वेश्यावृत्ति दुनिया का सबसे पुराना पेशा है। समय बदलने के साथ विभिन्न स्थानों पर इसके नाम और स्वरूप में परिवर्तन होते गए। इन्हें देवदासी, नित्यमंगली, गणिका, मंगलामुखी, रूपाजीवा, पण्य भोगांगना, वेश्या आदि नामों से जाना जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि वेश्यावृत्ति महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध हिंसा है जो मानव तस्करी को बढ़ावा देती है जिसके शिकार गरीब और आदिवासी लोग होते हैं। वेश्यावृत्ति को कानूनी संरक्षण देकर वैध करने और सेक्स वर्कर्स को सम्मान देने के पक्ष मे तमाम लेखक और ऐक्टिविस्ट समर्थन देते हैं, जिसे नॉरडीक मॉडल कहते हैं जो कि कनाडा, आइसलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे, फ्रांस और स्वीडन मे अपनाया गया है।
मानवाधिकारों की अन्तराष्ट्रीय संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल वेश्यावृत्ति को अपराध न मानने की प्रबल पक्षधर है। तमाम प्रयासों के बावजूद इस व्यवसाय को समाप्त नहीं किया जा सका है। एक तबका यह भी कहता है कि वेश्यावृत्ति को क़ानूनी संरक्षण देकर उनके मानवाधिकारों को सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यदि उनके बच्चे शिक्षा और रोजगार पाकर बाहर निकलना चाहते हों तो उनको बिना किसी कलंकित भाव के अवसर प्रदान किये जाने चाहिए।
कौन हैं तवायफें
उत्तर मे तवायफ़, दक्षिण में देवदासी, बंगाल की बाई, गोवा की नायकिंस और ब्रिटिश काल की कुख्यात नाच गर्ल्स को इतिहास में कोई स्थान नहीं मिल सका भले ही उन्होंने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम तक में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और अपना जीवन तक बलिदान किया। इतिहास में महिलाओं को हाशिये पर धकलने और शोषण करने के हजारों उदाहरण विद्यामान हैं, लेकिन वेश्याएं तो समाज से बहिष्कृत होने के बावजूद देश के कला, संस्कृति और साहित्य के अलावा स्वतंत्रता आंदोलन में भी उल्लेखनीय योगदान किया। हालांकि इतिहास के पन्नों से उनके नाम गायब ही रहे।
पेशेगत विशेषता के आधार पर तवायफ़ और वेश्या दो अलग अवधारणाएं हैं। दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची नहीं हैं जो कि प्रायः समझ लिया जाता है जिसको स्पष्ट करते हुए वीना ओल्डेनबर्ग लखनऊ पर लिखी अपनी किताब द मेकिंग ऑफ़ कोलोनियल लखनऊ 1856-1877 में लिखती हैं कि, ‘व्युत्पत्ति के अनुसार यह शब्द ‘तौफ’ शब्द से आया है जिसका अर्थ है ‘चारों ओर चक्कर लगाना’; ‘तौवाफ’ का मूल शब्द भी ‘पवित्र कब्बा की परिक्रमा’ को संदर्भित करता है। तवायफ वास्तव में एक अवधी शब्द है जिसका अर्थ है वेश्याएँ- अत्यधिक कुशल संगीतकार, गायक, नर्तक और उन सभी चीज़ों की विशेषज्ञ जिन्हें ‘अच्छे स्वाद और उच्च फैशन’ का मानक माना जाता है। केवल धनी ‘उच्च वर्ग’ के ग्राहकों को सेवा प्रदान करते हुए, वे मनोरंजन उद्योग पदानुक्रम के शीर्ष पर थीं। हालाँकि, हमारे समाज की पितृसत्तात्मक धारणा ने जल्द ही इन सामाजिक, आर्थिक और यौन रूप से स्वतंत्र महिलाओं को देह व्यापार के बाज़ारों में धकेल दिया।
तवायफ शब्द के प्रचलन में आने के बहुत पहले भारत देश में देवदासियाँ रहती थीं जो मंदिरों में रहकर गीत संगीत और नृत्य की संस्कृति को संरक्षित और समृद्ध करती थीं। मंदिरों की देखभाल पूजा-आरती करने के अलावा उन्होंने भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्य को स्थापित किया और भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया। दक्षिण की तमिल और मलयालम भाषी कई फिल्मों में देवदासियों पर केन्द्रित फ़िल्में बनी हैं। अर्थशास्त्र में गणिका की नियुक्ति और उनके व्यवसाय से कर संग्रह की बात का उल्लेख मिलता है। अमृतलाल नागर (1994: 57-58) के अनुसार तुर्किस्तान के राजदूत अब्दुरज्जाक द्वारा विजयनगर साम्राज्य में वेश्याओं के बारे में लिखा गया है, वेश्यावृत्ति राजकीय नियंत्रण में होती थी तथा उसकी आय से पुलिस को वेतन मिलता था। इब्नबतूता ने भी तुगलककालीन भारत में दौलताबाद की वेश्याओं और गायिकाओं के बारे में वर्णन किया है।
