Monday, June 24, 2024
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रेणु को डर था कि ‘मैला आंचल’ पर बनी फिल्म सफल नहीं होगी

हम इस मंच पर आपकी देखी गई यादगार फिल्मों के आगे-पीछे की कहानी को याद कराते हैं, पर आज एक ऐसी फिल्म की बात कर रहे हैं, जिसे किसी ने देखा ही नहीं। मतलब कि ऐसी फिल्म की बात, जो आलमोस्ट 80 प्रतिशत पूरी हो गई थी, पर उसकी रील ऐसी टूटी कि फिर चरखी […]

हम इस मंच पर आपकी देखी गई यादगार फिल्मों के आगे-पीछे की कहानी को याद कराते हैं, पर आज एक ऐसी फिल्म की बात कर रहे हैं, जिसे किसी ने देखा ही नहीं। मतलब कि ऐसी फिल्म की बात, जो आलमोस्ट 80 प्रतिशत पूरी हो गई थी, पर उसकी रील ऐसी टूटी कि फिर चरखी पर चढ़ नहीं सकी। अगर फिल्म पूरी होकर दर्शकों के सामने आई होती तो सच में वह यादगार और सुपरहिट साबित हुई होती।

इतना विश्वास से ऐसा कैसे कहा जा सकता है? क्योंकि इस फिल्म का आधार एक ऐसा कालजयी हिंदी उपन्यास था, जिसके उल्लेख के बगैर हिंदी साहित्य की बात अधूरी रह जाती है। उसका नाम है मैला आंचल और उसके लेखक हैं फणीश्वरनाथ रेणु। इसी उपन्यास पर बनने वाली फिल्म का नाम था डागदर बाबू (डाक्टर बाबू)। कलाकार थे, धर्मेन्द्र, जया बच्चन, उर्मिला भट्ट, उत्पलदत्त और अमजद खान। निर्देशक थे नबेन्दु घोष और निर्माता थे एसएच मुंशी, संगीतकार थे आरडी बर्मन। इसके 12 गाने रिकार्ड हो चुके थे।

अनिल कपूर के पिता सुरिन्दर कपूर ने 1981 में राकेश पांडे, राधा सलूजा, गुलशन अरोड़ा और अभी भट्टाचार्य को लेकर मैला आंचल नाम की एक फिल्म बनाई थी। परंतु रेणु से उसका संबंध मात्र टाइटल तक ही था अथवा यह भी कह सकते हैं कि उन्होंने टाइटल चुरा लिया था। ‘मैला आंचल’ नायिका प्रधान फिल्म थी। उसमें एक अनाथ, पर प्रेग्नेंट लड़की की आपबीती कहानी थी। ‘डागदर बाबू’ अथवा मूल उपन्यास ‘मैला आंचल’ में एक ऐसे डाक्टर की कहानी थी, जो बिहार के एक एकदम पिछड़े गांव को अपना कार्यक्षेत्र बनाता है। इसमें यह बताया गया है कि वहां उसे किस तरह गरीबी, कुप्रथाओं, अज्ञानता और बीमारियों का सामना करना पड़ता है।

[bs-quote quote=”70 के दशक के मध्य में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई थी और लगभग 80 प्रतिशत फिल्म बनने के बाद निर्माता मुंशी और फिल्म विक्रेता-फाइनेंसर मनिया दागा (यह भी बिहार के थे) के बीच झगड़ा हुआ और काम रुक गया। रेणु के बेटे दक्षिणेश्वर प्रसाद राय के कहे अनुसार, फिल्मी पत्रिका मायापुरी में ‘डागदर बाबू’ का विज्ञापन भी हो गया था। फिल्म की 13रीलें बन चुकी थीं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

‘मैला आंचल’ को हिंदी साहित्य का पहला आंचलिक उपन्यास कहा जाता है। आंचल यानी साड़ी का पल्लू अथवा किनारा। इसमें ‘इक’ प्रत्यय लगाने से आंचलिक बनता है, जिसका अर्थ होता है आंचल संबंधी। हिंदी में आंचल का अर्थ जनपद अथवा क्षेत्रीय अथवा प्रांतीय होता है। किनारे के इलाके को आंचलिक कहा जाता है।

बिहार के मेरीगंज गांव की यह कहानी थी। जो अभी भी पिछड़ा है और जब तक गरीबी और अज्ञानता समाप्त नहीं होगी, पिछड़ा ही रहेगा। इसमें तीन मुख्य पात्र थे, कमली- जो एक अज्ञात बीमारी से पीड़ित है। डॉ. प्रशांत, जो डाक्टर बन कर गांव में सेवा करने आते हैं और विश्वनाथ मलिक- जो कमली के पिता और गांव के जमींदार हैं।

2020 में अमिताभ बच्चन ने स्वामी विवेकानंद के वेश में पत्नी जया की इसी फोटो को इन्स्टाग्राम पर शेयर किया था

2020 में अमिताभ बच्चन ने स्वामी विवेकानंद के वेश में पत्नी जया का एक फोटो इन्स्टाग्राम पर शेयर किया था। वह स्टिल फोटो इस अधूरी फिल्म ‘डागदर बाबू’ का था। जबकि बच्चन ने गलती से इसे बंगाली फिल्म बताया था। फिल्म में कमली बनी जया डॉ. प्रशांत के प्रेम में पड़ जाती है, इसलिए वह बीमारी का नाटक करती है और डाक्टर को बुलाती है। डाक्टर आदर्शवादी है और स्वामी विवेकानंद को बहुत मानता है। डाक्टर को प्रभावित करने के लिए कमली स्वामी विवेकानंद का वेश धारण करती है। डाक्टर जब उसे देखकर चकित हो जाता है, तब वह सिर का साफा उतार कर असली रूप दिखाती है।

