हमारा दुख है पानी की बोतल उनका संघर्ष पहाड़ सरीखा

डॉ. गुलाबचन्द  यादव

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डॉ. गुलाबचन्द  यादव (जन्म 1 जनवरी 1965) जाने-माने हिन्दी गद्यकार हैं जिनके यात्रा वृत्तान्त आज के ग्रामीण मन-मिजाज की बहुत संवेदनशील आईनादारी करते हैं। वे दूर-दराज के इलाकों में घूमने और लोगों से मिलने-जुलने में बहुत दिलचस्पी ही नहीं रखते बल्कि यथासंभव उनके दुख-सुख में शामिल भी होते हैं। यात्रा के दौरान वे सहयात्रियों से घुल-मिल जाते के अपने स्वाभाविक गुण के कारण उनके जीवन और गतिविधियों का आसानी से आकलन कर लेते हैं । उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के कूसा गाँव में जन्मे गुलाब जी फिलहाल आईडीबीआई बैंक, मुंबई में  उपमहाप्रबन्धक (राजभाषा) हैं। उनकी दो किताबें क्षमा करें, मैं हिन्दी अखबार नहीं पढ़ता  और आधे रास्ते का सफर प्रकाशित हो चुकी । आज बुधवार से हम उनके यात्रा वृत्तांतों का साप्ताहिक अंतराल पर प्रकाशन करेंगे। प्रस्तुत है इस शृंखला की पहली कड़ी –                                                                                           

वह 25 नवंबर 2019 का दिन था। मैं सुबह 7.30 बजे लखनऊ से प्रयागघाट आनेवाली इंटरसिटी से प्रयाग आया था जहाँ मेरे मित्र श्री महेंद्र कुमार जी रहते हैं। इंटरसिटी 1 घंटे 10 मिनट की देरी से दोपहर 12.40 बजे प्रयाग पहुँची थी। मैंने महेंद्र भाई के घर पर स्नान कर दोपहर का भोजन किया। सवा दो बजे हम इलाहाबाद के नवाब यूसुफ मार्ग स्थित रेलवे अधिकारी आवास जाने के लिए निकल पड़े जहाँ हमारे एक परिचित श्री रामबली यादव रहते हैं। श्री यादव मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं। हमने उनसे मुलाकात की और उन्हीं के यहाँ चायपान भी हुआ। वहाँ से लगभग 3.45 बजे हम निकल पड़े और इलाहाबाद जंक्शन आ गए। मेरी ट्रेन लगभग 45 मिनट लेट थी। अतः मैंने दोनों मित्रों को प्रणाम कर उनसे विदा ली और प्लेटफॉर्म नंबर 7-8 पर आ गया।

कामायनी एक्सप्रेस के प्लेटफॉर्म नंबर 8 पर आने की घोषणा हो रही थी। जंक्शन पर आकर मैंने प्लेटफॉर्म नंबर 7-8 पर मौजूद रेलवे के एक अधिकृत वेंडर से ‘रेल नीर’ की एक लीटर वाली पानी की बोतल खरीदी। चूँकि मुझे उस समय प्यास नहीं लगी थी इसलिए मैं बोतल लेकर कामायनी एक्सप्रेस (मुंबई से वाराणसी जानेवाली) में बीच की किसी बोगी में बैठने के लिए आगे बढ़ गया। ट्रेन देर से आई थी। कामायनी एक्सप्रेस लगभग 50 मिनट विलंब से यानी 4.45 बजे इलाहाबाद से रवाना हुई थी। इस ट्रेन से यात्रा करनेवाले यात्रियों में से लगभग 40 फीसदी इलाहाबाद ही उतर जाते हैं। यह गाड़ी इलाहाबाद से चलने के बाद वाराणसी के पहले केवल 6 स्टेशनों यथा- फूलपुर, जंघई, सुरियावां, भदोही, परसीपुर और सेवापुरी पर ही रुकती है। मुझे परसीपुर उतरना था। मैं एस-5 कोच की 1 नम्बरवाली सीट पर जाकर बैठ गया क्योंकि इस सीट का यात्री इलाहाबाद में उतर गया था। ट्रेन के खुलने के बाद मैंने दवा की गोली खाने के लिए बोतल का ढक्कन घुमाया तो पाया कि उसकी सील पहले से टूटी हुई है। मुझे चूँकि दवा की गोली खानी थी इसलिए मुँह में गोली डालने के बाद एक घूँट पानी पिया। स्वाद से तुरंत पता लग गया कि यह तो मिनरल पानी न होकर साधारण नल का पानी था। मैंने बोतल तुरंत बाहर फेंक दी।

