इस कार्पोरेट समय में प्रेमचंद

उषा वैरागकर आठले

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मई 1925 के प्रभा के अंतिम अंक में गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि की समीक्षा लिखी थी, उसकी कुछ पंक्तियाँ आज भी उपयुक्त प्रतीत हो रही हैं – ‘कर्तव्य और कर्मण्यता की कितनी ही दिशाओं की ओर रंगभूमि की कथा अपनी उंगली उठा कर पाठक का सिर घुमा देती है। गाँव की भूमि व्यावसायिकता की वेदी पर जिस प्रकार बलिदान होती है इससे, अमेरिका के आदिम निवासियों को यूरोपियनों द्वारा लूटना या अपने ही आदमियों द्वारा अपने ही आदमियों को कुचला जाना नज़र के सामने घूम जाता है। देशी राज्य में अत्याचार और निरंकुशता के विरुद्ध जो असमान संग्राम छिड़ता है, उससे मेवाड़ के विजोलिया के किसानों का सत्याग्रह और इस अवसर का प्रजा-पीड़न दृष्टि के सामने आ जाता है।’1 इस उद्धरण को उद्धृत करने का मेरा उद्देश्य है कि बीसवीं सदी के दूसरे-तीसरे दशक से ही साम्राज्यवादी लूट की राजनीति का ‘ट्रेलर’ दिखाई देने लगा था, जिसका अक्स न केवल प्रेमचंद के इस उपन्यास में, बल्कि तत्कालीन पत्रकारिता में भी उतरने लगा था।

जब हम आज प्रेमचंद की बात करते हैं तब तो यह बात अपने आप आती है कि हम अपने कृषिप्रधान देश की वर्तमान जल-जंगल-ज़मीन की स्थिति पर बात करें। हम सब इस बात से बहुत चिंतित हैं कि आज के कार्पोरेट समय में किसानों की ज़मीनें छीनकर चौड़े-चौड़े रास्ते, बाँध और ऐसे उद्योग स्थापित किये जा रहे हैं, जिनके कारण होने वाले तथाकथित विकास का लाभ उन किसानों या आदिवासियों को कतई नहीं मिल रहा है, जिनकी ज़मीनें हैं। उन्हें उनके स्थान से उखाड़कर अन्यत्र विस्थापित करने का क्रूर और अमानवीय नाटक खेला जा रहा है।

आज हम कार्पोरेट कल्चर के शिकंजे में दिन-ब-दिन अधिक फँसते चले जा रहे हैं। साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद या कार्पोरेट कल्चर पूंजीवाद के ही क्रमशः क्रूरतम होते जाते रूप हैं। शोषण तो इसकी पूर्ववर्ती व्यवस्था में भी होता रहा है परंतु ‘‘सामंतवाद के आक्रमण और पूंजीवाद के आक्रमण में फर्क है। सामंतवाद का आक्रमण हमारे सामने होता था और जब हम बगावत करते थे तो संसाधन स्वाधीन हो जाते थे। पूंजीवाद जब वैश्वीकरण के रूप में आता है तब हमारी बगावत के बावजूद ज़मीन ज़मीन के रूप में नहीं रहती है, कोयला कोयले के रूप में और तेल तेल के रूप में नहीं रहता है…. खुले बाज़ार की लूट से संघर्ष करने पर हम जीतेंगे ज़रूर, लेकिन ज़मीन के अंदर कोयला नहीं बचेगा, ज़मीन ज़मीन जैसी नहीं रह जाएगी। साम्राज्यवाद, जो यहाँ के संसाधन को लूटकर ले गया है, उसे वापस नहीं लाया जा सकता। जैसे, उम्र चले जाने पर जो दाँत झड़ जाते हैं, वे फिर वापस नहीं लाये जा सकते, वैसे ही पूंजीवाद द्वारा जो छीन लिया जाता है, वह फिर वापस नहीं आ सकता। इसलिए पूंजीवाद सबसे अधिक खतरनाक है।’’2 और अब इसके नए-नए रूप विकरालतम होते जा रहे हैं। अब चुनी हुई सरकारें भी कार्पोरेट के हाथों की कठपुतली हो गई हैं, उनके लिए कार्पोरेट हितों का पोषण इतना महत्वपूर्ण हो उठा है कि अपने मतदाताओं को हाशिये पर धकेलने में उन्हें रंचमात्र संकोच नहीं होता। कृषि-भूमि, जंगल, नदी, तालाब, पर्वत, खनिज और तमाम तरह के जल-स्रोत कार्पोरेट के हवाले कर दिये जा रहे हैं। इसमें प्रशासन और नौकरशाही भी भरपूर सहयोग देती है। कार्पोरेट संस्कृति का एक लक्षण सरकारी धन की लूट भी है, जो भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटालों की गूँज बनकर रह जाती है। इसमें किसी की जवाबदेही तय नहीं होती और न ही किसी अपवाद को छोड़कर कोई सज़ा होती है। सिर्फ जाँच आयोगों का दसियों साल तक चलने वाला धारावाहिक चलता रहता है। कई बार यह भी महसूस होता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेज़ उपनिवेशवाद के सामने जितनी बेशर्मी से राजतंत्र ने सिर नहीं झुकाया होगा, उससे अधिक चापलूसी और भ्रष्टाचार के शिखर पर आसीन आज की चुनी हुई सरकारें तश्तरी में परोसकर अपने-अपने राज्य के प्राकृतिक संसाधन कार्पोरेट घरानों के सामने प्रस्तुत कर रही हैं।