‘मैला आंचल’ के लिए पद्मश्री सम्मान पाने वाले फणीश्वरनाथ रेणु (1921-1977) नेपाल की सीमा पर बसे बिहार के फारबिसगंज के रहने वाले थे। हिंदी विवेचक ‘मैला आंचल’ को प्रेमचंद के उपन्यास गोदान के समकक्ष मानते हैं। 1954 में उनके द्वारा लिखे गए उपन्यास मारे गए गुलफाम पर बासु भट्टाचार्य ने 1966 में राज कपूर और वहीदा रहमान को लेकर मशहूर फिल्म तीसरी कसम बनाई थी। इसका स्क्रीन प्ले नबेन्दु घोष ने लिखा था।

‘तीसरी कसम’ की सफलता से प्रेरित होकर नबेन्दु घोष ने बतौर निर्देशक ‘मैला आंचल’ को लेकर ‘डागदर बाबू’ बनाने का निश्चय किया था। नबेन्दु घोष एक प्रमुख बंगाली लेखक थे। उन्होंने ‘तीसरी कसम’ के अलावा सुजाता, बंदिनी, देवदास, मंझली दीदी और अभिमान फिल्मों का स्क्रीन प्ले लिखा था। 60 के दशक में उन्होंने अशोक कुमार और इंद्राणी मुखर्जी को लेकर प्रेम-एक कविता नाम की एक फिल्म बनाने का प्रयास किया था। गुरुदत्त की कागज के फूल की कहानी की क्रेडिट को लेकर दत्त से उनका झगड़ा होने के बाद वह उनकी पत्नी गीता दत्त को लेकर एक फिल्म बनाना चाहते थे।

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नबेन्दु घोष की कहानी पर विमल राय ने 1954 में बाप-बेटी (नलिनी जयवंत, बाल कलाकार आशा पारेख और नासिर हुसैन) फिल्म बनाई थी। इस फिल्म के निर्माता एसएच मुंशी बिहार के गया के थे। उनकी बहुत इच्छा थी कि रेणु के उपन्यास ‘मैला आंचल’ पर हिंदी में फिल्म बननी चाहिए और उसका निर्देशन नबेन्दु को करना चाहिए।

70 के दशक के मध्य में फिल्म की शूटिंग शुरू हुई थी और लगभग 80 प्रतिशत फिल्म बनने के बाद निर्माता मुंशी और फिल्म विक्रेता-फाइनेंसर मनिया दागा (यह भी बिहार के थे) के बीच झगड़ा हुआ और काम रुक गया। रेणु के बेटे दक्षिणेश्वर प्रसाद राय के कहे अनुसार, फिल्मी पत्रिका मायापुरी में ‘डागदर बाबू’ का विज्ञापन भी हो गया था। फिल्म की 13रीलें बन चुकी थीं।

नबेन्दु के बेटे शुभंकर घोष इस फिल्म में सहायक भी थे। उनके कहे अनुसार, ‘उसी झगड़े के दौरान मुंशी की मौत हो गई थी। फिल्म की निगेटिव्स बाॅम्बे लैब में रखी गई थी।

80 के दशक में मुंबई में आई बाढ़ में वह खराब हो गई थी। इसके बाद उसका क्या हुआ, किसी को पता नहीं।’

हिंदी लेखक-पत्रकार अरविंद दास इस फिल्म के बारे में पर्याप्त जानकारी देते हैं। उनका कहना था कि फिल्म के कलाकार मशहूर थे। रेणु के गांव फारबिसगंज में जब फिल्म की शूटिंग चल रही थी, तब धर्मेन्द्र और जया को देखने के लिए लोगों की भीड़ लग गई थी। आरडी बर्मन ने इसमें असाधारण संगीत दिया था, जो मुंशी परिवार के पास संभाल कर रखा होना चाहिए।

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शुभंकर का कहना है कि उनके पिता नबेन्दु घोष और रेणु अच्छे दोस्त थे। वह हमेशा अपने पास ‘मैला आंचल’ की पाकेट बुक रखते थे। वह काफी सालों से उसके स्क्रीन प्ले पर काम पर रहे थे। रेणु मैथिली भाषा की फिल्मों के साथ कुछ समय तक जुड़े रहे थे, उसी से हिंदी फिल्मों के प्रति उनमें रुचि जागी थी। पर बालीवुड में साहित्यिक कृतियों के साथ जो छेड़छाड़ होती थी, उससे वह नाराज थे।

जैसे कि ‘तीसरी कसम’ का अंत बदलने के लिए उन पर काफी दबाव डाला गया था। पर वह राजी नहीं हुए थे। इसी तरह उन्हें ‘डागदर बाबू’ को भी लेकर शंका थी। हिंदी के जाने-माने लेखक राबिन शाॅ पुष्प ने अपने संस्मरण में लिखा है कि रेणु ने उनसे कहा था कि शायद वह ‘डागदर बाबू’ फिल्म देखने नहीं जाएंगे। ऐसा क्यों? पूछने पर उन्होंने कहा था कि ‘पहले वह फिल्म की समीक्षा पढ़ेंगे, देखने वालों के विचार जानेंगे, जब सब ठीक लगेगा, तब देखने जाएंगे। बाकी ‘मैला आंचल’ ने मुझे जो यश दिलाया है, सम्मान दिया है, साहित्य में स्थापित किया है, उस कृति का विकृत रूप देखने का मुझ में साहस नहीं है।

काश, यह फिल्म पूरी हो गई होती और काश रेणु ने उसे देखा होता। काश हम पंचम दा का संगीत सुन सके होते।

वीरेंद्र बहादुर सिंह नोएडा स्थित पत्रकार हैं।

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