चौरी चौरा के शहीदों की दया याचिकाएं

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

2 221

दया याचिकाओं पर न्याय -1

राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली में रखे तत्कालीन गृह विभाग की फाइल संख्या 362-23/1923 जुडीशियल सेक्शन, के अनुसार फाँसी की सजा पाए 19 शहीदों की दया याचिकाएं सुरक्षित हैं।19 शहीदों में से ज्यादातर अनपढ़ थे। जाहिर है उनकी दया याचिकाएं, वकीलों द्वारा लिखी गयीं होंगी। ज्यादातर अभियुक्तों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी जो अपने व्यय पर कोई वकील रख सकें। जो वकील पहले से इस मामले को देख रहे थे, उन्होंने ही पहल की थी और उनके द्वारा लिखी गयी दया अपीलों के आधार पर सुनवाई की औपचारिकताएं पूरी की गयीं। उपरोक्त पत्रावली में सम्पूर्ण दया याचिकाओं की न्यायिक प्रक्रिया का, निम्नलिखित प्रकार से दस्तावेजीकरण किया गया है-

उच्च न्यायालय का फैसला 30 अप्रैल, 1923 को आया। फैसले के विरुद्ध गवर्नर, संयुक्त प्रांत के पास दया याचिका प्रस्तुत की गयी जो अस्वीकार कर दी गयी थी। ‘द पायनियर मेल’ ने इसके बारे में 11 मई, 1923 को निम्नलिखित शीर्षक से एक समाचार छापा-
चौरी चौरा का मुकदमा
गवर्नर द्वारा क्षमादान
उच्च न्यायालय की सिफारिशें स्वीकृत
नैनीताल, 4 मई
संयुक्त प्रांत के गवर्नर इन काउंसिल ने चौरी चौरा मुकदमे में हुए, उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध क्षमादान संबंधी सिफारिशों पर विचार किया है।
उच्च न्यायालय ने 170 व्यक्तियों को दिए गए मृत्युदंड पर विचार किया। 19 लोगों के सिलसिले में मृत्युदंड की पुष्टि की गई है और 110 के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया है। 38 व्यक्ति रिहा किए गए और 3 पर सिर्फ फसाद का मुकदमा चला।
जिन 110 लोगों के मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया गया, उनके लिए उच्च न्यायालय ने सिफारिश की थी कि गवर्नर इन काउंसिल 19 मुआमलों में दंड घटाकर 8 साल, 57 मुआमलों में 5 साल, और 20 मुआमलों में 3 साल करें। 14 मुआमलों में कोई सिफारिश नहीं की गई है।
उच्च न्यायालय की सिफारिशों को पूरी तरह स्वीकार किया गया और उसी के अनुसार सजाएँ घटाने के आदेश जारी कर दिए गए।

इन प्रार्थियों को मृत्युदंड चौरी चौरा कांड में उनकी भागीदारी का कारण दिया गया है जिसमें एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर और अनेक पुलिस कांस्टेबलों और चौकीदारों की हत्या की गई थी तथा पुलिस थाना जला दिया गया था। प्रार्थियों पर गोरखपुर के सत्र न्यायाधीश ने मुकदमा चलाया और उनको दोषी पाया। तदनुसार धारा 302, भारतीय दंड संहिता के तहत उनको सजा हुई और मृत्युदंड सुनाया गया। अपील के बाद उच्च न्यायालय ने इस दोष और दंड की पुष्टि की।

 

