जीवन में ईमानदारी और सामाजिक न्याय की पहरेदारी के बेमिसाल नायक कर्पूरी ठाकुर

दीपक शर्मा

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कर्पूरी ठाकुर भारतीय के एक बेमिसाल शख्सियत थे जिनकी राजनीति और सरोकार कभी मद्धिम नहीं पड़े बल्कि उनका महत्व लगातार बढ़ा है। सामाजिक न्याय के लिए किए गए उनके कामों को आज भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मानक का दर्जा प्राप्त है। यहाँ तक कि बाद में लालू प्रसाद की भूमिका को कमतर बताने के लिए सवर्ण बुद्धिजीवी कर्पूरी के काम का ऊंचा मूल्यांकन करते हैं। आज कर्पूरी ठाकुर की अट्ठानबेवीं जयंती है।
वे एक ऐसे शख्स थे जिनके भीतर ईमानदारी, सादगी, करुणा और न्याय के साथ करोड़ों गरीबों, शोषितों, वंचितों और भूखों के प्रति गहन आस्था, लगाव और अनुराग था। वे अपने 26 साल के राजनीतिक करियर में एक बार भी बिहार विधानसभा का चुनाव नहीं हारे। वे सूबे के एक बार उप-मुख्यमंत्री और दो बार मुख्यमंत्री रहे लेकिन उनके ऊपर कभी किसी प्रकार के भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। एक लंबी सियासत के बावजूद वे अपने रहने के लिए शहर या गाँव में एक मकान तो क्या एक इंच जमीन भी नहीं खरीद सके। गरीबी और अभाव की जिंदगी से ऊपर उठकर भी वह महान कर्मयोगी और जननायक बने।

इसी बीच 1942 में महात्मा गांधी द्वारा 'अंग्रेज भारत छोड़ो' का आंदोलन प्रारंभ हो गया। इस आंदोलन में विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से तमाम छात्रों ने हिस्सा लिया। कर्पूरी ठाकुर भी इससे अछूते न रहे। उन्होंने पटना के कृष्णा टॉकीज हॉल में छात्रों के बीच एक जोरदार भाषण देते हुए कहा था कि- 'हमारे देश की आबादी इतनी अधिक है कि केवल थूक देने मात्र से अंग्रेजी राज बह जाएगा।'

 

\कर्पूरी ठाकुर का जन्म 24 जनवरी 1924 को बिहार के समस्तीपुर जिले के पितौझिया (अब कर्पूरीग्राम) नामक गांव में हुआ था। उनके पिता गोकुल नाथ ठाकुर एक निर्धन किसान थे और माता रामदुलारी देवी सामान्य गृहिणी थीं। उनके पिता खेती-बाड़ी के साथ-साथ अपनी जातिगत पेशा नाई का काम करते थे। परिस्थितियां अनुकूल न होने के बावजूद उन्होंने कर्पूरी के भीतर पढ़ने के प्रति रुचि, लगन और लालसा को देखते हुए उनका भरपूर साथ दिया। बचपन से ही कर्पूरी पढ़ने में अत्यंत मेधावी एवं तेजस्वी व्यक्तित्व के बालक थे। प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा आरंभ करते हुए उन्होंने 1940 में मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर लिया। प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उनके पिता उनको गाँव के एक बाबू साहब के घर ले गए उनसे कहा कि ‘यह मेरा बेटा है, पढ़ने में अच्छा है, मैट्रिक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया है।  कोई काम-वाम हो तो दिलवा दीजिए, जिससे परिवार का खर्च चल सके।’

