‘बलचनमा’ का पुनःपाठ जरूरी है

वीरेंद्र यादव

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जयंती पर विशेष

नागार्जुन के उपन्यास ‘बलचनमा’ के लेखन-प्रकाशन  के लगभग सात दशक बाद इसका यह  पुनः पाठ महज एक उपन्यास पर पुनर्विचार न होकर औपन्यासिक विधा की उस सामर्थ्य से रूबरू होना है जिसे महज साहित्यिक पाठ से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए जरूरी है कि  उपन्यास को महज साहित्यिक संरचना के रूप में सीमित न  कर उसे सामाजिक संरचना के रूप में भी विश्लेषित किया जाय। यहाँ दिलचस्प  यह तथ्य है कि 1936 के जिस वर्ष में  प्रेमचंद के अंतिम उपन्यास ‘गोदान’ का प्रकाशन हुआ था ‘बलचनमा’ की  कथावस्तु  का समापन वर्ष वही है। ‘बलचनमा’ का घटनास्थल बिहार का दरभंगा जिला है तो उसका घटनाकाल 1937 की शुरुआत तक का  है। ‘गोदान’ की कथाभूमि तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के अवध इलाके की  है लेकिन कथासमय लगभग वही है स्वाधीनता आन्दोलन और प्रांतीय  असेम्बलियों  के चुनाव पूर्व तक का। ‘गोदान’ के राय साहब भी स्वधीनता आन्दोलन में जेल जाते हैं और ‘बलचनमा’ के फूल बाबू भी। ‘गोदान’ का  होरी भी शूद्र खेतिहर है और ‘बलचनमा’ का बालचंद भी ।होरी भी अपने खेत को बचाने का संघर्ष करता है और बलचनमा भी । जिस तरह ‘गोदान’  स्वाधीनता आन्दोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले देसी प्रभुवर्गों की दुहरी भूमिका का उद्घाटित करता है उसी तरह ‘बलचनमा’ उपन्यास  भी। धनिया की ही तरह बलचनमा भी यह प्रश्न उठाता है कि “सोराजी हो गए तो क्या ,थे तो आखिर बाबू-भैय्या ही न ! गरीब-गुरबा का दुःख ये लोग क्या जानें ?” प्रेमचंद और नागार्जुन के उपन्यासकार का यह अंतर अवश्य  था कि जहाँ प्रेमचंद अपने वर्तमान की कथा लिख रहे थे वहीं नागार्जुन प्रेमचंद के समय की कथा डेढ़ दशक के अंतराल   के साथ  लिख रहे थे। प्रेमचंद अपने समय के  स्वाधीनता आन्दोलन के साक्षी थे तो नागार्जुन स्वाधीन भारत  के बनते स्वरूप को भी  देख रहे थे। इसीलिये वे निर्णायक रूप में ‘बलचनमा’ की जुबानी यह कहला सके कि, “जैसे  अंगरेज बहादुर से सोराज लेने के लिए बाबू-भैय्या लोग एक हो रहे हैं ,हल्ला-गुल्ला और झगड़ा-झन्झट  मचा रहे हैं उसी तरह जन-बनिहार ,कुली-मजूर और बहिया-खवास लोगों को अपने हक़ के लिए बाबू –भैय्या से लड़ना होगा।”