इस प्रकार उच्च न्यायालय की सिफारिशों के अनुसार, गवर्नर इन कौंसिल द्वारा फैसले को स्वीकार कर लिया गया और 19 लोगों को फाँसी की सजा, 14 को आजीवन कारावास, 19 को आठ साल, 57 को पांच साल, और 20 को तीन साल की सजा स्वीकृत हो गयी।
अब फाँसी की सजा पाये 19 सजायाफ्ता कैदियों के सामने गर्वनर जनरल, भारत सरकार के पास दया याचिका प्रस्तुत करने का अंतिम विकल्प था। 19 संबंधित लोगों की दया याचिकाओं के संबंध में गवर्नर जनरल कार्यालय द्वारा निम्नलिखित कार्यवाहियां हुईं-
प्रथम प्राप्त दो दया याचिकाएं
उपसचिव, संयुक्त प्रांत सरकार, न्यायिक (आपराधिक) विभाग के निम्नलिखित पत्र से प्रथम दो दया याचिकाओं के बारे में जानकारी मिलती है।
संख्या 673-जे, नैनीताल, 23 मई 1923
प्रेषक-
एल. एस. व्हाइट, उपसचिव, संयुक्त प्रांत सरकार
सेवा में,
सचिव, भारत सरकार, गृह विभाग (न्यायिक), शिमला
भारत सरकार, गृह विभाग के पत्र संख्या 1126-1137, दिनांक 10 सितंबर 1915, द्वारा जारी आदेश के अनुसार मुझे वाइसरॉय और गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के आदेश पर दो दया याचिकाएँ भेजने का निर्देश दिया गया है। ये याचिकाएं, (1) श्यामसुंदर वल्द रामनारायन मिसिर और (2) रुदली वल्द रामदयाल केवट, जो क्रमशः इटावा और प्रतापगढ़ की जिला जेलों में मौत की सजा के तहत बंद हैं, से प्राप्त हुई हैं। इन याचिकाओं पर महामहिम के आदेश प्राप्त होने तक उनकी फाँसी के लिए निर्धारित तिथि को टाल दिया गया है।
मुआमले के रिकार्डों पर आधारित मुद्रित पुस्तिका तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले की प्रतियाँ एक अलग पैकेट में भेजी जा रही हैं (के. डब्ल्यू)।
– इन प्रार्थियों को मृत्युदंड चौरी चौरा कांड में उनकी भागीदारी का कारण दिया गया है जिसमें एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर और अनेक पुलिस कांस्टेबलों और चौकीदारों की हत्या की गई थी तथा पुलिस थाना जला दिया गया था।
-प्रार्थियों पर गोरखपुर के सत्र न्यायाधीश ने मुकद्दमा चलाया और उनको दोषी पाया। तदनुसार धारा 302, भारतीय दंड संहिता के तहत उनको सजा हुई और मृत्युदंड सुनाया गया। अपील के बाद उच्च न्यायालय ने इस दोष और दंड की पुष्टि की।
-गवर्नर-इन-काउंसिल ने प्रार्थियों से प्राप्त दया याचिकाओं पर विचार करके उनको रद्द कर दिया है, और उन्होंने कोई भी सिफारिश नहीं की है।

