निषाद संस्कृति की ध्वजवाहिका थीं बिलासा देवी केवट

लौटनराम निषाद

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छत्तीसगढ़ की वीरांगना बिलासा केवट जिनके नाम पर बसा है बिलासपुर शहर…

छत्तीसगढ़ में बिलासा एक देवी के रुप में देखी जाती हैं। कहते हैं कि उनके ही नाम पर बिलासपुर शहर का नामकरण हुआ। बिलासा केवटिन की एक आदमक़द प्रतिमा भी शहर में लगी हुई है। बिलासा देवी के लिए छत्तीसगढ़ के लोगों में, ख़ासकर केवट समाज में, बड़ी श्रध्दा है और इसका एक सबूत यह भी है कि छत्तीसगढ़ की सरकार हर वर्ष मत्स्य पालन के लिए एक लाख रुपये का बिलासा देवी पुरस्कार भी देती है। बिलासपुर एयरपोर्ट का नाम भी बिलासा देवी केवट एयरपोर्ट है।

भारतीय सभ्यता का प्रजातिगत इतिहास निषाद, आस्ट्रिक या कोल-मुण्डा से आरंभ माना जाता है। यही कोई चार-पांच सौ साल पहले, अरपा नदी के किनारे, जवाली नाले के संगम पर पुनरावृत्ति घटित हुई। जब यहां निषादों के प्रतिनिधि उत्तराधिकारियों केवट-मांझी समुदाय का डेरा बना। आग्नेय कुल का नदी किनारे डेरा। अग्नि और जल तत्व का समन्वय यानि सृष्टि की रचना। जीवन के लक्षण उभरने लगे। सभ्यता की संभावनाएं आकार लेने लगीं। नदी तट के अस्थायी डेरे, झोपड़ी में तब्दील होने लगे। बसाहट, सुगठित बस्ती का रूप लेने लगी। यहीं दृश्य में उभरी, लोक नायिका- बिलासा केवटिन। बिलासा केवटीन का गांव आज बिलासपुर जिले के नाम से विख्यात है। जो छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख नगर है।बिलासपुर व इसके अगले बगल के जिलों में निषाद-केवट, माँझी, मल्लाह, धीवर की अच्छी खासी आबादी का बसावट है।

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‘बिलासा देवी एक साहसी वीरांगना थीं। सोलहवीं शताब्दी में जब रतनपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी हुआ करती थी तो राजा कल्याण सहाय बिलासपुर के पास शिकार करते हुए खूंखार जंगली जानवरों के आक्रमण से घायल हो गए थे।उस समय बिलासा केवटिन ने उन्हें बचाया था।इससे खुश होकर राजा ने उन्हें अपना सलाहकार नियुक्त करते हुए नदी किनारे की जागीर उनके नाम लिख दी थी।’

आज से लगभग  300 साल पहले बिलासपुर शहर  नहीं था। निषाद संस्कृति के लोग नदी के किनारे बसा कराते थे। आखेटबाजी से अपने जीवन को एक दिशा देने के लिए काम करते थे।अपने जीवन के पारंपरिक कार्यों में आये दिन जंगलों में निवास के साथ जीवन उपार्जन के लिए शिकार के साथ मछली मारने के काम करते थे। उस समय की बात है जब छत्तीसगढ़ को  रतनपुरा के नाम से जाना जाता था। आरपा नदी के किनारे बसे निषाद संस्कृति के लोगों में विलासा भी रहा करती थीं। निषाद संस्कृति में महिला और पुरुष को समान अधिकार था जो एक दूसरे के साथ मिलकर शिकार करते थे। चाहे वह मछली मारना हो या जंगल की रक्षा करना हो। बंशी नामक युवक ने एक बार बिलासा को पानी में डूबने से बचाया था, तब से बंसी और बिलासा दोनों साथ रहते थे।  एक बार की बात है जब सभी लोग शिकार करने के लिए गए थे तो गाँव में कुछ महिला बच गई थीं। उसी समय जंगली सुअर ने हमला कर दिया था। तब बिलासा ने उसे मारने का काम किया। तब से विलासा का नाम पूरे गाँव में फैल गया।उस समय कल्याण साय  राजा ने एक बार शिकार करने के लिए गया और घनघोर जंगल में चला गया और सिपाही पीछे छुट गए।राजा एकेला पड़ गया । कुछ देर बाद प्यास लगने के बाद  नदी के किनार जाने लगा। तब तक जंगली सुअर ने उस पर हमला कर दिया। वह बड़ी ज़ोर ज़ोर से कराह रहा था। उस समय बिलासा  उसी रास्ते से आ रही थी। घायल देख राजा को गाँव ले गया । बिलासा ने उसकी बहुत सेवा किया । राजा के ठीक हो जाने के बाद बिलासा और बंसी को साथ ले गया, जहाँ पर बिलासा ने धनुष चला कर अपना करतब दिखाया, तो बंसी ने भाला फेक कर दिखाया । बिलासा खाली हाथ नहीं लौटी, जागीर ले कर लौटी।  जो आज धीरे –धीरे नगर का रूप ले लिया है। उसे बिलासपुर के नाम से जाना जाता है।

