Tuesday, August 25, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

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सवाल से भागता मुखिया, जवाब से कतराती सत्ता

ओस्लो की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उठे सवाल आज पूरे देश के लोकतंत्र का आईना बन गए हैं। एक अकेली विदेशी पत्रकार ने 1.45 अरब लोगों के प्रतिनिधि से पूछा — अभिव्यक्ति की आज़ादी कहाँ है? अल्पसंख्यक क्यों डरे हुए हैं? चुनाव आयोग कितना निष्पक्ष है? जवाब के बजाय खामोशी मिली। ये खामोशी 12 सालों से संसद, सड़क और मीडिया में गूँज रही है। जब 'विश्व लोकतंत्र की जननी' का दावा करने वाला देश सवाल से भागता है, तो 5,000 साल पुरानी सभ्यता भी सिर झुका लेती है। आपातकाल के 21 महीनों को कोसने वाले, बिना घोषणा के 12 साल से प्रेस का गला घोंट रहे हैं। सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं - हर उस आवाज़ का है जिसे दबाया जा रहा है। लोकतंत्र पूछ रहा है - डर किसे है?

तेईस मार्च को भगत सिंह और लोहिया को याद करने के मायने

डॉ. राम मनोहर लोहिया फ़ासीवाद, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद-विरोधी थे लेकिन समाजवाद के समर्थक थे। डॉ लोहिया का जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ एक गहरा बौद्धिक और वैचारिक जुड़ाव था। इसी प्रभाव के चलते, 1934 में जर्मनी से लौटने के बाद, उन्होंने (24 वर्ष की आयु में) 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया। वे इसकी कार्यकारिणी समिति के सदस्य बने और पार्टी के मुखपत्र, 'कांग्रेस सोशलिस्ट' के संपादक नियुक्त किए गए। आज उनकी 116 वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख। 

क्या भारत के पहले आदिवासी राष्ट्रपति संविधान की रक्षा करेंगे या चुप्पी साध लेंगे?

माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, आपके होम स्टेट ओडिशा में – नियमगिरी, गोपालपुर और पूरे दंडकारण्य में – आदिवासी कितने सालों से नुकसान पहुंचाने वाले डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स का विरोध कर रहे हैं। भारत की आबादी में आदिवासी सिर्फ़ 8-9% हैं, लेकिन आज़ादी के बाद से डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स की वजह से बेघर हुए लोगों में वे 75% हैं। उनके विरोध को नक्सलवाद का लेबल लगाकर कुचला जा रहा है। आपके साइन लेने और संविधान बनाने वालों द्वारा आदिवासियों को दिए गए खास अधिकारों को खत्म करने के लिए आदिवासी समुदाय की एक महिला को सबसे ऊंचे पद पर बिठाने की साज़िश है। मैं यह खुला खत खास तौर पर, श्रीमती द्रौपदी मुर्मू, इस साज़िश से सावधान करने के लिए लिख रहा हूं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस : एपिस्टन फाइल के शिकारियों के देश में महिलाओं के सामने अभी भी कई पहाड़

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 115 साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन दुनिया भर में पुरुष-प्रधान सोच अभी भी कायम है। ताकतवर नेताओं और उद्योगपतियों से जुड़े एपस्टीन के खुलासे हमें याद दिलाते हैं कि कितनी आसानी से महिलाओं के साथ आज भी मज़े की चीज़ जैसा बर्ताव किया जाता है। जब तक महिलाओं को मर्दों की खुशी के लिए सामान समझा जाता रहेगा, तब तक असली आज़ादी नामुमकिन रहेगी। पढ़िए डॉ सुरेश खैरनार का यह लेख।

अंध भक्त ही नहीं, अपशब्द और नफरती भाषण देने में सर्वोच्च नेता भी पीछे नहीं

देश में नफरत फैलाने वालों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है, यहां तक ​​कि केंद्र सरकार ने हाल ही में भारत मंडपम में सनातन राष्ट्र शंखनाद की बैठक के लिए 63 लाख रुपए दिए। इस कार्यक्रम में मुसलमानों के खिलाफ भाषण दिए गए, जिनका मुख्य विषय हिंदू राष्ट्र की मांग था। मुंबई स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज्म द्वारा प्रस्तुत एक हालिया अध्ययन में घृणास्पद भाषणों के प्रकारों और विवरणों का गहन विश्लेषण किया गया है। इस अध्ययन के अनुसार, 2024 से 2025 के बीच घृणास्पद भाषणों की संख्या में कमी आई है। रिपोर्ट में सामने आया है कि सबसे अधिक घृणास्पद भाषण महाराष्ट्र सरकार में मत्स्य एवं बंदरगाह विकास मंत्री नितेश राणे (10) ने दिए, उसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (6), असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पांच-पांच भाषण दिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन घृणास्पद भाषण दिए।

