जुमलों के दौर में सपा का निराशाजनक घोषणापत्र, सामाजिक न्याय और डायवर्सिटी

एच एल दुसाध

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मैंने 6 फ़रवरी को  समानुपातिक भागीदारी पर केन्द्रित हो सपा घोषणापत्र शीर्षक से एक लेख लिखकर बताया था कि आगामी एक- दो दिन में सत्ता की प्रमुख दावेदार दो पार्टियों : सपा और भाजपा का घोषणापत्र जारी हो सकता है। इनमें भाजपा के घोषणापत्र के प्रति लोगों में कोई दिलचस्पी नहीं, क्योंकि लोगों को पता है उसके घोषणापत्र में कुछ भी आये, वह ध्रुवीकरण के जरिये ही चुनाव जीतने की कोशिश करेगी। भाजपा के विषय में अगर यह बात सही है तो वह यूपी विधानसभा चुनाव – 2022 में उस ध्रुवीकरण की राजनीति को अभूतपूर्व ऊंचाई दे चुकी है, जिसके जरिये वह चुनावी सफलता के नए-नए अध्याय रचती रही है। ऐसे में भाजपा के घोषणापत्र को लेकर शायद ही किसी में रुचि हो। आमजन से लेकर राजनीति के पंडितों तक को किसी के घोषणापत्र में रुचि है तो वह सपा है, जिसका घोषणापत्र कुछेक दिनों के मध्य ही जारी हो सकता है।

बहरहाल 6 फ़रवरी वाले लेख में जिस सपा के घोषणापत्र में लोगों की रुचि होने की बात लिखा था, वह दो दिन बाद 8 जनवरी को सामने आ गया। यही नहीं, उसी दिन भाजपा का भी घोषणापत्र जारी हो गया और इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान कांग्रेस की ओर से उसका तीसरा घोषणा पत्र : उन्नति विधान जन घोषणापत्र – 2022 भी जारी  हो चुका है, जो सामान्य स्थिति में भाजपा और सपा से बहुत ज्यादा बेहतर कहा जा सकता है। किन्तु यूपी विधानसभा चुनाव- 2022 कोई सामान्य चुनाव नहीं, एक अति असामान्य चुनाव है, जिसमें भाजपा को शिकस्त देने से बड़ा कोई मुद्दा ही नहीं हो सकता।

इतिहास गवाह है मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी समुदाय के लिए शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियाँ धर्मादेशों द्वारा कहीं निषिद्ध नहीं की गईं जैसा हिन्दू धर्म शास्त्रों द्वारा बहुजनों को किया गया। यही नहीं हिन्दू धर्म में उन्हें अच्छा नाम तक रखने की आज़ादी नहीं रही। इनमें सबसे बदतर स्थिति दलितों की रही : वे गुलामों के गुलाम रहे। इन्हीं गुलामों के गुलामों को गुलामी से निजात दिलाने की जिम्मेवारी इतिहास ने डॉ. आंबेडकर के कन्धों पर सौंपी ,जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज़ में निर्वहन किया।

