भारत की साहसी न्यायपालिका और जोतीराव फुले का स्मरण (डायरी 28 नवंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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बदले हालात में न्यायपालिका ही शासन का वह तंत्र है, जिसकी साख कुछ हद तक बची है। इस वाक्य को लिखते समय मैं सावधानी बरत रहा हूं। इसकी वजह यह कि न्यायपालिका पर सवाल भी बहुत उठे हैं और इसके प्रमाणों की कमी नहीं है कि न्यायपालिका ने अपने न्याय-धर्म का पालन नहीं किया। इसके बावजूद मैं यह मानता हूं कि जितनी गिरावट विधायिका और कार्यपालिका में हुई है, न्यायपालिका में उतनी नहीं हुई है। अब भी उसने अपने आपको साबित किया है। हालांकि यह नजारा बदला है सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण के कारण। उन्होंने कुल मिलाकर न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को स्थापित किया है। कल ही उन्होंने एक अहम बात कही है। उनका कहना है कि विधायिका अपने द्वारा बनाए जानेवाले कानूनों के प्रभाव का आकलन नहीं करती है और इसके कारण मामले बहुत बढ़ जाते हैं और इसका सारा बोझ अदालतों पर पड़ता है।

मुख्य न्यायाधीश का उपरोक्त कथन सीधे-सीधे केंद्र सरकार और संसद दोनों के ऊपर सवाल है। इसका एक प्रमाण यह कि पिछले साल सरकार ने प्रचंड बहुमत के आधार पर तीन कृषि कानूनों को पारित करवाया। राष्ट्रपति तक ने मानो उन्हें पढ़े बिना अपनी स्वीकृति दे दी। लेकिन किसान असहमत थे। उन्होंने आंदोलन किया। अदालत को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा।

जोतीराव फुले ने हालांकि 63 साल का छोटा जीवन ही जिया, परंतु उनका जीवन सार्थक था। उन्होंने बहुसंख्यकों को बताया कि वे गुलाम कैसे बनाए गए हैं। उन्होंने वर्चस्ववादी ब्राह्मण ग्रंथों की धज्जियां उड़ा दी। उन्होंने 1873 में कहा था कि शासन-प्रशासन में समुचित भागीदारी के बगैर समाज बदलने वाला नहीं। उन्होंने आरक्षण का मंत्र इस देश को दिया।

मुझे लगता है कि मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण ने अपनी बात कह दी है। मैं तो कल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के द्वारा दिए गए एक बयान को देख रहा हूं। दिलचस्प यह कि मुख्य न्यायाधीश कल जब अपनी बात कर रहे थे तब सभा में राष्ट्रपति भी मौजूद थे। मौका था सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित संविधान दिवस समारोह का। राष्ट्रपति ने कहा कि अदालतों के अंदर अपने कक्ष में जजों को अत्याधिक विवेक का उपयोग करना चाहिए।

जाहिर तौर पर राष्ट्रपति के कथन का मतलब मुख्य न्यायाधीश के उलट है। उन्हें उनकी बात चुभ गई और उन्होंने अपनी पीड़ा ‘अत्याधिक विवेक’ के जरिए व्यक्त कर दी।

खैर, आज तो मैं न्यायपालिका का मुरीद हूं। वजह बहुत ही खास है। दरअसल, कल दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा ने बात ही कुछ ऐसी कह दी है। कल वे सलमान खुर्शीद की किताब सनराइज ओवर अयोध्या : नेशहुड इन ओल्ड टाइम्स को प्रतिबंधित किए जाने के मामले की सुनवाई कर रहे थे। इसी किताब एक अध्याय द सैफ्रॉन स्काई में सलमान खुर्शीद ने हिंदुत्व की तुलना आतंकी संगठन आईएसआईएस और बोको हराम से की है।

इस किताब को प्रतिबंधित करने से इन्कार करते हुए न्यायाधीश वर्मा ने वाल्टेयर के कथन को उद्धत किया– आप जो कह रहे हैं, मैं उससे बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखता, लेकिन मैं अंतिम सांस तक आपकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करूंगा। जस्टिस वर्मा ने यह भी कहा कि ‘अगर रचनात्मक आवाजों का गला घोंट दिया गया या बौद्धिक स्वतंत्रता को दबा दिया गया तो विधि के शासन से संचालित होनेवाला लोकतंत्र गंभीर खतरे में पड़ जाएगा।’

सचमुच कितना खूबसूरत है जस्टिस वर्मा का कथन। इसकी खूबसूरती इस मायने में कि आज हर क्षेत्र में अभिव्यक्ति के अधिकार को कुचला जा रहा है। सांसद संसद में खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते। उनकी अभिव्यक्ति पर उनके दल के शीर्ष नेतृत्व ने कब्जा कर रखा है। यहां तक कि भारत सरकार के तमाम मंत्री तक केवल अपने आका के कहने पर मुंडी हिला-डुला सकते हैं। हम पत्रकारों के उपर भी कम पहरे नहीं हैं। अभी कुछ दिन पहले ही एक बड़े लेखक के संबंध में जानकारी मिली। उन्हें महाराष्ट्र के एक प्रतिष्ठित अखबार ने कॉलम लिखने के लिए कहा। अभिव्यक्ति के अधिकार का उपयोग करते हुए जब लेखक ने लिखना शुरू किया तब तीन-चार कॉलम के बाद ही उनका कॉलम अचानक से बंद कर दिया गया। वजह यह रही कि उनकी बातें आरएसएस को नागवार गुजर रही थीं।

मुख्य न्यायाधीश का उपरोक्त कथन सीधे-सीधे केंद्र सरकार और संसद दोनों के ऊपर सवाल है। इसका एक प्रमाण यह कि पिछले साल सरकार ने प्रचंड बहुमत के आधार पर तीन कृषि कानूनों को पारित करवाया। राष्ट्रपति तक ने मानो उन्हें पढ़े बिना अपनी स्वीकृति दे दी। लेकिन किसान असहमत थे। उन्होंने आंदोलन किया। अदालत को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा।

खैर, इन तमाम प्रतिकुलताओं के बावजूद हमारे पास मुस्कुराने की कई वजहें हैं। इनमें से एक वजह जोतीराव फुले की यादें भी हैं। हालांकि आज के दिन 1890 को उनका महापरिनिर्वाण हुआ था। ऐसे में कुछ लोगों को मेरा खुश होना दुखी कर सकता है। लेकिन मैं यह मानता हूं कि जोतीराव फुले ने हालांकि 63 साल का छोटा जीवन ही जिया, परंतु  उनका जीवन सार्थक था। उन्होंने बहुसंख्यकों को बताया कि वे गुलाम कैसे बनाए गए हैं। उन्होंने वर्चस्ववादी ब्राह्मण ग्रंथों की धज्जियां उड़ा दी। उन्होंने 1873 में कहा था कि शासन-प्रशासन में समुचित भागीदारी के बगैर समाज बदलने वाला नहीं। उन्होंने आरक्षण का मंत्र इस देश को दिया। इसे 1902 में छत्रपति शाहूजी महाराज ने कोल्हापुर रियासत में लागू किया। बाद में यह हमारे संविधान का हिस्सा बना।

अब ऐसे महानायक के महापरिनिर्वाण पर शोक क्यों मनाया जाय। यह तो उनके सार्थक जीवन को याद करने का दिन है। कुछ नये संकल्प लेने का दिन है।

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