स्मिता पाटिल ने संजीदा सिनेमा को एक नया व्याकरण दिया था

राकेश कबीर

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मिर्च मसाला का एक दृश्य
फिल्म मिर्च मसाला के एक दृश्य मे

स्मिता पाटिल की फिल्म ‘वारिस’ को ब्लैक एंड ह्वाईट टेलीविजन पर गाँव में सन 1992-93 में देखा था। उस समय ‘वारिस’ शब्द का मतलब समझ नहीं आया था तो उसका तात्पर्य बारिश समझते रहे थे। अपने पति की हत्या के बाद किस तरह एक महिला अपने खानदान को आगे बढाने के लिए अपनी सगी छोटी बहन की शादी अपने बूढ़े ससुर से करने का साहसिक निर्णय लेती है यह बात आज भी बचपन से जेहन में बैठी है। स्मिता पाटिल और उनकी अदाकारी के बारे में तब हम ज्यादा नहीं जानते थे। लेकिन अब तक उनकी लगभग सभी फ़िल्में देख चुका हूँ। हिंदी सिनेमा के दर्शक और समीक्षक कोई भी ऐसा नहीं होगा जो स्मिता पाटिल के समानांतर न्यू वेव सिनेमा की फिल्मों में की गयी भूमिकाओं से प्रभावित न हो।

 

स्मिता पाटिल ने ज्योत्सना गोखले नामक कालेज लेक्चरर की भूमिका की है। जीवन के प्रति दोनों के अपने-अपने आदर्श और नजरिए हैं फिर भी वे अच्छे दोस्त और फिर संबंधों मे जीने लगते हैं। बॉलीवुड की बेहतरीन जासूसी फ़िल्मों में शुमार है। इस फ़िल्म ने कई अवॉर्ड्स जीते और भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर भी साबित हुई।

स्मिता पाटिल ने निजी जीवन से लेकर फिल्मी परदे तक एक नारीवादी एक्टिविस्ट की तरह काम किया। वे मुम्बई के विमेंस सेंटर की सक्रिय सदस्य थीं।  जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में काम करने और जूझनेवाली महिलाओं के चरित्रों को उन्होंने अपने भावप्रवण अभिनय से सफलतापूर्वक प्रस्तुत करने का काम किया।  उन्होंने अपने प्रथम नेशनल अवार्ड को भी दान कर दिया था। नादिरा बब्बर के अभिनेता पति राजबब्बर से शादी करके वे आलोचना की शिकार बनीं। सन 1986 में मात्र 31 वर्ष की उम्र में वे इस दुनिया को अलविदा कह गयीं लेकिन इस दौरान उन्होंने कई यादगार रोल किये जो हमेशा के लिए सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गए।  उन्होंने सत्तर के दशक में श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलानी, सत्यजीत रे, और मृणाल सेन जैसे प्रतिभाशाली और नामचीन निर्माता-निर्देशकों के साथ ‘रेडिकल-पोलिटिकल सिनेमा’ और अन्य प्रासंगिक विषयों पर बनी फिल्मों में काम किया।  टेलीविजन में उन्होंने न्यूज़रीडर के बतौर अपना कैरियर आरम्भ किया और फिल्म आखिर क्यूँ में वे टेलीविजन में एंकर के रोल में दिखी भी। भूमिका फिल्म में एक फिल्म अभिनेत्री के रोल में अपने प्रभावशाली अभिनय के लिए उन्हें बेस्ट अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

सन 1982 में रिलीज हुई फिल्म अर्थ में वह शबाना आज़मी और कुलभूषण खरबंदा के साथ दिखीं। अर्थ फिल्म में भी वह एक फिल्म अभिनेत्री के रोल में थीं। इस फिल्म में स्मिता पाटिल ने एक शक्की और मनोरोगी स्वभाव की महिला की भूमिका की थी। एक शादीशुदा मर्द की दूसरी पत्नी के रूप में उन्होंने लाजवाब अभिनय किया। प्रारम्भ में स्माल सिनेमा मूवमेंट की कई फिल्मों में काम करने के बाद स्मिता ने 1980 के दशक में बड़ी व्यावसायिक फिल्मों में भी काम करना शुरू किया और वहां भी सफल रहीं। उस दौर के सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के साथ स्मिता ने शक्ति और नमक हलाल जैसी फ़िल्में की। कई फिल्म अभिनेत्रियों पर कविताएं लिखने वाले प्रख्यात कवि दिनेश कुशवाह स्मिता पाटिल शीर्षक कविता मे कुछ इस तरह वर्णन करते हैं:

उसके भीतर एक झरना था/ कितनी विचित्र बात है/ एक दिन वह उसमें नहा रही थी। लोगों ने देखा/ देखकर भी नही देखा/ उसके आंखों का पानी / मैना ने कोशिश की/ कि कैसे गाया जाए पिंजरे का गीत/ कि लोग आँखों में देखने के आदी हो जाएँ/तब घर के पीछे बांसवारी मे हवा सायं-सायं करती थी/ जब उसने कोयल की नकल की थी और चल पड़ी थी बगीचे की ओर/ कि देखा/ बड़े बरगद के पेड़ पर किस तरह ध्यान लगाकर बैठते हैं गिद्ध/ पूरे सीवान की थाह लेते हुए।

पिटती-लुटती-कुढ़ती स्त्री के रूप में/ गालियां नहीं/ मंत्र बुदबुदाती थी नैना जोगिन। एक दिन मैंने उससे पूछा/ बचपन मे तुम जरूर सुड़कती रही होगी नाक वह मुस्कुराकर रह गयी/ मैंने कहा/ जिसने गौतम बुद्ध को खिलाई खीर तुम जैसी ही रही होगी वह सुजाता।/ उसने पूछा/ पुरुष के मुंह मे लगी सिगरेट बढ़कर सुलगा देनेवाली लड़की भी/ क्या इसी तरह रह सकती है इतिहास में?

कविताद्रोही भी मानते थे/ अभिनय करती थी कविता/ जीवन के रंगमंच पर भीड़भरी सिटी बसों में/ सुनते थे हम प्रसव की पीड़ा के बाद/ और जन्मती है दूसरी बार अभिनेत्री!/ जीवन के इस अभिशप्त अभिनय के लिए/ हम तैयार नहीं थे।

स्मिता पाटिल

इस एक कविता में दिनेशजी ने स्मिता पाटिल जैसी अभिनेत्री के रील और रियल लाइफ को समेटकर रख दिया है। इस कविता में स्मिता पाटिल के बचपन से लेकर उनके न्यूज एंकर बनने और फिर फिल्म अभिनेत्री बनने एवं एक शादीशुदा मर्द के साथ प्रेम और शादी करने के प्रसंगों को भी लिया गया है। मात्र 31 वर्ष की उम्र मे अप्रत्याशित रूप से प्रसव पीड़ा के दौरान अत्यंत प्रतिभाशाली एवं संजीदा अभिनेत्री के दुनिया को अलविदा कह देने से उनके प्रशंसकों को भी पीड़ा हुई। दिनेश जी की कविता भी इसकी गवाह है।

17 अक्टूबर, 1955 को स्मिता का जन्म पुणे में हुआ, उनका परिवार राजनीति में सक्रिय था। बचपन में ही स्मिता को अभिनय, थियेटर और अदाकारी से इश्क़ हो गया था। फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखने से पहले उन्होंने थियेटर की दुनिया में बहुत नाम कमाया। 1975 में आई श्याम बेनेगल की चरनदास चोर के ज़रिए उन्होंने उस ज़माने की शीर्ष अभिनेत्रियों को दिया। भूमिका (1977) श्याम बेनेगल निर्देशित फ़िल्म 1940 के दशक की मराठी अभिनेत्री हंसा वाडकर की ज़िन्दगी पर आधारित है। फ़िल्म को भारतीय दर्शकों तो नहीं मिली लेकिन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसे बेहद पंसद किया गया। फ़िल्म को 1978 के कार्थऐज फिल्म फेस्टिवल और शिकागो फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाया गया। फ़िल्म को दो नेशनल अवॉर्ड और फ़िल्मफ़ेयर का बेस्ट मूवी अवॉर्ड दिया गया। चक्र (1981) फ़िल्म में स्मिता के साथ नसीरुद्दीन शाह और कुलभूषण खरबंदा की भूमिकाएं थीं। फ़िल्म मे बेहतरीन अभिनय के लिए स्मिता पाटिल को बेस्ट एक्ट्रेस का नेशनल अवॉर्ड दिया गया। यह फ़िल्म लोकारो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में भी दिखाई गई थी।

