भारत की राजनीतिक पार्टियाँ को लैंगिक समानता पाने में सदियों !

एच.एल . दुसाध

1 314

 2022 में देश के पांच राज्यों – उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर- में होने वाले विधानसभा चुनाव की तिथियाँ घोषित हो चुकी हैं. इसके साथ हीसभी पार्टियाँ एक बार फिर आधी आबादी को अपने पक्ष में करने के लिए जुट गयी हैं.बहरहाल सभी राज्यों में यदि महिलाओं की कॉमन समस्या देखी जाय तो नजर आएगी कि  महिला सुरक्षा और रोजगार ही भारत की आधी आबादी की पुरानी और मुख्य समस्या है। इन्हीं समस्यायों को निजात दिलाने का वादा करके राजनीतिक पार्टियाँ उनको अपने पक्ष में खींचने का जुगत भिड़ाती  रहती हैं। अभी 5 राज्यों के चुनावों में पार्टियों ने अपने घोषणापत्र जारी नहीं किये हैं, लेकिन जब घोषणापत्र जारी होने शुरू होंगे तो देखा जायेगा कि तमाम पार्टियों का ही घोषणापत्र आधी आबादी को मुख्यतः सुरक्षा और रोजगार से निजात दिलाने पर केन्द्रित हैं। ऐसे में अतीत के अनुभव पर कहा जा सकता है कि हमारी राजनीतिक पार्टियां एक बार फिर महिलाओं को स्वरोजगार और उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए कम ब्याज पर ऋण; छात्राओं को निशुल्क शिक्षा और मुक्त की साइकल-स्कूटी; छात्राओं  और महिलाओं के लिए होस्टल, सांसद -विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करवाने में एक दूसरे से होड़ लगाएंगी। साथ ही होड़ लगाएंगी  बालिका भ्रूण- हत्या, दहेज़, बाल-विवाह, घरेलू हिंसा की रोकथाम के लिए बने कानूनों को कड़ाई से लागू करने; महिला उत्पीड़न के मामलों को त्वरित गति से निष्पादन करने तथा उनके विरुद्ध होने वाले अपराधों पर रोकथाम के लिए महिला थानों के गठन जैसी लोकप्रिय घोषणायें करने में। कुछ पार्टियाँ सरकारी नौकरियों में उनको एक तिहाई आरक्षण देने की घोषणा करने में भी होड़ लगा सकती हैं।

2021 में जो रिपोर्ट आई है उसमे दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। भारत रैंकिंग में 156 देशों में 140वें स्थान पर रहा, जबकि बांग्लादेश 65वें, नेपाल 106वें, पाकिस्तान 153वें, अफगानिस्तान 156वें, भूटान 130वें और श्रीलंका 116वें स्थान पर ।रिपोर्ट में नंबर एकपर आइसलैंड, दो पर फ़िनलैंड, तीसरे पर नार्वे , चौथे पर न्यूजीलैंड और 5 वें पर स्वीडेन रहा.इससे पहले 2020 में भारत 153 देशों में 112वें स्थान पर था।

बहरहाल भारतीय राजनीतिक दलों ने अबतक आधी आबादी के लिए जो कुछ किया है,उसका परिणाम इस रूप में आया है कि महिला सशक्तिकरण के मोर्चे पर भारत बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका , म्यांमार इत्यादी अपने दुर्बल प्रतिवेशी देशो से भी पिछड़ता गया है। और लगातार पिछड़ते -पिछड़ते आज  इसकी स्थिति कितनी कारुणिक हो गयी है कि  वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम द्वारा अप्रैल  2021 में प्रकाशित  ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट– 2021 देखकर राष्ट्र स्तब्ध है। 2006 से प्रकाशित हो रही वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम(डब्ल्यूईई) रिपोर्ट में स्वास्थ्य, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति के क्षेत्र में महिलाओं और पुरुषों के मध्य सापेक्ष अंतराल में हुई प्रगति का आकलन किया जाता है। यह आकलन चार आयामों- आर्थिक भागीदारी और अवसर,शिक्षा का अवसर, स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता और राजनीतिक सशक्तीकरण- के आधार पर किया जाता है ताकि इस वार्षिक रिपोर्ट के आधार पर प्रत्येक देश स्त्री और पुरुषों के मध्य बढती असमानता की खाई को पाटने का सम्यक कदम उठा सके। 2021 में जो रिपोर्ट आई है उसमे दक्षिण एशियाई देशों में भारत का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। भारत रैंकिंग में 156 देशों में 140वें स्थान पर रहा, जबकि  बांग्लादेश 65वें, नेपाल 106वें, पाकिस्तान 153वें, अफगानिस्तान 156वें, भूटान 130वें और श्रीलंका 116वें स्थान पर ।रिपोर्ट में नंबर एकपर आइसलैंड, दो पर फ़िनलैंड, तीसरे पर नार्वे , चौथे पर न्यूजीलैंड और 5 वें पर स्वीडेन रहा.इससे पहले 2020 में भारत 153 देशों में 112वें स्थान पर था।