16 -17वीं सदी में मुग़ल शासकों के संरक्षण में तवायफ संस्कृति पुष्पित और पल्लवित हुई। मुग़लकाल तवायफों के लिए स्वर्णकाल था। एक खानदानी और पारिवारिक व्यवसाय के रूप में छोटी उम्र से ही लड़कियों को विधिवत ट्रेनिंग देकर गीत, संगीत, नृत्य, बातचीत का तरीका-तहजीब सिखाया जाता था। थोड़ी बड़ी होने पर किशोरवय में उन्हें महफ़िलों में बैठाया जाता था ताकि वे अपने सीनियर से महफिलों में व्यवहार करना सीख सकें। ऐसी महफिलों से उन्हें अपने अमीर संरक्षक मिलते थे जो कला के साथ-साथ तवायफों के रूप-रंग से भी प्रभावित होते थे। कभी-कभी उनके रिश्ते शारीरिक सम्बन्धों तक बढ़ जाते थे, लेकिन प्रत्येक मामले में ऐसा होना जरूरी नहीं था।
तवायफों ने कला और संस्कृति का संरक्षण भी किया और अनारकली सूट जैसे नए फैशन और स्टाइल को भी मशहूर किया। नवाब और बड़े घरों के लोग अपने बच्चों को तहजीब, अदब और पहनावे की सीख लेने के लिए तवायफों के कोठों पर भेजते थे। शक्ति और सत्ता से सम्पन्न उच्च वर्ग की सेवा और संरक्षण में रहने के कारण तवायफें बहुत शक्तिशाली भी हो जाती थीं। हीरामंडी की मालकिन मल्लिकाजान को हुज़ूर नाम से संबोधित किया जाता था और उसे नाज़ था कि लाहौर में उसका सिक्का चलता है जिसके बलबूते वह अंग्रेज पुलिस अधीक्षक के अनुरोध को भी ठुकराने की कुव्वत रखती है।
मेरठ जिले की सरधना रियासत में तो एक तवायफ बेगम समरू ने बाकायदा सन 1778 से आगे 48 साल तक शासक बनकर राज किया। मुगल शासन के अधीन वासबसे ताकतवर और दौलतमंद शासक थीं। अमृतलाल नागर ने जे टालबॉय व्हीलर की किताब हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया में दर्ज वाकये के हवाले से मुग़ल काल की एक शक्तिशाली तवायफ लाल कुंवरी का ज़िक्र किया है जिसने तत्कालीन मुगल बादशाह जहाँदार शाह को अपने वश में कर रखा था (नागर1994:60)। नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के दिल्ली पर आक्रमण के साथ ही तवायफों की समृद्ध परम्परा का ह्रास आरम्भ हो गया। मुगल बादशाहों के पतन के साथ ही तवायफों के दुर्दिन आये और वे वेश्यावृत्ति करने को मजबूर हुईं।

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अंग्रेजी राज की नाच गर्ल और ब्रिटिश मेम साहब
मुग़ल शासन के कमजोर पड़ने के बाद भी लखनऊ और आसपास के नवाबों ने तवायफों और नृत्य संगीत की परम्परा को बचा कर रखा। ओल्डेनबर्ग तवायफों के द्वारा सरकार को दिए जाने वाले टैक्स के बारे में लिखती हैं,लखनऊ में, तवायफें “शहर में सबसे अधिक व्यक्तिगत आय के साथ उच्चतम कर ब्रैकेट में शामिल रहीं।
अंग्रेजों की इस संस्था पर हमेशा टेढ़ी नजर रही क्योंकि उनके साथ आये इसाई मिशनरियों ने विक्टोरियन नैतिक मूल्यों को जबरदस्ती भारतीय समाज और उसकी संस्थाओं एवं परम्पराओं पर थोपना आरम्भ कर दिया था। उनकी आधुनिकता की अवधारणा में तवायफ का कोठा एक अनैतिक स्थान था। शुरुआती दिनों में अंग्रेज सिपाही स्वयं मनोरंजन के लिए तवायफों का नाच-गाना देखने जाया करते थे। बाद के दिनों में उन्होंने अपने खुद के ब्रोथेल बनवाये और यूरोपीय वेश्याओं को ले आये जहाँ केवल अंग्रेज लोग ही जा सकते थे।