सन् 1936 में ही प्रेमचंद ने अपने अंतिम उपन्यास ‘गोदान’ में किसान के खेत मज़दूर एवं शहरी मज़दूर में बदलने की प्रक्रिया का वर्णन किया। इसी तरह ‘किसानों को लूटने वाली महाजनी सभ्यता, कर्ज़ की पूंजीवादी अर्थ-नीति बैंकिंग सिस्टम एवं उपनिवेशवादी राजनीति को प्रेमचंद अपने लेखों और कथासाहित्य में गहराई के साथ उकेर रहे थे।

जब हम आज प्रेमचंद की बात करते हैं तब तो यह बात अपने आप आती है कि हम अपने कृषिप्रधान देश की वर्तमान जल-जंगल-ज़मीन की स्थिति पर बात करें। हम सब इस बात से बहुत चिंतित हैं कि आज के कार्पोरेट समय में किसानों की ज़मीनें छीनकर चौड़े-चौड़े रास्ते, बाँध और ऐसे उद्योग स्थापित किये जा रहे हैं, जिनके कारण होने वाले तथाकथित विकास का लाभ उन किसानों या आदिवासियों को कतई नहीं मिल रहा है, जिनकी ज़मीनें हैं। उन्हें उनके स्थान से उखाड़कर अन्यत्र विस्थापित करने का क्रूर और अमानवीय नाटक खेला जा रहा है। इनका जीवन, इनकी संस्कृति, इनके जीने के संसाधनों को छीनकर इन्हें पूरी तरह हाशिये पर धकेल दिये गये एक बायोमास में बदल दिया जा रहा है। समाज का एक बड़ा तबका मनुष्य की तरह जीने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। जितनी भी खेती-बारी की ज़मीन है, अब रियल इस्टेट बनती जा रही है। कांक्रीट के जंगलों का व्यापार बहुत बड़े पैमाने पर चल रहा है। सवाल यह भी है कि आगे चलकर अनाज कहाँ से आएगा? अनाज उपजानेवाला किसान वर्ग ही अगर विलुप्त हो जाएगा तो खाद्यान्न समस्या का क्या होगा और कृषि पर निर्भर रहने वाला वर्ग किस तरह की कुशलता अर्जित कर पाएगा? सन् 1936 में ही प्रेमचंद ने अपने अंतिम उपन्यास ‘गोदान’ में किसान के खेत मज़दूर एवं शहरी मज़दूर में बदलने की प्रक्रिया का वर्णन किया। इसी तरह ‘किसानों को लूटने वाली महाजनी सभ्यता, कर्ज़ की पूंजीवादी अर्थ-नीति बैंकिंग सिस्टम एवं उपनिवेशवादी राजनीति को प्रेमचंद अपने लेखों और कथासाहित्य में गहराई के साथ उकेर रहे थे।’3 पर्यावरण पर तो बात करना अब महज़ फैशन हो गया है। जबकि पर्यावरण असंतुलन के भयावह परिणाम नित नए-नए रूपों में सामने आ रहे हैं।

