मुंबई : कूड़ा जो उड़ता और रिसता हुआ फैल रहा है साँसों और धमनियों तक

पूजा यादव

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मनुष्य को जीने के लिए हवा और पानी एक बुनियादी जरूरत है। इसके साथ ही यह सवाल उठता है कि क्या हमारे पास ये दोनों चीजें हैं? बेशक यह एक जटिल और गंभीर सवाल है क्योंकि इसका उत्तर खोजने की कोशिश करने के लिए जैसे ही हम गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं तब पता चलता है कि वास्तव में ये दोनों चीजें बहुत बुरे खतरों से घिर चुकी हैं। न केवल ये खतरे में पड़ी हैं बल्कि इनके खतरे में पड़ने से हमारा श्वसन तंत्र और रक्त वाहिनियाँ भी खतरे में हैं और धीरे-धीरे इसका खामियाजा भी हम झेल रहे हैं। जो हवा और पानी है उसे कॉर्पोरेट लालच, लूट  और सांस्थानिक अनैतिकता ने इस हद तक दूषित कर दिया है कि उन्हें अपने शरीर के अनुकूल बनाते-बनाते हमारा श्वसन तंत्र और रक्त वाहिनियाँ लंबे समय तक हमें स्वस्थ रहने देने की योग्यता खो रही हैं। मुहावरे का सहारा लूँ तो कह सकती हूँ कि दाँत और चना दोनों संकट में हैं।

इस रिपोर्ट में मैंने मुंबई में कूड़े के प्रबंधन की प्रक्रिया, उसकी जटिलता, मानव जीवन पर उसके प्रभाव और परिणाम के साथ ठोस कचरा प्रबन्धन के प्रति सांस्थानिक रवैये का अध्ययन किया है। मुंबई भारत के चार महानगरों और दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले शहरों में से एक है। अपने विशाल जनसंख्या आकार के कारण, विनियमित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन मुंबई में एक प्रमुख समस्या है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के अनुसार सूखे कचरे के रूप में मनुष्यों और पालतू पशुओं की गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले सभी अपशिष्ट शामिल होते हैं, जिन्हें बेकार या अवांछित के रूप में छोड़ दिया जाता है। .

मुंबई में अपशिष्ट प्रबंधन को सात नगर पालिकाओं द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जिनमें ग्रेटर मुंबई नगर निगम, नवी मुंबई नगर निगम, ठाणे महानगरपालिका,उल्हासनगर महानगर पालिका, कल्याण-डोंबिवली महानगर पालिका, भिवंडी-निजामपुर महानगर पालिका और वसई-विरार महानगर पालिका शामिल हैं। महानगर पालिकाओं द्वारा सबसे व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले तरीकों में से एक में प्राथमिक संग्रहकर्ताओं से कचरे का संग्रह और इसे पास के डंपसाइट में डंप करना शामिल है।

नगरपालिकाओं द्वारा इकट्ठा किए जाने वाला कचरा विभिन्न क्षेत्रों का मिश्रित कचरा है और इसलिए उचित प्रबंधन के लिए इसका पृथक्करण अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है, क्योंकि मिश्रित कचरे का उपयोग कचरा प्रबंधन के लिए प्रस्तावित ऊर्जा संयंत्रों, जैव खाद, कचरे से पैदा होनेवाले ईंधन और अन्य प्रक्रियाओं के लिए नहीं किया जा सकता है। कचरे को खुले में डंप करने से न केवल मानव स्वास्थ्य पर खतरनाक प्रभाव पड़ता है, बल्कि पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। डंपिंग ग्राउंड में मिश्रित कचरे से निकलने वाला रिसाव मिट्टी और पानी की गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित करता है।

यह रिपोर्ट विभिन्न स्रोतों से माध्यमिक शोध तथ्यों पर आधारित है जिसमें समाचार पत्र लेख, शोध पत्र, एमएसडब्ल्यू नियम और प्रजा फाउंडेशन की रिपोर्ट शामिल हैं। यह मुंबई में अपशिष्ट प्रबंधन के वर्तमान परिदृश्य को समझने का एक प्रयास है। इसमें उन बातों को जानने की कोशिश की गई है कि मुंबई में कूड़े के प्रबंधन की वास्तविक स्थिति क्या है? सामान्य जनजीवन और डम्पिंग ग्राउंड के आसपास की पारिस्थिकी एवं मनुष्य जीवन पर उसका क्या प्रभाव पड़ रहा है? साथ ही उसके निस्तारण के लिए क्या उपाय प्रभावी हो सकते हैं?