दरअसल ‘बलचनमा’ एक खेतिहर  मजदूर के संघर्षशील युवा के रूप में  व्यक्तित्वांतरण की कथायात्रा है। नागार्जुन के कहन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने  कथा-सूत्र को वृहत और सूक्ष्म दोनों ही धरातलों  पर विरल रचनात्मकता के साथ कथात्मक बनाते हैं। उपन्यास के पहले ही पृष्ठ पर दो कलमी आम चुराने के अपराध में बलचनमा के पिता के पीटे जाने और मृत्यु की घटना  बिहार के सामन्ती जुल्म तले शूद्रों और दलितों की जिस दारुण यातना का चित्र उकेरता है वह एक साथ चाक्षुष और वाचिक है। बलचनमा जाति का ग्वाला था। उसी के शब्दों में “हमारे गाँव में पंडितों का बड़ा दबदबा है।राज ही उन्हीं का है ।हाँ भैय्या ,आजकल भी । अब तो थोडा बहुत जमाना बदल भी गया है ,मुदा कुछ पाहिले  अगर तुम इसी भांति सतमहला बाल छंटाये, दाढी-मूंछ साफ़ किये मेरी बस्ती में पहुँच जाते ,तो परलय (प्रलय) मच जाता । दादी की कही हुयी बात सुनाऊँ । मेरा बाबू  एक बार ढाका से आया ,बावडी छंटाकर। बूढ़े मालिक उन दिनों महजूत थे । उन्होंने मेरे बाप को बड़ा ही फटकारा ।पछ्वारी टोल के पंडित बबुवन झा बुलाये गए और उन्होंने फ़तवा दिया ।नदी के किनारे जाकर असतूरा(उस्तरा) से बाल कटाना होगा ।बाबू को झख मारकर माथ मुड़ाना पड़ा । एक बार मेरा मामा आया तो हाट पर जाकर उसने दाढ़ी बनवाई ।मुझे भी ले गया था ।मेरे भी बाल छंटवा दिए थे ।क्या पूछते हो भाई, कितना बावेला मचा उस रोज ! अगले ही दिन मुझे भी परास्चित (प्रायश्चित) करना पड़ा”। बलचनमा के शब्दों में  ‘मलिकाइन नहीं चाहती थी कि मैं अच्छर बाचूं  या गिनती-पहाडा याद करूँ।’ क्योंकि ‘छोटी जातवालों को जो एक आखर भी ज्ञान देता है उसका अपना ही तेज घटता है ;और जो कोई शूद्र को समूची पोथी पढ़ा दे उसके पितर स्वर्ग छोड़कर नरक में रहने को मजबूर होते हैं!’  अपने समूचे कथ्य में यह उपन्यास इस तरह के प्रसंगों और विवरणों के माध्यम से सामाजिक न्याय के उस गर्भ-गृह का पता देता है जहाँ से मंडल-मंदिर की परिघटना को भी समझा जा सकता है। अपनी संरचना में  यह उपन्यास बलचनमा का आत्मकथात्मक वृत्तांत है। उसी के शब्दों में ‘गालियां ,पिटाई,तिरस्कार,अपमान, दुतकार और फटकार यही वह रास्ता था जिस पर से मेरा जीवन आगे की ओर खिसक रहा था ।’ लेकिन उसे नयी दुनिया का साक्षात् तब हुआ जब वह अपनी मलिकाइन के भतीजे फूल बाबू के खवास (अनुचर) के रूप में पटना आया।

सच तो यह है कि ‘बलचनमा’ अपने समूचे कथ्य में स्वाधीनता आन्दोलन के कांग्रेसी नेतृत्व का निम्नवर्गीय दृष्टिकोण से किया गया आलोचनात्मक भाष्य है। छोटे छोटे विवरणों और लुप्त व अचर्चित प्रसंगों के माध्यम से यह स्वाधीनता इतिहास की उन अनुपस्थितियों को दर्ज करता है जिनके बिना स्वाधीनता आन्दोलन की प्रकृति को सम्पूर्णता में नहीं समझा जा सकता ।