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बिलासपुर छत्तीसगढ़ प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा शहर आज महानगर का रूप ले रहा है। कलचुरी वंश की राजधानी रतनपुर बिलासपुर जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां महामाया देवी का मंदिर है। जो कि धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विख्यात है।  जिले की बाहरी सीमाएँ रायपुर, दुर्ग, जांजगीर, आदि हैं। जिले की स्थापना 18 मई 1998 में किया गया। इसी तरह बिलासा केंवटिन काव्य, संदिग्ध इतिहास नहीं, बल्कि जनकवि-गायक देवारों की असंदिग्ध गाथा है, जिसमें ‘सोन के माची, रूप के पर्रा’ और ‘धुर्रा के मुर्रा बनाके, थूंक म लाड़ू बांधै’ कहा जाता है। केंवटिन की गाथा, देवार गीतों के काव्य मूल्य का प्रतिनिधित्व कर सकने में सक्षम है ही, केंवटिन की वाक्‌पटुता और बुद्धि-कौशल का प्रमाण भी है। गीत का आरंभ होता है-

छितकी कुरिया मुकुत दुआर,

भितरी केंवटिन कसे सिंगार।

खोपा पारै रिंगी चिंगी, ओकर भीतर सोन के सिंगी।

मारय पानी बिछलय बाट, ठमकत केंवटिन चलय बजार।

आन बइठे छेंवा छकार,केंवटिन बइठे बीच बजार।

सोन के माची रूप के पर्रा, राजा आइस केंवटिन करा।

मोल बिसाय सब कोइ खाय, फोकटा मछरी कोइ नहीं खाय।

कहव केंवटिन मछरी के मोल, का कहिहौं मछरी के मोल।

आगे मछलियोँ के सोलह प्रजातियों- डंडवा, घंसरा,अइछा, सोंढ़िहा, लूदू, बंजू, भाकुर, पढ़िना, जटा चिंगरा, भेंड़ो, बामी, कारी‍झिंया, खोकसी, झोरी, सलांगी और केकरा- का मोल तत्कालीन समाज की अलग-अलग जातिगत स्वभाव की मान्यताओं के अनुरूप उपमा देते हुए, समाज के सोलह रूप-श्रृंगार की तरह, बताया गया है। सोलह प्रजातियों का ‘मेल’  मानों पूरा डिपार्टमेंटल स्‍टोर। लेकिन जिनका यहां नामो-निशान नहीं अब ऐसी रोहू-कतला-मिरकल का बोलबाला है और इस सूची की प्रजातियां, जात-बाहर जैसी हैं। जातिगत स्वभाव का उदाहरण भी सार्वजनिक किया जाना दुष्कर हो गया है क्योंकि तब जातियां, स्वभावगत विशिष्टता का परिचायक थीं। प्रत्येक जाति-स्वभाव की समाज में उपयोगिता, अतएव सम्मान भी था। जातिगतता अब सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक प्रस्थिति का हथियार बनकर, सामाजिक सौहार्द्र के लिए दोधारी छुरी बन गई है अन्यथा सुसकी, मुरहा, न्यौता नाइन, गंगा ग्वालिन, राजिम तेलिन, किरवई की धोबनिन, धुरकोट की लोहारिन, बहादुर कलारिन के साथ बिलासा केंवटिन परम्परा की ऐसी जड़ है, जिनसे समष्टि का व्यापक और उदार संसार पोषित है।