सागर सरहदी निर्देशित फिल्म बाज़ार (1982) में खाड़ी देशों के अमीर शेख हिंदुस्तान के हैदराबाद जैसे शहरों के गरीब घरों की लड़कियों को खरीदकर किस तरह शोषण करते हैं, इस मुद्दे को प्रभावी तरीके से उठाया गया है। फ़िल्म में स्मिता के साथ नसीरुद्दीन शाह, फ़ारुख़ शेख़ और सुप्रिया पाठक ने काम किया। गोविंद निहलानी निर्देशित फ़िल्म अर्द्धसत्य (1983) एस.डी. पनवलकर की कहानी सूर्या पर आधारित है।

फिल्म अर्द्ध सत्य में ओम पूरी के साथ
फिल्म अर्द्ध सत्य में ओमपुरी के साथ

ओमपुरी एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में हैं जो अपने आदर्शों और सिस्टम के करप्शन से जूझते दिखते हैं। स्मिता पाटिल ने ज्योत्सना गोखले नामक कालेज लेक्चरर की भूमिका की है। जीवन के प्रति दोनों के अपने-अपने आदर्श और नजरिए हैं फिर भी वे अच्छे दोस्त और फिर संबंधों में जीने लगते हैं। यह बॉलीवुड की बेहतरीन जासूसी फ़िल्मों में शुमार है। इस फ़िल्म ने कई अवॉर्ड्स जीते और भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर भी साबित हुई। बाद में शूल (मनोज बाजपेयी) और गंगाजल, सिंघम (अजय देवगन) ने ऐसे ही पुलिस अफसरों की भूमिकाएं की।

मंडी (1983) स्मिता पाटिल अभिनीत एक अन्य महत्वपूर्ण फिल्म है। श्याम बेनेगल निर्देशित यह फ़िल्म ग़ुलाम अब्बास की उर्दू लघु कथा आनंदी पर आधारित है। फ़िल्म के केंद्र में शहर का एक कोठा है जिसमे कई महिलाएँ रहती हैं। भारतीय राजनीति पर कटाक्ष करती इस फ़िल्म को कई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में भी प्रदर्शित किया गया था। आज की आवाज़ (1984) बीआर चोपड़ा की प्रोडक्शन की फिल्म थी जो 1982 में आई।  हॉलीवुड फ़िल्म डेथ विश (2) पर आधारित थी। इस फ़िल्म में स्मिता ने पब्लिक प्रोसीक्यूटर की भूमिका निभाई। मिर्च मसाला (1985) केतन मेहता निर्देशित फिल्म है। स्मिता पाटिल का अभिनय इसमें इतना असाधारण था कि उनका नाम फ़ोर्ब्स पत्रिका की 25 सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेत्रियों में रखा गया। धर्मेन्द्र, मिथुन अनीताराज जैसे बड़े कलाकारों के साथ स्मिता ने ग़ुलामी (1985) फिल्म में काम किया था जिसकी शूटिंग फतेहपुर राजस्थान में हुई थी। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन ने सूत्रधार के तौर पर नैरेशन किया था। जमींदारों के शोषण से किसानों को मुक्त कराने के लिए वर्ग संघर्ष पर आधारित इस फिल्म में स्मिता पाटिल ने शोषक जमींदार की बेटी सुमित्रा सुल्तान सिंह की भूमिका की थी। धर्मेन्द्र (रंजीत चौधरी) से एकतरफा प्यार करने वाली सुमित्रा अपने प्रेमी से शादी नहीं कर पाती लेकिन उसे चाहती रहती हैं। प्रेम त्रिकोण पर आधारित ऐसी कई फिल्मों में बिरहन की पीड़ा को परदे पर अलग-अलग तरीके से स्मिता पाटिल ने प्रस्तुत किया और वास्तविक जीवन में भी उसी त्रिकोण में जा फंसी। राजेश खन्ना और राकेश रोशन के साथ आख़िर क्यों? (1985) फिल्म में वे भारतीय परिधान साडी में बेहद खूबसूरत लगी हैं। एक परित्यक्ता महिला के एक सफल और मशहूर लेखिका बनने की कहानी पर केन्द्रित इस फिल्म में स्मिता पाटिल ने कमाल की भूमिका की है। एक अँधेरा लाख सितारे, एक निराशा लाख सहारे जैसा आशावादी गीत उनकी भूमिका के अनुरूप ही है। आगे राजेश खन्ना के साथ दिल-ए-नादान (1982) आखिर क्यूँ, अनोखा रिश्ता, अंगारे, नजराना, अमृत (1986) जैसी मुख्यधारा की फिल्मों में काम किया। नसीरुद्दीन शाह के साथ उन्होंने निशांत 1975, आक्रोश (1980), मिर्च मसाला (1987), बाज़ार (1982), मंडी (1983), मंथन (1976), गुलामी (1985), अर्द्धसत्य (1983)। भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष पर अप्रैल 2013 में फ़ोर्ब्स ने स्मिता पाटिल की फिल्मों को 25 महानतम फिल्मों की लिस्ट में शामिल किया था। द वाशिंगटन पोस्ट ने उन्हें रहस्यमयी और साहसी अभिनय करने वाली अंतिम अभिनेत्री कहा था। सन 2012 में उनके सम्मान में स्मिता पाटिल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल आयोजित किया गया। वारिस (1988) स्मिता पाटिल की मौत के बाद रिलीज़ हुई थी। पंजाबी उपन्यास कारा पर आधारित थी ये फ़िल्म। राजबब्बर के साथ भीगी पलकें, आज की आवाज,हम दो हमारे दो जैसी फिल्मों में काम किया और बाद में उनसे शादी कर ली। एक शादीशुदा अभिनेता के साथ रोमांस और फिर शादी करने के कारण स्मिता को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा क्योंकि राजबब्बर ने अपनी पत्नी नादिरा बब्बर और दो बच्चों को छोड़कर यह शादी की थी। नादिरा बब्बर थियेटर की प्रभावशाली अभिनेत्री हैं। नादिरा बब्बर और उनकी बेटी जूही बब्बर एवं उनके समूह द्वारा प्रस्तुत नाटक भारतीय रंग महोत्सव दिल्ली में देखने का अवसर सन 2008 में मिला था।