कुछ वक्त और गुजरने के बाद कम्पनी के अफसरों की पत्नियाँ भी भारत आयीं और अपने पुरुषों को भारतीय बाजारू महिलाओं के यहाँ जाने पर प्रतिबन्ध लगाने आरम्भ किये। मिशनरियों ने ब्रिटिश पत्नियों को आदर्श महिलाओं के रूप में प्रस्तुत किया और तवायफों को उनके एंटी थीसिस के रूप में प्रचारित किया गया। तवायफों को नियंत्रित करने के लिए उनके खिलाफ अभियान चलाये गए और सेक्स संक्रामक रोगों के नियन्त्रण के लिए कानून भी बनाये गए। नगरपालिकाओं को अधिकार दिए गए कि वेश्याओं का शारीरिक परिक्षण करके उन्हें विशेष मुहल्लों में स्थानांतरित किया जाये।
इस सम्बन्ध में शिवानी भसीन लिखती हैं, स्थिति तब और खराब हो गई जब ब्रिटिश महिलाएं अपने पतियों के साथ आने लगीं और उन्हें इन ‘बाजारू लड़कियों’ की बाहों में पाया, जो ‘शहर के हर हिस्से’ में बच्चों का पिता बन रही थीं। मिशनरियों ने इस विचार का लाभ उठाते हुए ब्रिटिश पत्नियों को आदर्श महिला के रूप में पेश किया, जबकि वेश्याओं को उनके विपरीत के रूप में प्रस्तुत किया – वह सब कुछ जो उन्हें नहीं होना चाहिए था। उन्होंने ‘स्वर्गदूत जैसी गृहिणी’ को ‘अनियंत्रित घर तोड़ने वाली’ के खिलाफ खड़ा किया। तवायफें न केवल महिलाओं की स्वतंत्रता बल्कि यौन स्वतंत्रता की भी प्रतीक थीं – एक कट्टरपंथी तरलता जो विक्टोरियन नैतिकतावादियों के लिए समझ से परे थी। इस प्रकार, इन सशक्त महिलाओं की वित्तीय और सामाजिक आत्मनिर्भरता को रोकने के लिए ‘नाच-विरोधी अभियानों’ के माध्यम से उन पर घरेलूपन थोपा गया। साथ ही, 1864 के संक्रामक रोग अधिनियम जैसे कानूनों के माध्यम से एक और अधिक आक्रामक दृष्टिकोण अपनाया गया, जिसने वेश्याओं को यौनकर्मियों के साथ जोड़ दिया और स्थानीय नगर पालिकाओं को उन्हें स्थानांतरित करने का अधिकार दिया। न केवल उन्हें जबरन बेदखल किया गया, बल्कि शारीरिक जांच भी की गई।
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तवायफों का अपमान, उनकी दशकों पुरानी संस्था को बदनाम करना, स्थानीय नवाबों और जमींदारों के लगातार अपमान और शोषण ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के खिलाफ माहौल बनाने का काम किया और 1857 के विद्रोह में इन सभी ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। यहाँ यह बताना समीचीन होगा कि बेगम हजरत महल फैजाबाद की एक तवायफ थीं और बाद में वह वाजिद अली शाह की दूसरी पत्नी बनीं। सन 1856 में जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर कब्ज़ा करके नवाब वाजिद अली शाह को कलकत्ता निर्वासित कर दिया तब बेगम हजरत महल अपने बेटे बिरजिस कादिर के साथ लखनऊ में रहीं और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह में शामिल हुईं।
तवायफ अज़ीज़नबाई ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका अदा की। उन्होंने आर्थिक सहयोग करने के साथ ही गुप्तचरों की भूमिका भी निभायी, विद्रोहियों को अपने कोठों पर छिपने की जगह भी दी। कानपुर की अजीजनबाई ने इन सबसे आगे बढ़कर सीधे विद्रोह में भागीदारी की। अंग्रेजों ने दंडस्वरूप उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली और कुर्क भी कर दिया। तवायफों के कोठों पर आक्रमण कर उन्हें लूटा गया।
खूबसूरत तवायफों को अंग्रेजों के आर्मी ट्रूप्स का मनोरंजन करने के लिए रख लेते थे। बाद में उन्हें तवायफ से बाजारू औरत में बदल दिया। हिंदी सिनेमा में उस दौर की तवायफों के जीवन और मुश्किलों पर केन्द्रित कोई सिनेमा नहीं बनाया गया। तवायफों को मुख्यधारा में शामिल करने के प्रयास कई समाज सुधारकों द्वारा किये गए लेकिन ये प्रयास बहुत सफल नहीं हुए क्योंकि समाज उन्हें स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
वेश्यावृत्ति क्या है?