बाबू साहब ने कहा ‘अच्छा फर्स्ट डिवीजन से पास किया है! चलो हमारा पैर दबाओ! अरे तुम छोटी जाति के लोग चाहे जितना भी काबिल हो जाओ लेकिन हमसे ऊपर नहीं उठ सकोगे।’
उसके बाद अपनी जेब से पचास रुपये निकालकर उन्हें देते हुये कहा, “जाइए, उस्तरा आदि ख़रीद लीजिए और अपना पुश्तैनी धंधा आरंभ कीजिए।”गाँव में कर्पूरी ठाकुर और उनके परिवार को इसी तरह से अपमान सहना पड़ता था।
इसके बाद युवा कर्पूरी ने 1942 में चंद्रधारी मिथिला महाविद्यालय दरभंगा से आई ए की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। दरभंगा जाने के लिए वे प्रतिदिन 15 किमी पैदल चलने के बाद ट्रेन से जाते थे और फिर उतनी ही दूरी वापस आते थे। परिस्थितियां अनुकूल न होने के बावजूद उन्होंने बी ए प्रथम वर्ष में प्रवेश ले लिया। इसी बीच 1942 में महात्मा गांधी द्वारा ‘अंग्रेज भारत छोड़ो’ का आंदोलन प्रारंभ हो गया। इस आंदोलन में विभिन्न विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से तमाम छात्रों ने हिस्सा लिया। कर्पूरी ठाकुर भी इससे अछूते न रहे। उन्होंने पटना के कृष्णा टॉकीज हॉल में छात्रों के बीच एक जोरदार भाषण देते हुए कहा था कि- ‘हमारे देश की आबादी इतनी अधिक है कि केवल थूक देने मात्र से अंग्रेजी राज बह जाएगा।’
इस भाषण के कारण अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें पकड़ कर कोर्ट में पेश किया और एक दिन की जेल और 50 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। अब कर्पूरी ठाकुर ने पढ़ाई-लिखाई छोड़ कर देश के आंदोलनों में हिस्सा लेना आरंभ कर दिया। इसी बीच अध्यापक के रूप में उनकी पितोझिया मध्य विद्यालय में  नियुक्ति हो गई। उन्होंने हेड मास्टर के रूप में भी कार्य किया। लेकिन गुलाम भारत को मुक्त कराने की छटपटाहट ने उन्हें अध्यापन कार्य में ज्यादा दिन तक नहीं रहने दिया। वे राष्ट्र सेवा की भावना से कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गए और विभिन्न आंदोलनों का प्रतिनिधित्व करने लगे। अब वे  अंग्रेजों की आंखों की किरकिरी बन चुके थे। इसी बीच जयप्रकाश नारायण, डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, रामअवतार शर्मा, राजेंद्र नारायण शर्मा, शारदा प्रसाद झा, रमाकांत पाठक आदि क्रांतिकारी नेताओं से उनकी संगति हो गयी। अक्तूबर 1942 को रात के दो बजे स्कूल में सोते हुए अंग्रेज पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया । कर्पूरी जी ने कैदियों के लिए उचित सुविधाओं की मांग के लिए जेल में ही आमरण अनशन कर दिया। 28 दिनों की भूख हड़ताल के बाद अंग्रेज सरकार द्वारा उनकी सारी मांगें मान ली गईं।
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अक्टूबर 1942 से लेकर नवंबर 1945 तक 26 महीने जेल में रहने के बाद अंग्रेज सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया। वे 1945 से लेकर 1946 तक दरभंगा जिला कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के मंत्री तथा 1946 में प्रांतीय किसान सभा के प्रधान मंत्री रहे। 1948 में जब आचार्य नरेंद्र देव एवं श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में समाजवादी दल की स्थापना हुई तो उसके प्रादेशिक मंत्री के रूप में 1948 से 1952 तक कार्य किया। इस अवधि में उन्होंने हिंद किसान पंचायत की केंद्रीय समिति के सदस्य एवं मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
1952 ई० में बिहार में प्रथम विधानसभा चुनाव हुआ। जिसमे भाग लेकर कर्पूरी ठाकुर भारी मतों से विजयी हुए। इसके बाद 1988 तक वे लगातार जीतते रहे। उन्होंने अपने जीवनकाल में विधानसभा का चुनाव कभी नहीं हारा। कह सकते हैं कि 1952 से लेकर 1988 तक बिहार की राजनीतिकर्पूरी ठाकुर के ही इर्द-गिर्द घूमती रही। इस बीच वे कई पार्टियों में शामिल होते रहे लेकिन जब पार्टी उनके सामाजिक न्याय के सिद्धांत से अलग कार्य करने लगती तो उन्हें पार्टी से अलग होने में देर नहीं लगती।
जयप्रकाश नारायण एवं डॉ राम मनोहर लोहिया उनके राजनीतिक गुरु थे, जिनके साथ उन्होंने जमीन पर रह कर जेनुइन मुद्दों पर जनता की लड़ाई लड़ी। परिणाम यह हुआ कि आजादी से पहले वे दो बार और आजादी के बाद 18 बार जेल गए। लेकिन जनता ने उन्हें अपने सिर आंखों पर बिठा कर रखा था। जनता ने उन्हें अपने से कभी अलग नहीं होने दिया। कर्पूरी ठाकुर चाहे सत्ता में रहे हों या विपक्ष में,  वे हमेशा गरीबों, शोषितों, वंचितों और पीड़ितों के पक्ष में मुखरता से आवाज उठाते रहे। शोषण, दमन और अन्याय के विरुद्ध विधानसभा में भी मुखर होकर बोलते रहे। वे सामंतशाही के विरुद्ध दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों एवं अल्पसंख्यकों की आजीवन आवाज बने रहे और उनकी लड़ाई लड़ते रहें। वे सत्ता के पक्ष में रहे हों या विपक्ष में कमजोरों को हमेशा न्याय दिलाते रहे। सन 1967 ईस्वी में बिहार विधानसभा चुनाव में कर्पूरी ठाकुर के नेतृत्व में संंसोपा संयुक्त विधायक दल बड़ी ताकत के रूप में उभरते हुए चुनाव जीत गई। फिर भी कर्पूरी ठाकुर ने मुख्यमंत्री के पद पर स्वयं न बैठकर महामाया प्रसाद सिन्हा को बैठाने का निर्णय लिया और स्वयं उप-मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री एवं वित्त मंत्री के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। वे हमेशा अपने से ज्यादा दूसरों को सम्मान देते रहें। इसीलिए लोग उनके विनम्रता व सादगी के कायल थे।
डॉ राम मनोहर लोहिया ने मैट्रिक परीक्षा में जो अंग्रेजी हटाओ का नारा दिया था। कर्पूरी ठाकुर ने उसे एक झटके में लागू कर दिया। इसके बाद लाखों गरीब, वंचित, दलित और पिछड़े बच्चे मैट्रिक पास होकर आगे आने लगे। कुछ लोगों को यह निर्णय नागवार लगा जिसे वे लोग कर्पूरी डिविजन कहने लगे।

