Tuesday, April 16, 2024
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एक हथियार के रूप में भाषा : डायरी (12 फरवरी, 2022) : 

भाषा बड़ी कमाल की चीज है। इसका आविष्कार इसीलिए ही किया गया होगा ताकि इंसान अपनी बात कह सके और दुनिया भर की तमाम चीजों को संबोधित कर सके। मुमकिन है कि ऐसी ही भाषा अन्य प्राणियों ने भी समय के साथ जरूर विकसित की होगी। यह बात मैं दावे के साथ इसलिए भी कह […]

भाषा बड़ी कमाल की चीज है। इसका आविष्कार इसीलिए ही किया गया होगा ताकि इंसान अपनी बात कह सके और दुनिया भर की तमाम चीजों को संबोधित कर सके। मुमकिन है कि ऐसी ही भाषा अन्य प्राणियों ने भी समय के साथ जरूर विकसित की होगी। यह बात मैं दावे के साथ इसलिए भी कह सकता हूं कि प्राणी चाहे जो कोई भी हो, वस्तुओं की पहचान वह करता जरूर है। मसलन, चींटियां और मधुमक्खियां, जो मनुष्यों के जैसे समूह में ही रहती हैं, उनकी अपनी भाषा जरूर होगी। वैसे शेर और बाघ जैसे जानवरों के पास भी अपनी ही भाषा होगी। यह भी मुमकिन है कि दुनिया में कहीं ना कहीं कोई और जरूर होगा जिसने जानवरों की भाषाओं पर वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया होगा।
फिलहाल जिस भाषा का इस्तेमाल मैं कर रहा हूं, वह दरअसल भाषा नहीं होकर भी भाषा ही है। हम पत्रकार इस भाषा का इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से करते रहे हैं। आप चाहें तो इसे शैली की संज्ञा भी दे सकते हैं या फिर शब्दों के चयन और संयोजन की कला भी। भाषा इसका भी निरूपण करती है। वैसे हम कैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, इसका निर्धारण भी काल और परिवेश के आधार पर करते हैं। रही बात यह कि हम भाषा कौन सी इस्तेमाल करते हैं तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस भाषा में अपने आपको अधिक सक्षम महसूस करते हैं। बाजदफा हम भाषा के चयन में अभिनय भी खूब करते हैं। मतलब यह कि भले ही हमें अंग्रेजी ना आती हो, लेकिन हम कोशिश करते हैं कि उसका उपयोग करें। तब मकसद यह होता है कि हम अपनी बात को दूसरे भाषा-भाषियों के बीच ले जाएं।
खैर, हमारी भाषा कैसी होगी, हम पत्रकारों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इससे भी महत्वपूर्ण कि हम लिखने क्या जा रहे हैं। इसके पहले हम यह भी सोचते हैं कि जो लिखने जा रहे हैं, उसका मकसद क्या है?

[bs-quote quote=”हम पत्रकार इस भाषा का इस्तेमाल अलग-अलग तरीके से करते रहे हैं। आप चाहें तो इसे शैली की संज्ञा भी दे सकते हैं या फिर शब्दों के चयन और संयोजन की कला भी। भाषा इसका भी निरूपण करती है। वैसे हम कैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, इसका निर्धारण भी काल और परिवेश के आधार पर करते हैं। रही बात यह कि हम भाषा कौन सी इस्तेमाल करते हैं तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस भाषा में अपने आपको अधिक सक्षम महसूस करते हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

तो यही मकसद वह कारक, जिसके आधार पर हम अपनी भाषा का चुनाव करते हैं और शैली का भी। एक उदाहरण देखिए जो कि दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता के पृष्ठ संख्या 23 पर प्रकाशित एक खबर है। इसका शीर्षक है–पाकिस्तान के इतिहासकार फकीर सैयद एजाजुद्दीन ने कहा : लता मंगेशकर की आवाज में दिव्यता थी।
यह खबर वाकई एक उदाहरण है कि हम पत्रकार किस तरीके से भाषा के नाम पर अत्याचार करते हैं। जनसत्ता ने इस खबर को न्यूज एजेंसी भाषा से लिया है। लिहाजा इसकी भाषा व शैली का श्रेय भाषा को जाता है। हालांकि जनसत्ता को श्रेय इस बात को जाता है कि उसने भाषा की इस खबर और इस खबर में उपयोग किए गए शब्दों को सहमति प्रदान किया है। मसलन, खबर के शीर्षक में दिव्यता शब्द का इस्तेमाल किया गया है। अब फकीर सैयद एजाजुद्दीन ने हिंदी के इस तत्सम शब्द का इस्तेमाल किया होगा, ऐसा मुझे नहीं लगता है। मुमकिन है कि उन्होंने कहा हो कि लता मंगेशकर की आवाज रूहानी थी। अब रूहानी को दिव्यता में किसने बदला होगा और क्यों बदला होगा?
खबर में फकीर साहब 1983 में अबु धाबी में हुए एक संगीत कार्यक्रम का उल्लेख किया है।  वह यह कहते हैं कि हर किसी को लगता है कि वह अपने गले को लेकर सतर्क रहती होंगी। ऐसा नहीं है, दोपहर के भोजन के दौरान, उन्होंने अचार और मसालेदार करी का आनंद लिया था।

