साम्प्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

राजू पाण्डेय

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जब सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण तत्परता से अनवरत सुनवाई कर राम मंदिर विवाद में बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं के अनुकूल फैसला दिया था तब भारतीय राजनीति का एक अतिसामान्य प्रेक्षक भी कह सकता था कि यह हिंसा और उन्माद की राजनीति का अंत नहीं है, अपितु इस फैसले के बाद कट्टरपंथी शक्तियां अधिक बल एवं अधिकारपूर्वक अन्य मुस्लिम उपासना स्थलों पर अपना दावा प्रस्तुत करेंगी। फिर भी हम सबने, मानो इस विनाशकारी प्रवृत्ति का पूर्वानुमान लगाकर ही, जन सामान्य से अपील की थी कि राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश एक नई सकारात्मक शुरुआत करे जिसमें मतभेद और मनभेद दोनों को समाप्त करने का संकल्प निहित हो।

किंतु हिंसा की पटकथा के लेखकों को यह कहां मंजूर था। राम मंदिर विवाद का पटाक्षेप साम्प्रदायिक हिंसा की इस लंबी, त्रासद और भयानक फ़िल्म का मध्यांतर ही था। मध्यांतर के बाद फ़िल्म अब गति पकड़ रही है। दुर्भाग्य यह है कि इस फ़िल्म का कोई क्लाइमेक्स नहीं है। हिंसा का अंत नहीं होता। घात-प्रतिघात, आक्रमण-प्रत्याक्रमण, अत्याचार-प्रतिशोध, यह सारे शब्द युग्म हिंसा को अंतहीन बना देते हैं। यह नाभिकीय विखंडन की चेन रिएक्शन की तरह होती है। सर्वनाश ही इसका अंत है।

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जब अनायास ही हासिल हो गए राम मंदिर मुद्दे ने कट्टरपंथी शक्तियों को देश का शासक बना दिया तब ऐसे अन्य मुद्दों को तलाशना और जीवित रखना उनकी स्वाभाविक प्राथमिकता ही थी। अधिक प्रयास करने की आवश्यकता ही नहीं थी स्वयं आरएसएस ने ही 1959 में एक प्रस्ताव पारित किया था जिसका शीर्षक था- मस्जिदों में परिणत मन्दिरों का प्रश्न। प्रस्ताव इस प्रकार है- ‘विगत एक हजार वर्षों में भारत में कई असहिष्णु तथा आततायी विदेशी आक्रामकों एवं शासकों ने भारतीय जनता की राष्ट्रीय भावनाओं पर आघात पहुँचाने की दृष्टि से अनेक हिन्दू मन्दिरों को उद्धवस्त किया और उनके स्थान पर मस्जिदें खड़ी कीं। इन पूजा-स्थानों के पुन:स्थापन की आकांक्षा हमारे स्वतंत्रता आन्दोलनों के मूल में सदैव रही हैं। यह बड़े खेद की बात है कि अंग्रेजी-सत्ता समाप्त होने के बाद भी हमारी अपनी सरकार ने मन्दिरों की पुन:स्थापना के न्यायपूर्ण हिन्दू  अधिकारों की मान्यता के प्रति सदैव दुर्लक्ष ही किया है। जब तक हिन्दुओं के प्रति घोर अन्याय एवं अत्याचार के प्रतीक विद्यमान हैं, हिन्दुओं में असंतोष व्याप्त रहना स्वाभाविक है। इतना ही नहीं, देश के राष्ट्रीय समाज के साथ मुस्लिमों की भावात्मक एकता स्थापित करना भी असंभव होगा। अत: अ.भा. प्रतिनिधि सभा संविधान द्वारा प्रदत्त पूजा की स्वतंत्रता को ध्यान में रखते हुए तथा पारस्परिक सहिष्णुता एवं सद्भाव का वायुमंडल-निर्माण करने के लिए इन सभी धवस्त मंदिरों की वापसी और पुन:स्थापना के लिए कदम उठाने की माँग करती है।