और भाजपा को शिकस्त देना इस चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा इसलिए है क्योंकि अप्रतिरोध्य बन चुकी इस पार्टी ने जिस तरह अपने पितृ संगठन के मिशन को पूरा करने के लिए अब तक देश बेचा है; जिस तरह उसने आधुनिक भारत को प्राचीन युग में ले जाने की परिकल्पना को आगे बढाया है; जिस तरह नयी सदी में 16 साल सत्ता में रहकर इसने मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या आर्थिक और सामाजिक विषमता को एवरेस्ट सरीखी उंचाई दी है ; जिस तरह इसने आर्थिक ही नहीं लैंगिक असमानता के मोर्चे पर बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार और श्रीलंका जैसे पिछड़े प्रतिवेशी मुल्कों से भी अभागे भारत को पीछे धकेला है और सबसे बढ़कर जिस तरह इसने यूपी में राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के सहारे सत्ता को दखल कर दलित, आदिवासी, पिछड़ों और धार्मिक अल्पसंख्यकों को गुलामों की स्थिति में पहुँचाया है, वैसी स्थिति में इस चुनाव में गैर-भाजपा दलों के सामने सबसे बड़ा मुद्दा था भाजपा को हर हाल में शिकस्त देना! और शिकस्त देने के लिए जरूरी था घोषणापत्रों को ऐसे सपनों से लैस करना, जिसके जोर से भाजपा के हेट पॉलिटिक्स से पार पाया जा सके। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि जो पार्टियाँ घोषणापत्रों को जारी करने में विश्वास करती हैं, उनमें एकाधिक कारणों से सिर्फ सपा से ही एक ड्रीम मैनिफेस्टो की उम्मीद थी। जो भाजपा को मात दे सके ऐसे सपनों के घोषणापत्र की कांग्रेस से उम्मीद नहीं थी, क्योंकि इसका वर्गीय चरित्र भाजपा से बहुत भिन्न नहीं है। विपरीत इसके, सपा इस बार यूपी के उन दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित तबकों की आशा और आकांक्षा का प्रतीक बनकर उभरी थी, जिनका इस बार यूपी में भाजपा के जीतने पर सामाजिक अन्याय की अतल गहराइयों में पंहुच जाना तय सा दिख रहा है। इसलिए सपा के घोषणापत्र में सामाजिक अन्यायमुक्त भारत निर्माण का एक सपना उभरना जरूरी था, जो नहीं हुआ। उसका घोषणापत्र सामाजिक अन्यायमुक्त भारत निर्माण के लिहाज से बहुसंख्य मतदाताओं के लिए एक दु:स्वप्न बनकर सामने आया है। इसे समझने के लिए सामाजिक अन्याय की परिभाषा, उत्पति और प्रतिकार के उपायों को जान लेना होगा।

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वैसे तो सामाजिक अन्याय की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभिन्न समाज-विज्ञानियों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति, नस्ल, लिंग, धर्म, भाषा, क्षेत्रादि के आधार पर विभाजित विभिन्न समाजों में से कुछेक का शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनैतिक-शैक्षिक- धार्मिक) से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय का कहलाता है। इस लिहाज से सारी दुनिया में नारी के रूप में विद्यमान आधी आबादी सर्वत्र ही सामाजिक अन्याय का शिकार रही। सर्वाधिक अन्याय के शिकार लोगों में आमतौर पर लोग अमेरिका के दास-प्रथा के शिकार नीग्रो लोगों को चिन्हित करते हैं, किन्तु यदि दिमाग को खुला रखकर देखा जाय तो दुनिया में सामाजिक अन्याय के सर्वाधिक शिकार शुद्रातिशूद्र अर्थात भारत के बहुजन ही नजर आयेंगे। दलित, आदिवासी, पिछड़ों से युक्त भारत का बहुजन उन गिने-चुने समाजों में से एक है, जिसे जन्मगत कारणों से कई हजार सालों तक शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत रखा गया। और ऐसा उन्हें सुपरिकल्पित रूप से उस हिन्दू धर्म के प्राणाधार वर्ण-व्यवस्था के प्रावधानों के तहत किया गया, जो विशुद्ध रूप से शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही। जिस हिन्दू धर्म के लिए भाजपा-संघ जान देने-लेने पर आमादा रहते हैं, उसके प्राणाधार वर्ण- व्यवस्था में अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य, भूस्वामित्व, राज्य- संचालन , सैन्य-वृत्ति, व्यापार-वाणिज्यादि सहित गगनचुम्बी  मानवीय मर्यादा सिर्फ ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्यों के मध्य वितरित की गयी।

