भारतीय सामाजिक क्रान्ति के सूर्य ज्योतिबा फुले

जयप्रकाश कर्दम

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बहुत पहले किसी विद्वान का यह कथन पढा था कि ‘अज्ञानता के अंधकार में जीने वाला मनुष्य कभी अपने जीवन के लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता।’ यह भी पढा था कि ‘अनपढ आदमी को निरा बैल समझो। उसे चाहे जैसे हाँक लो।’ ये दोनों बातें भारत में दलितों के संबंध में शत-प्रतिशत खरी उतरती हैं। सदियों से दलित लोग अशिक्षा के अंधकार में जीते आए हैं। इस अज्ञानता के कारण ही वे अपनी विवेक बुद्धि का कभी इस्तेमाल नहीं कर सके। दलितों (तथाकथित शूद्र-अतिशूद्र) को इस त्रासदायक स्थिति में जबरन धकेलकर उन पर अपनी मनमानी लादने वाले तथाकथित उच्च वर्णीय लोगों ने दलितों को विवेक-शून्य बनाए रखने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी। दलितों को सदां-सर्वदा के लिए अपना मानसिक और शारीरिक गुलाम बनाए रखने के लिए उन्होंने बहुत से ऐसे किस्से-कहानियां और आख्यान तैयार किए जो दलितों पर उनकी श्रेष्ठता को न केवल आधार देते थे अपितु उसे पुष्ट भी करते थे। वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद और पुराण ग्रंथ इसी सोच और मानसिकता की उत्पत्ति हैं। ये सब ग्रंथ इसी तरह की तर्कहीन, बेबुनियाद और पाखण्डपूर्ण बातों के पुलिंदे हैं। चार्वाक ने वेदों को ‘धूर्तों का प्रलाप’ यूं ही नहीं कहा था। उसकी तर्कबुद्धि ने इनमें निहित धूर्तता और पाखण्डों को, और उन पाखण्डों के पीछे छिपे स्वार्थ को भलि-भांति पकड़ लिया था। चार्वाक का मुद्दा दार्शनिक मुद्दा था। इसे सामाजिक स्तर पर समझने और समझाने का सफल प्रयास मान्य ज्योतिबा फुले ने किया।

उच्च कही या मानी जाने वाली जातियां सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित, आर्थिक रूप से संपन्न तथा राजनीतिक रूप से वर्चस्वशाली है, जबकि निम्न जातियाँ सामाजिक रूप से उपेक्षित और तिरस्कृत, आर्थिक रूप से अभावग्रस्त, और राजनीतिक रूप से शक्तिहीन हैं। अस्पृश्यता के कारण वे अनेक प्रकार के निषेध और वर्जनाओं की शिकार हैं।

देश में बहुत से समाज सुधारक हुए हैं। संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो इतने समाज सुधारक शायद ही किसी अन्य देश में हुए हों जितने भारत में हुए हैं। इस दृष्टि से भारत को समाज सुधारकों की भूमि कहा जा सकता है। किन्तु इन समाज सुधारकों ने समाज का क्या और कितना सुधार किया है, यह विचार का विषय है। सुधार की आवश्यकता वहाँ होती है जहां समाज में विकृतियाँ, विसंगतियाँ और विकार होते हैं। जहां चीजें ठीक नहीं होतीं, गड़बड़ होती है।

भारत में बड़ी संख्या में समाज सुधारकों का होना इस बात का द्योतक है कि भारतीय समाज विकृत, विसंगतिपूर्ण और विकृतियों से भरा समाज है। धर्म, संप्रदायों में तो प्राय: दुनियां के प्रत्येक राष्ट्र के समाज में विभाजन पाया जाता है। किन्तु, भारतीय समाज धर्म और संप्रदाय के अलावा वर्ण, जाति और उपजातियों में भी विभक्त है। यह विभाजन समाज में व्यक्तियों के बीच श्रेष्ठता-हीनता, ऊंच-नीच, स्पृश्य-अस्पृश्य, वर्चस्व-वंचना और सम्मान-अपमान का आधार है।

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उच्च कही या मानी जाने वाली जातियां सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित, आर्थिक रूप से संपन्न तथा राजनीतिक रूप से वर्चस्वशाली है, जबकि निम्न जातियाँ सामाजिक रूप से उपेक्षित और तिरस्कृत, आर्थिक रूप से अभावग्रस्त, और राजनीतिक रूप से शक्तिहीन हैं। अस्पृश्यता के कारण वे अनेक प्रकार के निषेध और वर्जनाओं की शिकार हैं। संक्षेप में देश की दलित और बहुत सी पिछड़ी जातियों के अधिकांश लोग मानवीय अधिकारों से वंचित हैं।