भारत सहित पूरे में विश्व में लैंगिक असमानता का सम्बन्ध मानव जाति की उस सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से है, जिसकी उत्पत्ति शक्ति के स्रोतों – आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक- के विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से होती रही है। जहाँ तक शक्ति के स्रोतों के बंटवारे का सवाल है, हजारों साल से ही दुनिया के हर देश का शासक वर्ग कानून बनाकर शक्ति के स्रोतों का वितरण करता रहा है।

भारत के लगातार पिछड़ते जाने के कारणों पर प्रकाश डालते हुए ग्लोबल जेंडर गैप- 2021 की  रिपोर्ट में कहा गया है,’ इस साल भारत का जेंडर गैप 3% बढ़ा है। अधिकांश कमी राजनीतिक सशक्तीकरण उप-सूचकांक पर देखी गई है, जहां भारत को 5 प्रतिशत अंक का नुकसान हुआ हैं। 2019 में महिला मंत्रियों की संख्या 23.1% से घटकर 9.1% हो गई है। महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर में भी कमी आई है, जो 8% से घटकर 22.3% हो गई है। पेशेवर और तकनीकी भूमिकाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी घटकर 2% रह गई।वरिष्ठ और प्रबंधकीय पदों पर भी महिलाओं की हिस्सेदारी कम है। इनमें से केवल 6% पद महिलाओं के पास हैं और केवल 8.9% फर्म महिला शीर्ष प्रबंधकों के पास हैं।भारत में महिलाओं द्वारा अर्जित आय पुरुषों द्वारा अर्जित की गई केवल 1/5वीं है। इसने भारत को वैश्विक स्तर पर बॉटम 10 में रखा है।महिलाओं के खिलाफ भेदभाव, स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत को निचले पांच देशों में स्थान दिया गया है। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट- 2021 में एक बेहद चौकाने वाला अध्ययन भी आया है, जिसमें  बतलाया गया है कि पूरे विश्व में लैंगिक समानता का लक्ष्य पाने में 135 वर्ष लग जायेंगे। 2020 की रिपोर्ट में इसके लिए 100 साल का कयास लगाया गया था. बहरहाल यह कयास उन देशों की महिलाओं को ध्यान में रखकर लगाया गया है, जो लैंगिक समानता के मामले में भारत से काफी आगे हैं. ऐसे में अगर विश्व के दूसरे देशों को लैंगिक समानता हासिल करने में 135 वर्ष लगेंगे तो भारत जैसे अनग्रसर देश को 150 साल से भी ज्यादा लग जायेंगे, यह मानकर चलना चाहिए। और लैंगिक समानता हासिल करने लिए यदि भारत को डेढ़ सौ से भी ज्यादे साल लगने हैं तो मान लेना पड़ेगा कि देश की आधी आबादी की समस्या भयावह रूप से चिंताजनक हैं, जिसे लेकर राजनीतिक दलों को पहले के मुकाबले कई गुना गंभीर होना होगा तथा इससे उबरने के लिए कुछ विशेष कदम उठाने होंगे.इसके लिए सबसे पहले भारत में लैंगिक असमानता की उत्पत्ति के कारणों का नए सिरे से संधान करना होगा, तभी निराकरण का सम्यक उपाय हो पायेगा।

यह भी पढ़िये:

 स्वामी प्रसाद मौर्य के इस्तीफे के मायने

भारत सहित पूरे में विश्व में लैंगिक असमानता का सम्बन्ध मानव जाति की उस सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी से है,  जिसकी उत्पत्ति शक्ति के स्रोतों – आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षिक और धार्मिक- के विभिन्न सामाजिक समूहों और उनकी महिलाओं के मध्य असमान बंटवारे से होती रही है। जहाँ तक शक्ति के स्रोतों के बंटवारे का सवाल है, हजारों साल से ही दुनिया के हर देश का शासक वर्ग कानून बनाकर शक्ति के स्रोतों का वितरण करता रहा है। पर, यदि हम यह जानने का प्रयास करें कि सारी दुनिया के शासकों ने किस पद्धति का अवलंबन कर शक्ति के स्रोतों का असमान बंटवारा कराया तो हमें विश्वमय एक विचित्र एकरूपता दिखती है। हम पाते हैं कि दुनिया के सभी शासक ही शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता का असमान प्रतिबिम्बन करा कर ही, इस समस्या की सृष्टि करते रहे है। शक्ति के स्रोतों में सामाजिक और लैंगिक विविधता के असमान प्रतिबिम्बन से ही मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या, आर्थिक और सामजिक गैर-बराबरी के साथ लैंगिक असमानता की सृष्टि होती है, पूरा विश्व इसकी ठीक से उपलब्धि बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही  कर पाया।  इसकी सत्योपलब्धि करके  ही विषमता-मुक्त समाज बनाने व आधी आबादी को उसका प्राप्य दिलाने के लिए बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया , मलेशिया इत्यादि ने अपने-अपने देश में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन में होड़ लगाया और दुनिया को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाया। ऐसा करते हुये ये  देश अपने यहाँ विद्यमान विविध समूहों के स्त्री और पुरुषों के संख्या अनुपात में शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी देने लगे। इसका उज्ज्वलतम दृष्टान्त अमेरिका में स्थापित हुआ जहाँ शक्ति के समस्त स्रोतों में अनिवार्य रूप से डाइवर्सिटी पॉलिसी(विविधता नीति) लागू होने से वहां के वंचित नस्लीय समूहों- हिस्पैनिक, रेड इंडियंस, अफ़्रीकी मूल के कालों इत्यादि- के साथ हर नस्लीय समूहों की आधी आबादी को शक्ति के स्रोतों में वाजिब अवसर मिलने लगा. इसी तरह दूसरे सभ्यतर देश भी अनिवार्य रूप से शक्ति के समस्त स्रोतों में महिलाओं के रूप में विद्यमान आधी आबादी को उनकी हिस्सेदारी देने लगे . इस तरह वहां महिला सशक्तिकरण का दौर चल पड़ा और महिलाएं बिना किसी भेदभाव के पुरुषों के समान सिर्फ नौकरियों और राजनीति की संस्थाओं में ही नहीं सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, फिल्म –मीडिया इत्यादि में अवसर मिलने लगा. इससे वैसे देश वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम द्वारा निर्धारित चारों आयामों-आर्थिक भागीदारी और अवसर,शिक्षा का अवसर,स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता और राजनीतिक सशक्तीकरण- पर खरा उतरने लगे। किन्तु भारत में ऐसा इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि यहाँ के शासकों ने शक्ति के स्रोतों में लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन पर काम ही नहीं किया। बहरहाल भारत के राजनीतिक दल यदि 150 सालों में अर्जित होने वाली लैंगिक समानता को  महज कुछेक दशकों के मध्य ही हासिल करना चाहते हैं तो निम्न क्षेत्रों में सामाजिक के साथ लैंगिक विविधता लागू करने की बात अपने घोषणापत्रों में शामिल करें-

विषमता-मुक्त समाज बनाने व आधी आबादी को उसका प्राप्य दिलाने के लिए बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया , मलेशिया इत्यादि ने अपने-अपने देश में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन में होड़ लगाया और दुनिया को बेहतर बनाने का रास्ता दिखाया। ऐसा करते हुये ये देश अपने यहाँ विद्यमान विविध समूहों के स्त्री और पुरुषों के संख्या अनुपात में शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी देने लगे।

1-सेना व न्यायालयों सहित सरकारी और निजीक्षेत्र की सभी स्तर की,सभी प्रकार की नौकरियों व धार्मिक प्रतिष्ठानों;2-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा दी जानेवाली सभी वस्तुओं की डीलरशिप; 3-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा की जानेवाली सभी वस्तुओं की खरीदारी; 4-सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग,परिवहन; 5-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा चलाये जानेवाले छोटे-बड़े स्कूलों, विश्वविद्यालयों, तकनीकि-व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं के संचालन,प्रवेश व अध्यापन; 6-सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा अपनी नीतियों, उत्पादित वस्तुओं इत्यादि के विज्ञापन के मद में खर्च की जानेवाली धनराशि; 7-देश –विदेश की संस्थाओं द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं (एनजीओ)को दी जानेवाली धनराशि; 8-प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मिडिया एवं फिल्म-टीवी के सभी प्रभागों; 9-रेल-राष्ट्रीय मार्गों की खाली पड़ी भूमि सहित तमाम सरकारी और मठों की खली पड़ी जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अस्पृश्य-आदिवासियों में वितरित हो एवं 10-ग्रामपंचायत, शहरी निकाय, संसद-विधासभा की सीटों; राज्य एवं केन्द्र की कैबिनेट;विभिन्न मंत्रालयों के कार्यालयों; विधान परिषद-राज्यसभा;राष्ट्रपति,राज्यपाल एवं प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री के कार्यालयों के कार्य बल इत्यादि में!

उपरोक्त क्षेत्रों में सामाजिक के साथ लैंगिक विविधता लागू करने पर भारत की महिलाएं पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर मिलिट्री, पुलिस, न्यायपालिका, सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों, राजनीति की समस्त संस्थाओं, समस्त व्यवसायिक गतिविधियों इत्यादि में पुरुषों के साथ कन्धा से कन्धा मिलाकर चलने लगेंगी. तब देश न सिर्फ 150 के बजाय 50 वर्षों में ही लैंगिक असमानता की समस्या से पार पा लेगा, बल्कि आर्थिक और सामाजिक विषमता-जन्य बाकी समस्यायों पर भी विजय पा लेगा।

दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कैसे हो संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक हैं।

Leave A Reply

Your email address will not be published.