सम्पूर्ण देश के सभी हिन्दुओं की भावना एवं श्रद्धा के केन्द्र के नाते इन मंदिरों में काशी विश्वनाथ मंदिर विशेष महत्त्व रखता है। प्रतिवर्ष लक्षावधि भक्तगण इस पवित्र तीर्थ के दर्शनार्थ आते हैं। मंदिर का वर्तमान रूप उनकी भावनाओं को चोट पहुँचाने वाला है। यह मन्दिर, जिस पर हिन्दुओं का अधिकार उच्चतम न्यायालय ने भी मान लिया है, हिन्दुओं को वापस करने के कार्य में अगुआपन ग्रहण कर उत्तर प्रदेश सरकार जनता की कृतज्ञता-भाजन बने, ऐसा अनुरोध यह सभा उस सरकार से करती है।’

इस प्रस्ताव से ही यह स्पष्ट होता है कि अपनी इच्छा एवं आवश्यकतानुसार कट्टर हिंदुत्व के समर्थक जब चाहें इस मुद्दे को जीवित कर सकते हैं। यह तथ्यों और तर्कों को तिलांजलि देने का युग है। यही कारण है कि ध्वस्त किए गए मंदिरों की संख्या दिन प्रतिदिन नई ऊंचाइयों को स्पर्श कर रही है। साठ के दशक में करीबन 300 हिन्दू मंदिर ध्वस्त होने के समाचार प्रकाशित हुए थे और अब यह संख्या 60000 को स्पर्श कर रही है। यह भी अंतिम नहीं है, कल्पना की उड़ान का कोई अंत नहीं होता।

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ज्ञानवापी विवाद की सधी हुई पटकथा का फिल्मांकन जारी है। टीवी चैनलों का अधिकांश समय इस विषय पर होने वाली हिंसक बहसों को समर्पित है। हिन्दू और मुस्लिम कट्टरपंथी जैसे भड़काऊ बयान दे रहे हैं उन्हें देख-सुनकर यह लगता है कि ये एक ही कारखाने में निर्मित उत्पाद हैं जिन पर अलग-अलग कंपनियों के लेबल चस्पा किए गए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल पोस्टों की बाढ़-सी आई हुई है। देश का नया इतिहास व्हाट्सएप विश्वविद्यालय के विद्वानों द्वारा लिखा जा चुका है अब इसकी पुष्टि सरकारी महकमे द्वारा की जानी है।

न्यायपालिका को भी इस पटकथा में अहम भूमिका दी गई है। सुनवाइयों का दौर जारी है और न्यायपालिका स्वयं को निष्पक्ष दिखाने के लिए प्रयासरत है। पता नहीं न्यायपालिका के लिए निष्पक्ष होना ज्यादा आवश्यक है या निष्पक्षता का आभास देना। इस पटकथा में पूजा स्थल अधिनियम 1991 जैसा पेंच भी है किंतु पटकथा लेखक इस बात के लिए आश्वस्त हैं कि अधिनियम के भीतर ही किसी प्रावधान की इच्छित व्याख्या से पटकथा को मनचाही दिशा मिल जाएगी। अन्यथा फिर ‘मजबूत फैसले लेने वाली बहुमत की सरकार’ तो है ही। ऐसे कानूनी दांवपेंच पटकथा को रोचक बनाने का जरिया हैं। इन्हें पटकथा से अलग मानना नासमझी है।

पटकथा इतनी कसी हुई और रोचक है कि क्या साम्प्रदायिक और क्या सेकुलर, सारे बुद्धिजीवी इसमें उलझे हुए हैं। युवा बेरोजगारी 24 प्रतिशत पर है, देश में तीस करोड़ युवा बेरोजगार हैं, खुदरा महंगाई की दर 8 वर्ष के उच्चतम स्तर पर है जबकि थोक महंगाई 15.5 प्रतिशत के शिखर को स्पर्श कर रही है। लेकिन पूरा देश उन मस्जिदों की सूची बना रहा है जिनके स्थान पर मंदिर बनाए जाने हैं।