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समाज सुधार का असली कार्य यही था कि समाज के इन उपेक्षित, तिरस्कृत, वंचित, उत्पीड़ित और शोषित लोगों को मानवीय अधिकार दिलाने हेतु प्रयास किए जाते। समाज सुधार का अर्थ यथार्थ में केवल सवर्ण हिन्दू समाज की बेहतरी माना गया इसलिए हिन्दू समाज की प्रगति में जो सामाजिक विकृतियाँ या विसंगतियाँ देखी, समझी या मानी गईं उन विकृतियों अथवा विसंगतियों को दूर करने पर ही प्राय: सभी समाज सुधारकों का बल रहा। इसलिए भारत के तथाकथित समाज सुधारवाद को सवर्ण हिन्दू समाज कल्याणवाद कहना अधिक उपायुक्त है।

समाज की रूढ परम्पराओं, अंधविश्वासों, धार्मिक मान्यताओं तथा सामाजिक भेदभाव, उपेक्षा और शोषण का प्रतिकार कर समाज के तिरस्कृत, वंचित, उपेक्षित वर्गों और जातियों में समानता, सम्मान और स्वाभिमान चेतना का संचार करने वाले कबीर की वाणी का यह उपहास उनका अपमान है। यही हाल संत रविदास का हुआ। उनको भी ईश्वर भक्त के रूप में ही प्रचारित किया गया है।

यहाँ उल्लेखनीय बात यह भी है कि सवर्ण हिन्दू जातियों में जन्मे और सवर्ण हिन्दू समाज के कल्याण के निमित्त कार्य करने व्यक्तियों को समाज सुधारक के रूप में प्रचारित और सम्मानित किया गया जबकि वर्ण-जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता जैसी अत्यंत अमानवीय परंपरा का प्रतीकार करने वाले कबीर की बानी का उलटबांसी या रहस्य कहकर मज़ाक उड़ाया गया।

कबीर को इस तरह बदनाम किया गया कि दुनियाँ भर की तमाम अश्लील और अशोभनीय बातों को कबीर के साथ जोड़कर सुनाया जाता है। और बड़े मजे से उसमें रस और मजा लिया जाता है। ‘क़हत कबीर सुनो भाई साधो’ कहकर उसके आगे श्लील-अश्लील कुछ भी जोड़कर कहने की एक परंपरा सी समाज में बन गई है। होली के अवसर पर गाए जाने वाले कबीरे इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जिनमें कबीर का नाम जोड़कर बहुत भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती हैं।

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समाज की रूढ़ परम्पराओं, अंधविश्वासों, धार्मिक मान्यताओं तथा सामाजिक भेदभाव, उपेक्षा और शोषण का प्रतिकार कर समाज के तिरस्कृत, वंचित, उपेक्षित वर्गों और जातियों में समानता, सम्मान और स्वाभिमान चेतना का संचार करने वाले कबीर की वाणी का यह उपहास उनका अपमान है। यही हाल संत रविदास का हुआ। उनको भी ईश्वर भक्त के रूप में ही प्रचारित किया गया है। पाठ्यक्रमों में भी उनकी इसी प्रकार की रचनाओं को शामिल कर विद्यार्थियों को पढ़ाया गया है। वर्ण-जाति-व्यवस्थाजनित सामाजिक-आर्थिक असमानता, शोषण, अस्पृश्यता और इसके आधार ईश्वरवाद की आलोचना और नकार में उन्होंने जो कहा, जिसमें दलित चेतना की अभिव्यक्ति है, उसे दबा कर या उपेक्षित रखा गया।

किसी भी व्यक्ति, विचार या तर्क का जब कोई जवाब नहीं होता तो उसको दबाने या बदनाम करने के परम्परा सवर्ण हिंदू समाज में बहुत पुरानी है। शंकराचार्य और बौद्ध आचार्य धर्मकीर्ति के बीच हुए तर्क-युद्ध या शास्त्रार्थ में धर्मकीर्ति के तर्कों के समक्ष धराशायी शंकराचार्य को, राजा सुधन्वा की सेना के सानिध्य में उनके समर्थक ब्राह्मणों द्वारा, शोर-शराबे और शक्ति-बल से जबरदस्ती विजयी घोषित कर दिया गया था। महाभारत में अश्वत्थामा की मृत्यु की घोषणा भी इसी प्रकार की गयी थी।

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पाखंडपूर्ण ग्रन्थों के पहले अध्येता और विध्वंशक 