मुंबई में डंपिंग साइटों की हालत

गौरतलब है कि मुलुंड डंपिंग ग्राउंड का उपयोग 1967 से किया जा रहा है। इसका रकबा 24 हेक्टेयर में फैला हुआ है। ठोस कचरा प्रबंधन यानी एसडब्ल्यूएम के अधिकारी के अनुसार यहाँ लगभग सात मिलियन क्यूबिक मीटर कचरा डंप किया गया है, जिसकी ऊंचाई 30 मीटर तक पहुंच गई है।

लगभग 66 हेक्टेयर में फैले कांजूर लैंडफिल से भी कम खतरा नहीं है जहां से लीचेट का रिसाव ठाणे क्रीक के जलीय जीवों, परवासी फ़्लेमिंगों पक्षियों और मेंग्रोव के लिए भारी मुसीबत है। 2005 में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार से बीएमसी को 141.77 हेक्टेयर भूमि प्राप्त हुई थी। लेकिन कुल 141.77 हेक्टेयर भूखंड में से नगर निकाय केवल 65.96 हेक्टेयर का उपयोग कर सका क्योंकि शेष क्षेत्र सीआरजेड और मैंग्रोव भूमि के अंतर्गत आता है।

मुलुंड डंपिंग ग्राउंड (साभार- गूगल)

वर्तमान में कांजूर में लगभग 3200 मीट्रिक टन कचरा बायोरिएक्टर प्रौद्योगिकी द्वारा वैज्ञानिक रूप से संसाधित किया जाता है।

इसी तरह लीचेट का रिसाव गोराई की खाड़ी में हो रहा है हालांकि 2009 में पूरी तरह से बंद हो गया है। इसके बावजूद जो रिसाव हो रहा है उसका असर मानव स्वास्थ्य, जलीय जंतुओं और जैवविविधता पर किस रूप में पड़ रहा है उसका अभी तक ठोस मूल्यांकन नहीं किया जा सका है।

लैंडफिल ठोस कचरा प्रबंधन के लिए अंतिम और सबसे कम पसंदीदा विकल्प है। अधिकांश नगर पालिकाएं अक्सर अवैज्ञानिक तरीके से कचरे को लैंडफिल में डंप करती हैं, कचरे के अनुचित या अनियमित डंपिंग से विभिन्न समस्याएं हो सकती हैं जैसे कि भूमि की मिट्टी की गुणवत्ता, हवा की गुणवत्ता और कचरे से लीचेट के रिसाव के कारण पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। यह लीचेट है अत्यंत खतरनाक होता है और इसके उचित उपचार की आवश्यकता होती है। इसके खतरनाक प्रभावों को रोकने के लिए कचरे का डंपिंग को वैज्ञानिक तरीके से करना जरूरी है।

कांजूर डंपिंग यार्ड (साभार-गूगल)

यह मुंबई का एक सामान्य परिदृश्य है जो रोज़मर्रा की भागदौड़ के बीच हमारी चेतना में कोई हलचल नहीं पैदा करता क्योंकि हम बच-बचाकर निकल जानेवाली नागरिकता के पक्षधर हैं। जबकि वास्तविक आंकड़े और प्रभाव बहुत भयावह हैं और कतई इग्नोर करने के विषय नहीं हैं। सच्चाई यही है कि तमाम चमक-दमक के बावजूद हमारा पर्यावरण ज़मीन के ऊपर और ज़मीन के भीतर के उड़ते और रिसते हुये कचरे से घिर रहा है। वह इतनी बड़ी चुनौती बन चुका है कि सारे प्रयास बौने साबित हो रहे हैं।