कुछ नासमझ लोग यह चीख-चीख कर कह रहे हैं कि पूजा स्थलों को ध्वस्त किया जाना मध्यकालीन भारत में एक सामान्य प्रक्रिया थी और हमारे देश में चाहे जिस धर्म के भी पूजा स्थल हों, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च, सभी का कभी न कभी विध्वंस हुआ है। मंदिर राजसत्ता से संरक्षित होते थे, उनकी संपदा अकूत थी। राजाओं के आपसी युद्ध के बाद विजयी राजा कुछ संपत्ति के लिए और कुछ अपनी सर्वोच्चता दिखाने के लिए इन्हें ध्वस्त कर लूट लेते थे। ऐसा हिन्दू राजाओं ने भी किया है, वे कभी मंदिर की संपदा और भगवान की मूर्तियों को अपने अधिकार में ले लेते थे, कभी इन मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट कर देते थे। बौद्ध और जैन धर्म के उपासना स्थलों पर क्या बीती यदि इसकी पड़ताल प्रारम्भ की जाए तो कटुता और वैमनस्य का एक नया दौर शुरू हो सकता है।

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किंतु इन पागल बुद्धिजीवियों के कथन इतिहास के खारिज किए गए पाठ पर आधारित हैं, नए भारत में ऐसा कोई भी विचार जो सामाजिक समरसता, साम्प्रदायिक सद्भाव और शांति की स्थापना में सहायक हो सकता है, अस्वीकार्य है। इसीलिए इन  विद्वानों पर भाषिक, शारीरिक और कानूनी आक्रमण हो रहे हैं। आखिर तर्कशीलता भी तो नए भारत में जुर्म है क्योंकि अब हमें आस्था से संचालित होना है।

जिस ब्राह्मणवादी व्यवस्था की स्थापना करना इन साम्प्रदायिक शक्तियों का उद्देश्य है उसकी नृशंसता को दलितों ने भोगा है। रंगभेद और अस्पृश्यता में कौन अधिक भयानक हैं यह तय करना कठिन है। यही कारण है कि जब इस पाखंड की पोल दलित विद्वानों द्वारा खोली जाती है तब साम्प्रदायिक ताकतें और उनकी संरक्षक सरकार इनका दमन करने की कोशिश करती है। हम दिल्ली, लखनऊ और इलाहाबाद विश्वविद्यालयों में दलित विद्वानों पर हिंसा और दमन की कार्रवाइयां होती देखते हैं। आशंका है कि पूरे शिक्षा जगत में इस घातक प्रवृत्ति का विस्तार न हो जाए।

हम साम्प्रदायिक हिंसा के एक लंबे दौर की ओर धकेले जा रहे हैं। इतिहास की गलतियों को सुधारने के नाम पर उन्हीं भूलों को दुहराया जा रहा है। क्या गौरवशाली 75 वर्ष पूर्ण करने की ओर अग्रसर हमारे लोकतंत्र को इस ऐतिहासिक अवसर पर मध्यकालीन अंधकार में ले जाने की तैयारी है? क्या भारत की युवा आबादी अपनी ऊर्जा अब अल्पसंख्यक समुदायों के उपासना स्थलों के विध्वंस में लगाएगी? क्या हमारे भावी जीवन का आधार प्रतिशोध और हिंसा होंगे? यह प्रश्न जितने गहरे हैं इनके संभावित उत्तर उतने ही बेचैन करने वाले हैं।