[bs-quote quote=”पाकिस्तानी फकीर सैयद एजाजुद्दीन के साक्षात्कार के आधार पर खबर का जनसत्ता में प्रकाशन का मकसद यह है लता मंगेशकर की महानता को और अलंकृत किया जाय और इसके साथ ही हिंदी के विस्तार को बाधित किया जाय। इसका एक मकसद यह भी कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के अंतर को और बढ़ाया जाय, जो कि मौजूदा केंद्रीय हुकूमत का नापाक मंसूबा भी है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

सनद रहे कि मैं केवल उन शब्दों काे उद्धृत कर रहा हूं जो भाषा के पत्रकार ने लिखी और जनसत्ता ने जिसे अपनी सहमति दी। मैं नहीं जानता कि फकीर साहब ने किन शब्दों का उपयोग किया होगा।  खबर में ही चार-पांच और शब्द हैं। एक वाक्य में वह कहते हैं– मंगेशकर की आवाज ईश्वर की एक भेंट थी, क्योंकि इसमें दिव्यता की अनुभूति थी। 
अब कोई भी यह आसानी से समझ सकता है कि जनसत्ता और भाषा ने किस तरह का भाषिक खेल किया है। दोनों संस्थानों के लोग यह जानते हैं कि यह खबर हिंदी के पाठकों के लिए है और हिंदी के पाठक बड़ी आसानी से उर्दू शब्दों को समझते हैं। लिहाजा वह चाहते तो फकीर साहब के मुंह से निकले शब्दों का उपयोग हू-ब-हू कर सकते थे। मतलब यह कि भगवान की जगह अल्लाह, अनुपम की जगह खूबसूरत अथवा नायाब व भेंट की जगह तोहफा जैसे अल्फाज उपयोग में लाए जा सकते थे। लेकिन दोनों ने भाषिक बेईमानी की। अब यह बेईमानी उन्होंने क्यों की? इस सवाल पर विचार करते हैं।
सबसे पहले तो यह कि इस खबर को प्रकाशित करने का मकसद क्या है? लता मंगेशकर की आवाज वास्तव में रूहानी थी। उनके द्वारा गाए नज्मों को पसंद करनेवाले सरहदों तक सीमित नहीं हैं। पाकिस्तान में भी लता मंगेशकर की रूहानी आवाज को लोग खूब पसंद करते हैं। ठीक उसी तरह जैसे मुझे इकबाल बानो और नूरजहां से लेकर नुसरत फतेह अली खान की आवाज पसंद है। यहां तक कि अमेरिका के न्यूयार्क में रहने वाली मेरी महिला मित्र श्वेता के मुताबिक परसों वहां एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित की गई, जिसमें अनेक अमरीकी महिलाओं ने लता मंगेशकर द्वारा गाए गीतों को गाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
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लेकिन पाकिस्तानी फकीर सैयद एजाजुद्दीन के साक्षात्कार के आधार पर खबर का जनसत्ता में प्रकाशन का मकसद यह है लता मंगेशकर की महानता को और अलंकृत किया जाय और इसके साथ ही हिंदी के विस्तार को बाधित किया जाय। इसका एक मकसद यह भी कि हिंदू और मुसलमानों के बीच के अंतर को और बढ़ाया जाय, जो कि मौजूदा केंद्रीय हुकूमत का नापाक मंसूबा भी है।
याद रखिए कि भाषा सबसे घातक हथियार है। इसके हथियार से सभ्यताओं का खात्मा किया जाता है। हमारे हुक्मरान हमारी गंगा-जमुनी सभ्यता को खत्म कर देना चाहते हैं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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