‘बलचनमा’ के फूल बाबू के चरित्रांकन के माध्यम से नागार्जुन स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल उस अभिजात और प्रभुत्वशाली वर्ग का क्रिटिक रचते हैं जिसकी कांग्रेस में प्रभावी  भूमिका थी । सेठ –साहूकारों के स्वाधीनता आन्दोलन में जुडाव का  तथ्य औपन्यासिक कथ्य में कुछ यूं अंतर्गुम्फित है ‘कलकत्ता ,बम्बई के सेठ-साहूकार भीतर ही भीतर गांधीजी का पक्ष ले रहे थे ।उनको साफ साफ लौकता था कि सुराज होने से सबसे जास्ती भलाई उन्हीं की होगी ।वे देख रहे थे कि सरकार झुकती है ,तो सुराज मिलता है ।सुराज मिलता है तो अधिक से अधिक कल-कारखाने वे खड़ा कर सकते हैं । अभी जो देस को दुहकर सारी धन-संपदा अंगरेज ले जाते हैं ,सुराज होने पर वह सब सीधे उनके खजाने में आने लगेगी।’   गांधी जी का सुराजियों को निर्देश था कि वे आश्रम में अपने साथ नौकर चाकर नहीं रखेंगें ।नागार्जुन ‘बलचनमा’ में यह तथ्य उद्घाटित करते हैं कि किस तरह बड़े घरों और उच्च जातियों के लोग वालिन्टीयर के नाम पर अपने साथ नौकर खवास रखते थे । इन सब का काम उनकी जातियों के अनुसार निर्धारित होता था। ‘फूल बाबू का सुभाव बड़ी जातवालों के सुभाव से लाख गुना अच्छा था’ लेकिन बलचनमा का उनसे  मोहभंग तब हुआ जब उन्होंने   मलिकार द्वारा उसकी बहन के साथ दुर्व्यवहार करने पर उसे कोई मदद नहीं की  । फूल बाबू से निराश  बलचनमा का निष्कर्ष था  कि ‘बाबू-भैया लोग वहीं तक हमारा पक्ष लेंगें जहाँ तक उनका अपना मतलब रहेगा।’  लेकिन बलचनमा की यह निराशा तब पूर्णता प्राप्त करती है जब वह बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए कांग्रेस की ओर से दी जाने वाली मदद के दौरान फूल बाबू के भ्रष्ट आचरण को देख कर ‘कांग्रेस के बारे में सोचने लगा कि ‘स्वराज मिलने पर बाबू-भैया लोग आपस में ही दही-मछली बाँट लेंगें ,जो लोग आज मालिक बने बैठे हैं आगे भी तर माल वही उड़ावेंगें हम लोगों के हिस्से सीठी ही सीठी पड़ेगी।’  उपन्यास में बिहार भूकंप में कांग्रेस के रिलीफ फंड की किंचित विस्तृत चर्चा से  इस तथ्य का भी रहस्योदघाटन होता है कि भ्रष्टाचार में भी अगड़ी, पिछड़ी और दलित जातियों में भेदभाव किया जाता था। निम्न जातियों को कागज पर  और वास्तव में दी जाने वाली राशि का प्रतिशत कम था  जबकि उच्च जातियों में अधिक। उदाहरण स्वरूप तारानंद झा के नाम पर रकम  लिखी थी 30 रु।जबकि मिले थे उन्हें 15रुपये। इससे अलग बुद्धू चमार और करीम बक्स के नाम लिखे गए थे 15 रुपये जबकि दिए गए थे उन्हें मात्र 3 रुपए।

सच तो यह है कि ‘बलचनमा’ अपने समूचे कथ्य में स्वाधीनता आन्दोलन के कांग्रेसी नेतृत्व का निम्नवर्गीय दृष्टिकोण से किया गया  आलोचनात्मक भाष्य है। छोटे छोटे विवरणों और  लुप्त व अचर्चित प्रसंगों के माध्यम से यह स्वाधीनता इतिहास की उन अनुपस्थितियों को दर्ज करता है जिनके  बिना स्वाधीनता आन्दोलन की प्रकृति को सम्पूर्णता में नहीं समझा जा सकता । उपन्यास उन परिवर्तनकामी आंदोलनों की सामर्थ्य और सीमा को भी रेखांकित करता है जो कांग्रेस के बरक्स उठ खड़े हुए थे। उपन्यास के राधा बाबू का कांग्रेसी से सोसलिस्ट हो जाना और किसान सभा के नेतृत्व में आन्दोलन ऐसे ही प्रसंग है। बलचनमा के लिए सोसलिस्ट होने का मतलब था कि ‘दरभंगा के महराज हों  चाहे पटना के लाट साहब –मुफ्त का खाना किसी को नहीं मिलेगा — सब काम करेगा ,सब दाम पावेगा ।। लूल अपंग, बूढ़-बेकार सबकी जिम्मेवारी सरकार को उठानी पड़ेगी ,पैसे के बल पर कोई किसी को बंधुआ गुलाम नहीं बना सकेगा ।।।जिसका हर-फार उसकी धरती! जिसका हुनर और जिसका हाथ उसी का कल-कारखाना’  सच है कि राधा बाबू जैसे सोसलिस्ट नेताओं की भूमिका गाँव को गरमाने तक थी लेकिन इन आन्दोलनों के चलते बलचनमा जैसों का व्यक्तित्वांतरण हाशिये के समाज की बड़ी शक्ति थी। बलचनमा का यह संकल्प कि ‘हमने यह तय कर लिया है कि आगे बित्ता भर भी जमीन मालिकों को हडपने नहीं देंगें’ उपन्यासकार की ल मेहनतकशों का साथ दिया । लेकिन अपने अंतिम परिणतियों में यह उपन्यास निम्नजन की विजयगाथा न होकर उनकी संघर्षचेतना का ही वाहक है। उपन्यास के अंत में बलचनमा का आत्मस्वीकार है कि ‘मैं बंधा था और जाल में सभी अंग उलझे हुए थे ।हाँ दांतों से एक की कलाई को चांपे हुए था।’