अरपा-जवाली संगम के दाहिने, जूना बिलासपुर और किला बना तो जवाली नाला के बायीं ओर शनिचरी का बाजार या पड़ाव, जिस प्रकार उसे अब भी जाना जाता है। अपनी परिकल्पना के दूसरे बिन्दु का उल्लेख यहां प्रासंगिक होगा- केंवट, एक विशिष्ट देवी ‘चौरासी’ की उपासना करते हैं और उसकी विशेष पूजा का दिन शनिवार होता है। कुछ क्षेत्रों में सतबहिनियां के नामों में जयलाला, कनकुद केवटी, जसोदा, कजियाम, वासूली और चण्डी के साथ ‘बिलासिनी’ नाम मिलता है तो क्या देवी ‘चौरासी’ की तरह कोई देवी ‘बिरासी’, ‘बिरासिनी’ भी है या सतबहिनियों में से एक ‘बिलासिनी’ है, जिसका अपभ्रंश बिलासा और बिलासपुर है। इस परिकल्पना को भी बौद्धिकता के तराजू पर माप-तौल करना आवश्यक नहीं लगा।

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आज भी बिलासा नामक वीरांगना के नाम पर कालेज बनाकर अलग अलग रूपों में पूरा सम्मान दिया जा रहा है।कालेज ,अस्पताल , रंगमंच, पार्क आदि बिलासा के नाम पर  है। निषाद संस्कृति की सभी उप जातियों के लिए सम्मान के साथ यह कहने के लिए नहीं थकते हैं कि बिलासपुर निषाद संस्कृति के पहचान के आयाम के रूप में है । निषाद संस्कृति को आज हम सब को तलास करने की जरूरत है। निषाद संस्कृति अपने देश को आगे बढ़ाने में महत्तवपूर्ण भूमिका के साथ देश के विकास में निषाद का सर्वोपरि योगदान है।

साहस और कर्तव्य निष्ठता की प्रतीक बिलासा देवी के जीवन संघर्ष से हमें प्रेरणा लेने की जरूरत है।

कहानी छत्तीसगढ़ की वीरांगना बिलासा की जिनके नाम पर बसा है बिलासपुर शहर

चकरभाठा एयरपोर्ट को बिलासा केवट एयरपोर्ट नाम दिया गया है। बिलासपुर शहर का नाम भी वीरांगना बिलासा के नाम पर रखा गया है। इतिहास खंगालकर वीरांगना बिलासा से जुड़े रोचक तथ्यों पर रिपोर्ट तैयार की है। देवार लोक गीतों में भी बिलासा के जीवन का वर्णन हुआ है।

ऐतिहासिक तथ्यों से मिली जानकारी के मुताबिक सदियों पहले परसूराम और बैशाखा बाई के घर बिलासा का जन्म हुआ था। बचपन से ही बिलासा में विलक्षण गुण दिखने लगे थे।बिलासा धर्म कर्म के कार्य के अलावा घरेलू कामों और शौर्य कला में निपुण थी। बिलासा कुश्ती, भाला, तलवारबाजी और नौकायन में भी पूर्ण पारंगत थी। बिलासा एक निडर युवती थी।

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कहानी छत्तीसगढ़ की उस वीरांगना की जिनसे है बिलासपुर की पहचान, गजेटियर में मिलता है। उल्लेख है कि बिलासपुर का नाम केंवटिन बिलासा के नाम पर रखा गया है।इसका जिक्र 1902 के गजेटियर में भी किया गया है। गजेटियर के एक अंश में 350 साल पहले एक मछुआरन बिलासा के नाम पर इस शहर के नामकरण होने की बात कही गई है।बिलासपुर को बिलासा नाम की एक केंवटिन के नाम पर रखा गया है। इस बात का जिक्र भूगोल की पुस्तकों में भी देखा गया है।जानकारों की मानें तो देवार लोकगीतों में भी बिलासा के जीवन का वर्णन हुआ है। बिलासा जहां रहती थी उस जगह बिलासपुर के पचरीघाट के रूप में जाना जाता है।पचरीघाट में ही बिलासा की समाधि भी बनी हुई है।बिलासा को लोग देवी स्वरूप पूजते भी हैं। लोक साहित्यों में बिलासा के कृतित्व का जिक्र किया गया है। जानकार बताते हैं कि बिलासा एक मजबूत इरादों वाली और प्रगतिशील मानसिकता वाली महिला थी।बिलासा ने कुरितियों और रूढ़िवादी मानसिकता पर भी करारा प्रहार किया था।