पिछले दस महीने से चल रहे किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में यह बात बहुत साफ है कि, कार्पोरेट कल्चर उत्पादन को सिर्फ उपभोग से या मुनाफे से जोड़ता है जबकि भारत की कृषि-व्यवस्था में पला-बढ़ा हुआ किसान अपनी फसल को अपने खून-पसीने और मन-प्राण से सींचता था, उसके दाने-दाने में उसके जीवन का रस उतरता था। फसल उसका प्राण थी और है, उसकी संतान थी और आज भी है। खेत और उसकी फसल के साथ के उसके जीवंत और रसमय संबंधों को कार्पोरेट ने सोख लिया है। एक ओर किसानों को जीएम बीजों, कृत्रिम रसायनों और अनेक तरह के कृषि के नाम पर दिखाये जाने वाले सपनों के नाम पर बड़े-बड़े कर्ज़ों में फँसाया जा रहा है, जिसका दर्दनाक़ प्रतिफलन किसानों की आत्महत्या के रूप में दिख रहा है, वहीं दूसरी ओर उनकी उपजाऊ कृषि-भूमि अनेक प्रकार के विकास-कार्यों के लिए शासकीय तौर पर अधिग्रहित कर उन्हें मुआवज़े के लालच के अंधे कुएँ में धकेला जा रहा है। प्रेमचंद के किसान पर कसने वाले उस समय के महाजनी सभ्यता के शिकंजे का भी उत्तरआधुनिकीकरण हो गया है। ‘यह महज़ दुर्भाग्य नहीं कि साहित्य और फिल्मों से हमारे गाँव और किसान बहिष्कृत हो चुके हैं। यह विकास का नया, अनचाहा और अमानवीय माॅडल है। यही हृदयहीन पूंजीवादी समाज का निर्माण है, इसीलिए सरकारें या उनके नुमाइंदे क्रूरतम वक्तव्य देते हैं। वे कार्पोरेट और पूंजीवादी समाज के समर्थक हैं और निश्चित ही किसान विरोधी। वे खेती को ही नष्ट करना चाहते हैं, इसीलिए जब किसान आत्महत्याएँ करते हैं तो उन्हें लगता है कि उनका एजेंडा आसान हो रहा है।’4

वैश्वीकरण की बाज़ारकेन्द्रित उदार आर्थिक नीतियों के तहत सेज़, कृत्रिम बीजों-रासायनिक खादों का मायावी बाज़ार, कर्ज़ की भुलभलैया में फँसकर आत्महत्या करते लाखों किसान, जंगलों, कृषि-भूमि और गाँव-मोहल्लों से निरंतर खदेड़े जाते निरीह जनसमूहों के पक्ष में आज के साहित्यकारों को भी उसीतरह से आवाज़ उठाना होगा, जिसतरह प्रेमचंद उठाते थे। उनके समूचे कथासाहित्य एवं उनके लेखों-संपादकीयों में किसानों, मज़दूरों, दलितों, स्त्रियों पर होने वाले अन्याय की वे जिस तरह आलोचना करते थे, जिसतरह की चरित्र-सृष्टि करते थे, अपने को उनके उत्तराधिकारी माननेवाले साहित्यकार आज ऐसे मुद्दों से बचते हुए मालूम देते हैं।