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ट्रेन खुल चुकी थी और मुझे वेंडर/स्टाल का नाम याद नहीं था (जो कि शायद किसी के लिए भी संभव नहीं है) अतः सिवाय कुढ़ने और उस नामुराद को कोसने-गरियाने के और कुछ नहीं किया जा सकता था। शासन-प्रशासन चाहे जिस किसी पार्टी का हो, पारदर्शिता और कड़े कानूनो- दिशा-निर्देशों की चाहे कितनी भी बातें और प्रचार हो, सचाई यही है कि भ्रष्टाचार और बेईमानी हमारे देश मे कम होने की बजाए दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों में यह धतकरम थोड़ा कम देखने को मिलता है किंतु यूपी और बिहार…बस अल्लाह ही मालिक है।

मन में यह प्रश्न कुरेदने लगा कि रेल यात्राओं में इस धोखाधड़ी से कैसे पार पाया जाए? एक उपाय यह हो सकता है कि हम जब भी रेलवे स्टालों से बोतलबंद पानी खरीदें तो वहीं पर ढक्कन घुमाकर चेक कर लें कि बोतल की सील टूटी तो नहीं है। यदि आप स्टॉल पर दूषित पानी युक्त ऐसी टूटी सील वाली बोतलें पाएं तो तुरंत विरोध करें, थोड़ा हंगामा करें, अपने मोबाइल से बोतल और ठेकेदार की नाम पट्टिका की फोटो खींचे, स्टाल पर खड़े व्यक्ति का भी नाम पूछें और उसकी भी फोटो खींच लें। संभव हो तो ट्विटर, ईमेल आदि के जरिए रेल मंत्रालय से शिकायत भी करें। हमारी आपकी जागरूकता और सतर्कता ही लूट की ऐसी घटनाओं पर कुछ अंकुश लगा सकती है।

शुद्ध पानी की असली बोतल के स्थान पर नकली यानी साधारण पानी की बोतल पकड़ाकर ठगे जाने की जाने से उपजी पीड़ा और संताप सुरियावां आते-आते बहुत कम हो गया था क्योंकि उस अनुभव को अपने सुझाव के साथ  मैंने वॉट्सएप के जरिए अपने मित्रों/शुभचिंतकों से साझा कर लिया था। इलाहाबाद के बाद बाकी बचे यात्रियों में से कई फूलपुर और जंघई उतर गए। दिन में मौसम आश्चर्यजनक रूप से थोड़ा गर्म था। मैंने हॉफ स्वेटर पहना हुआ था और डिब्बे के पंखे भी चल रहे थे किंतु इसके बावजूद गर्मी का एहसास हो रहा था। तंग आकर मैंने स्वेटर उतारकर सीट पर रख लिया। सर्दियों में उत्तर भारत में सूर्यास्त जल्दी हो जाता है और शाम के साढ़े पांच बजे ही मानो रात हो जाती है।