1-इटावा जिला जेल में बंद, दंड प्राप्त कैदी श्यामसुंदर (पुुत्र रामनारायण, मिसिर) से 19 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल, भारत को संबोधित दया याचिका का अनुवाद-
‘मैं जब जेल में दाखिल हुआ तो आठ गवाहों से मेरी पहचान कराई गई पर उनमें से कोई भी मेरा नाम नहीं बतला सका। जब सब मेरी पहचान कर चुके तो बोले कि यह श्यामसुंदर नाम का आदमी है। क्या मैं किसी अपराध का दोषी था, इस बारे में वे कुछ नहीं बोले। बाद में इन्ही गवाहों ने अदालत में मेरी पहचान की और झूठे बयान दिए, जो उनसे देने को कहा गया था। भवानी दत्त तिवारी ने भी मेरी पहचान की और कहा कि शयामसुंदर ने कुछ आदेश दिए थे, पर वह उन आदेशों की प्रकृति नहीं बतला सका। बाद में उसने कहा कि श्यामसुंदर ने फलाँ-फलाँ आदेश दिए थे यानी वे जो, सत्र न्यायालय में डिप्टी मजिस्ट्रेट ने बतलाए थे। सरकारी गवाह मेरा नाम नहीं बतला सका। आरंभ में किसी ने मेरा नाम नहीं लिया। ब्रह्मपुर के दूबे इसके लिए अपराधी हैं। इस मुआमले में मुझे बेगुनाह फाँसी दी जा रही है। मेरी प्रार्थना है कि मुझ पर दया की जाए और मेरी जिंदगी बख्श दी जाए।’
2-प्रतापगढ़ जिला जेल में बंद दंड प्राप्त कैदी रुदली (पुत्र रामदीहल, केवट) से 19 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-इन-काउंसिल, संयुक्त प्रांत, को संबोधित दया याचिका का अनुवाद-
‘लाला जगन्नाथ, बिंदेसरी और हरिहर को मुझसे दुश्मनी थी। मैं उनकी नौकरी में था, उनका 3 रुपये का देनदार था और उनके पास मेरी एक कमीज और धोती पड़ी हुई थीं। उन्होंने मुझे एक गमछा दे रखा था। एक दिन लाला जगन्नाथ और हरिहर के कहने पर बिंदेसरी ने वह मुझसे छीन ली। इस कारण से मेरा उनसे झगड़ा हुआ। रामकुमार पांडे को मुझसे दुश्मनी थी। हम तीनों भाई (चार में से तीन) बसरा गए हुए थे (प्रथम विश्व युद्ध में)। वापसी पर रामकुमार पांडे ने कहा कि मेरे साथ रहो, जमींदार के साथ मत जाओ। मैंने कहा कि आप झगड़ालू व्यक्ति हो इसलिए हम आपका साथ नहीं देंगे। तब रामकुमार ने मुझे धमकी दी कि वह किसी मुआमले में मुझे जरूर फँसायेगा। इसलिए मैंने उसके खिलाफ जिला मजिस्ट्रेट से शिकायत की। बाद में उसने हम चारों भाइयों के खिलाफ अपने खेत में मवेशी चराने का झूठा आरोप लगाया। उस मुआमले में चिलादीन चैकीदार ने मेरे खिलाफ गवाही दी। बाद में उसने चौरा मुआमले में भी मेरे खिलाफ गवाही दी। उसने अपने रिश्तेदार, मोहर चमार को भी बुलाकर मेरे खिलाफ गवाही दिलवाई। रामलाल चैकीदार ने भी मेरे खिलाफ गवाही दी क्योंकि वह रामकुमार पांडे का कर्जदार है। जब डिप्टी कलेक्टर के सामने मेरी पहचान कराई गई तब रामलाल ने कहा कि उसने मुझे घटनास्थल पर नहीं देखा था। बाद में उसने अदालत में कहा कि उसने मुझे पत्थरबाजी करते देखा था। शिवबरन लोहार की मुझसे दुश्मनी है। मुझे आठ या दस खेतों से बेदखल करने के लिए, जमींदार ने मेरे खिलाफ मुकदमा दायर कर रखा था। मैंने एक छोड़, सात खेत जोतने बंद कर दिए। जमींदार ने यह सोचा कि मैंने सारे खेत छोड़ दिए हैं, उसने उस (आठवें) खेत को भी शिवबरन को बँटाई पर दे दिया। मैंने वह खेत शिवबरन से छीन लिया और उस खर्च की भरपाई नहीं की जो उसने खेत जोतने और बोने में किया था। इसलिए हमारे बीच झगड़ा हुआ था। मैंने डुमरी की सभा में भाग नहीं लिया, न दंगे में शामिल था। चौरा में दंगा होने के समय मैं मौजा बुड़वामन में अपने खेत पर मौजूद था। अगर मैं दंगे में शामिल होता तो वादामाफ ने निश्चित ही मेरी पहचान की होती। जलाधन चौकीदार, रामकुमार पांडे, और सेक्रेटरी प्यारेलाल ने पुलिस और लोगों को हिदायत देकर मेरी पहचान कराई। मैं अदालत में अपनी मर्जी से पेश हुआ।
पहले एक मौके पर रामकुमार ने मेरे खिलाफ एक शिकायत दायर की थी, जो हम चारों भाइयों के खिलाफ थी। अदालत में मेरी तरफ से दायर जवाब में भी चारों के नाम हैं। डिप्टी कलेक्टर और सत्र न्यायाधीश के सामने दिया मेरा बयान कृपा करके देखा जाए। इस मुआमले में जो कांस्टेबल मेरे खिलाफ गवाह था, उसने डिप्टी कलेक्टर के सामने मेरी पहचान नहीं की थी, लेकिन अदालत में बोला कि उसने मुझे पत्थर चलाते देखा था। हरिहर कहता है कि भीड़ जब उसके घर के पास पहुंची तो वे सब डर गए। पहले वही घर के अंदर भागा। उसका भाई बिंदेसरी और फिर उसका बाप भी भागकर अंदर चले गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिए। वे सब घर के अंदर ही रहे और 8 बजे शाम को बाहर निकले। उन सबने पूरी तरह झूठी गवाही दी है। उन्होंने मेरे खिलाफ यह मुआमला पुलिस के दबाव में गढ़ा है। मैं दंगे में शामिल नहीं था। पुलिस से रामकुमार के दोस्ताना संबंध थे और इसलिए उसने पुलिस के प्रभाव में मेरे खिलाफ झूठी गवाही दिलवाई है। नंद प्रसाद मुखिया की मुझसे दुश्मनी है। मैं बिल्कुल बेगुनाह हूँ। मेरी प्रार्थना है कि मेरी जिंदगी बख्श दी जाए।’