हिंसा नए भारत का नव सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। मध्यप्रदेश के नीमच में 65 वर्षीय भंवर लाल जैन को मुसलमान होने के शक में पीट-पीटकर मार डाला जाता है। कहा तो यह भी गया है कि आरोपी ने स्वयं मुस्लिम समुदाय को भयभीत करने हेतु इसका वीडियो वायरल किया। इस भयावह घटना से भी डरावनी हमारी प्रतिक्रियाएं हैं जब हम कहते हैं कि ‘अरे बेचारा बुजुर्ग गलतफहमी में मारा गया, शायद उसका हुलिया मुसलमानों जैसा था।’ हमारी प्रतिक्रियाओं से यह ध्वनित होता है कि यदि मृतक मुसलमान होता तो उसका इस तरह पीट-पीटकर मारा जाना जायज होता। मध्य प्रदेश के सिवनी में गोमांस ले जाने के कथित आरोप में दो आदिवासियों को पीट-पीटकर उनकी निर्मम हत्या कर दी जाती है। जब हम प्रतिक्रिया देते हैं- ‘अरे भाई, पीटने के पहले पक्का पता तो कर लिया होता कि गोमांस उनके पास था या नहीं।’ तब हम कह रहे होते हैं कि यदि उनके पास गोमांस बरामद होता तो उनकी हत्या न्यायोचित होती। नए भारत का न्याय बर्बर और आदिमयुगीन होता जा रहा है। भीड़ ही आरोप लगाती है, भीड़ ही इन आरोपों की पुष्टि करती है और भीड़ ही दंड देती है। दंड भी कैसा- भयावह मृत्युदंड। मामला सरकार तक पहुंचता ही नहीं, न्यायालय की तो बात ही दूर है। और अगर मामला सरकार तक पहुंच भी गया तो उसकी सोच भीड़ की सोच से कौन-सी अलग है- वह भी तो असहमति पर बेरहमी से बुलडोजर चलाने पर आमादा है। न्यायपालिका अप्रसांगिक बना दी गई है और ऐसा नहीं लगता है कि तटस्थ दर्शक की अपनी भूमिका से उसे कोई ऐतराज है।

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नया भारत बहुलताओं को बर्दाश्त नहीं कर पाता। हम केवल मंदिरों का देश बनना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि विलक्षण भाषाई विविधता वाले देश के लोग एक भाषा बोलें- वह भाषा नहीं जो उनके अस्तित्व की पहचान है बल्कि वह भाषा जो कट्टरपंथियों को पसंद है। नए भारत का ड्रेस कोड अब हिंदुत्ववादी ताकतों द्वारा तय किया जाना है, कौन-सी पोशाक पहनने से भारतीयता और राष्ट्र भक्ति झलकती है, अब वे तय करेंगी। जब उनकी इच्छा होगी तब वे केवल इसलिए लोगों को हिंसा का शिकार बनाएंगी कि वे एक खास तरह से काटा गया मांस खाते हैं। हम स्वयं मांसाहारी हो सकते हैं किंतु शाकाहार न करने पर दूसरों को प्रताड़ित करना हमारा विशेषाधिकार है। शायद आने वाले दिनों में भीड़ शाकाहार न करने वालों को मृत्युदंड दे दे।

हम हीनताबोध के शिकार हैं और हों भी क्यों नहीं? हमारे धर्म और संस्कृति में जो कुछ भी गौरव करने लायक था- दया, क्षमा, करुणा, बंधुत्व, प्रेम, सहयोग, सहकार, समावेशन- उसे तो हमने सावरकर के कथनानुसार ‘सद्गुण विकृति’ कहकर खारिज कर दिया है।

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अब हम किस पर गर्व करें? हम अब पीएन ओक महोदय की हास्योत्पादक इतिहास दृष्टि पर आश्रित हैं। किसी काल और सभ्यता के शिल्प एवं स्थापत्य की अद्भुत लाक्षणिक विशेषताओं के प्रतीक समझे जाने वाले भवनों, स्मारकों एवं नगरों के ऐतिहासिक नामों से उच्चारण साम्य रखने वाले तथा संस्कृतनिष्ठ होने का आभास देने वाले शब्दों की तलाश ओक के इतिहास लेखन में सर्वाधिक महत्व रखती है। ओक तो धर्मों के भी नए नाम तलाशने से बाज नहीं आए थे। कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं- ‘वेटिकन’ अर्थात् ‘वाटिका’, ‘क्रिश्चियनिटी’ अर्थात् ‘कृष्ण नीति’, ‘इस्लाम’ अर्थात ‘इशालयम’, ‘अब्राहम’ अर्थात् बह्म का विकृत रूप, ताजमहल अर्थात तेजोमहालय। ऐसे शब्दों की सूची बड़ी लंबी है।