बरगढ़ किसान महापंचायत : अनियंत्रित कारपोरेट लूट और संकट में पड़ते जा रहे किसानों के सवाल पर भारी जुटान

विगत दिनों कृषि संकट के साथ ही दूसरे ज्वलंत मुद्दों पर बरगढ़ में राज्य भर से भारी संख्या में आए किसानों की महापंचायत हुई। महापंचायत में आए किसान नेताओं ने किसानों से अपने अधिकारों और आत्मरक्षा के लिए बड़े संघर्ष के लिए तैयार रहने का आह्वान किया है।

औरंगजेब पर हमला : एक सुनियोजित सांप्रदायिक एजेंडा जो नपुंसक फासिस्ट ताकतों को कुछ देर तक बहादुर बना सकता है

फिल्म छावा प्रदर्शित होने के बाद औरंगजेब को कब्र से निकालकर पुन: मारने की साजिश में सांप्रदायिक दंगों को हथियार बनाया जा रहा है। सवाल न भी उठाया जाए तब भी सभी जानते हैं कि इस साजिश को योजनाबद्ध तरीके से करने में किसका हाथ है। संघी हिंदू राष्ट्र का सपना देखते हुए इतिहास को गलत तरीके से प्रस्तुत कर युवाओं का ब्रेन वाश कर रहे हैं। यही कारण है कि युवा साहस के साथ गुंडागर्दी करने में सबसे आगे हैं। इस तरह की स्थिति सोचने को विवश करती है कि आखिर यह देश कहाँ पहुँच गया है?

कानून की मौजूदा व्यवस्था में छोटे उल्लंघन और गंभीर अपराध सब धान बाइस पसेरी के भाव तौले जा रहे हैं

 खराब कानून गरीब लोगों को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं, क्योंकि वे पुलिस और छोटी अदालतों की शक्ति के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं। भारतीय न्यायिक व्यवस्था में न्याय प्रणाली का लंबे समय तक अटके रहने के कारण ध्वस्त होती नज़र आ रही हैं। साथ ही अपराधों की परिभाषा में स्पष्टता नहीं होना, सजा में असमानता, पीड़ितों को उपेक्षित करने के कारण विश्वसीनयता में कमी आई है। लेकिन केंद्र सरकार के स्तर पर हाल ही में घोषित जनविश्वास विधेयक 2, जिसके बाद जल्द ही विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा जनविश्वास 3 विधेयक पेश किए जाने पर क्या बदलाव होंगे, यह तो आने वाला समय बताएगा। 

संघ की राजनीति ने देश में सांप्रदायिक ताकतों को मुसलमानों पर हमले की दी  छूट 

वर्ष 2014 के बाद भारत की धर्ननिरपेक्षता पर लगातार हमला हुआ है। देश में हिंदुत्ववादी विचारधारा ने लगातार सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश की है। रोजाना एक-दो खबरें सुनाई दे रही हैं। केवल पुलिस-प्रशासन ही नहीं बल्कि जनप्रतिनिधि भी गैर जिम्मेदाराना बयान दे आग भड़का रहे हैं।

बस्तर में लोकतन्त्र कुचलने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों एक हैं : रघु मीडियामी की गिरफ़्तारी से उठते सवाल

रघु मीडियामी की वकील शालिनी गेरा का कहना है कि बस्तर के जन आंदोलनों को कुचलने के लिए ही रघु की फर्जी केस में गिरफ्तारी की गई है, क्योंकि जिन प्रतिबंधित 2000 रूपये के नोटों को रखने और प्रतिबंधित माओवादी संगठनों को धन वितरित करने के आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया है, संबंधित एफआईआर में भी उसका कोई जिक्र नहीं है। उल्लेखनीय है कि इसके पहले भी सरजू टेकाम और सुनीता पोटाई नामक मंच के दो कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है, जो बस्तर में संसाधनों की लूट के खिलाफ जारी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे।

पीयूसीएल के पूर्व अध्यक्ष और नागरिक अधिकार कार्यकर्त्ता रविकिरण जैन की याद में स्मृति-सभा का आयोजन

मानवाधिकार कार्यकर्त्ता व समाजवादी चिंतक एवं पेशे से वकील श्री रविकिरण जैन की स्मृति-सभा की शुरुआत उनके छायाचित्र पर माल्यार्पण से हुई। वक्ताओं ने रविकिरण जैन के बचपन और उन पर पड़े भारत छोड़ो आंदोलन के प्रभाव, छात्र-राजनीति में सक्रियता एवं वकील के रूप में मानवाधिकारों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को याद किया। 
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