हालांकि ज्योतिबा फुले से पहले नामदेव, चोखामेला, कबीर और रैदास ने भी इन पाखण्डों को समझा था और अपनी-अपनी भाषा और शैली में इनका प्रतिकार भी किया था, किंतु अकसर ज्ञान न होने के कारण इन ग्रंथों में निहित बारीक कुटिलताओं को वे नहीं पकड़ पाए थे। ज्योतिबा फुले पहले व्यक्ति हुए जिन्होंने इन पाखण्डपूर्ण ग्रंथों का तार्किक अध्ययन किया और इनकी विसंगतियों को जन-मानस के सामने मौखिक और लिखित रूप में प्रस्तुत करके उनकी आंखें खोलीं। सही मायनों में ज्योतिबा फुले दलित समाज के पहले शिक्षक और प्रवक्ता हैं, जिन्होंने दलितों को ब्राह्मणों द्वारा रचित इन ग्रंथों के पाखण्डों से अवगत कराया।

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ज्योतिबा फुले के परदादा महाराष्ट्र में सतारा से 40 किलोमीटर दूर स्थित कटगुण नामक गांव के रहने वाले थे। उनके परदादा का नाम गोरे था, जो जाति से माली थे, जिसे शूद्र और निम्न जाति माना जाता है। थोड़ी सी कृषि-भूमि के सहारे परिवार का गुजारा कठिन था, इसलिए वह गांव में ‘चौगुला’ के रूप में भी काम करते थे। तत्कालीन समय में प्रत्येक गांव में दो मुख्य अधिकारी हुआ करते थे-‘पाटील’ और ‘कुलकर्णी’, जिन्हें ‘चौधरी’ और ‘पटवारी’ कहा जा सकता है। कुलकर्णी प्राय: ब्राह्मण हुआ करते थे। इन दोनों के अधीन ‘चौगुला’ (सहायक) हुआ करता था, जो इन अधिकारियों के रजिस्टरों, पुस्तकों आदि के लाने और ले-जाने, लगान की वसूली करने और कटाई के दिनों में फसलों का निरीक्षण करने में सहायता करता था। बाद में उनका परिवार पुणे आ गया था। यहीं पर ज्योतिराव फुले का जन्म हुआ। यही उनकी कर्मभूमि भी रही।

साधारण परिवेश और असाधारण व्यक्तित्व 

ज्योतिबा का जन्म 11 अप्रैल, सन 1827 को पुणे के पास एक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंदराव और माता का नाम चिमणाबाई था। ज्योतिराव के जन्म के एक वर्ष बाद ही चिमनाबाई का निधन हो गया। इसके कुछ समय बाद ही उनके पिता की जमीन का, जिस पर वे खेती करते थे, सरकार द्वारा अधिग्रहण कर लिया गया। परिवार की आजीविका चलाने के लिए वे अपने परिवार को लेकर पुणे आ गए और बच्चों के लालन-पालन हेतु मौसेरी बहिन सगुणाबाई क्षीरसागर को अपने पास रख लिया।

सगुणाबाई बाल विधवा थी और ईसाई मिशनरी में अनाथ बच्चों की देखभाल का काम करती थी। अंग्रेजी भाषा का भी उसे कुछ ज्ञान था। सगुणाबाई ने बहुत ममता और प्यार से बालक ज्योतिराव का पालन-पोषण किया और उन्हें कभी मां की कमी महसूस नहीं होने दी। बचपन से ज्योतिराव सगुणा को ‘आऊ’ कहकर सम्बोधित करते थे। सगुणा भी ज्योतिराव को अपने बच्चे की तरह प्यार करती थी और सदेव उन्हें पढने-लिखने के लिए प्रेरित करती थी।

प्राय: छ: वर्ष की आयु तक लड़की और दस वर्ष की आयु तक लड़के का विवाह कर दिया जाता था। यदि इस आयु तक किसी लड़की या लड़के का अविवाहित रह जाना समाज में अच्छा नहीं माना जाता था। और ऐसे परिवारों का सामाजिक सम्मान कम हो जाता था। ज्योतिराव का विवाह भी देर से हुआ था।

6 वर्ष की आयु में ज्योतिराव को स्कूल में प्रवेश दिलाया गया। वह खूब मन लगाकर पढते। बहुत जल्दी वे पढना-लिखना सीख गए और हिसाब भी करने लगे। किंतु इसी दौरान कट्टरपंथी ब्राह्मणों द्वारा निम्न जाति के विद्यार्थियों के स्कूल प्रवेश का तीव्र विरोध किए जाने के कारण स्कूलों से निम्न जातियों के विद्यार्थियों को निष्कासित कर दिया गया। इसी दबाव में ज्योतिराव को भी स्कूल छोड़ना पड़ा। किंतु ज्योतिराव में पढने की जबरदस्त लगन थी। स्कूल से पढायी रूक जाने के बाद ज्योतिराव ने अपने पिता के साथ फूलों की खेती के काम में हाथ बंटाना शुरू किया। वह दिन में अपने पिता के साथ खेतों में काम करते लेकिन रात में टिमटिमाते दीये की रौशनी में पढते थे।

