लालमणि को ठोकर मारकर बन गए श्रीनाथ

ओमप्रकाश यादव 'अमित'

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दौर कोई भी हो दिखावा और आडम्बर इंसानी फितरत का एक जरुरी हिस्सा बन गया है। शादी हो या कोई त्यौहार या कोई भी ख़ुशी का मौका,इस बहाने मनुष्य अपनी उत्सवधर्मिता को तुष्ट कर ये ज़ाहिर करना चाहता है कि समाज का हिस्सा होने के नाते इस तरह के आडम्बर किये जाने जरुरी है। विशेषकर शादी के अवसर पर किये गये लेन-देन के मामलों में। लड़के वाले अपनी प्रतिष्ठास्वरूप और लड़की वाले अच्छे वर की कीमत चुकाने हेतु दहेज जैसे घोर निंदनीय कामों में अपनी सहभागिता देते हुए समाज में अपना रूतबा हासिल करते हैं। चाहते सभी है दहेज जैसी बुराई समाज से खत्म हो जाए लेकिन मौका आने पर दहेज न लेने-देने की बात भूल जाते हैं। अच्छाई अपनाना जितना मुश्किल है उससे ज्यादा मुश्किल बुराई से लड़ उसे खत्म कर पाना। ऐसे समय में आज से 1950 के दशक में दहेज जैसे मुद्दों पर अकेले दम पर आवाज़ उठाना और लड़ना बहुत ही हिम्मत का काम था। तब श्रीनाथ जैसे गाँव में रहने वाले व्यक्ति ने ठाना और ताउम्र उससे लड़ते रहे। जिस तरह से वे इस बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाये वो आश्चर्य के साथ-साथ प्रशंसनीय भी है।

दहेज़ घूस है, लेना-देना पाप है, दहेज़ जो लेगा घोर नरक में जायेगा, दहेज नरक है, बेटी-बहू लक्ष्मी, दहेज़ लेने वाले रावण की औलाद हैं, दहेज टट्टी है, दहेज़ पाप की गठरी है, ग्यारह से अधिक बाराती-रावणी होना, यह तो एक बानगी है। इसी तरह के तमाम विचारोत्तेजक नारे लिखने वाले श्रीनाथ जी एकला चलो के अनुयायी थे। घर के लोगों ने सोचा ये पागल हो गए हैं। इस तरह की गतिविधियों से ये कई बार अपमानित ही नहीं हुए बल्कि प्रताड़ित कर भगाए गए। लेकिन समाज में बदलाव के जुनून और सनक के कारण इन्होंने अपने इस अभियान को कभी बाधित नहीं होने दिया। इनके ये नारे दीवारों, रोडवेज की बसों, ट्रेन के डिब्बों पर लिखा होता था।

दहेज़ विरोधी प्रचार अभियान के दौरान तमाम प्रदेशों के गाँव-कस्बों में पैदल ही जाते थे। संसद के सामने हो या लाल किला, जन्तर -मंतर हो या इलाहाबाद का कुम्भ मेला, जब हांड कंपा देने वाली ठण्ड पड़ रही होती, तब भी वे अपनी पीठ और सीने पर ऐसे नारों की तख्तियां लटकाए और हाथों में तख्ती लिए घंटों संगम के पानी में खड़े हो मेले के मुख्याकर्षण हुआ करते थे।

 