बरेली जेल में बंद सजायाफ्ता कैदी महादेव (पुत्र कुंजबिहारी, केवट) से दिनांक 22 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल, संयुक्त प्रांत, को संबोधित दया याचिका का अनुवाद- न तो मैं चौरा गाँव गया था और न डुमरी की सभा में मौजूद था। मैं तिलक के खेत में चारा काट रहा था। मेरा नाम गलती से स्वयंसेवकों में दर्ज कर लिया गया था इसलिए मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। अगर महामहिम द्वारा मेरी जान बख्श दी जाती है तो मैं सदा महामहित के दीर्घायु और वैभव की कामना हेतु प्रार्थना करता रहूँगा।

तीसरी दया याचिका
उपसचिव, संयुक्त प्रांत सरकार, न्यायिक (आपराधिक) विभाग के निम्नलिखित पत्र द्वारा तीसरी दया याचिका, भारत सरकार को भेजी गयी थी-
संख्या 684-जे, नैनीताल, 26 मई 1923
प्रेषक- एल एस व्हाइट, श्रीयुत, आई सी एस, एम आई सी, उपसचिव, संयुक्त प्रांत सरकार, न्यायिक (आपराधिक) विभाग
सेवा में,
सचिव, भारत सरकार, गृह विभाग (न्यायिक), शिमला
भारत सरकार के पत्र संख्या 673-जे, तिथि 23 मई 1923, की निरंतरता में मुझे वाइसरॉय और गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के आदेश पर, एक और दया याचिका संप्रेषित करने का निर्देश दिया गया है। यह महादेव वल्द कुंजबिहारी, जाति केवट, की है जो मृत्युदंड पाकर बरेली जेल में बंद है। याचिका पर महामहिम का आदेश मिलने तक उसकी फाँसी मुल्तवी कर दी गई है।
मुआमले के रिकॉर्डों पर आधारित मुद्रित पुस्तिका तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले की प्रतियाँ एक अलग पैकेट में, उपरोक्त पत्र के संलग्नक के रूप में, पहले ही भेजी जा चुकी हैं।
3-बरेली जेल में बंद सजायाफ्ता कैदी महादेव (पुत्र कुंजबिहारी, केवट) से दिनांक 22 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल, संयुक्त प्रांत, को संबोधित दया याचिका का अनुवाद-
‘न तो मैं चौरा गाँव गया था और न डुमरी की सभा में मौजूद था। मैं तिलक के खेत में चारा काट रहा था। मेरा नाम गलती से स्वयंसेवकों में दर्ज कर लिया गया था इसलिए मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। अगर महामहिम द्वारा मेरी जान बख्श दी जाती है तो मैं सदा महामहित के दीर्घायु और वैभव की कामना हेतु प्रार्थना करता रहूँगा।
सात और दया याचिकाएं
उपसचिव, संयुक्त प्रांत सरकार, न्यायिक (आपराधिक) विभाग के निम्नलिखित पत्र द्वारा सात और दया याचिकाएं भारत सरकार को भेजी गयी थीं-
संख्या 735-जे, नैनीताल, 30 मई 1923
प्रेषक-एल एस व्हाइट, श्रीयुत, आई सी एस, एम आई सी, उपसचिव, संयुक्त प्रांत सरकार
सेवा में,
सचिव, भारत सरकार, गृह विभाग (न्यायिक), शिमला
सरकार के पत्र संख्या 684-जे, तिथि 25 मई 1923 की निरंतरता में मुझे वाइसरॉय और गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल के आदेश पर सात दया याचिकाएँ अग्रसारित करने का निर्देश मिला है जो निम्नलिखित से प्राप्त हुई हैं —
(1) कालीचरन वल्द निरघुन, जाति कहार, जिला जेल गाजीपुर में बंद।
(2) लौटू वल्द शिवनंदन, जाति कहार, जिला जेल रायबरेली में बंद।
(3) लाल मुहम्मद वल्द हकीम शाह, जिला जेल रायबरेली में बंद।