उन दिनों बाल विवाह की प्रथा थी। प्राय: छ: वर्ष की आयु तक लड़की और दस वर्ष की आयु तक लड़के का विवाह कर दिया जाता था। यदि इस आयु तक किसी लड़की या लड़के का अविवाहित रह जाना समाज में अच्छा नहीं माना जाता था। और ऐसे परिवारों का सामाजिक सम्मान कम हो जाता था। ज्योतिराव का विवाह भी देर से हुआ था। 14 वर्ष की उम्र में उनका विवाह सतारा जिले के नायगांव निवासी खंडूजी नेवसे और श्रीमती लक्ष्मीबाई की सुंदर, सुशील पुत्री सावित्रीबाई के साथ सम्पन्न हो गया था। उस समय सावित्रीबाई की उम्र आठ वर्ष थी।

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ज्योतिराव का शिक्षा के प्रति इतना लगाव देखकर उनके पिता गोबिंदराव ने ज्योतिराव को शिक्षा दिलाने का निश्चय किया। सन 1841 में 14 वर्ष की आयु में उनको स्कॉटिश मिशन की अंग्रेजी पाठशाला में फिर से भर्ती कराया गया। यहां से उनके जीवन में नया मोड़ आ गया। हालांकि अन्य छात्रों की अपेक्षा ज्योतिराव की उम्र अधिक थी, किंतु इसका ध्यान मन में लाए बिना वह पूरी एकाग्रता के साथ अध्ययन करते थे और प्रत्येक परीक्षा में प्रथम श्रेणी के उत्तीर्ण होते थे। शीघ्र ही वह अपने अध्यापकों के प्रिय विद्यार्थी बन गए। इसी दौरान ज्योतिराव की कुछ प्रगतिशील ब्राह्मण और मुसलमान लड़कों के साथ घनिष्ठता हो गयी। इससे उनको धर्म के नाम पर ब्राह्मणों द्वारा की जा रही धूर्ततापूर्ण चालाकियों और अत्याचारों के बारे में पता चला। शिवाजी और जॉर्ज वाशिंगटन की जीवनियां पढने से उनको श्रम, साहस और संघर्ष के बल पर आगे बढने की प्रेरणा मिली। अपने अध्ययन के क्रम में उन्होंने एकनाथ की भागवत, ज्ञानेश्वरी और तुकाराम की गाथा तथा गीता, उपनिषद और पुराणों का भी अध्ययन किया। पाश्चात्य विचारकों में जॉन स्टुआर्ट मिल और हरबर्ट स्पेंसर आदि ने भी उनको प्रभावित किया।

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सावित्रीबाई फुले का असाधारण जीवन

ज्योतिराव शरीर से बहुत सुंदर, स्वस्थ और ताकतवर थे। हालांकि उनको सवर्ण विद्यार्थियों से जाति-प्रथा और ऊंच-नीच के कटु व्यवहार का सामना करना पड़ा। किंतु उन्होंने इससे बिना विचलित हुए अपनी पढाई जारी रखी। एक बार उनको एक ब्राह्मण मित्र के विवाह में शामिल होने का निमंत्रण मिला। वहां पर निम्न जातीय होने के कारण ब्राह्मणों ने उनका अपमान किया। इस घटना ने उनको बहुत मानसिक आघात लगा। घर लौटने पर पितागोविंद राव से उनकी बात हुई तो उन्होंने पूछा, ‘किसने बनाया हमें नीच? यह सारा ब्राह्मणों का ढकोसला है। बारात की घोड़ी को छूने से उन्हें छूत नहीं लगती और हमारे छूने पर छूत लग जाती है। क्या हम जानवरों से भी गए-बीते हैं?