श्रीनाथ जी उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, बंगाल के गांवों-बस्तियों की ख़ाक छानते। दहेज़ विरोधी प्रचार अभियान के दौरान तमाम प्रदेशों के गाँव-कस्बों में पैदल ही जाते थे। संसद के सामने हो या लाल किला, जंतर-मंतर हो या इलाहाबाद का कुम्भ मेला, जब हांड कंपा देने वाली ठण्ड पड़ रही होती, तब भी वे अपनी पीठ और सीने पर ऐसे नारों की तख्तियां लटकाए और हाथों में तख्ती लिए घंटों संगम के पानी में खड़े हो मेले के मुख्याकर्षण हुआ करते थे। इस काम के लिए घर से  उपेक्षित रहे श्रीनाथ जब अखबारों में समाचार बनने लगे तब घर के सदस्यों को समझ आया कि उन्होंने किस सामाजिक नासूर से लड़ने का बीड़ा उठाया है। तब उनकी पत्नी कैलाशी देवी के साथ सभी बच्चों ने भी इस अभियान में बढ-चढ़कर हिस्सा लिया। इसके साथ ही वे दहेज रहित शादी के लिए प्रेरित ही नहीं करते थे बल्कि लोगों को आर्थिक सहयोग भी देते थे।

आर्थिक सहयोग राशि 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक हुआ करती थी। घी, तेल, चीनी इत्यादि रसद एक सीमित मात्रा में लोगों को दिया करते थे। कभी-कभी अपने घर से भी जरूरत के सामान उठाकर दे दिया करते थे। गेहूं-चना बेचकर लोगों की सहायता करने के व्रत में कभी बाधा आई तो अपनी पत्नी के सारे गहने एक-एक कर बेच डाले। लेकिन समाज के सामने कभी इस बात का ज़िक्र तक नहीं किया। हमेशा इस बात को छिपाए रखा। सहयोग देने के समय वे बिना दहेज के शादी करेंगे ऐसी हिदायत दिया करते थे। अधिक संख्या में आये बारातियों को वे ‘रावणी सेना’ का दर्जा देते थे। ऐसी शादी में जाने वाले खब्बू या राक्षस होते हैं। इन्होंने अपने तीनों पुत्र-पुत्रियों की शादी बिना दहेज के सम्पन्न किया।इनके पुत्रों में सबसे बड़े पुत्र राजेन्द्रनाथ मिश्र घर पर खेती-बाड़ी करके जीवनयापन करते हैं। सुरेन्द्रनाथ और महेन्द्रनाथ दिल्ली की किसी कंपनी में नौकरी करते हैं। उनकी पुत्रियां सुनीता,अंजू और कुसुम अपने-अपने घरों में राजी ख़ुशी जीवन बीता रहीं हैं I

श्रीनाथ जी का परिचय 

1940 के दशक में श्रीनाथ जी का जन्म हुआ। इनके पिता का नाम बेनीशंकर मिश्र थे। बेनीशंकर मिश्र के चार पुत्र हरिहरनाथ, सिद्धनाथ, श्रीनाथ और मातासहाय थे। चार पुत्रों में तीसरे नंबर के श्रीनाथ यानी लालमणि बाल्यावस्था से ही अलग ढंग के बालक थे। पांच वर्ष के थे तभी उनके सर से पिता का साया उठ गया। विधवा मां द्वारा चार-चार पुत्रों का इस गरीबी में पालन पोषण करना बहुत कठिन था। उस समय का समाज अंधविश्वास, छुआछूत व बालविवाह जैसे रोगों से बुरी तरह संत्रस्त था। भला इसी समाज में रहने वाले इनके परिवार के लोग इससे कैसे पृथक रह सकते थे। ताऊ जी के पास श्रीनाथ का पालन-पोषण हुआ। इनका विवाह दस वर्ष की अवस्था में ही दुगौली के मान्यता प्रसाद शुक्ला की पुत्री प्रेमा के साथ कर दिया गया था। उनके ताऊ ने लालच में या किस वजह से ये शादी स्वीकार कर ली, इस सन्दर्भ में यह भी घटना है कि, प्रेमा से शादी के लिए शुक्ला जी ने अठारह बीघे ज़मीन व मकान की रजिस्ट्री शादी से पहले कर दी। मात्र दस साल के लालमणि को जब ज्ञात हुआ कि ताऊ जी ने दहेज में ज़मीन ली है उनके लिए तो, उनके बालमन पर गहरा आघात लगा। उन्होंने उसी उम्र में दहेज लिए जाने का कठोर विद्रोह कर दिया। और उनके आहत मन ने प्रेमा के साथ विवाह करने से ही इंकार कर दिया। लालमणि को बहुत समझाया-बुझाया गया कि दहेज में ली जा रही सम्पत्ति किसी से छीनकर या डकैती डालकर तो नहीं ली जा रही है। लेकिन लालमणि आपने निश्चय पर दृढ़ रहे। लोगों को भय था कि समाज में ऐसी परम्परा चल पड़ेगी। लेकिन लालमणि ने इस तरह के धन को ठोकर मारकर लोगों को अचभिंत कर दिया।