(4) संपत वल्द मोहन, अहीर, जिला जेल इटावा में बंद।
(5) सीताराम वल्द रामफल, अहीर, जिला जेल इटावा में बंद।
(6) रघुबीर वल्द जद्दू, जिला जेल कानपुर में बंद।
(7) रामलगन वल्द शिवटहल, जाति लोहार, जिला जेल कानपुर में बंद।
जिला जेलों में बंद, इनमें से हर कैदी मौत की सजा पाए हुए है। याचिकाओं पर महामहिम के आदेश के आने तक उनकी फाँसी की सजाएँ मुल्तवी कर दी गई हैं।
मुआमले के रिकॉर्डों पर आधारित मुद्रित पुस्तिका तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले की प्रतियाँ एक अलग पैकेट में, सरकार के पत्र संख्या 673-जे के संलग्नक के रूप में, 23 मई 1923 को भेजी जा चुकी हैं।
प्रार्थियों को चौरी चौरा दंगे में सक्रिय भागीदारी के लिए मौत की सजा सुनाई गई है।
प्रार्थियों का मुकद्दमा सत्र न्यायालय, गोरखपुर ने सुना और उनको दोषी पाया। तदनुसार उनको धारा 302, भारतीय दंड संहिता के तहत मुजरिम ठहराकर मौत की सजा सुनाई गई। इस दोष और दंड की उच्च न्यायालय ने पुष्टि की।
प्रार्थियों की दया याचिकाओं पर विचार करके गवर्नर-इन-काउंसिल ने उनको रद्द कर दिया है और कोई भी सिफारिश नहीं की है।

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4- गाजीपुर जेल में बंद सजायाफ्ता कैदी कालीचरन (पुत्र निरघीं, कहार) से दिनांक 22 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल, संयुक्त प्रांत, को संबोधित दया याचिका का अनुवाद-
‘मैं आदर के साथ प्रार्थना करना चाहता हूँ कि बिना किसी अपराध के फाँसी पर चढ़ाया जा रहा हूँ क्योंकि मेरे वकील द्वारा मुकदमे के दौरान कोई बचाव नहीं किया गया। उसने कहा कि बचाव करना असहयोग आंन्दोलन के विरुद्ध है। इसलिए उन्होंने मुकदमे को गम्भीरता से नहीं लिया। चौरी चौरा विद्रोह के बीस दिन पूर्व, मैं मेथेर्रा (डमजीमततं) केवट (संभवतः मथुरा केवट) के साथ मकर संक्रांति का मेला देखनेे इलाहाबाद गया हुआ था। वहाँ मैं बच्चा पांडा के घर में रुका था। वहाँ उन्होंने मेरा नाम रजिस्टर में लिखा था और अगूंठे का निशान भी लगवाया था। मैं वहाँ 3 दिन रुका और दो गाय के बछड़े दान किए। उसके बाद गंगा से जल भर कर कांवड़ लिया पैदल घर के लिए चल पड़ा। 8 दिन बाद, शनिवार को (4 फरवरी, 1922, दंगे के दिन) आजमगढ़ के एक धर्मशाला में पहुंचा और वहीं रुक गया। वहाँ मेरा नाम रजिस्टर में लिखा गया था। वहाँ से अगले दिन सुबह चला और सोमवार को घर पहुंचा। तब मुझे चौरा थाना जलाये जाने की घटना की जानकारी मिली। जब मैं शनिवार को आजमगढ़ की धर्मशाला में ठहरा हुआ था, तब थाना जलाये जाने के समय कैसे उपस्थित रहा? वहाँ से आने के बाद मैं लगातार घर पर ही रहा। चौरी चौरा दंगे के 1 माह 7 दिन बाद, सुन्दर केवट ने दुश्मनीवश मुझे डिप्टी कलेक्टर के हाथों गिरफ्तार करवा दिया। चूंकि मेरे वकील ने मेरा कोई बचाव नहीं किया, इसलिए मैं निर्दोष फाँसी पर चढ़ाया जा रहा हूँ। मैं बहुत गरीब हूँ और परिवार में मेरे अलावा कोई कमाने वाला नहीं है। इसलिए मैं महामहिम से जिंदगी बख्श देने की अपील करता हूँ। मैं महामहिम की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए बराबर प्रार्थना करता रहूँगा।’