माओ ने एक स्थान पर लिखा था कि ‘साम्राज्यवाद एक-दूसरे के बीच की खाई को बढ़ाता है। गाँव और शहर के बीच, एक प्रांत से दूसरे प्रांत के बीच, पीढ़ियों के बीच, महिला और पुरुष के बीच। इसे बनाए रखो और बढ़ाओ … इस असमानता को कार्पोरेट सेक्टर और बढ़ाता है।’5 प्रेमचंद ने इस खाई के एक रूप आत्मनिर्वासन के बीजों को अपने किसान पात्रों में उभरते दिखाया है। मैं उनकी सिर्फ दो कहानियों के उदाहरण देना चाहूँगी। पूस की रात का अंत याद कीजिये। खेत की पूरी फसल बरबाद होने के बाद भी हल्कू को कोई अफसोस नहीं होता। वह जान चुका है कि उसकी जी-तोड़ मेहनत के बावजूद जब वह अपने लिए एक कंबल तक खरीद नहीं पा रहा तो फसल अच्छी होने पर भी उसके लिए उसमें से क्या बच पाएगा। यह उसकी उसके भविष्य और फसल से विलगाव की अवस्था है। कहानी की अंतिम पंक्तियाँ हैं, ‘मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था। मुन्नी ने चिंतित होकर कहा – अब मजूरी करके मालगुज़ारी भरनी पड़ेगी। हल्कू ने प्रसन्न मुख से कहा – रात को ठंड में यहाँ सोना तो न पड़ेगा।’6 इन पंक्तियों में छिपी ब्लैक कामेडी को वही समझ सकता है, जो किसान की मानसिकता का जानकार हो। अत्यधिक पीड़ा किस तरह असहायता में बदलकर मनुष्य को अपने भविष्य से काट देती है, प्रेमचंद ने इन कहानियों में बखूबी व्यक्त किया है। दूसरा और भी स्पष्ट उदाहरण कफन का है। जो घीसू और माधव हमें कहानी के आरम्भ से अंत तक बहुत असंवेदनशील, कामचोर प्रतीत होते हैं, उनकी ऐसी दशा क्यों है, इसका मनो-सामाजिक कारण प्रेमचंद के ही शब्दों में जानना अधिक रोचक है। ‘जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा सम्पन्न थे, वहाँ इसतरह की मनोवृत्ति का पैदा होना कोई अचरज की बात न थी। हम तो यही कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं अधिक विचारवान था और किसानों के विचारशून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाजों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी कि बैठकबाजों के नियम और नीति का पालन करता इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उंगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम से कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते।’7 प्रेमचंद अपने जीवन की अंतिम रचनाओं में मनुष्य और समाज के बदलते संबंधों को बहुत बारीकी से व्यक्त करने लगे थे।

कालजयी रचनाकार मुंशी प्रेमचंद

प्रेमचंद ने जिस महाजनी सभ्यता की बात की थी, उसमें धन के बढ़ते महत्व को बताते हुए कहा था कि ‘इस महाजनी सभ्यता में सारे कामों की गरज महज पैसा होती है।’ उन्होंने उस समय के गुलाम भारत में नई-नई लागू हुई लोकतांत्रिक पद्धति के धनकेन्द्रित चरित्र को भी पहचान लिया था। चुनाव के बारे में उन्होंने मालती के मुख से कहलवाया है, ‘निर्वाचित पद्धति का आधार केवल धन है। अतः रानीसाहिबा जब अशर्फी की थैलियाँ खोल देंगी तो चुनाव केवल वही जीतेंगी।’ लोकतंत्र, चुनाव-प्रणाली, सामंती संस्कृति, पूंजीवादी विकास, साम्राज्यवादी विस्तार एवं भारतीय किसान या मज़दूर की अपनी विषम स्थिति – उक्त सभी मुद्दों पर प्रेमचंद क्रांतिकारी और गतिशील ढंग से विचार कर रहे थे और देश के भविष्य पर एक दृष्टि बना रहे थे8