एक साक्षात्कार में श्रीनाथ ने गर्भवती स्त्रियों की आदतों और उनमें आये आधुनिकता के प्रति झुकाव को लकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस कलियुग में अभिमन्यु पैदा होने में बाधा उत्पन्न की है। अगर हर बच्चे के जन्म के समय थोड़ी सावधानियां बरती जाएँ तो शत-प्रतिशत तो नहीं लेकिन काफी संख्या में अभिमन्यु आज पैदा किये जा सकते हैं। उन्होंने कुछ दिनों तक प्रसूताओं के प्रशिक्षण का आयोजन भी किया। इस प्रशिक्षण में नदिनी, बभनी, भैतपुर, योपा, नियरा, सीटी ब्लॉक और भदोही के कई गाँवों की गर्भवती महिलायें प्रशिक्षण ग्रहण की थी।

 

इस घटना का दूसरा पहलू ये रहा कि उनके हारे हुए ताऊ जी ने जीतने की दूसरी युक्ति ढूढ निकाली। उन्होंने प्रेमा का विवाह लालमणि के छोटे भाई माता सहाय से कर दिया। चूँकि कन्या पक्ष से शादी पूर्व ही ज़मीन की रजिस्ट्री करा दी गई थी। अत: उस आराजी में नाम संशोधित करना था इसीलिए माता सहाय के आगे ‘उर्फ़ लालमणि’ कर दिया गया। इस तरह से उस घर से उनका नाम तक ही छीन लिया गया था। तब उनका खुद का क्या रहा,इस स्थिति में वे स्वयं अपना नाम श्रीनाथ रख लिया। तमाम लोगों के ‘सरनेम’ पूछने पर उनका एक ही उत्तर रहता, न मेरी कोई बिरादरी है, न धर्म। अगर है तो सिर्फ मानव धर्म और सिर्फ श्रीनाथ। इस तरह उन्हें नालायक घोषित कर घर से बेदखल कर दिया गया।

उनकी जीवनसंगिनी मिर्ज़ापुर जनपद के गांव सीखड़ की कैलाशी देवी बनी। श्रीनाथ ने कैलाशी देवी से दहेज मुक्त विवाह किया। उनका दाम्पत्य जीवन बहुत कठिनाइयों से भरा हुआ था लेकिन उसके बाद भी वे दोनों ख़ुशी से जीवन गुजार रह थे। तीन पुत्र-पुत्रियों की शिक्षा-दीक्षा में कोई कोताही नहीं की। जीवन में उन्होंने बहुत संघर्ष किया। प्रारम्भ में कलकत्ता की कुमार डीही कोल कंपनी में अपने चारों भाइयों के साथ काम किया। लेकिन इनके दिलो-दिमाग में पलायन का दर्द इन्हें सताता रहा। अस्तु वहां से लौटकर वे अपने ही गांव में ही दुग्ध उत्पादक कॉर्पोरेटिव संस्था बनायी। गलीचे के लिए लूम लगाया, टैक्सी ली, गाँव में सबसे पहले टैक्सी इनके यहां ही आयी। गांव के लोगों को अपने ही ज़िले- गाँव में काम मिल गया। तमाम लोगों को रोज़गार देकर इन्होंने कई परिवार को  जीने-खाने के साधन दिए। वे अपने गाँव जवार में बहुत चर्चित भी हुए, लेकिन अधिकारियों को भ्रष्टाचार की छूट न देने के कारण वे अधिकारीगण कुछ अवसरवादियों को बरगला कर श्रीनाथ के खिलाफ झूठे मुकदमे दायर करा दिए। घर-गाँव व समाज से अपेक्षित सहयोग न मिल पाने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी।