बलचनमा पुस्तक

‘बलचनमा’ की विशेषता यह भी है कि यह अपने समय और समाज का प्रमाणिक दस्तावेज भी है। बिहार के तत्कालीन  सामंती समाज में उच्च सवर्ण जातियों में स्त्रियों को लेकर क्या नजरिया था इसका खुलासा भी उपन्यास में बेबाकी के साथ कई प्रसंगों में हुआ है। स्त्रियों के पढने लिखने के प्रति ग्रामीण समाज के कुलीन वर्ग की सोच थी कि ‘पढता सूगा गाहक को अपनी ओर खींचता है ,पढ़ती लडकी काबिल दूल्हे को अपनी ओर खींचती है ।इससे बाप का काम हलका होता है ।शादी हुयी कि पढ़ाई बंद ।बाप भी आँख मूँद लेता है ,ससुर भी।’ लेकिन निम्न जातियों के बीच उनके श्रमशील होने के चलते स्थिति भिन्न थी । उच्च जातियों और निम्न जातियों के बीच स्त्रियों की इस भिन्नता को उपन्यास के इस अंश से समझा जा सकता है। ‘गरीबों के यहाँ बहू हो चाहे बेटी ,खेत में काम करने जाना पड़ेगा ,पानी भरना होगा ,माल-मवेशी चराने होंगें ।सिंगार पटार में बर्बाद करने लायक बखत गरीब घर की जनानी को कहाँ से मिलेगा ? बड़ी जातवाले चाहे कितना ही गरीब हों ,उनके घर की औरतें रोजी-धंधा के कामों में मर्दों का हाथ नहीं बटा सकतीं ।उनके यहाँ औरतें निकम्मी –निठल्ली  बैठी रहती हैं ।जितना ही बड़ा खानदान होगा ,औरतों में उतना जास्ती निठल्लापन पाओगे ।हमारी औरतें मेहनत-मजूरी का दाना खाती हैं । अपनी माँ-बहनों और बहू-बेटियों के  हाथ-पैर  हमारे यहाँ सिरिफ छूने –मसलने या नचाने-थिरकाने का सामान नहीं हुआ करते; हमारी जिन्दगी का सहारा हैं वे हाथ-पैर।’  यही कारण है कि निम्न जातियों में बेटी-बेटे को लेकर भिन्न दृष्टिकोण भी उपन्यासकार  कुछ यूं प्रस्तुत करता है-‘हमारी बिरादरी  बराहमन की ,भूंईहार-रजपूत की नहीं है कि लडकी के सीन्थ में सेंदूर पड़ना पहाड़ हो जायेगा ।काहे की सोच ,काहे की फिकिर ?’ इसी प्रकार नागार्जुन अपने इस उपन्यास में धार्मिक कर्मकांड का संबंध भी आर्थिक सम्पन्नता से जोड़ते हैं। उपन्यास की इन पक्तियों से इसे बेहतर समझा जा सकता है ‘महंथ –बैरागी किसके-किसके गले में कंठी बांधते फिरेंगें ? कोठी-बखारी में धान –चाउर भरा हो ,बाग़-बगीचे में तर-तरकारी ,फर-फूल लगा हो तभी कंठी की इज्ज़त बची रहती है।गरीबों के गले में चार दिन भी कंठी सही-सलामत बंधी नहीं रह सकती ।’