स्मिता पाटिल, एक ऐसी कलाकार थीं जो बॉलीवुड में ताज़ी हवा की तरह आईं। समानांतर और सार्थक फिल्मों मे समाज के निचले तबके और संघर्षरत स्त्रियों के चरित्रों को परदे पर जीवंत करते हुए अत्यंत छोटी उम्र मे काल के गाल मे समय गईं। उन्होंने फिल्मों मे अपने विषय चयन और प्रभावशाली अभिनय से कई सकारात्मक और प्रगतिशील बदलाव किए। उन्होंने अपनी साँवली रंगत और सामान्य रंग रूप से सौंदर्य के हर तय पैमाने को खुली चुनौती दी।

प्रतीक बब्बर को जन्म देने के बाद 13 दिसंबर, 1986 को स्मिता की पोस्ट-प्रेगनेंसी कॉम्प्लीकेशन्स की वजह से मौत हो गई। वारिस समेत स्मिता की 10 फ़िल्में उनकी मृत्यु के बाद रिलीज़ की गई। स्मिता के साथ नमक हलाल फिल्म में काम करने वाले अभिनेता अमिताभ बच्चन ने प्रतीक बब्बर पर टिप्पणी करते हुए हाल में ही कहा था कि प्रतीक बब्बर को देखकर उनके माँ की याद आती है। आँखों और चेहरे के तनाव से एवं गंभीर आवाज से प्रभावशाली अदाकारी करने वाली संजीदा अभिनेत्री स्मिता पाटिल को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया था। इकतीस साल की छोटी-सी उम्र में दुनिया को अलविदा कहने वाली स्मिता पाटिल को उनकी ख्वाहिश के अनुसार अंतिम संस्कार के पहले मेकअप आर्टिस्ट द्वारा दुल्हन की तरह सजाकर विदा किया गया था।