कचरा प्रबंधन के तौर-तरीके अर्थात नौ दिन चले अढ़ाई कोस

मूल सवाल यही है कि मुंबई में कचरे के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है? वास्तविकता यह है कि मुंबई में प्रतिदिन पैदा होने वाले कचरे की मात्रा और उपचारित/एकत्रित कचरे की मात्रा में बहुत अंतर होता है। जिस कचरे को सही ढंग से प्रबंधित नहीं किया जाता वह अक्सर सीवेज, नदियों और अंत में समुद्र में मिल जाता है। झुग्गी-झोपड़ी क्षेत्रों से उत्पन्न कचरे का भी उचित प्रबंधन किया जाना चाहिए जबकि इसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

ठोस कचरे का अधिकतम हिस्सा जैविक कचरा है और इसे या तो सामुदायिक स्तर पर या नगर पालिकाओं द्वारा कंपोस्ट किया जाना चाहिए। मुंबई में जैविक कचरे की समस्या से निपटने के लिए बीएमसी ने 9 मिनी बायोमेथेनाइजेशन इकाइयां स्थापित करने का निर्णय लिया है ताकि जैविक कचरे को मीथेन में परिवर्तित किया जा सके, जिसे बाद में ऊर्जा स्रोत के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

मुंबई में विभिन्न समाजों ने अपने स्तर पर अपशिष्ट उत्पादन को कम करने और देवनार डंपिंग ग्राउंड पर भार कम करने के लिए गैर सरकारी संगठन के साथ हाथ मिलाया है। 2022 में देवनार डंपिंग ग्राउंड में अपशिष्ट से ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसकी बहुत आवश्यकता भी है क्योंकि 2025 तक देवनार डंपिंग ग्राउंड बंद होने की उम्मीद है। वर्तमान परिदृश्य में, देवनार डंपिंग ग्राउंड के पास मलिन बस्तियों के निवासी रिसाइकिल किए जाने योग्य चीजों को अलग करने और इसे स्थानीय रिसाइकिलिंग बाजारों में बेचने का काम करते हैं। इन क्षेत्रों के अधिकांश लोग अपनी आजीविका के लिए इस नौकरी पर निर्भर हैं। अवैज्ञानिक तरीके से की गई डंपिंग से कचरे से निकलने वाले लीचेट से पानी की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

2025 तक देवनार डंपिंग ग्राउंड बंद होने की उम्मीद(साभार-गूगल)

शोध में पाया गया कि देवनार डंपिंग ग्राउंड के आसपास हवा की गुणवत्ता बहुत खराब है। यहाँ के धूल-कणों और कचरा जलाए जाने से फैलने वाले धुएँ और बदबू से आस-पास की बस्तियों में साँस संबंधी बीमारियाँ, आँखों में दिक्कत और चर्मरोग एक सामान्य स्थिति है। अनेक रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि इसके नजदीक के लोगों का जीवन 40 वर्ष तक सिमट गया है।

मैनेजमेंट ऑफ सॉलिड वेस्ट (MSW) 2016 के नियमों के अनुसार, गीले और सूखे कचरे का अलग-अलग संग्रह होना चाहिए। इसके लिए फलों और सब्जियों के छिलके आदि जैसे गीले कचरे के लिए हरे कूड़ेदान का उपयोग और कागज, प्लास्टिक, कांच और धातु आदि जैसे सूखे कचरे के लिए नीले कूड़ेदान का उपयोग करना अनिवार्य बना दिया गया। इन दो तरीकों से अपशिष्ट संग्रह करने में कई तरह की सहूलियतें होती हैं, मसलन इन्हें आसानी से जलाया और रिसायकिल किया जा सकता है। इसी तरह से गीले कचरे का उपयोग खाद बनाने, वर्मी कम्पोस्ट बनाने, बायोमेथेनाइजेशन आदि के लिए किया जा सकता है। लेकिन प्रायः ऐसा होना एक अत्यंत कठिन लक्ष्य बन गया है, क्योंकि नगरपालिका सूखे और गीले कचरे के संग्रह के लिए अलग-अलग वाहनों का उपयोग नहीं करती है और कचरा संग्रह के लिए एकल वाहनों के उपयोग के कारण, भले ही लोगों ने कचरे को अलग कर दिया हो, अंततः यह मिश्रित अपशिष्ट के रूप में निकलता है और पृथक्करण का पूरा उद्देश्य ही बेकार हो जाता है। इस मिश्रित कचरे से अच्छी खाद बनाना मुश्किल हो जाता है और अन्य घटकों का कुशल उपयोग भी प्रभावित होता है।

सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट (साभार- गूगल)

सीपीसीबी के अनुसार बड़े शहरों में उत्पन्न होने वाले कचरे का केवल 15% ही उचित ढंग से उपचारित या संसाधित किया जाता है। मिश्रित कचरे को अवैज्ञानिक तरीके से डंपिंग ग्राउंड में डाल दिया जाता है, जिसमें लीचेट संग्रह के लिए कोई प्रावधान नहीं होता है। बारिश के मौसम में कचरे में पानी जमा हो जाता है और यह रुका हुआ पानी मच्छरों के लिए प्रजनन के लिए प्रसूति-गृह बन जाता है। मलेरिया और डेंगू जैसी जीवाणु-जनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। कचरे के पहाड़ को कम करने के लिए कभी-कभी नगरपालिका डंपसाइट्स में कचरा जलाती है। कचरे को जलाने से कुछ जहरीले कणों के साथ-साथ बारीक कण निकलते हैं। इनसे पैदा होने वाली गैसों में श्वसन संबंधी कई विकार पैदा करने की क्षमता होती है। कचरे को जलाने से स्मॉग भी बनता है जो वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है।

कचरे से जुड़ी चुनौतियों और दिक्कतों से निपटने के लिए नवी मुंबई महानगर पालिका ने सभी हाउसिंग सोसायटियों को अपशिष्ट प्रबंधन पर सिडको के आदेश का पालन करने के लिए कहा है। इसी तरह कचरे को इकट्ठा करने के लिए नागरिकों, नगर पालिकाओं, कचरा बीनने वालों तथा उसे रिसाइकिल करनेवाली इकाइयों को जोड़ने की व्यवस्था पर ज़ोर दिया जा रहा है।

मुंबई में भारत का पहला बायोगैस संचालित इलेक्ट्रिक वाहन चार्जर बनाया गया है। इसमें एनारोबिक अपघटन के माध्यम से जैविक कचरे से मीथेन का उत्पादन किया जाता है। मीथेन को आगे बिजली में परिवर्तित किया जाता है और इस बिजली का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहन को चार्ज करने के लिए किया जाता है।

कचरे को इकट्ठा करने के लिए एमसीजीएम द्वारा विभिन्न पहलकदमियाँ शुरू की गई हैं। इसने चकाचक मुंबई नामक ब्रोशर में अनेक योजनाओं और प्रविधियों का उल्लेख किया है। एडवांस लोकेलिटी मैनेजमेंट (एएलएम) और थोक जनरेटर नीति दोनों का उद्देश्य अलगाव और स्थानीयकृत खाद को बढ़ावा देना है। हालांकि, वर्तमान में मुंबई में कुल 614 एएलएम हैं, लेकिन केवल 454 कचरे को अलग कर रहे हैं और केवल 39 ही कचरे से खाद बना रहे हैं। 2018-19 के अंत तक, 49% थोक जनरेटर अपने कचरे का खाद बना रहे थे। इसके अलावा, मुंबई की मलिन बस्तियों में प्रभावी एसडब्ल्यूएम सेवाएं प्रदान करने के लिए स्वच्छ मुंबई प्रबोधन अभियान के बावजूद, ये क्षेत्र अभी भी ठोस कचरे के खराब प्रबंधन से पीड़ित हैं। उदाहरण के लिए, 2020 में कुल ठोस कचरा प्रबंधन शिकायतों में से 39% केवल 9 वार्डों (F/N, P/N, P/S, R/N, R/S, M/W, N, L, and S) से थीं, जिनमें 50% से अधिक की आबादी झुग्गियों में रहती है । (प्रजा फाउंडेशन की रिपोर्ट)।

मुंबई में उत्पन्न अधिकांश कचरे में खाद्य बायोडिग्रेडेबल कचरा होता है जिसे आसानी से खाद बनाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। एमएसडब्ल्यू नियमों के अनुसार, उत्पन्न होने वाले कचरे का कम से कम 80% रिसाइकिल किया जाना चाहिए, लेकिन मुंबई नगर पालिका की रिसाइकिल दर कई साल से 35% पर ही स्थिर है ।