वेश्यावृत्ति पैसे या भुगतान के बदले सेक्स को बेचने से जुड़ा हुआ व्यवहार है। इसमें क्रेता से शारीरिक संपर्क सम्मिलित है जिसमें एड्स जैसे संचारी रोगों के फैलने का भी खतरा रहता है। इसे सेक्सुअल सर्विस, कामर्शियल सेक्स या हूकिंग भी कहा जाता है। अंग्रेजी भाषी लोगों के बीच वेश्यावृत्ति को विश्व का सबसे पुराना व्यवसाय भी कहा जाता है। इस व्यवसाय में काम करने वालों को सेक्स वर्कर या वेश्या भी कहा जाता है। अंग्रेजी भाषा मे इन्हे हूकर और होर भी कहा जाता है। सामाजिक और कानूनी तौर पर इस व्यवसाय को ज्यादातर देशों में एक गलत और गैर-कानूनी काम माना जाता है। इसके विपरीत कई देशों में वेश्यावृत्ति को कानूनी संरक्षण मिला हुआ है और वहाँ की अर्थव्यवस्था का यह मुख्य आधार भी है।
लुइज़ ब्राउन अपनी किताब यौन दासियाँ :एशिया का सेक्स बाज़ार में लिखती हैं, दुनिया भर में स्त्रियों को बेचा जाता है, उन्हें धोखे में डालकर, लुभाकर, या जबरन वेश्यावृत्ति में धकेला जाता है। उन्हें वेश्यालयों में कैद कर दिया जाता है। छोटी बच्चियों को अनगिनत ग्राहकों को खुश करने पर मजबूर किया जाता है। वे ग्राहकों को इंकार नहीं कर सकतीं, जेल जैसे वेश्यालयों से भाग नहीं सकतीं। ये स्त्रियाँ आधुनिक दौर की यौन दासियाँ हैं। खासतौर से एशिया में इनकी संख्या दुर्भाग्य से ज्यादा है। शायद ऐसा होना भी था। जिस समाज में नवजात बच्चियों को मार डाला जाता हो, जहाँ गुमशुदा स्त्रियों की संख्या लाखों हो, जहाँ अवांछित पुत्रियों के लिए बने अनाथाश्रमों में ‘मृत्यु कक्ष’ बने हों और जो समाज स्त्रियों के साथ व्यवस्थित ढंग से भेदभाव करता हो तथा युवतियों को यौन दासता के लिए बेचता हो वहां उनकी संख्या है तो क्या आश्चर्य (ब्राउन, लुइज़ 2017:11-12 )।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के हवाले से हिंदी साहित्य के प्रख्यात कथाकार अमृतलाल नागर अपनी शोधपरक पुस्तक ये कोठेवालियां में लिखते हैं, मौर्यकाल और उसके आसपास के युग में राजदरबार एवं सम्पन्न प्रजाजनों के लिए गणिका की अनिवार्यता का पता भी चल जाता है। जहाँ तक मानव की वेश्या सम्बन्धी मान्यताओं की बात है, आज की दृष्टि से ठीक उलटी राह पर चल रहा था। आज वेश्या संस्था को समाप्त किया जा रहा है और उस काल में सरकार द्वारा ही वेश्याओं की प्रतिष्ठापना होती थी; उनके लिए एक अलग सरकारी विभाग खुला था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में सरकारी गणिकाध्यक्ष के लिए यह आदेश है कि वह सुंदर, जवान और कला निपुण युवतियों को एक हजार पणम (तत्कालीन सिक्कों) के वार्षिक वेतन पर गणिका की हैसियत से नियुक्त करे। गणिका मंगलामुखी थी। प्रातःकाल उसका मुख देखना शुभ शकुन माना जाता था। वेश्या या गणिका का अर्थ स्पष्ट है जन और गण की पत्नी जो केवल इस देश के प्राचीन इतिहास से ही नहीं वरन सारी दुनिया में मानव-सभ्यता के पितृसत्तात्मक युग में एक आवश्यक और महत्वपूर्ण संस्था बन गयी (नागर1994:54-55)।
