वास्तविक नहीं सात्विक कहानियाँ

अनूप मणि त्रिपाठी

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(एक)
जुलूस निकल रहा था। भीड़ नारे लगा रही थी। बहुतों के हाथों में एक रंग के झण्डे लहरा रहे थे। जिनके हाथों में झण्डे नहीं थे, वे अपने हाथों में अस्त्र चमका रहे थे। उनमें से एक झण्डे ने पास वाले झण्डे से धीरे से कहा,’इधर मैं देख रहा हूँ,अपने लोग काफी धार्मिक हो रहे हैं…’  ‘उहुँ, बेरोजगार….’ दूसरे झण्डे ने लहराते हुए जवाब दिया।
(दो)
सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं। युवाओं की नसें फड़क रहीं थीं। उनका खून उबाल मार रहा था। माहौल में गजब की गर्मी थी।
टोली के अगुआ ने नेता जी के सुपत्र से बहुत नरमी के साथ पूछा, ‘भईया, आप नहीं चलेंगे!’
नेताजी के सुपुत्र ने मुँह में मसाला झोंका और बोले,’अरे यार कहाँ! छिहत्तर ठू काम धरे पड़े हैं इहाँ… तुम लोग जाओ!’
(तीन)
दूसरे धर्म स्थल पर एक दूसरे धर्म का झण्डा लगा दिया गया।
नये-नये लगे झण्डे ने फड़फड़ाते हुए कहा, ‘अब तो पुलिस भी हमारे साथ है…’
‘ नौकरी की मांग करते हुए यही लोग जरा धरने पर बैठ कर देखें…फिर देखते हैं…’ पुराना झण्डा थिर होकर बोला।
(चार)
धार्मिक जुलूस निकलने के बाद गली में सन्नाटा था। पत्थरों से पूरी गली पट गयी थी। पत्थर खून से सने थे। कोई देखता तो यही कहता कि वे खून के आँसू रो रहे हैं। सदियों बाद एक नई सभ्यता का विकास हुआ। वहाँ खुदाई हुई। खनन में  रोटी के कोई अवशेष न मिले। और न ही तो कोई जीवाश्म मिला। न कोई किताब मिली,और न ही कोई डिग्री। मगर जब खुदाई थोड़ी और गहरी की गई तो नये मानव के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उसे अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। उन पत्थरों के नीचे उसे एक कुर्सी मिली। और कमाल की बात यह कि वह कुर्सी बिल्कुल नई-सी दीखती थी। उस पर कमाल यह कि कुर्सी काठ की नहीं अस्थियों की बनी हुई थी।
(पांच)
जुलूस निकल रहा था। नारे तेज और तेज होते जा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो धरती डोल रही हो। देखते ही देखते भीड़ ने एक बुजुर्ग का फलों से लदा ठेला पलट दिया।
‘यू का माजरा है!’ गधे ने गधी से पूछा।
‘श श श ! ‘ गधी ने चुप रहने का इशारा किया।
गधा कहाँ मानने वाला था। उसने फिर पूछा,’क्या हो रहा है!’
‘चुप!कुछ मत पूछ! अब तो सोचना भी गुनाह है! धर लिए जाओगे!’ गधी बोली।
थोड़ी देर चुप रहने के बाद गधे ने फिर पूछा,’यू चल क्या रहा है!’
‘नये देश का निर्माण चल रहा है!’ गधी ने खीजते हुए कहा।
‘अच्छा,तो नये देश के निर्माण में कुछ अपना भी तो योगदान होना चाहिए!’ गधा जोश में बोला।
‘…तो जा कर न …’ गधी गुस्से से बोली।
गधा दौड़ कर जुलूस में शामिल हो गया और जोर-जोर से रेंकने लगा।
(छह )
लाउडस्पीकर से आवाज आनी शुरू हो गयी थी।
‘ये स्याले!’ बड़ा भाई गुस्से से बोला।
‘भईया, लाउडस्पीकर काम कैसे करता है!’ अचानक छोटे भाई ने पूछ लिया।
इस सवाल से बड़ा भाई अटपटा गया और ताली पीटते हुए बोला,’स्याला आज तक तो कभी हम सोचे ही नहीं!’ यह कहकर वह हँसने लगा।
(सात)
छत पर बैठी कबूतरी ने कबूतर से पूछा,’
पेट्रोल 15 दिनों में 9.20 रुपए मंहगा हुआ!अब सरकार क्या करेगी!’
कबूतर इत्मीनान से बोला, ‘वह किसी दूसरे शहर का नाम बदल देगी!’