1970 में कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने गरीब और पिछड़े तबके की शिक्षा को ध्यान में रखते हुए आठवीं तक की शिक्षा को नि:शुल्क कर दिया और बिहार में उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दे दिया।  निःशुल्क शिक्षा प्रणाली लागू होने के बाद स्कूलों में भीड़ लग गई और गरीब एवं निम्न स्तर के बच्चे अधिक संख्या में शिक्षा में आगे आने लगे। उनके इस निर्णय के बाद आम जनता ने कर्पूरी की जमकर सराहना की।

1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ जिसमें सारे विपक्ष के नेता व पत्रकार भारी संख्या में गिरफ्तार कर लिए गये थे ।जयप्रकाश नारायण ने छात्रों को लेकर सरकार के विरुद्ध आंदोलन छेड़ दिया। उनके प्रतिनिधिमंडल में कर्पूरी ठाकुर भी शामिल थे। सरकार ने जयप्रकाश सहित तमाम विरोधी दल के नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। इस आंदोलन में पुलिस लाखों प्रयास करने के बावजूद भी कर्पुरी ठाकुर को गिरफ्तार नहीं कर पाई। पुलिस की नजरों से बचकर वे आंदोलन में बहुत सक्रिय रहे। आपातकाल खत्म हुई और बिहार में विधानसभा का चुनाव हुआ कर्पूरी ठाकुर दुबारा बिहार के मुख्यमंत्री बने।