प्रजा फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार स्वच्छ भारत मिशन ने प्राथमिक रूप में डोर टू डोर संग्रह निर्धारित किया है। एमसीजीएम का दावा है कि 2019 -20 तक कचरे का 100% डोर-टू-डोर संग्रह किया गया है। लेकिन 2020 में कुल 11596 शिकायतों में से 34% शिकायतें सिर्फ ऐसे कचरे से संबंधित हैं, जिनका कई दिनों या महीनों से संग्रह नहीं किया गया है।

वास्तविकता यह है कि सभी प्रकार के प्लास्टिक को रिसाइकिल नहीं किया जा सकता है और इसलिए उनका प्रबंधन एक समस्या बन चुका है। प्लास्टिक उत्पादों को सीमित संख्या में रिसाइकिल किया जा सकता है। समय के साथ और प्रत्येक चक्र के साथ प्लास्टिक उत्पाद की गुणवत्ता हीन हो जाती है।

खाद बनाने की प्रक्रिया भी बहुत जटिल है। इसके लिए बहुत विस्तृत परियोजना और कौशल की जरूरत है। चलताऊ ढंग से खाद बनाने की प्रक्रिया में साल्मोनेला एसपीपी, ई.कोली, एंटामोइबा हिस्टोलिटिका आदि सभी रोगाणुओं के विनाश के लिए 60 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। अच्छी खाद के लिए यह चरण महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि रोगाणुओं का विनाश ठीक से नहीं किया जाता है, तो खाद को बेहतर बनाने  वाले लोग रोगाणु  संक्रमित होकर जीवन के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।

निषाद संस्कृति की ध्वजवाहिका थीं बिलासा देवी केवट

डम्पिंग ग्राउंड के आसपास की पारिस्थिकी और जनजीवन

एक उदाहरण के रूप में Mongabay नामक वेबसाइट पर 18 अगस्त 2021 को प्रकाशित अपेक्षिता वार्ष्णेय की रिपोर्ट जानलेवा प्रदूषणः मुंबई की इस बस्ती में 40 साल में ही आ जाता है बुढ़ापा को देखना जरूरी है। रिपोर्ट में देवनार डंपिंग ग्राउंड के पास की झुग्गियों में रहनेवाले लोगों के जीवन पर प्रदूषण के  घातक असर के बारे में बताया गया है कि यहां के लोगों का औसत जीवनकाल 39 वर्ष ही रह गया है। जबकि महाराष्ट्र में शहरी लोगों का औसत जीवनकाल 73.5 साल आंका गया है।

देवनार डंपिंग ग्राउंड मुंबई का सबसे बड़ा डंपिंग ग्राउंड है। इसका क्षेत्रफल 134 हेक्टेयर में फैला हुआ है और यहाँ प्रतिदिन 9000 मीट्रिक टन कचरा जमा होता है। इस कचरे के सड़ने से मिथेन गैस निकलती है जिसकी वजह से यहाँ अक्सर आग लगती है। इससे इस क्षेत्र में लगातार धुआँ और बदबू फैलती है। यह बदबू असहनीय होती है। सामान्य मनुष्य के लिए कभी-कभार इसके आस-पास से गुजरने पर भी नर्क से गुजरने से कम भयानक अनुभव नहीं होता है। ऐसे में हम उनकी कल्पना करें जिनको इसके आस-पास ही रहना पड़ता है। उन लोगों को क्या अनुभव होता होगा जिनका घर इस इलाके में है?