प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि में सूरदास देसी अंग्रेज जनसेवक को कारखाना लगाने नहीं देना चाहता। आज भी किसान उद्योगों के लिए अपनी ज़मीन नहीं देना चाहता। इसको लेकर देश के कोने-कोने में आंदोलन हो रहे हैं। … सूरदास ने जनसेवक को अपनी ज़मीन नहीं देनी चाही। इसकी एक वजह यह भी थी कि यह उसके पुरखों की ज़मीन थी। भारत के लोगों को ऐसी ज़मीन से एक लगाव होता है और वे आमतौर पर इसे बेचना नहीं चाहते। आज भी गाँव की अपनी ज़मीन से लगाव होना एक स्वाभाविक-सी बात है। इसलिए कृषक औद्योगिक विकास के लिए ज़मीन छीने जाने के विरुद्ध हैं। …प्रेमचंद गाँव के लोगों और पर्यावरण को उजाड़ने के भी विरोधी थे। … प्रेमचंद को एक चिंता यह भी थी कि शिक्षा, शहरीकरण और औद्योगिक विकास आदमी के मानवीय गुणों को धीरे-धीरे मिटा देते हैं।9 उनकी चिंता जायज़ रही है। आज अपने पूर्वजों की ज़मीन या जंगल के छिन जाने और विस्थापन के दर्द को कार्पोरेट कल्चर के हितैषी कभी नहीं समझना चाहते क्योंकि उनकी जीवन संबंधी समझ होती है -‘अधिक से अधिक कमाओ, अधिक से अधिक खाओ और अकेले मौज मनाओ, बाकी जाएँ भाड़ में’ तथा ‘जो उपलब्ध है, उसका अधिक से अधिक उपभोग करो, चाहे वह दूसरों से छीनना ही क्यों न पड़े। इसी को वे विकास का द्योतक मानते हैं। परंतु अपनी भूमि और अपने प्राकृतिक परिवेश से जुड़े एक बड़े जनसमूह के जीवन में न केवल उनका परिवार एवं गाँव होता है, बल्कि उनके आसपास विद्यमान तमाम प्राकृतिक उपादान भी उनके जीवन के अनिवार्य हिस्से होते हैं। प्रेमचंद के किसान का अपनी भूमि के प्रति जुड़ाव इसी संस्कृति को प्रतिबिम्बित करता है। वे औद्योगीकरण के विरोधी नहीं थे। गोदान में मेहता द्वारा गन्ने का कारखाना लगाने का वे स्वागत करते हैं क्योंकि उससे किसान की उपज को माकूल बाज़ार मिलने की संभावना पैदा होती है।

वैश्वीकरण की बाज़ार केन्द्रित उदार आर्थिक नीतियों के तहत सेज़, कृत्रिम बीजों-रासायनिक खादों का मायावी बाज़ार, कर्ज़ की भुलभलैया में फँसकर आत्महत्या करते लाखों किसान, जंगलों, कृषि-भूमि और गाँव-मोहल्लों से निरंतर खदेड़े जाते निरीह जनसमूहों के पक्ष में आज के साहित्यकारों को भी उसी तरह से आवाज़ उठाना होगा, जिस तरह प्रेमचंद उठाते थे। उनके समूचे कथासाहित्य एवं उनके लेखों-संपादकीयों में किसानों, मज़दूरों, दलितों, स्त्रियों पर होने वाले अन्याय की वे जिस तरह आलोचना करते थे, जिसतरह की चरित्र-सृष्टि करते थे, अपने को उनके उत्तराधिकारी माननेवाले साहित्यकार आज ऐसे मुद्दों से बचते हुए मालूम देते हैं। अगर वे वाकई प्रेमचंद की विरासत को आगे ले जाना चाहते हैं तो उन्हें प्रेमचंद की तत्कालीन जनसमर्थक एवं जन-संघर्षों को आँच देने वाली कलम को उतनी ही सजगता और प्रखरता के साथ आगे बढ़ाना होगा। यही उनकी इस कार्पोरेट समय में प्रेमचंद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

संदर्भ:-

1.गणेश शंकर विद्यार्थी – रंगभूमिबया जुलाई-सितंबर 2014, पृ. 32
2.वरवर राव – कारपोरेट लूट के दौर में हाशियासमयांतर, फरवरी 2012, पृ. 79
3.प्रभा दीक्षित – भूमंडलीकरण के दौर में मुंशी प्रेमचंद का चिंतन – गवेषणा, अंक 100/2012, पृ. 93
4.कुमार अंबुज – प्रेमचंद हमेशा रहेंगे और किसानों के पक्ष में खड़े मिलेंगे – khabar.ibnlive.com
5.वरवर राव – कारपोरेट लूट के दौर में हाशियासमयांतर, फरवरी 2012, पृ. 79
6.पूस की रात
7.कफन
8.प्रभा दीक्षित – भूमंडलीकरण के दौर में मुंशी प्रेमचंद का चिंतनगवेषणा, अंक 100/2012, पृ. 93
9. शंभुनाथ से मनीषा की बातचीतगवेषणा, अंक 100/2012, पृ. 50-52

 

उषा वैरागकर आठले जानी-मानी रंगकर्मी और इप्टा के राष्ट्रीय सचिव मंडल की सदस्य हैं.

 

2 Comments
  1. Umesh Yadav says

    धारदार और जोरदार आलेख!

  2. दीपक शर्मा says

    बहुत महत्वपूर्ण लेख।

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