स्व-धर्म पालन के नाम पर कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता के फलस्वरूप वर्ण-व्यवस्था ने एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया जिसे हिन्दू आरक्षण कहते हैं। इस हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सिर्फ और सिर्फ विशेषाधिकारयक्त सवर्णों के लिए आरक्षित रहे। इस कारण जहां विदेशीमूल के सवर्ण चिरकाल के लिए सशक्त तो मूलनिवासी दलित, आदिवासी और पिछड़े हमेशा के लिए अशक्त व गुलाम बनने के लिए अभिशप्त हुए। लेकिन दुनिया के दूसरे गुलामों की तुलना में भारत के बहुजनों की स्थिति इसलिए सबसे बदतर हुई क्योंकि उन्हें हिन्दू धर्म के प्रावधानों के तहत आर्थिक, राजनीतिक के साथ शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों तक से बहिष्कृत रहना पड़ा। इतिहास गवाह है मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी समुदाय के लिए शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियाँ धर्मादेशों द्वारा कहीं निषिद्ध नहीं की गईं जैसा हिन्दू धर्म शास्त्रों द्वारा बहुजनों को किया गया। यही नहीं हिन्दू धर्म में उन्हें अच्छा नाम तक रखने की आज़ादी नहीं रही। इनमें सबसे बदतर स्थिति दलितों की रही : वे गुलामों के गुलाम रहे। इन्हीं गुलामों के गुलामों को गुलामी से निजात दिलाने की जिम्मेवारी इतिहास ने डॉ. आंबेडकर के कन्धों पर सौंपी ,जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज़ में निर्वहन किया।

अगर ज़हर की काट ज़हर हो सकती है तो हिन्दू धर्म-संस्कृति के जठर से निकली हिन्दू आरक्षण की काट आंबेडकरी आरक्षण से हो सकती थी, जो हुई भी।  इसी आरक्षण से सही मायने में सामाजिक अन्याय के खात्मे और सामाजिक न्याय के  धारा के प्रवाहमान होने की प्रक्रिया शुरू हुई। आंबेडकरी आरक्षण के सहारे जब गुलामों के गुलाम दलित और आदिवासी सांसद- विधायक, डॉक्टर-इंजीनियर-प्रोफ़ेसर इत्यादि बनकर दुनिया को विस्मित करने लगे, तब इसी आंबेडकरी आरक्षण की आइडिया को उधार लेकर पूरी दुनिया में महिलाओं और नीग्रो लोगों को सामाजिक अन्याय की खाई से निकालने का काम अंजाम दिया गया। संविधान में डॉ. आंबेडकर ने दलित-आदिवासियों के लिए आरक्षण सुलभ कराने के साथ धारा 340 का जो प्रावधान रचा, उसी के सहारे बिलम्ब से ही सही 7 अगस्त, 1990 को मंडलवादी आरक्षण का प्रावधान सामने आया, जिससे पिछड़ी जातियों को सामाजिक अन्याय की गुफा से निकलने का मार्ग प्रशस्त हुआ। स्वाधीनोत्तर भारत में सामाजिक अन्याय के दूरीकरण के लिहाज से मंडल रिपोर्ट एक ऐतिहासिक घटना साबित हुई और यही बहुजनों के लिए काल बन गया। मंडलवादी आरक्षण की घोषणा होते ही हिन्दू आरक्षण का सुविधाभोगी तबका एक बार फिर शत्रुतापूर्ण मनोभाव लिए बहुजनों के खिलाफ मुस्तैद हो गय।  इससे परोक्ष रूप में वर्ग संघर्ष की शुरुआत हुई और भारत समाज दो वर्गों में बंट गया : सामाजिक अन्यायवादी सवर्ण बनाम सामाजिक न्यायवादी बहुजन! भाजपा सामाजिक अन्यायवादी वर्ग का ही प्रतिनिधित्व करती है, जो मंडल विरोध में उठे मंदिर आन्दोलन के सहारे एकाधिक बार सत्ता में आई और आज अप्रतिरोध्य बन चुकी है।

हिंदुत्व अर्थात सामाजिक अन्याय का समर्थक भाजपा का पितृ संगठन हमेशा से ही इसे व्यर्थ करने में जुटा रहा। और जब मंदिर आन्दोलन के जरिये इसके हाथ में सत्ता की बागडोर आई स्वयंसेवी अटल बिहारी वाजपेयी और खासकर नरेंद्र मोदी ने उसका अधिकतम इस्तेमाल संविधान को व्यर्थ करने और इसके द्वारा स्थापित सामाजिक न्याय के खात्मे में किया। और आज संघ अपने मकसद में उम्मीद से कहीं अधिक सफल हो चुका है। उसे अपने मकसद को शत प्रतिशत सफल बनाने के लिए सिर्फ यूपी विजय की जरूरत है।

