर पर। इनके बाद उस सूची में शामिल रहे वारेन बफेट(37.4 अरब डॉलर), जॉर्ज सोरोस(34 .8 अरब डॉलर), जॉन डी रॉकफेलर(26.8 अरब डॉलर) जैसे विश्व विख्यात दानवीर जमशेदजी टाटा से मीलों पीछे थे। सदी के टॉप 50 दानवीरों में भारत की ओर से दूसरे एकमात्र अन्य भारतीय के रूप में अज़ीम प्रेमजी थे, जिनके नाम के साथ 22 अरब अमेरिकी डॉलर की दानराशि जुड़ी थी। सूची में 38 दानवीर अमेरिका से, 5 ब्रिटेन से 3 चीन और भारत से दो नाम रहे, जो इस बात का संकेतक है कि ईसा के लोगों में दानशीलता व परोपकार का भाव बहुत ज्यादा , जबकि हिन्दूओं का रिकॉर्ड निहायत ही कारुणिक है।

मोदी सरकार विनिवेश में गैर- हिन्दुओं को प्राथमिकता देने का मन बनाये

भारी अफ़सोस की बात है कि विनिवेश के जरिये सारी सरकारी कंपनियां, रेल, बस और हवाई अड्डे, चिकित्सालय और विद्यालय इत्यादि: प्रायः सारा कुछ उन्हीं हिन्दू-जैनी उद्यमियों के हाथ में जा रहा है, जिनका परोपकार के मामले में रिकॉर्ड अत्यंत शोचनीय है एवं जो व्यवसाय के सामाजिक, मानवीय, राष्ट्रीय और वैश्विक उद्देश्यों की अनदेखी कर प्रायः पूरी तरह आर्थिक उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहते हैं। अब जबकि एयर इंडिया के टाटा के हाथों में जाने से सर्वत्र राहत का भाव परिलक्षित हो रहा है, क्यों न देश विनिवेश में गैर-हिन्दू उद्यमियों को प्राथमिकता देने का मन बनाये। जिस विनिवेश के जरिये देश का सारा कुछ निजीं क्षेत्र में जाते देख राष्ट्र भीषण रूप से भयाक्रांत है, उस विनिवेश के मामले में 2022- 23 के बजट में एक भारी राहत की खबर आई है। मोदी सरकार ने अगले वित्त वर्ष में विनिवेश के लक्ष्य में भारी कटौती करते हुए, उसे 65,000 करोड़ रखा है, जो कि चालू वित्त वर्ष में विनिवेश के जरिये अनुमानित 78, 000 करोड़ जुटाने की तुलना में काफी कम है। चालू वित्त वर्ष 2021-2022 में भारतीय जीवन बीमा निगम में विनिवेश की प्रक्रिया जारी है जबकि बीपीसीएल, जहाजरानी निगम, कंटेनर कारपोरेशन,आर आई एनएल और पवन हंस में रणनीतिक बिक्री होनी है. क्यों न विपक्ष और देश का बुद्धिजीवी वर्ग प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्ताव रखे कि जो संस्थाएं रणनीतिक बिक्री की कतार में है, उनके विनिवेश में गैर-हिन्दू उद्यमियों को प्राथमिकता देने की शुरुआत हो। भारी संतोष का विषय है कि इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान सरकार ने भारी-भरकम घाटे वाली नीलांचल इस्पात निगम लिमिटेड (एनआईएनएल ) को भी टाटा स्टील लॉन्ग प्रोडक्ट्स को बेचने की मंजूरी दे दी है! क्या इसे सरकार के विनिवेश नीति में आये सुखद बदलाव के संकेतक के रूप में देखा जा सकता है।

दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कैसे हो संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.