अपनी सम्पूर्णता में ‘बलचनमा’ का औपन्यासिक महत्व इस तथ्य में अन्तर्निहित है कि यह स्वाधीनता आन्दोलन के प्रथम दौर का  आंतरिक क्रिटिक तत्कालीन सामाजिक संरचना में रच बस कर प्रस्तुत करता है। विशेषरूप से उल्लेखनीय है इस उपन्यास की वह आत्मकथात्मक संरचना ।जिसके अंतर्गत उपन्यासकार ने बलचनमा की कहानी बलचनमा की जुबानी प्रस्तुत की है। दो राय नही कि परकाया प्रवेश के बिना यह संभव नहीं था। लेकिन नागार्जुन  का ‘बलचनमा’  में यह परकाया प्रवेश महज एक तकनीकी दक्षता न होकर वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर हाशिये के निम्नजन के साथ एकाकार होने की प्रतिबद्धता का सुफल भी है। आज जब मुख्यधारा के साहित्य में वर्ण और वर्ग से मुक्त होकर हाशिये के समाज से एकाकार होने की परम्परा का दिनोंदिन क्षरण हो रहा है तब इस परम्परा की श्रेष्ठ कृतियों के रेखांकन द्वारा इसकी जरूरत और महत्व को  समसामयिक सन्दर्भों में पुनर्परिभाषित किये जाने की जरूरत दरपेश है।

 

 वीरेंद्र यादव हिन्दी के जाने-माने आलोचक हैं । यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है ।

1 Comment
  1. Ramnaresh Yadav says

    यह समीक्षा पढ़ते हुए मुझे एक किस्सा याद आ गया. 1991 या 1992 की बात होगी. मधुबनी जिला के लखनौर प्रखंड मुख्यालय से सटा एक गाँव है- बलिया. वहाँ ब्राह्मणों की एक बड़ी आबादी है. उसी गाँव में एक गोवार टोली भी है, जहाँ मैं अपने भतीजे को मैट्रिक परीक्षा दिलाने हेतु ठहरा हुआ था. यह टोला सीमांत किसानों का था. कुछ यादव लोग ब्राह्मणों की खेती बटाईदारी पर करते थे. एक सुबह जब मैं वहाँ था तो अचानक किसी की जोड़ जोड़ से बोलने की आवाज मेरे कानों तक गूँजने लगी. दर असल में बहुत ही सुंदर व लोचपूर्ण मैथिली में कोई किसी को डाँट रहा था. मुझे समझते देर नहीं लगा कि डाँटने वाला ब्राह्मण है और उस डाँट को उतनी ही सिद्दत से प्रतिकार करने वाला एक यादव किसान. ब्राह्मण रैयत हटवाने को अपने खेत में हल ले जाने को बोल रहा था, जबकि किसान को उस दिन हल बैल की स्वयं जरूरत थी. मेरे लिए किसी ब्राह्मण द्वारा किसी यादव को डाँटने की मुद्रा में बात करना बिलकुल नया अनुभव था, क्योंकि मैं जिस इलाके से हूँ वहाँ ब्राह्मण अल्पसंख्यक और यादव बहुसंख्यक हैं. मुझे बुरा लग रहा था. मुझसे भी बुरा उस ब्राह्मण को लग रहा था जिसके आदेश को पहली बार न सिर्फ अनसुनी की जा रही थी बल्कि उन्हें जवाब भी मिल रहा था. चुपचाप आदेश पालन केअभ्यस्त यादव हलवाहा तकरार किये जा रहा था. यह घटना उस गाँव में पहली बार घटित होते हुए मैं गवाह बन रहा था. बलचनमा जाग गया था, अनाधिकार चेष्टा को न सिर्फ तौल रहा था बल्कि सिर तानकर खड़ा हो गया था.

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