लोगों के खुशहाल जीवन के लिए बहुत कुछ करने के बदले इस तरह के अपमान, जलालत भरे उपहार को भी सहर्ष स्वीकार किया। बच्चों की जिम्मेदारी निभाकर इस अभियान में पूरे मनोयोग से जुटे रहे। श्रीनाथ जीवनभर दहेज,शराब और लाटरी के खिलाफ एकमात्र लड़ने वाले योद्धा की तरह डटे रहे। शुरुआत में सभी इन्हें पागल समझने लगे थे लेकिन समाज में इस तरह की स्वीकृति पर इनकी पत्नी व बच्चे भी खुलकर सहयोग करने लगे।

एक साक्षात्कार में श्रीनाथ ने गर्भवती स्त्रियों की आदतों और उनमें आये आधुनिकता के प्रति झुकाव को लकर चिंता व्यक्त की। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इस कलियुग में अभिमन्यु पैदा होने में बाधा उत्पन्न की है। अगर हर बच्चे के जन्म के समय थोड़ी सावधानियां बरती जाएँ तो शत-प्रतिशत तो नहीं लेकिन काफी संख्या में अभिमन्यु आज पैदा किये जा सकते हैं। उन्होंने कुछ दिनों  तक प्रसूताओं के प्रशिक्षण का आयोजन भी किया। इस प्रशिक्षण में नदिनी, बभनी, भैतपुर, योपा, नियरा, सीटी ब्लॉक और भदोही के कई गाँवों की  गर्भवती महिलायें प्रशिक्षण ग्रहण की थी। इसका व्यापाक असर भी पड़ा। उनका विशेष सुझाव था अच्छे खानपान व रहन-सहन से नन्हे मेहमान पर उसका अच्छा असर पड़ेगा। धर्मग्रंथों का पारायण श्रवण काफी प्रभावशाली होगा। प्रसूताओं को बादाम, दूध व पौष्टिक आहार व फलादि फायदेमंद हो सकता है,न कि पिज्जा व बर्गर खाने से।

देश के तमाम शहरों में पर्वों उत्सवों में अपने अनोखे अंदाज़ से पहचाने जाने वाले समाज को जगाने वाले एक योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित श्रीनाथ का निधन एक अक्टूबर 2011 को दिल्ली प्रवास में अपने पुत्रों के यहाँ अचानक हो गया। इसी के दो साल बाद चार अक्टूबर 2013 में  उनकी संगिनी कैलाशी देवी भी स्वर्गवासी हो गईं। उनके इस अभियान की गाड़ी को आगे ले जाने के लिए उनके बच्चे पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं किन्तु उनकी तरह दीवानगी का अभाव साफ़ दिखता है।

श्रीनाथ को कईयों ने आर्थिक सहयोग देने के लिए बुलाया, लेकिन उनका एक ही कहना था,पैसा नहीं साथ दो। इन्होंने विकार रहित जीवन जिया। तमाम स्वयंसेवी संस्थानों ने उन्हें जबरन सम्मान दिया। उन्हें जीवन के आखिरी दिनों में यही टीस रही कि समाज सुनता बहुत है किन्तु गुनता कुछ भी नहीं …पता नहीं कब, कैसे समाज की तस्वीर बदलेगी।

ओमप्रकाश यादव ‘अमित’ जी कवि हैं।

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    बढ़िया और प्रेरक। ओमप्रकाश जी अच्छा लिखा है। बधाई।

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