कर्पूरी ठाकुर का महत्व सामाजिक न्याय के पुरोधा के रूप में है। उनके राजनीतिक शिष्य लालू प्रसाद ने उन्हें हशिए के समाजों का मसीहा कहा है। एक पत्रकार ने लिखा है -' 1990 की बात है। बिहार में खगड़िया जिले में पड़ने वाले अलौली में लालू प्रसाद यादव का एक कार्यक्रम था। इस दौरान उन्होंने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का जिक्र किया। लालू यादव का कहना था, ‘जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेजरबेसन (रिजर्वेशन) की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है।

 

अपने दूसरे कार्यकाल में कर्पुरी ठाकुर जी ने बिहार के पिछड़ी जाति के लिए एक ऐतिहासिक फैसला लिया जिनमें उन्होंने 20 फ़ीसदी पिछड़ों के लिए 3 फ़ीसदी महिलाओं के लिए और तीन फीसदी गरीब सवर्णों सहित कुल 26 फीसदी आरक्षण लागू कर दिया। उनके इस निर्णय से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की तरह अन्य पिछड़े वर्ग को भी आरक्षण का लाभ मिलने लगा। जिसके कारण उन्हें पिछड़ी जाति का घोर समर्थन और सम्मान मिला। तो वही सामान्य जाति के कुछ लोगों उन्हें जातिगत एवं मां-बहन की गालियां तक दिए। वे उनके विरुद्ध नारे देने लगे- कर कर्पूरी कर पूरा। छोड गद्दी धर उस्तुरा । 
इसके अतिरिक्त उन्होंने सैकड़ों स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान एवं पेशन दिला कर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाई। इसके पहले स्वतंत्रता सेनानियों की कोई सुध नहीं लेता था। उन्होंने अपने इस फेसले से उन्हें काफी राहत देने का कार्य किया। अपने शासनकाल में कर्पूरी ठाकुर ने पुलिस, दरोगा, लेखपाल, डॉक्टरों एवं शिक्षकों की खुली भर्ती किया। जिसका लाभ देश की सामान्य से सामान्य जनता को मिला। इसीलिए लोग आज भी कर्पूरी ठाकुर को अपना मसीहा मानते हैं।
कर्पूरी जी की जीवन शैली बहुत ही सादा, सरल, सहज व सामान्य थी। मुख्यमंत्री रहते हुए भी वे रिक्शा से चलते थे। उन्होंने सरकारी फंड का अपने निजी कार्य के लिए कभी उपयोग या दुरुपयोग नहीं किया। उन्होंने अपने लिए एक कार तक नहीं खरीदी। इसके अलावा अपनी विरासत में एक मकान तो क्या एक इंच भी जमीन नहीं जोड़ी। वो बहुत सामान्य वेशभूषा में बड़ी सादगी से रहते थे। वे मूँज की चारपाई पर सोते थे। उनके घर कोई अतिथि आ जाता था तो अपने बिस्तर पर उन्हें सुला कर स्वयं जमीन पर सो जाते थे। जनता की भीड़ में बात करते हुए वे उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंच जाते थे जिनकी दूर-दूर तक संभावना नहीं होती थी। गरीबी की हालत से निकलने के कारण कर्पूरी जी को गरीबों की सामाजिक, पारिवारिक एवं आर्थिक स्थिति का पूरा ज्ञान था। इसलिए उन्होंने उन्हें हमेशा अपने सीने से लगा कर रखा।