वह शिक्षा से लेकर शस्त्र तक प्रत्येक क्षेत्र में वह पारंगत होना चाहते थे। इसलिए पढाई के साथ-साथ उन्होंने लहूजी भाऊ नाम के एक मांग (अछूत) व्यक्ति से तलवारबाजी, निशानेबाजी आदि का प्रशिक्षण लिया। यह एक संयोग है कि ज्योतिराव के साथ दो अन्य युवाओंने भी लहूजी साल्वे से सैनिक प्रशिक्षण लिया। इनमें एक वासुदेव बलवंत फड़के ने अंग्रेजों के विरूद्ध सशस्त्र क्रांति में भाग लिया और दूसरे बालगंगाधर तिलक थे।

जिन किताबों ने फुले की जीवनधारा बदल दी 

शिक्षा प्राप्ति के दौरान ज्योतिराव को हिंदू-धर्म अन्य बहुत सी पुस्तकों के साथ-साथ टॉमस पेन की पुस्तकों राइट्स ऑफ मेन और दि एज ऑफ रिजन को भी पढा। मानववाद के प्रबल पक्षधर और प्रवक्ता टॉमस पेन के विचारों का ज्योतिराव के चिंतन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। अमेरिका के विद्रोही लेखक पेन की मान्यता थी कि ‘देश, वंश, पंथ, स्तर, लिंग आदि के आधार पर मनुष्यों में भेदभाव करना ईश्वरी योजना के विरूद्ध है। हर एक को दूसरे की मनुष्यता की कद्र करनी चाहिए और सभी के साथ समानता का बर्ताव करना चाहिए।’ (मुरलीधर जगताप, युगपुरूष महात्मा फुले, पृष्ठ-28-29)

पेन के अनुसार, ’व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह को अपने-अपने विश्वास के अनुसार ईश्वर की भक्ति करने की छूट होनी चाहिए और इस बारे में किसी भी सरकार या अन्य संस्था को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। साथ ही यदि किसी की असहिष्णुता के कारण अन्यों की धार्मिक स्वतंत्रता पर आक्रमण का भय उत्पन्न होता हो तो संबंधितों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य होना चाहिए।’ (वही, पृष्ठ-29) अपनी इस धर्म संबंधी विचार प्रणाली को पेन ‘मानवता धर्म’ (रिलीजन ऑफ ह्युमेनिटी) कहते थे। पेन की आदर्शोक्ति थी-‘पूरा विश्व मेरा देश है और सबकी भलाई करना मेरा धर्म है।’ (वही, पृष्ठ-29)

पेन के मानवता-धर्म और बाद में ज्योतिराव फुले द्वारा स्थापित ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ में सैद्धांतिक रूप से बहुत समानता है। मानव का सम्मान, वैयक्तिक स्वतंत्रता का आग्रह और गुलामी का धिक्कार पेन की समग्र विचार प्रणाली की त्रिसूत्री थी। स्वतंत्रता का आग्रह और गुलामी का धिक्कार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इन तीनों तत्वों को अलग-अलग नहीं किया जा सकता। ज्योतिराव ने भी अपने कार्यों और साहित्य में इन तीन तत्वों पर सदा ही बल दिया।’ (वही, पृष्ठ-29)

मिशनरी कॉलेज में पढते हुए ज्योतिराव को दो लाभ हुए। एक तो ईसाई पादरियों और अंग्रेज प्राध्यापकों के सानिध्य में ईसाई धर्म के बारे में गहराई से जानने समझने का अवसर मिला और हिंदू धर्म की बुराइयों का ही पता चला। साथ ही चिंतनपरक, तार्किक और आधुनिक प्रगतिशील विचारों से परिपूर्ण पुस्तकें पढने का भी अवसर मिला। दूसरे, प्रगतिशील विचारों वाले ब्राह्मण और मुसलमान सहपाठियों के साथ-साथ कुछ मराठा, ईसाई और निम्न जातीय युवाओं से उनकी घनिष्ठता हो गयी थी, जिनके साथ वह हिंदू धर्म की बुराइयों और उनके निराकरण के बारे में बात करते थे। अपने गम्भीर अध्ययन, तार्किक चिंतन और मानववादी दृष्टिकोण के कारण ज्योतिराव अपने सभी साथियों के प्रिय और आदर्श बन गए थे। उन्होंने सामाजिक रूढियों और धार्मिक कट्टरता को ज्योतिराव समाज की प्रगति और विकास के लिए अभिशाप मानते थे और इस कारण इनका विरोध करते थे। इसके अलावा समाज में प्रचलित रूढियों, प्रथाओं, मान्यताओं, अंधविश्वासों के कारण समाज में प्रचलित अमानवीय और समाज को पीछे की ओर ले जाने वाली जड़ परम्पराओं का भी उन्होंने विरोध किया। साथ ही उनके अंदर देश-प्रेम की भावना विकसित होती गयी। वह अंग्रेजी शासन के खिलाफ थे और चाहते थे कि अंग्रेजों को जल्द से जल्द देश से बाहर भगा देना चाहिए। इतने विशाल देश पर मुट्ठी भर अंग्रेज कैसे शासन कर रहे हैं और उनको क्यों नहीं मार भगाया जाता, जब उन्होंने इन प्रश्नों पर विचार किया तो उन्हें महसूस हुआ कि समाज में संगठन और एकता की कमी है, और समाज में एकता न होने का सबसे प्रमुख कारण अशिक्षा और समाज में जड़ तक फैली जाति-व्यवस्था है। ब्राह्मण वर्चस्व वाला भारतीय समाज पुरूष सत्तात्मक समाज है। ब्राह्मण सब पर अपना प्रभुत्व बनाकर रखना चाहता है, इसलिए समाज में निम्न जातीय लोगों को और घर में स्त्री को निम्न मानकर दबाकर रखता है। दोनों को ही दबाए रखने के लिए उसने अपने धर्मग्रंथों में व्यवस्था की है। शिक्षित होने पर वे इन धर्म-ग्रंथों में निहित कुटिलताओं और पाखण्डों को जान जाएंगे इसलिए स्त्री और निम्न जातियां दोनों को ही उसने शिक्षा और मानव-अधिकारों से वंचित रखा।