5-रायबरेली जिला जेल में बंद दंड प्राप्त कैदी लौटू या लवटू (पुत्र शिवनंदन, कहार) से 22 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को संबोधित याचिका का अनुवाद-
‘मैं सुबह 9 बजे एक भाषण सुनने के लिए डुमरी खुर्द गया था, जो थाना से एक मील दूर है। वहाँ लोगों ने श्रोताओं से अपने-अपने घर वापस जाने को कहा क्योंकि मुँडेरा बाजार में झगड़ा होने वाला था और इसके लिए वहाँ कोई पाँच सौ डंडे जमा किए गए थे। मुझसे यह भी कहा गया कि चौरा थाने पर पुलिस गार्ड पहुँच चुके हैं। इसलिए मैं सीधे घर चला गया। घटना के एक माह बाद पुलिस ने मुझे, मेरे घर से रात के समय बेगुनाह गिरफ्तार किया। पुलिस इंस्पेक्टर ने जब ग्यारह लोगों को एक रस्सी में बँधवाकर थाने भिजवा दिया तो थानेदार ने मुझसे कहा कि जो लोग वादामाफ गवाह बनना चाहें, वे रिहा कर दिए जाएँगे। इसी आधार पर सब-इंस्पेक्टर द्वारा छः लोग छोड़ दिए गए। उनको शिनाख्त के लिए गवाह बनाया गया और उनसे जेल में हमारी पहचान कराई गई। अदालत ने मेरे बचाव को नहीं सुना और मुझे मृत्युदंड दिया और उस दंड की उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि कर दी गई। फाँसी 6 जून 1923 के लिए तय की गई है। मेरी प्रार्थना है कि मुझ पर शाही करम किया जाए और मेरी जिंदगी बख्श दी जाए।’
इस दया याचिका से ज्ञात होता है कि अभियुक्तों की पहचान कराने के लिए, औपनिवेशिक सत्ता ने लोगों को जबरदस्ती तैयार किया था।

