राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियां 

देवेन्द्र यादव

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राजस्थान सरकार ने लंबे समय से अटकी पड़ी राजनीतिक नियुक्तियां 9 फरवरी बुधवार को कर दी।

राजस्थान में कांग्रेस के भीतर नेताओं के बीच चल रही नाराजगी में, एक भाग कार्यकर्ताओं के सम्मान को लेकर भी था। नाराज नेता सचिन पायलट पार्टी हाईकमान से मांग कर रहे थे की जिन कार्यकर्ताओं ने 2018 के विधानसभा चुनाव में चुनाव की घोषणा होने से पहले और चुनाव प्रारंभ होने पर जो मेहनत की थी और कार्यकर्ताओं की मेहनत के कारण राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी थी, उन कार्यकर्ताओं को सम्मान के साथ सरकार में भागीदारी दी जाए ? यानी उनकी राज्य के निगम बोर्ड और आयोग में नियुक्तियां हो।

लंबी कशमकश के बाद आखिर राज्य सरकार ने विभिन्न बोर्ड निगम और आयोगों में नियुक्तियां कर दी हैं। लेकिन इन नियुक्तियों से नेताओं की नाराजगी तो शायद दूर हो गई होगी लेकिन क्या इन नियुक्तियों से कांग्रेस का आम कार्यकर्ता खुश होगा जिस कार्यकर्ता ने 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले और चुनाव में कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए मेहनत की थी, क्या उस आम कार्यकर्ता को सम्मान मिला।

यदि 44 नेताओं की राजनीतिक नियुक्तियों की लिस्ट पर गौर करें तो इसमें वह नेता भी शामिल हैं जो नेता मेहनत करने के बाद भी स्वयं विधानसभा का चुनाव नहीं जीत पाए, ऐसे नेता सरकार में नियुक्त होकर भागीदारी पाने में सफल हो गए।

तीन नेता तो ऐसे हैं जो लंबे समय से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने के लिए मेहनत कर रहे हैं, राजस्थान के यह तीनों नेता उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सफलता दिलाने में तो कामयाब नहीं हुए लेकिन तीनों नेता राजस्थान में राजनीतिक नियुक्ति लेने में सफल हो गए! राहुल गांधी अमेठी से भले ही लोकसभा का चुनाव हार गए लेकिन अमेठी में मेहनत करने वाला राजस्थान में राजनीतिक नियुक्ति पा गया !

आम कार्यकर्ताओं की मेहनत के कारण जो नेता विधायक बने थे वह नेता भी राजनीतिक नियुक्ति पाने में सफल हो गए।

जो लोग नेताओं के हम साया बनकर नेताओं के इर्द-गिर्द मंडराते रहे वह लोग राजनीतिक नियुक्तियां पाने में कामयाब हुए। और जो कार्यकर्ता सड़क पर कांग्रेस के नाम का झंडा बुलंद करता रहा वह अपना हाथ मलता रह गया।

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सवाल आम कार्यकर्ताओं का करें तो कार्यकर्ता जहां था वहीं पर खड़ा दिखाई दे रहा है, शायद कार्यकर्ता अपने आप को एक बार फिर से ठगा सा महसूस कर रहा होगा? क्योंकि राजनीतिक नियुक्तियों की सूची को देखने के बाद उसके यह समझ में नहीं आ रहा होगा कि कांग्रेस के नेता किसे कार्यकर्ता मानते हैं और किसे नेता मानते हैं? यदि राजनीतिक नियुक्ति की सूची को देखें तो उस सूची में कार्यकर्ता तो नजर नहीं आ रहा उसमें तो नेता ही नेता नजर आ रहे हैं। वह नेता भी हैं जो लंबे समय से कभी विधायक कभी प्रदेश अध्यक्ष कभी प्रतिपक्ष का नेता कभी राज्य सरकार में मंत्री रहे हैं, क्या यही सब कांग्रेस के मेहनतकश कार्यकर्ता हैं।

संगठन से लेकर सत्ता की मलाई खाने वाले नेता ही शायद कांग्रेस के भीतर मेहनतकश कार्यकर्ता हैं।  यह राजनीतिक नियुक्तियों से जाहिर हो गया है ! लेकिन अब भी सवाल वही है क्या राजनीतिक नियुक्तियों के बाद कांग्रेस के नेताओं के बीच अब सार्वजनिक नहीं बल्कि अंदर खाने चल रही नाराजगी दूर हो  पायेगी।


देवेंद्र यादव कोटा स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।

 

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