ट्रेन खुल चुकी थी और मुझे वेंडर/स्टाल का नाम याद नहीं था (जो कि शायद किसी के लिए भी संभव नहीं है) अतः सिवाय कुढ़ने और उस नामुराद को कोसने-गरियाने के और कुछ नहीं किया जा सकता था। शासन-प्रशासन चाहे जिस किसी पार्टी का हो, पारदर्शिता और कड़े कानूनो- दिशा-निर्देशों की चाहे कितनी भी बातें और प्रचार हो, सचाई यही है कि भ्रष्टाचार और बेईमानी हमारे देश मे कम होने की बजाए दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है। महाराष्ट्र और दक्षिण के राज्यों में यह धतकरम थोड़ा कम देखने को मिलता है किंतु यूपी और बिहार...बस अल्लाह ही मालिक है।

रात घिर आई थी और सुरियावां स्टेशन आ गया जहाँ कुछ और यात्री उतर गए। मेरी सीट दरवाजे के पास थी। मैंने देखा कि मुसहर (वनवासी) समुदाय के 6-7 लोगों का एक झुंड साड़ी में बँधे अपने 2-3 गट्ठरों के साथ हमारे कोच में घुस आया और गट्ठरों को आसपास उपलब्ध स्थानों पर रख दिया। वे कुल 7 जन थे जिनमें से दो 55-60 वर्ष की दो प्रौढ़ाएँ, दो युवतियां, एक नौजवान, एक किशोर और एक बालक था। दोनों युवतियां, नौजवान और किशोर दरवाजे के पास ही सिमट-सिकुड़कर बैठ गए किंतु एक प्रौढ़ाऔर वह बालक मेरे सीट के सामने आकर खड़े हो गए। मैंने अपने पैर सिकोड़कर उन्हें अपनी सीट पर बिठा लिया। दूसरी प्रौढा भी सामने वाली सीट के कोने पर बैठ गई। बैठने के बाद दोनों की सुखा-दुखा शुरू हो गई।

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अब मौसम में सर्दी घुलने लगी थी। मैंने अपने स्वेटर को फिर से पहन लिया। वह छोटा बच्चा मेरे पास बैठा था जिसने ठंड से बचने के लिए अपने कानों के इर्द-गिर्द चुनरीनुमा गमछा लपेट रखा था। नौजवान ने सस्ती सी जैकेट पहन रखी थी और महिलाओं में से केवल 2 के पास ही सस्ते दाम वाली शॉल थी। उनकी गठरियों में से महुआ के ताजे हरे पत्ते झाँक रहे थे मानो वे आसपास का मुआयना कर रहे हों और चिंतन कर रहे हों कि आज की रात कैसे कटेगी। ये लोग मुसहर (वनवासी) समुदाय से थे जो अनुसूचित जनजाति वर्ग में आते हैं।

मैं पिछले लगभग 40 वर्षों से अपने प्रवासों के दौरान देखता आ रहा हूँ कि मुसहर समुदाय अभी भी विकास की मुख्यधारा से कोसों दूर है। भूमिविहीन और घुमंतू प्रवृत्ति वाले इस समुदाय के लोग बस जैसे-तैसे गुजर-बसर कर रहे हैं और टाट-फूस की झोपड़ियों में रहते हैं। लगभग 3 दशक पहले जब हमारे अंचल में विवाह आदि प्रयोजनों के लिए पालकी, डोली और असवारी का प्रचलन था तो उन्हें ढोने का काम मुसहर लोग ही करते थे। साथ ही वे जंगली पेड़ों और महुआ के पत्तों से दोने और पत्तल बनाया करते थे जिनका प्रयोग तेरही, भंडारा, भोज-भात, विवाह आदि अवसरों पर अनिवार्य रूप से होता था। किंतु प्लास्टिक और थर्मोकोल से बनी प्लेटों, थालियों और कटोरियों के बढ़ते प्रचलन के चलते वृक्षों के पत्तों से बनी पत्तलों और दोनों का मानो उठान सा ही हो गया है। परिणाम यह हुआ है कि मुसहर समुदाय के हजारों लोगों के रोजगार का मुख्य जरिया ही बंद होने के कगार पर पहुँच गया है। अब इस समुदाय के लोग मुख्य रूप से ईंट भट्ठों पर काम कर रहे हैं जहाँ इन्हें कड़ी मेहनत करने के बावजूद कम मजदूरी मिलती है और इनका शोषण भी होता है। कुछ लोग साइकिल रिक्शा या ठेलागाड़ी चला रहे हैं तो कुछ निर्माण कार्यों में बेगारी कर जीवन यापन कर रहे हैं। आज भी इस समुदाय में शिक्षा का प्रचार-प्रसार बहुत ही कम है। शिक्षा के लिए इनमें जागरूकता का अभाव है और आर्थिक सामर्थ्य तो न के बराबर है। इस समुदाय के पुरुषों में शराब और गांजे जैसे नशों का सेवन आम बात है। आजादी के बाद से ही केंद्र और राज्य सरकारें इनके जीवन स्तर को सुधारने, आवास उपलब्ध कराने और शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रयास करती रही हैं किंतु इनकी स्थिति देखकर साफ पता लग जाता है कि इनके जीवन में अंधेरे का ही वर्चस्व है और विकास का उजाला अभी भी मीलों दूर है।