लड़कियों की शिक्षा की भारत में यह पहली पाठशाला थी। सावित्रीबाई को इस पाठशाला की मुख्य-अध्यापिका बनाया गया। सावित्रीबाई का अध्यापक बनना भी एक ऐतिहासिक घटना थी। उससे पूर्व भारत की किसी महिला को शिक्षिका बनने का अवसर नहीं मिला था। ज्योतिबा फुले के प्रयासों का परिणाम था कि सावित्रीबाई भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। उस समय ज्योतिबा फुले की आयु केवल 21 वर्ष की थी। इतनी कम आयु के युवक द्वारा शुरू किया गया स्त्री शिक्षा का यह कार्य एक अदभुत, अनूठा और क्रांतिकारी कार्य था।

सामाजिक दासता के खिलाफ मुहिम 

वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि देश की आजादी और समाज की प्रगति के लिए जाति-व्यवस्था का नाश तथा स्त्री और निम्न जातियों का शिक्षित होना अनिवार्य है। शूद्र-अतिशूद्र समाज में समानता और आत्म-सम्मान की भावना को जागृत करने के लिए ज्योतिबा फुले ने उन्हें बताया कि वे जिस सामाजिक दासता का दंश भोग रहे हैं, वह उनके पूर्व-जन्मों का फल नहीं है, जैसाकि ब्राह्मणों द्वारा बताया जाता है, अपितु, यह अशिक्षा और सदियों से थोपी गयी मानसिक दासता का परिणाम है। उनका यह मत था कि समाज निर्माण और समाज परिवर्तन का जो काम एक स्त्री कर सकती है वह काम दस शिक्षक नहीं कर सकते। इसलिए स्त्री-शिक्षा को सर्वोपरि माना तथा अपनी शिक्षापूर्ण कर पुणे लौटते ही उन्होंने सबसे पहले अपनी पत्नी सावित्रीबाई को पढाना शुरू किया। 14 जनवरी, 1848 में उन्होंने पुणे की बुधवार पेठ में अपने ब्राह्मण सहयोगी श्री भिड़े के मकान में कन्या पाठशाला की स्थापना की, जहां पर उच्च जातियों के लोग ही रहते थे। लड़कियों की शिक्षा की भारत में यह पहली पाठशाला थी। सावित्रीबाई को इस पाठशाला की मुख्य-अध्यापिका बनाया गया। सावित्रीबाई का अध्यापक बनना भी एक ऐतिहासिक घटना थी। उससे पूर्व भारत की किसी महिला को शिक्षिका बनने का अवसर नहीं मिला था। ज्योतिबा फुले के प्रयासों का परिणाम था कि सावित्रीबाई भारत की पहली महिला शिक्षिका बनीं। उस समय ज्योतिबा फुले की आयु केवल 21 वर्ष की थी। इतनी कम आयु के युवक द्वारा शुरू किया गया स्त्री शिक्षा का यह कार्य एक अदभुत, अनूठा और क्रांतिकारी कार्य था।

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उस जमाने में समाज में यह धारणा थी कि स्कूल जाने से लड़कियां बिगड़ जाएंगी। कुछ लोग लड़कियों की शिक्षा को धर्म-विरूद्ध मानते थे और इसलिए अपनी लड़कियों को पढने के लिए स्कूल नहीं भेजते थे। ज्योतिबा फुले ने लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोला तो बहुत से लोगों ने उनकी कड़ी आलोचना की और उनको भला-बुरा कहा। इतना ही नहीं बहुत से लोग सावित्रीबाई की हंसी उड़ाते थे, उन पर गंदी टिप्पणियां करते थे, उनके ऊपर पान की पीक थूंक देते थे, ताकि वह दुखी होकर लड़कियों को पढाना बंद कर दें। किंतु सभी आलोचनाओं और विरोधों से विचलित हुए बिना ज्योतिराव पूरी दृढता से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर रहे। इसका यह परिणाम हुआ कि सन 1849-50 में उनकी पाठशाला में पढने वाली लड़कियों की संख्या बढकर 70 तक हो गयी। इस पाठाशाला के अच्छे परिणाम से ज्योतिराव का हौसला बढा और उन्होंने इसके बाद पुणे शहर और देहातों में लड़कियों की कई पाठशालाएं स्थपित कीं।