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6-रायबरेली जिला जेल में बंद दंड प्राप्त कैदी लाल मुहम्मद( पुत्र हाकिम शाह) से 22 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को संबोधित याचिका का अनुवाद-
‘मैं अर्ज करना चाहूँगा कि दंगे के दिन मैं 10 बजे सवेरे मुँडेरा बाजार गया हुआ था। वहाँ से मैं दोपहर बाद 3 बजे लौट रहा था तब मैंने रास्ते में चौरा थाने पर कुछ लोगों को जमा देखा। बात क्या है, यह पूछने पर बतलाया गया कि थानेदार के हुक्म पर लोगों को बिना किसी कुसूर पीटा गया है। कुछ मिनट बाद पुलिस ने लोगों पर गोली चलानी शुरू कर दी। मेरी बायीं कनपटी पर भी एक गोली लगी और मैं वहीं जमीन पर गिर पड़ा। मुझे होश नहीं रहा और मुझे नहीं पता कि कौन मुझे उस स्थान से उठाकर कहाँ ले गया था? 8 बजे के आसपास जब मुझे होश आया तो पुलिस ने मुझे गिरफ्तार करके अगली सुबह मेरा चालान कर दिया। मैं तब घटनास्थल पर नहीं था जिसका कारण यह था कि-मेरा बेटा एक माह से सख्त बीमार चल रहा था और चिंता के कारण मैं लगातार उसकी तीमारदारी कर रहा था। घटना के तीन दिन बाद मेरा बेटा चल बसा। रहा सवाल जेल के अंदर मेरी पहचान का, तो पुलिस के सब-इंस्पेक्टर ने पहले ही उन लोगों को जेल से बाहर मेरी पहचान करा दी थी। यही कारण है कि उन लोगों ने जेल के अंदर मेरी पहचान कर ली। अदालत ने, मेरी पेश की हुई सफाई पर कोई ध्यान नहीं दिया और मुझे मौत की सजा सुना दी। फाँसी 6 जून 1923 के लिए तय की गई है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि मुझ पर शाही करम किया जाए और मेरी जिंदगी बख्श दी जाए।”

7-इटावा जिला जेल में बंद दंड प्राप्त कैदी संपत (पुत्र मोहन, अहीर) से 23 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को संबोधित याचिका का अनुवाद-
‘मैं दंगे में शामिल नहीं था। मैं चौरी चौरा से 40 कोस दूरी पर था। जीधन और खिलावन को मुझसे पुरानी दुश्मनी है और इसलिए उन्होंने मेरी शिनाख्त की और दूसरों से मेरी शिनाख्त कराई। वारंट, रामपुरा के एक अन्य संपत नाम के अहीर के लिए जारी हुआ था लेकिन रामकुमार मुखिया ने उसकी जगह मुझे अंदर करा दिया। मुझे, बेगुनाह फाँसी दी जा रही है। शाही करम करके मेरी जिंदगी बख्शी जाए।’

8-इटावा जिला जेल में बंद दंड प्राप्त कैदी सीताराम (पुत्र रामफल, अहीर) से 23 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को संबोधित याचिका का अनुवाद-
‘मैं दंगे के दिन नूतन बाजार में था। मैंने दंगे में भाग नहीं लिया। पुलिस ने मुझे घटना के चार माह बाद केवल शक की बिना पर गिरफ्तार किया। औतार और बालक चमार से मेरी दुश्मनी रही है। इसलिए उन्होंने मेरी शिनाख्त की और गिरफ्तार कराया। मैं एकदम बेगुनाह हूँ। शाही करम करके मेरी जिंदगी बख्शी जाए।’

9-कानपुर जिला जेल में बंद दंड प्राप्त कैदी रघुबीर (पुत्र जद्दू, सुनार) से 21 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को संबोधित याचिका का अनुवाद-
‘मैं अर्ज करना चाहूँगा कि मैंने चैरी चैरा थाने को आग नहीं लगाई। मुझे दुश्मनी के कारण फँसाया गया है। मैं बेगुनाह हूँ। मेरी प्रार्थना है कि मुझ पर शाही रहम किया जाए और मेरी जिंदगी बख्श दी जाए।’
10-कानपुर जिला जेल में बंद दंड प्राप्त कैदी रामलगन (पुत्र शिवटहल, लोहार) से 21 मई 1923 को प्राप्त और महामहिम गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल को संबोधित याचिका का अनुवाद-
‘मैं अर्ज करना चाहूँगा कि मैंने चैरी चैरा थाने को आग नहीं लगाई। दुश्मनी के कारण मेरा नाम शामिल किया गया है। मैं निर्दोष हूँ। मेरी प्रार्थना है कि मुझ पर शाही रहम करते हुए मेरी जिंदगी बख्श दी जाए।’

क्रमश:

सुभाष चन्द्र कुशवाहा जाने-माने कथाकार और इतिहासकार हैं।

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