मेरे पास बैठा हुआ मुसहर बालक अपने में सिकुड़ा हुआ था और कुछ भयवश और कुछ शर्म-संकोच के कारण अपना सिर नीचे किए हुए था। दोनों प्रौढ़ाएँ अपनी बतकही में मशगूल थीं। मैंने गौर किया कि इन तमाम वर्षों में कम से कम इतना परिवर्तन जरूर आया है कि इनकी बोली हमारी आंचलिक बोली के समान हो गई है। पहले इनकी बोली की उच्चारण पद्धति थोड़ी अलग थी और इनके कई शब्द हमें समझ में नहीं आते थे। इनकी बोली वैसी ही थी जैसी हम लोग बोलते हैं। यदि इन्हें अच्छे कपड़े पहनने को दे दिए जाएँ तो शायद ही इन्हें कोई मुसहर माने।

सुनहरे भविष्य का सपना देखते वंचित समाज का बालक दिनेश साथ में हैं लेखक गुलाबजी

ट्रेन सुरियावां से चलकर तेजी से अगले स्टापेज यानी कालीन नगरी/मिनी डॉलर नगरी के रूप में मशहूर भदोही की ओर बढ़ती जा रही थी। घरों, दुकानों और सड़कों के किनारे लगे बिजली के बल्बों की रोशनी में आसपास के पेड़-मकान अपनी उपस्थिति का अहसास करा रहे थे। अब सड़कों पर वाहनों की संख्या भी कम होने लगी थी। मैं भी “बोतल दुर्घटना” के झटके से उबरकर सहज हो चुका था। मैंने बगल में बैठे बालक  की ओर सायास झुककर उसका नाम पूछा तो वह शर्म और भय से और सिकुड़ गया और नीचे फर्श की ओर ताकने लगा। मैंने भी हार नहीं मानी और पुनः उससे उसका नाम पूछा तो उसकी बाईं ओर बैठी महिला ने कहा, ” एकर नाव दिनेश हउ (इसका नाम दिनेश है)।” मैंने जोर से ‘दिनेश’ शब्द दुहराया और उसके गले में बाँह डालकर अपने कंधे से सटा लिया।

“दिनेश तू पढ़ई जा थ? (दिनेश तुम पढ़ने जाते हो)”, मैंने उससे पूछा तो उसने बुदबुदाकर कुछ जवाब दिया। किंतु ट्रेन की तेज रफ्तार से उत्पन्न होनेवाली धड़-धड़ की आवाज में उसकी आवाज उसी तरह दब गई जैसे भेड़िए को देखकर मेमने की आवाज गुम हो जाती है। उसके बगल बैठी महिला ने जवाब दिया, “ई पढ़ई जा थ (यह पढ़ने जाता है)।” “कौने दरजा में?”, मैंने अगला सवाल किया। अब वह लड़का अपनी झिझक को त्यागकर बोला, “हम दूसरे दर्जा में पढ़ी थ और हमरे इस्कूल में दुपहरे क खाना भी मिलत थ।” बच्चे के मुंह से यह जवाब सुनकर मुझे खुशी हुई कि चलो कम से कम यह बच्चा तो स्कूल जाता है। स्कूल जाएगा तो अक्षरों और संख्याओं से परिचय और दोस्ती करेगा। मानक भाषा के वाक्य सुनेगा और बोलेगा और क्या पता अक्षर, लिपि, संख्या और भाषा के सागर में गहरे उतरने का हुनर भी सीख जाएगा। यह शिक्षित होकर न केवल अपना भविष्य बना सकेगा बल्कि अपने समुदाय के अन्य बच्चों के लिए उदाहरण भी बन सकेगा।