इन पाठशालाओं के माध्यम से लड़कियों की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करने के बाद ज्योतिराव ने अछूतों की शिक्षा की ओर ध्यान दिया तथा 01 मई, 1852 को अछूत बच्चों की शिक्षा के लिए एक पाठशाला की स्थापना की। पूरे देश में अस्पृश्य जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए स्थापित की गयी यह पहली पाठशाला थी। दलितों के उत्थान की दिशा में आधुनिक भारत के इतिहास में ज्योतिराव फुले द्वारा किया गया यह पहला महत्वपूर्ण प्रयास था। विद्यालयों के लिए धन की व्यवस्था और प्रबंधन के कार्य में ज्योतिबा इतने व्यस्त रहते थे कि खाना खाने तक के लिए भी मुश्किल से समय निकाल पाते थे। किंतु इसके उपरांत वह स्वयं भी बच्चों को पढाते थे। सरकार द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम के अलावा वह विद्यार्थियों को धर्म, समाज, संस्कृति आदि के बारे में भी बताते थे। वेद या किसी भी धार्मिक ग्रंथ की रचना ईश्वर ने नहीं की है। इनकी रचना मनुष्यों द्वारा की गयी है। मिथ्या प्रचार ब्राह्मणों द्वारा अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए किया गया।

किसी भी हाल में हताश और दयनीय नहीं हुये 

ज्योतिबा फुले के जीवन में ऐसे भी कई अवसर आए जब उनके पास खाने तक के लिए पैसे नहीं थे और उनको तथा सावित्रीबाई को भूखे ही रहना पड़ा। किंतु वे कभी हताश और दुखी नहीं हुए। अपने समाज-सुधार के अभियान को आगे बढाते हुए ज्योतिबा फुले ने ‘महिला सेवा मण्डल’ की स्थापना की। सम्पूर्ण भारत में अस्पृश्यता उन्मूलन हेतु कार्य करने वाली देश में यह पहली संस्था थी। अछूतों के साथ-साथ गरीब किसानों के घर जा-जाकर बच्चों को पढाने के लिए प्रेरित कर शिक्षा के माध्यम से उनके जीवन को बेहतर बनाने हेतु ज्योतिबा फुले ने अकथनीय प्रयास किया। 25 वर्ष की युवा उम्र में ही इतने बड़े और महान करने के कारण दूर-दूर तक ज्योतिराव की ख्याति फैल गयी। दलित समाज के वह मुक्तिदाता और मसीहा बन गए। स्त्री और दलितों की शिक्षा के प्रति ज्योतिराव द्वारा किए गए महान कार्य के लिए 16 नवम्बर,1852 को मुम्बई सरकार द्वारा उनका नागरिक अभिनंदन कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर अपने भाषण में ज्योतिराव फुले ने कहा था कि ‘मैं ज्ञान का दीपक लेकर उन सबके पास जाना चाहता हूं जिनके जीवन में अंधेरा ही अंधेरा है। इस सम्मान-वस्त्र ने प्रमाणित कर दिया है कि ज्ञान सभी के लिए है, वह किसी की बपौती नहीं है।’ (युगपुरुष महात्मा फुले, मुरलीधर जगताप, पृष्ठ-47)। जानकारी के लिए यह बताना आवश्यक है कि उस समय केवल विख्यात संस्कृत पंडितों को ही सम्मान-वस्त्र भेंट किया जाता था। ज्योतिराव फुले पहले गैर-ब्राह्मण व्यक्ति थे जिनको सम्मान-वस्त्र भेंट कर सार्वजनिक अभिनंदन किया गया था।