एक और उदाहरण के तौर पर हम मुलुंड डंपिंग ग्राउंड को ले सकते हैं जिसे 1 अक्टूबर 2018 को बंद कर दिया गया। डीएनए में प्रकाशित अमित श्रीवास्तव की 6 अक्टूबर 2018 की रिपोर्ट A dawn for Mulund residents, but tough road ahead for the BMC के मुताबिक ‘डंपिंग ग्राउंड के पास मुलुंड (पूर्व) के हरिओम नगर में कामधेनु कॉम्प्लेक्स के निवासी असहनीय बदबू से तंग आकर, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच जटिल और सांस लेने की समस्याओं से परेशान होकर या तो अपने घर बेच दिए या पिछले एक दशक में अन्य क्षेत्रों में स्थानांतरित हो गए।’

‘डंपिंग ग्राउंड के निकटतम आवास परिसर कामधेनु कॉम्प्लेक्स की एक अन्य निवासी निशा मेनन ने बताया कि मानसून उनके लिए सबसे खराब मौसम है। उन्होंने कहा, ‘पूरा परिसर मक्खियों से ढक जाता था। यहां तक कि इसके चारों ओर सांप भी घूमते पाए जाते थे।’ उन्होंने कहा कि बच्चे अक्सर बीमार पड़ते हैं और त्वचा रोग हो जाता है।’

ये समस्याएँ इतनी बड़ी हैं कि पर्यावरण पर काम करने वाली अनेक संस्थाओं ने इसको लेकर सवाल उठाए। अनेक छोटी-बड़ी पहलकदमियाँ हुई हैं लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात है।

कचरा प्रबंधन कोई रोमानी अवधारणा नहीं है

कचरा प्रबंधन को लेकर ढेरों संस्थाएं और कंपनियाँ काम कर रही हैं लेकिन इस क्षेत्र में बढ़ती हुई चुनौती को देखकर उनके कामों पर अनेक प्रकार के सवाल उठते हैं और कोई भी संतोषजनक जवाब न मिलने पर अनुत्तरित रह जाते हैं। इस क्षेत्र में दो-तीन-चार दशक से काम कर रही कुछ अग्रणी संस्थाओं के कामों और प्रविधियों के बारे में जानने के लिए मैंने उन्हें ईमेल लिखे। मुझे यह जानकार निराशा हुई कि एक गंभीर विषय के प्रति उनका रवैया कितना चलताऊ है। दादर में काम कर रही एक कंपनी के प्रमुख को कूड़ा प्रबंधन के लिए एक बड़ा सम्मान प्राप्त है। उनसे जब मैंने जानना चाहा कि आपने इस क्षेत्र में वास्तव में क्या नया काम किया कि आपको सम्मान मिला तो वे कोई भी संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। कुछ देर बाद उन्होंने मुझे अपनी कंपनी की वेबसाइट का लिंक भेजा और कहा कि इसे देखकर मैं समझ लूँ।

यादवों की घृणा के शिकार थे पेरियार ललई, केवल एक वाल्मीकि परिवार पर था भरोसा

इसी तरह गोवंडी में 1995 से काम कर रही एक स्वयंसेवी संस्था से जुड़ी एक कार्यकर्ता ने मेरे ईमेल के जवाब में फोन किया और पूछा कि क्या मैं वहाँ इंटर्नशिप करना चाहती हूँ। मैंने कहा नहीं, बल्कि मैं आपके कार्यकर्ताओं के साथ देवनार डंपिंग ग्राउंड जाकर देखना चाहती हूँ। उन्होंने कहा कि यह संभव नहीं है। यह संस्था कूड़ा बीनने वालों को काम देती है और उनके बच्चों के कल्याण के लिए काम करती है। उन्होंने बड़े गर्व से बताया कि वे प्लास्टिक रिसाइकिल इंडस्ट्री में बहुत योगदान कर रही है। सच यह है कि ऐसी संस्थाएँ प्लास्टिक बीनने वाले लोगों के सहारे अपने अस्तित्व को बचाए हुये हैं जबकि प्लास्टिक बीनने वालों की ज़िंदगी लगातार खतरे में पड़ती जा रही है। उन्हें लगातार मौत के मुहाने पर रहना पड़ रहा है। Mongabay की ऊपर उद्धरित रिपोर्ट का यह अंश देखिये –

‘सूरज उगने से पहले जगकर तैयार होती मानसी दिघे (बदला हुआ नाम) का दिन बेहद संघर्षों से भरा होने वाला है। साड़ी ठीक कर अपने बाल बनाते हुए वह काम पर निकलने की तैयारी कर रही है। दिघे की मंजिल है मुंबई का सबसे बड़ा डंपिंग ग्राउंड-देवनार।