Bilasa and Bilaspur in Gazetteer

गजेटियर में बिलासा और बिलासपुरबिलासपुर एयरपोर्ट पर 50 जवान संभालेंगे सुरक्षाजानवरों से करती थी मुकाबलाउन दिनों बिलासपुर की जीवनदायिनी अरपा नदी के किनारे वन थे। नदी के आसपास वन्यजीवों का बसेरा भी रहता था।कहा जाता है कि उन दिनों महिलाओं को सिर्फ घर तक सीमित रखा जाता था, लेकिन बिलासा उन दिनों भी वीरता का परिचय देती थी।बिलासा जंगल की ओर कूच करती थी। हिंसक जानवरों से बचने के लिए बिलासा निपुणता से पारंपरिक हथियारों का इस्तेमाल करती थी। इस तरह बिलासा ने एक साहसी युवती के रूप में पहचान हासिल कर ली थी। बिलासा ने बचाई राजा की जान- ऐतिहासिक तथ्यों से मिली जानकारी के मुताबिक प्राचीनकाल में छत्तीसगढ़ की राजधानी रतनपुर हुआ करती थी।उन दिनों कल्चुरी शासक राजवंश का राजा कल्याण साय का शासन था। राजधानी दिल्ली में मुगल बादशाह जहांगीर सत्तासीन थे। उन दिनों वन पशुओं का शिकार करना राजा का प्रमुख शौक होता था।इसी शौक के कारण एक दिन राजा कल्याण साय अपने सैनिकों के साथ शिकार के लिए अरपा नदी के किनारे जंगल में पहुंचे। शिकार में मग्न एक वन्यजीव का पीछा करते-करते राजा घने जंगल में चले गए। उनके सैनिक पीछे छूट गए। राजा को अकेला देख वन्य जीवों ने उन पर हमला कर दिया। राजा जमीन पर गिर गए।बिलासा घोड़े की आवाज सुनकर जंगल की ओर भागी। उसने वन्यजीव का मुकाबला किया।बिलासा के पराक्रम की वजह से राजा जंगली जीवों के शिकार होने से बच गए।

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बिलासा के साहस से खुश होकर राजा कल्याण साय ने बिलासा का सम्मान किया। राजा के आदेश पर बिलासा को सैनिक वेशभूषा में घोड़े पर सवार होकर रतनपुर बुलाया गया।बिलासा के इस रूप का वर्णन समय-समय पर कवियों ने अपने-अपने शब्दों में किया है।सम्मान स्वरूप राजा ने बिलासा को अरपा नदी के दोनों किनारे की जागीर सौंप दी थी। इस तरह बिलासा अपने शौर्य और पराक्रम की वजह से एक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभर के सामने आईं। बिलासा के पराक्रम की धमक दिल्ली तक भी पहुंची थी।दिल्ली में दिखाया शौर्य तत्कालीन दिल्ली के शासक मुगल बादशाह जहांगीर ने रतनपुर के राजा को दिल्ली आमंत्रित किया। राजा कल्याण साय बिलासा और अपने पराक्रमी योद्धाओं के साथ दिल्ली पहुंचे। इस दौरान दिल्ली शासक के पराक्रमी योद्धाओं के साथ बिलासा का मुकाबला भी हुआ था।हर मुकाबले में बिलासा वीर साबित हुई। इस तरह बिलासा के पराक्रम की चर्चा दिल्ली तक पहुंच गई।

बताया जाता है कि एक बाहरी शासक ने बिलासा की नगरी पर आक्रमण कर दिया था। लड़ाई के दौरान बिलासा के पति और प्रधान सेनापति बंशी वीरगति को प्राप्त हुए थे। यह जानकारी जब बिलासा को मिली तो बिलासा खुद शत्रुओं से लड़ने के लिए मैदान में आ गई, लेकिन शत्रु सैनिकों की संख्या अधिक होने के कारण बिलासा भी वीरगति को प्राप्त हुई। राजा कल्याण साय को इस बात की जब जानकारी हुई तो बहुत दुखी हुए। उन्होंने अपने बड़े फौज के साथ बिलासपुर का मोर्चा संभाला और फिर दुश्मन को खदेड़ दिया। इस तरह वीरांगना बिलासा के नाम पर बिलासपुर शहर अस्तित्व में आया। बिलासपुर के लोग आज भी वीरांगना बिलासा को किसी ना किसी रूप में याद करते हैं।

निषाद संस्कृति का वृहद इतिहास नामक अप्रकाशित पुस्तक का अंश

लौटनराम निषाद तेज-तर्रार वक्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और राष्ट्रीय निषाद संघ के सचिव हैं।

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