बाँस के स्कूल और सपनों में लगती जंग

जनार्दन

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कोविड से पूरी दुनिया प्रभावित हुई है। धरती के हर हिस्से का इंसान गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। कोरोना से पैदा हुई चुनौतियों ने हमारे देश की दबी-दबाई विषमता को उघाड़ दिया है। अमीर-गरीब की खाई पहले से अधिक चौड़ी और गहरी हुई है । अर्थात उसके आयतन का विस्तार हुआ है। हम जानते हैं कि महामारियों की मार का असर कई सालों तक रहता है। महामारियाँ कैंसर की तरह होती हैं, जो धीरे-धीरे व्यक्ति, समाज और देश को खोखला कर देती हैं। इनसे राजनीतिक और आर्थिक असमानताएं तो पैदा होती ही हैं, जो वक्त के साथ भरने लगती हैं। मगर आर्थिक और सांस्कृतिक असमानताओं और विकृतियों की भरपाई होने में कई पीढ़ियाँ तबाह हो जाती हैं। कोरोना के कारण आई बेरोजगारी, गरीबी और भूखमरी का प्रतिफलन बाल मजदूरी, बाल विवाह, जिस्मफरोशी, मानवतस्करी, आत्महत्या और अशिक्षा के रूप में होने लगी है। इसका सबसे भयावह असर हाशिए के समाज पर पड़ा है।

कोरोना से संबंधित तमाम सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्टें अब तक सामने आ चुकी हैं। गैर-सरकारी रिपोर्टों की बात न करके अगर सरकारी रिपोर्टों की चर्चा की जाए, तो भी कई भयावह तस्वीरें आकार लेती दिखाई पड़ती हैं। इन रिपोर्टों से पता चलता है हम जीवन के हर क्षेत्र में तेजी से पीछे होते जा रहे हैं। हमारे सपने असमय मर रहे हैं। शिक्षा राष्ट्र निर्माण और मानव को सपना देखने की ताकत देने वाली व्यवस्था है। कोरोना के कारण वह बिलकुल हाशिए पर आ गई है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से संबंधित एकीकृत जिला शिक्षा सूचना प्रणाली (यूडीआईएसई) की रिपोर्ट कहती है कि शिक्षण संस्थान कोरोना महामारी से बुरी तरह प्रभावित हुये हैं। रिपोर्ट में बताया गया है ‘शैक्षणिक सत्र 2019-20 के दौरान पूरे देश में सिर्फ 22 फीसदी स्कूलों में ही इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध थी। जबकि तीस फीसदी से कम स्कूलों में ही कंप्यूटर उपलब्ध थे।”1

पोर्टाकेबिन स्कूल

मार्च 2020 में ही कोरोना का कहर और असर दिखाई पड़ने लगा था। इसी समय लाकडाउन लगा और लाखों मजदूरों को पलायन करना पड़ा। पलायन के कारण इन मजदूर परिवारों को हर प्रकार की परेशानी का सामना करना पड़ा, जिसमें उनका वर्तमान और भविष्य (उनके बच्चों को स्कूलों से वंचित होना पड़ा) दोनों चौपट हो गया। इसके साथ-साथ जो बच्चे गाँव या कस्बों में स्थित सरकारी विद्यालयों में पंजीकृत थे, उनके सामने भी शिक्षा से वंचना का पूरा परिवेश उपस्थित था। यहाँ यूडीआईएसई के रिपोर्ट का संदर्भ लिया जा सकता है –‘मार्च के महीने से तकरीबन पूरे सत्र के दौरान स्कूल बंद रहे, जिससे अधिकांश बच्चों को ऑनलाइन पढाई पर निर्भर रहना पड़ा।’2 गाँवों और कस्बों के गरीब के परिवारों के बच्चों के पास एंड्रायड मोबाइल और इंटरनेट की कमी थी, जिसके कारण ये तमाम बच्चे शिक्षा से वंचित हुए, जिसका प्रतिफलन बाल मजदूरी और पलायन के रूप में हुआ। जिन हाथों में किताब होनी चाहिए थी, उन हाथों अब फावड़ा है या वे हाथ किसी होटल पर जूठे बर्तन धोने में लग गए हैं।