फिल्म बाजार का एक दृश्य
फिल्म बाजार का एक दृश्य

आखिर क्यों (1985) फिल्म में स्मिता पाटिल (निशा) ने एक अनाथ लड़की का रोल किया था जिसे उसके मामा ने गोद लेकर पाला था। उसकी एक ममेरी बहन इंदू (टीना मुनीम) भी है। बड़ी होने के बाद इंदू को एक अमीर और खूबसूरत लड़के कबीर (राकेश रोशन) से प्यार हो जाता है, लेकिन कबीर स्वच्छंद और आधुनिक ख्यालों की इंदू के बजाए आज्ञाकारी और घरेलू स्वभाव की निशा को पसंद करने लगता है और उससे शादी कर लेता है। शादी के बाद निशा और कबीर के जीवन में सब अच्छा चल रहा होता है और निशा गर्भवती हो जाती है। निशा की मदद करने के लिए इंदू उनके घर आकर रहने लगती है। इस फिल्म में अमीर मर्द कबीर के महिलाओं के बारे में जो खयालात हैं वे दरअसल सभी पितृ सत्तात्मक समाजों के पुरुषों के सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं। पुरुषों को घूमने, खेलने और इन्जॉय करने के लिए मॉडर्न ख्यालों वाली लड़की और शादी के लिए गीत-संगीत और परंपरागत पारिवारिक मूल्यों वाली घरेलू लड़की चाहिए होती है। शादीशुदा औरत (निशा) अपने बच्चे के साथ अपनी शादी और घर को बचाए रखने की बहुत कोशिश करती है। पति के सामने रोती है। मिन्नतें करती हैं लेकिन अमीर बिगड़ैल आदमी निशा  को ही घर से बाहर निकाल देता है। उसकी अपनी बेटी को भी साथ नहीं ले जाने दिया जाता है जिसे वह आया को सौंपकर घर छोड़कर चली जाती है। पुरुष-प्रधान समाज में अकेली समस्याओं से जूझती हुई निशा आलोक (राजेश खन्ना) से मिलती है, और दोनों दोस्त बन जाते हैं। आलोक निशा को पसंद करने लगता है और उससे दुबारा शादी का प्रस्ताव रखता है लेकिन वह टाल जाती है। आलोक की प्रेरणा से निशा आशा श्री नाम की एक सफल लेखिका बनकर उभरती है। प्रकाशक आशा श्री की किताबें छापने के लिए उनके यहाँ सिफारिश लगाते हैं। निशा के पूर्व पति कबीर भी उसकी किताब छापने के लिए जब मिलने पहुंचता है तो उसे पता चलता है कि निशा और आशा श्री एक ही स्त्री के दो नाम हैं। जिसे कभी कमजोर समझकर घर से अपमानित उसने करके निकाल दिया था। किताब की रॉयल्टी के पैसे वह अपनी बेटी की शादी के लिए कबीर को दे देती है और फिर आलोक के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर दुबारा जीवन आरंभ करती है। आखिर त्याग दी गयी औरत पुरुष की तरह दुबारा शादी क्यों नहीं कर सकती- आखिर क्यों?

स्मिता पाटिल अभिनय की एक संस्कृति है 

स्मिता पाटिल, एक ऐसी कलाकार थीं जो बॉलीवुड में ताज़ी हवा की तरह आईं। समानांतर और सार्थक फिल्मों मे समाज के निचले तबके और संघर्षरत स्त्रियों के चरित्रों को परदे पर जीवंत करते हुए अत्यंत छोटी उम्र मे काल के गाल मे समय गईं। उन्होंने फिल्मों मे अपने विषय चयन और प्रभावशाली अभिनय से कई सकारात्मक और प्रगतिशील बदलाव किए। उन्होंने अपनी साँवली रंगत और सामान्य रंग रूप से सौंदर्य के हर तय पैमाने को खुली चुनौती दी। स्मिता ने फ़िल्मी दुनिया में अभिनेत्रियों के लिए एक नए युग की शुरुआत की थी। स्मिता ने हिन्दी फ़िल्मों के अलावा बंगाली, गुजराती, मराठी, कन्नड़ और मलयालम भाषाओं की फ़िल्मों में भी काम किया। स्मिता पाटिल फिल्मों में महिलाओं के अश्लील चित्रण के खिलाफ थीं और इसके लिए आवाज भी उठाती रहती थीं। नमक हलाल फिल्म में अमिताभ के साथ आज रपट जाए गीत की शूटिंग करने पर उन्हें बहुत बुरा लगा था और बताते हैं कि वे रात भर रोती रही थीं। दस वर्ष के छोटे से फिल्मी कैरियर मे उन्होंने जिन फिल्मों में काम किया उन भूमिकाओं के लिए स्मिता जी हमेशा सम्मान के साथ याद की जाती रहेंगी।

संदर्भ

पाठक, संचिता (2021) स्मिता पाटिल: मिर्च मसाला, बाज़ार जैसी 10 उम्दा फ़िल्में जिन्हें देख कोई भी स्मिता का फ़ैन हो जाएगा, इन इंडिया टाइम्स.कॉम, ऑन 18 अक्तूबर, 2021
रे, कुनाल (2015) स्मिता स्ट्रगलड विथ क्यूरियस कंट्राडिक्शन, इन द हिन्दू, ऑन 17 अक्टूबर, 2015
राव, मैथिली (2015) स्मिता पाटिल: ए ब्रीफ़ इनकैनडेसेन्स, हार्पर कालिन्स पब्लिकेशन्स इंडिया
विजय, अनंत (2019) हिंदी फिल्मों की काली: स्मिता पाटिल, ऑन 17 अक्टूबर 2019, इन साहित्य सिनेमा सेतु.कॉम।

राकेश कबीर जाने-माने कवि, कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

5 Comments
  1. Brijesh Prasad says

    इतनी गहराई से किसी सिनेमा के चरित्र पात्र की व्याख्या कोई आप जैसे ही बड़े लेखक कर सकते हैं सर। खूब साधुवाद??