वह साझा अतीत जो हम जी चुके हैं और जिसकी विशेषताएँ हमारे लोकव्यवहार का अंग बन चुकी हैं उसे केवल नाम बदलकर मिटाया नहीं जा सकता। पर हम हैं कि संस्कृतनिष्ठ नामों का सहारा लेकर इन धरोहरों और नगरों पर हिंदुत्व का ठप्पा लगाने में लगे हुए हैं। पता नहीं यह कैसी मनोविकृति है कि हम सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई और इस्लाम धर्म की उत्पत्ति हिन्दू धर्म से मानकर इन्हें हिन्दू धर्म के अधीन लाने के अतार्किक विचार से आनंदित हो रहे हैं। वे धर्म जो सनातन धर्म की जकड़न और कर्मकांडों से विद्रोह कर पैदा हुए और वे धर्म जो एकदम अलग पृष्ठभूमि से आए हैं, हमारे विकृत मस्तिष्क को हिन्दू धर्म के अंग नज़र आ रहे हैं। हम इन धर्मों के अनुयायियों पर हमारी अधीनता स्वीकार करने के लिए दबाव बना रहे हैं।

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साम्प्रदायिकता के इस विस्फोट को रोकेगा कौन? क्या हिंदुत्व के नए संस्करणों की तलाश करती टूटती-बिखरती नेतृत्वहीन कांग्रेस पार्टी से आशा लगाई जाए? अथवा उन क्षेत्रीय दलों से किसी प्रतिरोध की अपेक्षा की जाए जिनके वयोवृद्ध क्षत्रप और उनके अयोग्य उत्तराधिकारी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं? क्या उन क्षेत्रीय नेताओं से आशा लगाई जाए जो भाषा और क्षेत्रवाद के जहर में साम्प्रदायिकता के विष की काट तलाश रहे हैं? क्या उस दलित नेतृत्व से उम्मीद बांधी जाए जो ब्राह्मणवादी मूल्य मीमांसा से संचालित है? क्या इस आशा में हाथ पर हाथ रखकर बैठना उचित है कि हमारी लड़ाई कोई और लड़ेगा?

साम्प्रदायिकता से संघर्ष  की विधियां बहुत सरल हैं। किंतु इन पर अमल करने से पहले हमें यह विश्वास करना होगा कि हमारा डीएनए सेकुलर है। इस हालिया अपवाद को छोड़ दिया जाए तो हमारे लोकतंत्र  का स्वरूप समावेशी एवं उदार रहा है। आज की स्थिति न तो अपरिवर्तनीय है न ही संप्रदायीकरण की प्रक्रिया अनुत्क्रमणीय।

साम्प्रदायिकता से संघर्ष के उपाय पुराने और जांचे परखे हैं- दोनों समुदाय आपस में संवाद का सेतु भंग न होने दें। संवाद होगा तो गलतफहमी उत्पन्न होने की आशंका नहीं रहेगी, हर विवाद का निपटारा शांतिपूर्ण ढंग से होगा। सभी समुदाय सप्रयास एक दूसरे के पर्व-त्योहारों को मिलकर मनाएं। साझा प्रार्थना सभाएं आयोजित हों। एक दूसरे की उपलब्धियों और साझा विरासत पर गर्व किया जाए।

सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में नफरत का जहर ज़रूर फैला है लेकिन असल दुनिया में तो लोग मिल-जुलकर रह रहे हैं। हमें युवा को आभासी दुनिया से बाहर निकाल कर अपने पास पड़ोस, अपने परिवेश पर नजर डालने के लिए प्रेरित करना होगा। कौमी एकता की मुहिम जब तक जन आंदोलन का रूप नहीं  लेगी तब तक साम्प्रदायिक शक्तियों पर काबू पाना कठिन होगा।

इस संघर्ष में हमें दमन और हिंसा का सामना करना पड़ेगा किंतु अहिंसा के मार्ग पर चलकर हम अवश्य विजयी होंगे।

डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र लेखन करते हैं और रायगढ़ में रहते हैं।

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