इलियट और मेरिल ने अपनी पुस्तक सोशल डिसऑर्गनाइजेशन में वेश्यावृत्ति को परिभाषित करते हुए लिखा है, वेश्यावृत्ति को अनैतिक और स्वार्थी आधार पर भावनात्मक उदासीनता के साथ किए गए अवैध यौन संबंध के रूप में परिभाषित किया गया है अर्थात ये समाजशास्त्री बिना किसी भेदभाव के भावनारहित अवैध लैंगिक संबंध को वेश्यावृत्ति मानते हैं। जी. आर. स्कॉट ने अपनी पुस्तक ‘ए हिस्ट्री ऑफ प्रास्टिटूशन’ (1945:8) कोई व्यक्ति (पुरुष और महिला) जो किसी नए और (मौद्रिक या अन्यथा) या किसी अन्य प्रकार की व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए और आंशिक या पूर्णकालिक पेशे के रूप में, विभिन्न व्यक्तियों के साथ सामान्य या असामान्य यौन संबंध बनाता है, जो समान लिंग या विपरीत लिंग के हो सकते हैं, वह वेश्या है।
एडवर्ड जी. आर्मस्ट्रांग (2010) ने वेश्यावृत्ति को समाजशास्त्रीय ढंग से परिभाषित करते हुए लिखा है कि, वेश्यावृत्ति एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें एक व्यक्ति कामुक और भावनात्मक रूप से उदासीन तरीके से सेक्स बेचता है। इस परिभाषा को चार भागों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक की अलग-अलग जांच की जाती है। ये भाग हैं वेश्यावृत्ति (1) एक व्यवसाय; (2) बेचने का कार्य; (3) एक यौन आदान-प्रदान; और (4) एक कामुक और भावनात्मक रूप से उदासीन गतिविधि।
आर्मस्ट्रांग की परिभाषा के अनुसार वेश्यावृति बिना किसी भावनात्मक लगाव के अनेक लोगों से पैसे कमाने के लिए अपने शरीर को बेचने की गतिविधि है। संगठनात्मक या असंगठनात्मक रूप में यह प्रथा दुनिया के सभी देशों में पाई जाती है। तमाम प्रयासों के बावजूद वेश्यावृत्ति का समाज से अंत न होना और नए-नए फॉर्म में अपना वजूद बनाये रखने के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि वेश्यावृत्ति समाज के लिए आवश्यक बुराई है।
समाजशास्त्री किंग्सले डेविस ने वेश्यावृत्ति का एक प्रकार्यात्मक नजरिया प्रस्तुत किया है जो वेश्या को एक सेफ़्टी वाल्व के रूप में देखता है। समाजशास्त्रीय शब्दकोश मे स्कॉट ने इस बारे में लिखा है वेश्यावृत्ति एक सुरक्षा वाल्व के रूप में है, जो विवाह की प्रतिष्ठा को बनाए रखने में मदद करती है” (स्कॉट2009: 608) … लेकिन नारीवादियों ने बताया है कि वेश्यावृत्ति महिलाओं के लिए कोई सुरक्षा वाल्व प्रदान नहीं करती है और वास्तव में उन लोगों को नियंत्रित करती है जो पवित्र नहीं हैं उन्हें वेश्या के रूप में लेबल किया जाता है।
ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन सा दयार है
असमानता के पोषक भारतीय समाज में वेश्यावृत्ति एक व्यवसाय के रूप में कैसे अस्तित्व में आई? समाज का कौन सा वर्ग था जिसने इस व्यवस्था को पोषित किया और संरक्षण दिया, वेश्यावृत्ति को एक धंधे के रूप में अपनाने वाली महिलायें किस जाति-वर्ग से थीं? समय के साथ इस प्रोफेशन में किस तरह के परिवर्तन आये? क्या तवायफ, वेश्या, बारगर्ल एक ही हैं या उनमें कोई फर्क होता है? वेश्यावृत्ति का समाजशास्त्र क्या है? इन सब सवालों के जवाब वेश्यावृत्ति के मुद्दे पर बनी फिल्मों की विषयवस्तु का विश्लेषण के माध्यम से भी खोजने की जरूरत है। आखिर सिनेमा ने इन सवालों को किस भाव से उठाया है। यह जानना बहुत जरूरी है।