रोज 20 से 25 किलोमीटर की थकान भरी पैदल यात्रा से दिघे इतना कचरा भी इकट्ठा नहीं कर पाती कि उसे बेचकर 100 रुपए से अधिक की कमाई हो सके। लोहा, प्लास्टिक और कांच के टुकड़े 20 रुपए प्रति किलो बिक जाते हैं।

मुंबई की एक करोड़ से अधिक आबादी हर दिन 9,000 मीट्रिक टन कचरा पैदा करती है जिसे 234 एकड़ में फैले डंपिंग ग्राउंड में भेजा जाता है। यहां कचरे का अंबार 18 से 20 मंजिला इमारत जितना है। आसपास की बस्तियों में रहने वाले लोग यहां से काम लायक कचरा चुनकर अपनी रोजी-रोटी भी चलाते हैं।

“हमारे लिए तो यह कचरे का अंबार सोने की खान जितना महत्व रखता है,” दिघे कहती हैं।

“कचरा बीनने के लिए ग्राउंड में घुसना है तो नगर निगम के कर्मचारियों को कुछ पैसा खिलाना पड़ता है,” वह कहती हैं।

हाल ही में मुंबई के नगर निगम ने घोषणा की है कि कचरा चुनने वालों को डम्पिंग ग्राउन्ड इत्यादि में कचरा अलग करने का ठेका दिया जाएगा। जबकि यह कहा जाता रहा है कि कचरे को घर में ही अलग करना सबसे बेहतर उपाय है।

सरकार के इस कदम से कितना फायदा होगा यह तो भविष्य की गर्भ में है पर इस बहाने इस डंपिंग ग्राउंड के आस-पास रहने वाले लोगों की हालचाल जानें।’

क्या अब भी यह कल्पना करना कठिन है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर देश में हजारों लोगों का जीवन ऐसा भी हो सकता है। जहां रोज नए-नए मोबाइल और गजेट्स जीवन में शामिल हो रहे हों, सुविधाजनक कमोडिटी की भरमार हो, वहाँ कूड़ा निस्तारण का यह तरीका क्या साबित करता है? निश्चय ही यह बताता है कि भारतीय नागरिकता में गंदगी बिखेरना प्राथमिकता है लेकिन सफाई का कोई सरोकार नहीं है। हर काम के लिए मशीनरी है लेकिन कूड़ा निस्तारण के लिए आदिम तरीका है। साथ ही यह कितनी भयानक बात है कि बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था और लगातार आधुनिक होते हुये समाजों के समानान्तर बहुत बड़ा तबका इतना मजबूर है कि वह जहरीले कूड़े में अपनी आजीविका, जीवन और भविष्य ढूंढ रहा है।

एफएमसीजी द्वारा प्लास्टिक पेकेजिंग (साभार गूगल)

एक तरफ प्लास्टिक की पैकेजिंग ने एफएमसीजी कंपनियों और कॉर्पोरेट्स को अनियंत्रित मुनाफा दिया है और दूसरी तरफ बहुत छोटे पैमाने पर प्लास्टिक की थैलियों के उपयोग के खिलाफ खुदरा व्यवसायियों और दूकानदारों की धरपकड़ और जुर्माने का खेल चल रहा है जबकि दोनों ही स्थितियों में कौन पर्यावरण की बरबादी के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है यह समझना बहुत कठिन नहीं। बहुत से लोग और संस्थाएँ कागज़ और कपड़े की थैलियों को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। बेशक यह एक अच्छी सोच है लेकिन पर्यावरण को बचाने की दिशा में यह बहुत ही नाकाफी है। बहुत अधिक सोचने और करने की जरूरत है।

सतत शोध और अध्ययन के साथ सुनियोजित परियोजनाओं और विज़न की जरूरत 

हाल में ही केंद्र सरकार द्वारा एक प्रस्ताव सामने आया कि प्रशासनिक सेवाओं की तर्ज पर संघ लोक सेवा आयोग द्वारा पर्यावरण सेवा की भी एक परीक्षा होगी। इससे यह पता चलता है कि देश के सामने पर्यावरण एक बड़ी चुनौती बन चुका है। इस दिशा में अभी शोध की प्रक्रिया न केवल धीमी है बल्कि अनेक जटिलताओं की भी शिकार है। इसे अधिक स्वायत्त और नवोन्मेषशील बनने की आवश्यकता है।