कोरोना के बाद से अब तक शिक्षण और अध्यापक का कार्यक्रम ऑनलाइन मोड से संचालित किया जा रहा है। हर तरफ डिजिटल डिवाइस की गूंज सुनाई पड़ती है। सचेत और सक्षम अभिभावक इस परिवर्तन को समझ रहे हैं और अपने बच्चों को नए उपक्रम के अनुसार ढालने में सफल भी हो रहे हैं, मगर उनका क्या, जो सक्षम नहीं हैं, जैसे बस्तर नेतरहाट, बिष्णुनुर, (झारखंड) सुकमा, बीजापुर, दंतेवाड़ा और नारायणपुर (छत्तीसगढ़) के पोटाकेबिन स्कूलों (बॉस से बने विद्यालयों) के छात्र?

इन छात्रों के अंधकारमय होते भविष्य पर इतनी चुप्पी क्यों है, जबकि इनका जीवन और इनकी परिस्थितयाँ इस देश के किसी भी दूसरे नागरिक की तुलना में अधिक जटिल हैं? 

हमारे इस महादेश के इन इलाकों या जिलों की परेशानियाँ क्या हैं।

नेतरहाट, बिषुमपुर, सुकमा, बीजापुर, दंतवाड़ा और नारायणपुर की आदिवासी बसाहट वाले जिले हैं। नेतरहाट भले ही ‘छोटानागपुर की रानी’ के रूप विख्यात है और वहाँ हर साल हजारों सैलानी सैर-सपाटे के लिए आते हैं, मगर वहाँ के आदिम आदिवासियों के जीवन में कोई सकारात्मक उजाला नहीं आ पाया है। बिषुनपुर, सुकमा, बीजापुर, दंतवाड़ा और नारायणपुर की स्थिति भी नेतरहाट जैसी ही है, बल्कि वहाँ से भी गई-गुजरी है, क्योंकि ये इलाके नक्सल की समस्या से भी ग्रसित हैं। चूँकि मुख्यधारा के पढे-लिखे वर्ग का जेहन आदिवासी समुदाय की समस्याओं को समझने लायक है ही नहीं, इसलिए इन लोगों को पता ही नहीं कि कोरोना महामारी सबसे बुरा असर आदिवासियों पर पड़ा। लॉकडाउन के दौरान सड़क पर सबसे ज्यादा वे हताहत हुए। बेरोजगारी, हारी-बीमारी और भूखमरी का निवाला आदिवासी बने, लेकिन  अगर किसी पर सबसे कम बात हुई तो वह आदिवासी वर्ग था। आदिवासियों को अदर मान लिया गया है।

कोरोना ने हर वर्ग के बच्चों के सामने पढ़ाई की चुनौती पेश की। दलितों, आदिवासियों और वंचित तबकों के अलावा दूसरे तबके के बच्चों के लिए ऑनलाइन शिक्षण का विकल्प व्यवहार में आ गया। कोरोना के कारण आदिवासी बच्चों के केवल स्कूल बंद नहीं हुए, बल्कि उनका भविष्य और जीवन संकट के घेरे में आ गया है। इस समस्या को अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए कुछ उदाहरणों या प्रश्नों का सहारा लेते हैं, जो इस प्रकार हैं – 

आगे बढ़ने के पहले जान लिया जाए कि पोटाकेबिन स्कूल क्या होते हैं और इनकी स्थापना क्यों की गई है?

पोर्टाकेबिन आवासीय विद्यालय

पोटाकेबिन स्कूल छत्तीसगढ़ सरकार के उपक्रम से स्थापित किए गए स्कूल हैं। ये स्कूल नक्सल प्रभावित परिवारों और इलाकों के बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए बनाए गए हैं। यही कारण है कि बाँसों से बने ये रिहायशी स्कूल नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में चलाए जाते हैं। बाँस से बनी कक्षाएं, वाचनालय और छात्रावास आदिवासी छात्रों को आकर्षित करते हैं और उन्हें स्कूल अपने रहवास-सा लगने लगता है। जिला मुख्यालय के पास होने के कारण इन स्कूलों को सुरक्षा भी आसानी से उपलब्ध थी। पोटोकेबिन स्कूल छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों के बच्चों को शिक्षा की ओर मोड़ने में कामयाब हो रहे थे।