जब दोनों के बीच उपर्युक्त बातें हो रही थी,तभी युवाओं का एक जत्था धार्मिक नारे लगाता हुआ उनके पास से गुजरा।
न चाहते हुए भी दोनों को अपनी वाणी को विराम देना पड़ा।
(आठ)
‘सर पिता जी की पेंशन अभी तक चालू नहीं हुई! वे बहुत बीमार हैं…’ लड़का मरमराती आवाज में बोला।
‘मसाला खाते हो!’ अफसर ने पूछा। अफसर नया था।
‘नो सर!’ लड़के ने धीरे से कहा।
‘आज खाना नहीं खाये हो!’
‘जी सर!’ लड़का फुसफुसाया।
‘इतना मरे-मरे क्यों बोल रहे हो यार! इतने जोर से तो बोलना ही चाहिए कि अगले को स्पष्ट सुनाई दे!’ यह कहकर अफसर मुस्कुराया। वह दयालू निकला।
नये अफसर द्वारा नई आश्वस्ति पाकर लड़का दफ्तर से जब निकल रहा था,तो वह मन ही मन अफसर पर हँस रहा था। अब वह अफसर से क्या कहता कि जुलूस में हर बार सबसे आगे उसे ही क्यों रखा जाता है, क्योंकि जब वह नारे लगाता, तो उन्हें वह सातवें आसमान तक पहुँचा देता है।
(नौ)
जुलूस के बाद दोनों मित्र बाजार निकल आये।
‘आज तो नारे लगाते लगाते गला बैठ गया!’ एक बोला।
‘लौकी कैसे दिए!’ दूसरे ने लौकी के दाम पूछे। दाम सुनकर उसका दिल बैठ गया।
‘वैसे आज तुमने भी इतनी जोर से नारे लगाए हैं कि दुश्मनों के कान के परदे फट गये होंगे!’ गर्व से लबालब होकर उसके दोस्त ने उसे सम्बल प्रदान करने की चेष्ठा की। उसी जोश में उसने नींबू के दाम पूछे।
नींबू के दाम सुन उसका मन खट्टा हो गया। दोनों मित्र जब बैठे दिल और खट्टे मन से सब्जी तौला रहे थे, ठीक उसी वक्त सब्जी मंडी में इधर-उधर मुँह मारता हुआ सांड उनके पास से गुजरते हुए बोला, ‘दामों में तो जैसे आग लगी हुई है!’
‘इसलिये बाहर आग लगाई जा रही!’ सांड के पीछे-पीछे आती गाय भी बोलती हुई निकल गई।
(दस)
नये-नये दो लाउड स्पीकर लग चुके थे। अब वे अपना काम पूरी ईमानदारी से कर रहे थे।
एक दिन एक लाउड स्पीकर उदास था। तो दूसरे लाउड स्पीकर ने इसका कारण पूछा।
‘मुझे लगता है कि हम गलत जगह फिट किये गए हैं!’ पहला लाउड स्पीकर बोला।
‘ इतने दिनों बाद ..आज अचानक कैसे!’
दूसरे लाउड स्पीकर ने अपने मित्र के दुख को समझने की कोशिश की।
‘अचानक नहीं रे! इतने दिनों से जो कुछ देखा तो ये खयाल आया!’ लाउड स्पीकर धीरे से बोला।
‘तो तुम्हारे हिसाब से हमें इस समय कहाँ होना चाहिए था!’ दूसरे लाउड स्पीकर ने पूछा।
‘मुझे लगता है कि हमें आम आदमी के गले में फिट होना चाहिए था…’
अभी दूसरा लाउड स्पीकर हँसने ही वाला था कि तभी वहाँ एक फरियादी आ गया। दोनों चुपचाप उसे सुनने लगे। फरियादी रुआंसे स्वर में बोला,’ दया करो! अब तुम भी नहीं सुनोगे तो कैसे चलेगा!ऊपर से नीचे तक हम गरीब की कहीं सुनवाई नहीं है…’
अब दूसरे लाउड स्पीकर की हँसी पूर्णतःगायब हो चुकी थी । वह पहले लाउड स्पीकर को बहुत आदर के साथ लगातार देखे जा रहा था…
(ग्यारह)
छोटे पत्थर के ऊपर ताजा-ताजा खून लगा हुआ था, जो अभी तक सूखा भी नहीं था।
‘तेरे तो खून निकल रहा है!’ बड़े पत्थर ने छोटे पत्थर को देखते हुए कहा।
‘ऐसे माहौल में मजाक करना आपको शोभा नहीं देता…’ छोटा पत्थर बिगड़ते हुए बोला।
बड़ा पत्थर ग्लानि से भर गया। उसने माफी मांगने में देर न लगाई।
शोभायात्रा निकल चुकी थी। शोर थम चुका था। दोनों से काम लिये जा चुके थे। और अब दोनों अनाथ होकर बीच रास्ते में पड़े हुए थे…

अनूप मणि त्रिपाठी स्वतंत्र लेखक हैं और लखनऊ में रहते हैं।

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