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन मुंबई शहर में एक बड़ी समस्या है और हममें से अधिकांश इसे अक्सर अनदेखा कर देते हैं क्योंकि हम हर दिन अपने  द्वारा उत्पन्न कचरे की मात्रा और इसे प्रबंधित करने के बारे में कम से कम चिंतित हैं।

अपशिष्ट प्रबंधन में शामिल नगर पालिकाओं और अन्य हितधारकों को अपशिष्ट प्रबंधन की समस्या को एक गंभीर मुद्दे के रूप में देखने की आवश्यकता है क्योंकि ऊपर से यह एक ही मुद्दा  लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह कई अन्य समस्याओं से जुड़ा हुआ है जिनका हम हर रोज सामना करते हैं जैसे खराब वायु गुणवत्ता, पानी की गुणवत्ता, जलवायु परिवर्तन आदि।

कई परियोजनाओं को शुरू करने का प्रस्ताव है लेकिन बीच रास्ते में या प्रस्तावित होने से पहले ही विफल हो जाती हैं। इसके पीछे कारण कई हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण समस्याओं के प्रति लापरवाही है और यह मानसिकता कि कार्य को तब तक नहीं करना है जब तक कि वह बहुत गंभीर न हो जाए।

क्या सोच रहे हैं विस्थापन की दहशत के बीच तमनार के लोग

जब तक हम इस पर विचार करना शुरू नहीं करते और विभिन्न हितधारकों को एक मंच पर नहीं लाते, तब तक ठोस कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या बनी रहेगी। अनौपचारिक कचरा बीनने वालों को भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। नई मशीनरी और कुशल तौर-तरीके  का इस्तेमाल करना होगा। इससे न केवल लोगों को रोजगार मिलेगा बल्कि ठोस कचरा प्रबंधन की समस्याओं में भी बहुत हद तक सुधार होगा। अनौपचारिक कचरा बीनने वालों को नगर पालिकाओं के तहत पंजीकृत किया जाना चाहिए। उन्हें पहचान पत्र प्रदान किए जाने चाहिए और न्यूनतम वेतन का प्रावधान होना चाहिए ताकि उनके लिए अपना कार्य ठीक से करना आसान हो सके।

सभी नगर पालिकाओं को अलग-अलग क्षेत्रों से एकत्र किए गए कचरे पर नज़र रखनी चाहिए। गीले और सूखे कचरे का अलग-अलग प्रबंधन करना चाहिए। वे इसे अलग-अलग वाहनों का उपयोग करके पूरा कर सकती हैं। सूखे और गीले कचरे के लिए या संग्रह के लिए एक ही वाहन में डिब्बे बनाकर भी इसे अच्छी तरह किया जा सकता है।

लैंडफिल लीचेट ट्रीटमेंट (साभार- गूगल)

आग की घटनाओं से बचने के लिए लैंडफिल मॉनिटरिंग आवश्यक है। लीचेट संग्रह का प्रावधान होना चाहिए क्योंकि यह भूजल और जल निकायों के लिए खतरनाक है।

अपशिष्ट से ऊर्जा, भस्मीकरण और कचरे से पैदा होने वाले ईंधन जैसी किसी भी विधि को नियोजित करने से पहले, कचरे की संरचना का अध्ययन करने की आवश्यकता है और बाद के चरणों की विफलता से बचने के लिए अपशिष्ट संरचना के अनुसार अधिक अनुकूल तरीकों को नियोजित किया जाना चाहिए।

इसके बावजूद, किसी भी परियोजना की सफलता के लिए लोगों के व्यवहार में परिवर्तन भी महत्वपूर्ण है। लोगों को प्रतिदिन अपने द्वारा उत्पन्न कचरे के प्रभाव पर विचार करने की आवश्यकता है।

 

 

 

पूजा यादव पर्यावरण सूक्ष्म जैवतंत्र शास्त्र की अध्येता हैं और फिलहाल मुंबई में प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट के क्षेत्र में काम कर रही हैं।

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  1. […] मुंबई : कूड़ा जो उड़ता और रिसता हुआ फैल रह… […]

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