मैंने गौर किया कि अब उसने अपना सिर ऊपर उठा लिया था और उसके चेहरे पर चमक आ गई थी। उसकी आँखों में भी आत्मविश्वास की तरंगें तैरने लगी थीं। मैंने अपनी बाईं बाँह उसकी पीठ और गर्दन के आसपास लपेट दी जिससे उसने अपनत्व और भरोसे की ऊष्मा महसूस की। मैंने उससे उसकी बाईं ओर बैठी महिला की ओर इशारा कर पूछा,”ई तोहार के हईन?(ये तुम्हारी क्या लगती हैं)।” उसने जवाब दिया, “हमार नानी…।” अब मैंने उसके सामने बैठी महिला के बारे में पूछा तो वह बोला, “ई हमार आजी हउ (यह मेरी दादी है)।”

Great things in business are never done by one person. They are done by a team of people.

“अउर तोहार माई कहाँ बा?” मैंने अगला सवाल किया तो उसने जवाब दिया, “ऊ घरे बा…(वह घर पर है)।”

“दिनेश, चलअ….हम तोहार एक ठो फोटो खींचत हई।”

यह सुनकर वह शरमाया और दाएं-बाएं अपनी दादी-नानी की ओर ताकने लगा।

“बबऊ…लजा मत, हम तोहार फोटो खींच के बंबई लई जाब और तोहरे बदे एक ठो हीरोइन जइसन सुंदर दुलहिन लइके आउब।” अब मैं भी चुहल और मसखरी पर उतर आया था। यह सुनते ही दोनों महिलाएं खिलखिलाकर हँस पड़ी और दिनेश शरमाकर झेंप गया। मैंने उसके साथ एक सेल्फी ली और साथ ही कुछ और तस्वीरें खींच लीं ताकि इन्हें अपनी यादों में सँजोकर रख सकूँ और अपने सुधी मित्रों के साथ साझा कर सकूँ।

ट्रेन अब भदोही से निकलकर मेरे गंतव्य परसीपुर की ओर तेजी से भागी जा रही थी। इस बालक का सानिध्य और उससे की गईं कुछ हल्की-फुल्की बातों और हँसी-मजाक से मुझे जो आनंद मिला उससे मेरी थकान और कुढ़न गायब हो गई। मैंने जेब से पचास का नोट निकाला और दिनेश का हाथ पकड़कर नोट उसकी हथेली पर रखकर नरमी से उसकी मुट्ठी बंद कर दी। मैंने स्नेह से उसे अपनी ओर सटाते हुए कहा, ” लई ल दिनेश…। ई हम तोहके बनारस में समोसा और लवंगलता खाइ बदे देत हई।” उसने धीरे से अपनी आँखें ऊपर उठाकर कुछ देर तक मेरे चेहरे को ताका मानो वह पूछना चाहता हो कि यह चाचा या बाबा मेरे क्या लगते हैं जो मुझ गरीब पर यह मेहरबानी कर रहे हैं। क्या इन्हें पता नहीं है कि मैं एक मुसहर बालक हूँ जिसे ज्यादातर लोग अछूत समझते और मानते हैं। बहुत से लोग तो हमें इंसान भी नहीं समझते हैं और हमें जानवरों की तरह दुत्कारते हैं। हो सकता है कि ये सवाल उसके मन में न उठकर उसकी नानी या दादी के मन में उठे हों किंतु उन दोनों महिलाओं की आँखों की सजलता मैं साफ तौर पर देख पा रहा था जो यह दृश्य देखकर कुछ पलों के लिए निशब्द हो गईं थीं।