  2. Ghanshyam kushwaha says

    आपके लेख को पढ़ते पढ़ते पूरी फिल्म के किरदार आँखों के सामने तर जाते हैं।बहुत ही उम्दा विश्लेषण।?

  3. Gulabchand Yadav says

    हिंदी फिल्म जगत की आठवें और नवें दशक की अत्यंत प्रतिभाशाली अभिनेत्री स्मिता पाटील के अभिनय कला की विलक्षणताओं, आम भारतीय स्त्री की वास्तविक स्थिति और मनोदशा को रुपायित करती अविस्मरणीय भूमिकाओं, समाज के वंचित तबके, विशेष रूप से महिलाओं के प्रति उनकी गहरी संवेदना आदि को रेखांकित करता/समेटता शोधपरक आलेख पढ़ा। यह हिंदी सिनेमा का दुर्भाग्य रहा कि वे बहुत कम उम्र में इस दुनिया से विदा हो गईं अन्यथा वे और सैकड़ों फिल्मों में अपने सशक्त अभिनय से अविस्मरणीय भूमिकाओं को परदे पर साकार करतीं।

    स्मिता पाटील ने जितनी सहजता और स्वाभिकता के साथ आर्ट या समांतर सिनेमा में यादगार और अप्रतिम भूमिकाएं निभाईं उतनी ही ऊर्जा और ठसक के साथ पॉपुलर या मेन स्ट्रीम के सिनेमा में भी अपनी जगह बनाई। उन्हें अनेक राष्ट्रीय और फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। वे मराठी भाषी और सामान्य चेहरे मोहरे की सांवली रंगत वाली युवती थीं जिन्होंने यह साबित कर दिखाया कि जो कलाकार अपने अभिनय के दम पर दर्शकों के दिलों में जगह बनाते हैं वह स्थाई और अमिट होती है। बड़ी बड़ी सौंदर्य प्रतियोगिताओं में विजेता का ताज हासिल करने वाली अनेक “विश्व/एशिया/भारत सुंदरियां” बॉलीवुड में आईं किंतु केवल दो -तीन को छोड़कर बाकी कहां गईं और क्या कर रही हैं कोई नहीं जानता। किंतु स्मिता पाटील, शबाना आजमी, नंदिता दास जैसी अभिनेत्रियों ने राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

    आपने अपने इस श्रम साध्य आलेख में स्मिता पाटील की अभिनय यात्रा के साथ साथ उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और व्यक्तित्व की विशेषताओं पर भी यथोचित प्रकाश डाला है। वास्तव में स्मिता पाटील के अभिनय कला की इतनी छटाएं, विविधताएं, शेड्स और प्रतिबिंब हैं कि उन पर कई शोध किए जा सकते हैं और किताबें लिखी जा सकती हैं। इस परिप्रेक्ष्य में आपका यह आलेख बेहद पठनीय और संग्रहणीय बन पड़ा है।

    निष्कर्ष के तौर पर आपके ये कथन सटीक और सही हैं कि, *स्मिता पाटिल, एक ऐसी कलाकार थीं जो बॉलीवुड में ताज़ी हवा की तरह आईं। समानांतर और सार्थक फिल्मों मे समाज के निचले तबके और संघर्षरत स्त्रियों के चरित्रों को परदे पर जीवंत करते हुए अत्यंत छोटी उम्र मे काल के गाल मे समय गईं। उन्होंने फिल्मों मे अपने विषय चयन और प्रभावशाली अभिनय से कई सकारात्मक और प्रगतिशील बदलाव किए।*

    इस सुंदर आलेख के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं।

  4. दीपक शर्मा says

    स्मिता पाटिल पर बेहतरीन विश्लेषण सर

  5. […] स्मिता पाटिल ने संजीदा सिनेमा को एक नय… […]

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