कोरसा सुक्का का मामला

कोरसा सुक्का अब सत्रह बरस का हो चुका है। सन 2018 में वह अपने गाँव से छत्तीस किलोमीटर दूर सुकमा के पोटा केबिन 3 (बाँस से बने स्कूल) में पंजीकृत हुआ। कोरसा सुक्का जैसे तमाम बच्चे इन विद्यालयों से जुड़कर अपने सपनों को सच करना चाहते थे।

लेकिन कोरोना महामारी के कारण जिस तरह दूसरे शिक्षण संस्थान बंद हुए उसी तरह पोटाकेबिन स्कूल भी बंद कर दिए गए। कोरसा सुक्का जैसे लगभग 30000 हजार आदिवासी बच्चे पोटाकेबिन स्कूलों को छोड़कर घर लौट गए। उनकी किताबें छात्रावास में रह गईं। किताबों के अभाव से कोरसा सुक्का दुखी है और वह कहता है –“स्कूल लौटने की उम्मीद हर दिन धूँधली पड़ती जा रही है।”4

पोटाकेबिन स्कूलों के बंद होने से आदिवासी छात्र क्या खो रहे हैं ?

पोटाकेबिन स्कूल केवल स्कूल नहीं थे। वहाँ आदिवासी बच्चों के सपने पलते थे और उनकी उम्मीदों को सहारा मिलता था। खेल का मैदान होने के कारण वे खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे थे। प्रशासनिक सुरक्षा मिलने से उनमें आत्मविश्वास पनप रहा था। छात्रावास और मेस की व्यवस्था के कारण वे पेट भर भोजन पाते थे और कुपोषण से बचे हुए थे।

पोटाकेबिन और आश्रम प्रकार के स्कूलों के बंद हो जाने से लगभग दो लाख आदिवासी बच्चे ऊपर बताए गए सुरक्षा-चक्र से वंचित हो गए हैं। घर लौटे आदिवासी छात्र अपने सपनों से दूर जा चुके हैं, क्योंकि उनके पास न एंड्रायड फोन है न ही उनके आसपास इंटरनेट सुविधा। वंचित आदिवासी छात्र सपनों के बिखरने से छटपटा रहे हैं और महामारी के समय में भी आंदोलन करने पर मजबूर हो रहे हैं।

कांकेर के कोयलीबेडा ब्लॉक के आदिवासी छात्र क्यों आंदोलन कर रहे हैं?

कांकेर के कोयलीबेडा ब्लॉक में पोटाकेबिन छात्रों का संगठन बना है। यह संगठन कोशिश कर रहा है कि पोटाकेबिन स्कूल फिर से बहाल किए जाएं और ऑनलाइन शिक्षण को हटाकर पहले जैसी व्यवस्था कायम की  जाए। इसके लिए छात्रों का यह संगठन रचनात्मक रूप से अपनी शिकायत सक्षम अधिकारियों तक पहुँचा रहा है। इस संगठन में तीन हजार से अधिक आदिवासी छात्र शामिल हैं। वे बच्चे जानते हैं कि अगर शीघ्र ही उनकी वापसी स्कूलों में नहीं हो पाई तो न सिर्फ उनके सपने और उनका भविष्य तबाह हो जाएगा, बल्कि उनका जीवन तहस-नहस हो जाएगा।

पोटाकेबिन स्कूलों के अध्यापक चाहते हैं कि यथाशीघ्र बंद पड़े स्कूलों को खोला जाए ताकि विनाश पर बढ़े कदम विकास की ओर मोड़े जा सकें। इन अध्यापकों का यह भी मानना है कि पोटाकेबिन स्कूल केवल स्कूल भर नहीं हैं। ये स्कूल आदिवासी बच्चों के लिए चूल्हा भी हैं, जहाँ पर उन्हें भरपेट भोजन मिलता है, जिसके भरोसे वे भविष्य की तैयारी करते हैं।

पोटाकेबिन स्कूलों के बंद होने से शिक्षा से वंचित आदिवासी छात्रों का भविष्य कैसा हो सकता है ?