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उनके भाषण देने का अंदाज और उनकी आवाज लोगों को सीधे अपनी ओर खींचती थी। बिहार विधानसभा सभा में जनता के सवालों को वे बड़े बेबाकी से उठाते थे। उनके सवालों से सरकार की भौंहें तन जाती थीं। कर्पूरी ठाकुर विपक्ष में रहे हों या सत्ता में उन्होंने अपने उसूलों से समझौता कभी नहीं किया। सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में वे सच्चे, ईमानदार, और न्यायप्रिय थें। साहित्य एवं संस्कृति के प्रति भी उन्हें गहरा लगा था। वे देश के साहित्यकारों एवं कवियों का बहुत सम्मान करते थे। उनमें आम जनता के प्रति निरादर व अपमान का भाव कभी नहीं दिखा।
इमरजेंसी के समय उन्होंने इंदिरा गांधी के फैसले की घोर निंदा करते हुए उनके करीबी आचार्य विनोबा भावे को पत्र लिखकर पूछा कि – ‘युद्धकाल था, फिर भी वाणी स्वातंत्र्य की उतनी हत्या अंग्रेज सरकार ने नहीं की थी जितनी इंदिरा सरकार आपत्तिस्थिति के नाम पर कर रही हैं। ब्रिटिश शासन की संपूर्ण अवधि में, दोनों विश्वयुद्ध काल में, असहयोग आंदोलन के समय, विभिन्न सत्याग्रह के दरमियान, भारत चीन युद्ध और भारत-पाक युद्ध काल में वाणी-स्वातंत्र्य पर उतना व्यापक कठोर आघात नहीं हुआ था जितना आज इंदिरा राज में हुआ है। ऐसी स्थिति में क्या आपको यह लगता है कि वाणी-स्वातंत्र्य के प्रथम सत्याग्रही की आज की दमघोंट उपस्थिति में सत्याग्रह संग्राम का प्रथम सेनापति बनना चाहिए? ….. देश में जो आपत्तिस्थिति लागू की गई उसके लिए जो करण बतलाए गए और संविधान की संबंधित धाराओं का जो उपयोग किया गया, क्या आप उसे उचित मानते हैं? …… विभिन्न अध्यादेश द्वारा संविधान प्रदत्त सारे  मौलिक अधिकार जो स्थगित कर दिए गए हैं और अखबारी तथा नागरिक आजादी छीन ली गई है, क्या आप उसे सही मानते हैं?
ऐसे ही तीन अन्य पत्रों के माध्यम से आचार्य विनोबा से उनके सैकड़ों सवाल और शिकायतें थीं। वहीं इंदिरा गांधी के निधन पर उन्होंने विधानसभा में जो संवेदना प्रकट की वह बहुत ही मार्मिक है – प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की बर्बर एवं निर्ममतापूर्ण हत्या अत्यंत दर्दनाक और बेहद शर्मनाक घटना है। दर्दनाक इसलिए कि इस देश की ही नहीं बल्कि संसार की वे एक महान महिला थीं। इनके साहसपूर्ण, शौर्यपूर्ण, संघर्षशील एवं ऐतिहासिक जीवन का अंत हो गया। शर्मनाक इसलिए कि प्रधानमंत्री के प्रशासन में अपने ही प्रधानमंत्रित्व में उनके अपने जीवन की रक्षा नहीं हो सकी। प्रशासन अक्षम सिद्ध हुआ, अयोग्य सिद्ध दुआ और निकम्मा सिद्ध हुआ ……. श्रीमती इंदिरा गांधी न केवल आज का बल्कि आगे आने वाला भारत और संसार समाजवादी के रूप में चित्रित करेगा, संसार चित्रित करेगा उन्हें एक गुटनिरपेक्ष का एक सफल संगठन कर्ता के रूप में, गुटनिरपेक्ष को सफल बनाने के रूप में चित्रित करेगा तथा तमाम गुलाम मुल्कों की आजादी के लिए लड़ने वाली महिला के रूप में चित्रित करेगा, विश्वशांति के प्रधान के रूप में। श्रीमती इंदिरा गांधी अत्यंत बहादुर महिला थी. साहस, शौर्य उनके जीवन में कूट-कूट कर भरा हुआ था। वे लापरवाह रहती थीं और किसी की परवाह नहीं करती थीं। औरतों में सचमुच मर्द थीं। संसद में ऐसी महिलाएँ बहुत कम मिलती हैं।  न केवल 50-100 साल के इतिहास में बल्कि सदियों की इतिहास में श्रीमती इंदिरा गांधी खतरों से खेलना और जोखिमों से जूझना जानती थीं।….. इस अवसर पर नहीं, अनेकों अवसरों पर श्रीमती इंदिरा गांधी को हम लोगों ने अपने देश में ही नहीं, दुनिया में देखा और परखा था। ऐसी महान महिला को खोकर हमारा देश दीन बन गया है, देश ही नहीं, संसार दीन बन गया है। उस महान महिला के प्रति, उस देशभक्त महिला के प्रति अपने और अपने देश की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