चूँकि भाजपा का हिन्दू धर्म-संस्कृति में अन्यों के मुकाबले ज्यादा गहरी आस्था है इसलिए इसकी नज़रों में दलित- आदिवासी-पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित लोगों का संविधान के जरिये शक्ति के स्रोतों में में हिस्सेदारी पाना महा-अधर्म है! क्योंकि हिन्दुओं के तमाम भगवानों और धर्मशास्त्रों  द्वारा सिर्फ सवर्णों को शक्ति के स्रोतों के भोग का अधिकारी बताया गया है। इसलिए इसने राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन के ज़माने से जो धर्माधारित आन्दोलन छेड़ा है, उसका लक्ष्य सामाजिक अन्याय को पुनर्स्थापित करना रहा है। चूँकि आंबेडकर प्रवर्तित भारतीय संविधान देश के सभी सामाजिक समूहों को शक्ति के स्रोतों में समान रूप से अवसर प्रदान करता है, इसलिए हिंदुत्व अर्थात सामाजिक अन्याय का समर्थक भाजपा का पितृ संगठन हमेशा से ही इसे व्यर्थ करने में जुटा रहा। और जब मंदिर आन्दोलन के जरिये इसके हाथ में सत्ता की बागडोर आई स्वयंसेवी अटल बिहारी वाजपेयी और खासकर नरेंद्र मोदी ने उसका अधिकतम इस्तेमाल संविधान को व्यर्थ करने और इसके द्वारा स्थापित सामाजिक न्याय के खात्मे में किया। और आज संघ अपने मकसद में उम्मीद से कहीं अधिक सफल हो चुका है। उसे अपने मकसद को शत प्रतिशत सफल बनाने के लिए सिर्फ यूपी विजय की जरूरत है।  2022 का यूपी चुनाव जीतने के बाद संघ 2025 में अपने स्थापना के सौवें वर्षगांठ पर हिन्दू राष्ट्र की घोषणा कर फिर भारत को उस युग में पहुंचा देगा, जिस युग में हिन्दू धर्माधारित कानूनों के जरिये वर्ण-व्यवस्था के जन्मजात वंचित सामाजिक अन्याय के दलदल में फंसने के लिए विवश हुए।  ऐसे में 2025 में बहुजनों को चिरस्थायी तौर पर सामाजिक अन्याय की खाई में डूबने की सम्भावना को देखते हुए अखिलेश यादव के लिए अपने घोषणापत्र में सामाजिक अन्यायमुक्त भारत निर्माण का सपना दिखाना जरूरी था।

अखिलेश यादव और केशव प्रसाद मौर्य

और इसका सपना उन्होंने दिखाया भी था! जब जनवरी के दूसरे सप्ताह में स्वामी प्रसाद मौर्या के 85 बनाम 15 के बयान का समर्थन करते हुए अखिलेश यादव ने घोषणा किया था की सपा सत्ता में आने के तीन महीने बाद जातीय जनगणना कराकर सभी सामाजिक समूहों के संख्यानुपात भागीदारी सुलभ कराएगी। तब हिन्दू राष्ट्र के खतरे से भयाक्रांत बहुजन समाज के जागरूक लोगों ने उनके बयान को आधार बनाकर यह कयास लगाया था कि अखिलेश यादव भाजपा के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए अपने जातीय जनगणना कराकर मिलिट्री-पुलिस-न्यायिक सेवा सहित सभी प्रकार की सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरयों तथा सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, पार्किंग-परिवहन, यूपी के मीडिया संस्थानों तथा प्रदेश में विकसित होने जा रहे फिल्मोद्योग सहित ए टू जेड  सभी क्षेत्रों में अवसरों का बंटवारा सवर्ण, ओबीसी, एससी-एसटी और धार्मिक अल्प संख्यकों के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात कराने की बात अपने घोषणापत्र में डालेंगे। ऐसा होने पर भाजपा शर्तिया तौर पर हारती और सामाजिक अन्यायमुक्त भारत का मार्ग प्रशस्त होता। किन्तु उन्होंने एक ऐसा घोषणापत्र जारी किया है, जिसे देखकर लगता है मानो उन्होंने भाजपा को जिताने की सुपारी ले रखी है!

दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कैसे हो संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक हैं।

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