बस्तर मुख्यालय के पोटाकेबिन स्कूल के एक कार्यालयकर्मी को भय है। लाखों बच्चों को शिक्षा से वंचित होने से वह डरा हुआ है। वह कहता है –“पोटाकेबिन स्कूल से वंचित छात्र लिखना-पढ़ना जानते हैं। वे नक्सलियों के लिए बैनर, पोस्टर और नारे लिख सकते हैं। वे पर्याप्त बड़े भी हो चुके हैं। बहुत आसानी से उनके दिमाग में विद्रोह के तत्व भरे जा सकते हैं।” 5

बस्तर मुख्यालय के उस कार्यालयकर्मी का दावा हवा-हवाई नहीं है, उसमें सच्चाई भी है। बस्तर के एक अधिकारी का मानना है –‘हाल-फिलहाल जो विरोध हो रहे हैं, उनमें सोलह से अट्ठारह बरस बच्चे भाग ले रहे हैं। इनका उपयोग प्रवक्ताओं की तरह किया जा रहा है। इनमें से अधिकांश बच्चे पोटोकेबिन स्कूलों में पंजीकृत हुए थे।’6

पोटाकेबिन स्कूलों के बंद होने से नक्सली और माओवादी संगठनों में उत्साह दिखाई पड़ने लगा है। वे इन बच्चों के नियोजन कर रहे हैं। कलम थामने वाले हाथ बंदूक और असलहा संभालने को मजबूर हो रहे हैं।

हालांकि पोटाकेबिन स्कूलों के अध्यापक चाहते हैं कि यथाशीघ्र बंद पड़े स्कूलों को खोला जाए ताकि विनाश पर बढ़े कदम विकास की ओर मोड़े जा सकें। इन अध्यापकों का यह भी मानना है कि पोटाकेबिन स्कूल केवल स्कूल भर नहीं हैं। ये स्कूल आदिवासी बच्चों के लिए चूल्हा भी हैं, जहाँ पर उन्हें भरपेट भोजन मिलता है, जिसके भरोसे वे भविष्य की तैयारी करते हैं। पोटाकेबिन स्कूल का यह अध्यापक यह भी जोड़ता है –‘हम कोविड ड्युटी कर रहे हैं, जबकि हमें पढ़ाना चाहिए। हमारी दिली तमन्ना है कि ये स्कूल जल्द से जल्द खुलने चाहिए।’ 7

पढ़ाई बंद होने से निराश कोरसा सुक्का कहता है –‘मैं स्कूल लौटना चाहता हूँ। मैं सुकमा से बाहर निकलना चाहता हूँ। मैं पढ़कर पशु डॉक्टर बनना चाहता हूँ। मुझे बीमार जंगली जानवर ठीक नहीं लगते। मैं उनका इलाज करना चाहता हूँ। लेकिन लगता है कि मैं अपने सपने से दूर होता जा रहा हूँ। स्कूल बंद है और मेरी उम्र बढ़ती जा रही है। मैं बिना कुछ सीखे बढ़ रहा हूँ। अगर मैं बीस साल का हो गया और उसके बाद स्कूल खुले तो मेरे लिए अपने सपने को पूरा करना मुश्किल हो जाएगा।” 8

लॉकडाउन के बाद स्कूलों में दाखिलों और ड्रॉपआउट का समग्र आकलन अभी आना शेष है।

संदर्भ –

1 – (महामारी के दौर में शिक्षा, अमर उजाला, दिनांक 03.09. 2021, पृ.10)

2 – (महामारी के दौर में शिक्षा, अमर उजाला, दिनांक 03.09. 2021, पृ.10)

3 – Potacabin is schools made of pota or bamboo.

Residential schools shut, students home, officials fear Maoist influence, (article by Gargi Verma) Indian Express, July 02, 2021 page 01

4 – वही।

5 – वही।

6 – वही।

7 – वही।

8 – वही।

जनार्दन हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज में सहायक प्राध्यापक हैं

2 Comments
  1. दीपक शर्मा says

    पोटा केबिन स्कूलों के बारे में मैंने पहली बार पड़ा । यह पढ़ने के बाद मुझे भी लग रहा है आदिवासी बच्चों के पढ़ाई और विकास के लिए यह उत्तम माध्यम है कोरोना काल में गरीब तपके के लिए शिक्षा मुश्किल हो गई है इन सब विषयों पर आपने बहुत अच्छी चर्चा की है ।एक शानदार लेख के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर

  2. जनार्दन says

    बहुत बहुत आभार

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