गाड़ी के इंजन ने तेज हॉर्न बजाया था जो संकेत था कि मेरा परसीपुर स्टेशन बस अब आने ही वाला है। मैंने सीट के नीचे रखा अपना हैंडबैग उठाया और सीट पर रख लिया। थोड़ी ही देर में ट्रेन  अपनी गति को धीमी कर प्लेटफॉर्म से जुगलबंदी करने लगी थी। मैं सीट से उठकर खड़ा हो गया और दिनेश के सिर पर हाथ फिराते हुए बोला, “बऊ, पढ़िहा जरूर। पढ़ाई मत छोड़िहा। एक दिन तोहउँ बड़ा मनई बनि जाबअ। देखअ….अपने बियाहे में हमके नेवता भेजब जिन भुलाय। हम तोहरे बराते में डीजे और नाच देखई आउब।” यह सुनकर वह लजाकर मुस्कुराया और उसकी दादी और नानी जोर से हँस पड़ीं। मुसहर बालक दिनेश की निश्छल और निर्दोष मुस्कान मेरी आँखों की रील में मानो अंकित हो गई थी। मैं अपना बैग उठाकर बाईं ओर के दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया। मैंने दाईं ओर के दरवाजे के पास बैठे उस मुसहर समुदाय के बाकी सदस्यों की ओर निगाह दौड़ाई। दोनों  युवतियां ठंड के अहसास के चलते अपनी दुबली काया में कुछ और सिमट गईं थीं किंतु उनकी माँग में पड़ा एनूर (सिंदूर) खूब चमक रहा था। मैंने कामना की कि इस एनूर की भाँति उनके जीवन में भी खुशियों और बरक्कत की वह चमक आए जिससे ये सैकड़ों वर्षों से वंचित हैं। मुझे उनकी गठरियों के हरे पत्तों में भी कुछ सरसराहट महसूस हुई मानो वे पत्ते मुझसे पूछ रहे हों, “क्या बाबू हमारे साथ बनारस नहीं चलोगे? चलो न….। आज हम आपको वहाँ टमाटर चाट और इमरती खिलाएंगे और पुरवा (कुल्हड़) वाली चाय भी पिलाएंगे।” मैं भला उनकी मनुहार  कैसे स्वीकार कर पाता? मेरी मंजिल यानी परसीपुर स्टेशन तो आ चुका था। मैंने मन ही मन में महुआ के उन पत्तों को जवाब दिया, “आउब हो..जरूर आउब लेकिन अबकी बार नाहीं… अगली बार। मिलिहा जरूर…।” इलाहाबाद की घटना का दुख दिनेश के साथ की गई चुहल से हासिल सुख की आत्मीय फुहार से तिरोहित हो चुका था।

“गुलाब भाई….।” प्लेटफॉर्म से दीनानाथ ने मुझे आवाज लगाई थी जो मुझे लेने स्टेशन आए थे। ट्रेन से उतरकर मैंने दिनेश की ओर देखकर हाथ हिलाया और धीमे कदमों से प्लेटफॉर्म को नापता हुआ दीनानाथ उर्फ दीना भाई की ओर बढ़ चला।

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3 Comments
  1. कृष्ण कुमार यादव says

    गुलाब जी की दोनों पुस्तके हमने पढ़ी हैं…… आपके लेखन की ठेठ पुरबिया अंदाज पाठकों को अत्यंत भाता है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पाठक स्वयं को संस्मरण का किरदार समझने लगता है.
    ढेरों शुभकामनाएं व बधाइयां

  2. Yogesh Nath Yadav says

    बेहतरीन यात्रा वृत्तांत।

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