ऐसे ही कर्पूरी ठाकुर ने विधानसभा में अपने समय की तमाम हस्तियों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी है जिनमें कुछ नाम हैं- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पंडित नेहरू, खान अब्दुल गफ्फार खान, लाल बहादुर शास्त्री, डॉ राम मनोहर लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, वीवी गिरि, चौधरी चरण सिंह, रामानंद तिवारी, महामाया प्रसाद, संजय गांधी, एमजी रामचंद्रन, महादेवी वर्मा, राहुल सांकृत्यायन आदि हैं।
कर्पूरी ठाकुर का महत्व सामाजिक न्याय के पुरोधा के रूप में है। उनके राजनीतिक शिष्य लालू प्रसाद ने उन्हें हशिए के समाजों का मसीहा कहा है। एक पत्रकार ने लिखा है -‘ 1990 की बात है। बिहार में खगड़िया जिले में पड़ने वाले अलौली में लालू प्रसाद यादव का एक कार्यक्रम था। इस दौरान उन्होंने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर का जिक्र किया। लालू यादव का कहना था, ‘जब कर्पूरी जी आरक्षण की बात करते थे, तो लोग उन्हें मां-बहन-बेटी की गाली देते थे। और, जब मैं रेजरबेसन (रिजर्वेशन) की बात करता हूं, तो लोग गाली देने के पहले अगल-बगल देख लेते हैं कि कहीं कोई पिछड़ा-दलित-आदिवासी सुन तो नहीं रहा है।’ लालू प्रसाद यादव ने आगे इसका श्रेय उस ताकत को दिया जो कर्पूरी ठाकुर ने हाशिये पर रह रहे समुदायों को दी थी। 
 देश की सेवा करते हुए कर्पूरी ठाकुर 17 फरवरी 1988 को देश को अलविदा कह गए। उनके मरने के बाद उनके घर हेमलती नंदन बहुगुणा आए हुए थे। उनकी पुरानी झोपड़ी देखकर वे रो पड़े थे। कर्पूरी ठाकुर थे ही ऐसे व्यक्तित्व। वे आने वाले तमाम राजनीतिज्ञों के लिए प्रेरणादायक पदचिन्ह छोड़ गए। आज भी बिहार में कर्पूरी ठाकुर का नाम लिए बिना राजनीति संभव नहीं हो पाती है। वहां की सभी राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियां उनकी हिमायती बन कर जनता के बीच में वोट मांगने जाती हैं, लेकिन सत्ता की कुर्सी पर बैठते ही सब भूल जाती हैं। सच में कर्पूरी ठाकुर हमारे लिए जो रास्ता बनाकर कर गए हैंं उस पर चलना बहुत कठिन है। यदि आज के राजनीतिज्ञ उस रास्ते पर सच में चलने लगे तो राष्ट्र को बेहतरीन दिशा की ओर ले जा सकते हैं और भारत को विकसित राष्ट्र बना सकते हैं। आज करोड़ों लोगों की मांग है कि जननायक कर्पूरी ठाकुर जी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाए लेकिन केंद्रीय सत्ता के कान में जूं नहीं रेंग रही है। कर्पूरी ठाकुर जनता के महान नेता थे।
दीपक शर्मा युवा कहानीकार और अध्यापक हैं। वाराणसी में रहते हैं। 
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