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स्त्रियों के मुक्तिदूत 

उन दिनों समाज में विधवा स्त्रियों की दशा बहुत दयनीय थी। बहुत-सी विधवा स्त्रियां अपनी गलती से अथवा पुरूषों की चालाकी का शिकार होकर गर्भवतीहो जाती थी, उनकी समाज में बड़ी दुर्गति होती थी। उनके बच्चों को समाज में घृणा, अपमान और दुत्कार मिलती थी। ऐसी महिलाओं की सहायता करने के लिए ज्योतिबा फुले ने 28 जनवरी, 1953 को एक ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की। किसी भी कारण से गर्भवती हुई विधवा महिला इस केंद्र में आकर अपनी प्रसूति करा सकती थी और बच्चे को यहीं पर छोड़कर जा सकती थीं। यदि चाहें तो वे स्वयं भी यहां पर रह सकती थीं। इससे बहुत सी युवा विधवा स्त्रियों को को सामाजिक कलंक और अपमान की जिंदगी जीने से मुक्ति मिली। पुणे में स्थापित इस प्रसूति-गृह की सफलता से प्रेरित होकर ज्योतिराव ने पण्ढरपुर में भी एक ‘बाल-हत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की।

ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई की कोई संतान नहीं थी। प्रसूति-गृह में अपने अवैध बच्चे की प्रसूति कराने आयी काशीबाई नाम की एक विधवा ब्राह्मण स्त्री के बच्चे को, उसके अनुरोध पर, फुले दम्पत्ति ने गोद ले लिया। अपने इस दत्तक पुत्र का नाम उन्होंने यशवंत रखा। (ज्योतिबा फुले के अत्यधिक प्रभावित होने का परिणाम था अथवा महज एक संयोग कि डॉ. अम्बेडकर के एकमात्र जीवित पुत्र का नाम भी यशवंत था)। फुले दम्पत्ति ने बहुत अच्छी तरह से यशवंत का पालन-पोषण किया। अपने माता-पिता की सेवा भावना से प्रभावित और प्रेरित होकर यशंवंतराव ने डॉक्टरी की शिक्षा प्राप्त की। माली समाज के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति ज्ञानवा औष्णराव सहाणे की पुत्री राधाबाई के साथ यशवंत का विवाह हुआ। उस समय में जब जाति-बाह्य विवाह करना पाप समझा जाता था, यशवंतराव और राधाबाई के अंतरजातीय विवाह को समाज में एक आश्चर्यजनक और समाज-विरोधी घटना के रूप में देखा गया था। बहुत से लोगों ने इस विवाह का विरोध किया।

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ज्योतिराव ने समाज की बेहतरी के लिए कई प्रकार के कार्य किए। पुणे में राज्य की ओर से ब्राह्मणों को दान दिए जाने की व्यवस्था थी। इससे न केवल अनपढ, निकम्मे ब्राह्मणों की आजीविका चलती थी और वे भोली-भाली अशिक्षित-अज्ञानी जनता में कुरीतियों, अंध-विश्वास और पाखण्ड फैलाते थे। बहुत से लोग फर्जी नामों से भी राज्य से यह धनराशि प्राप्त करते थे। इस व्यवस्था के द्वारा सरकारी धन ब्राह्मणों पर लुटाया और उनके द्वारा खूब लूटा जा रहा था। यह व्यवस्था शिवाजी, पेशवा से लेकर अंग्रेजों के आने पर भी चालू रही थी। ज्योतिबा फुले ने इस व्यवस्था का जोरदार विरोध किया तथा इस व्यवस्था को समाप्त करवाकर इस पर खर्च होने वाली राशि कि मराठी साहित्य के प्रकाशन और दूसरी भाषाओं से मराठी भाषा में अनुवाद पर खर्च कराने की व्यवस्था करायी। मराठी भाषा और साहित्य की वृद्धि और विकास का श्रेय ज्योतिबा फुले को जाता है।

सत्य की खोज उनका अंतिम ध्येय था 

ज्योतिबा फुले ने अपने विचारों को समाज में दूर तक फैलाने के लिए कई पुस्तकों की रचना भी की। उनकी पहली पुस्तक तृतीय रत्न एक नाटक था, जो 1855 में प्रकाशित हुआ। सन 1869 में शिवाजी-चा-पोवाड़ा (छत्रपति राजा शिवाजी भोसला का पंवाड़ा) नामक पुस्तक प्रकाशित हुई। इसके पश्चात एक के बाद एक उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं जिनमें ब्राह्मणांचे कसब (ब्राह्मणों की चालाकी), किसान का कोड़ा, अछूतों की कैफियत और गुलामगीरी शामिल हैं। ’सार्वजनिकसत्यधर्म पुस्तक’ उनके द्वारा लिखित सबसे अंतिम पुस्तक है। यह पुस्तक 1889 में प्रकाशित हुई थी। इसके अलावा भी उन्होंने कई लेख लिखे। ‘गुलामगीरी’ को तो दलितों की मुक्ति का घोषणा-पत्र माना जाता है।

1876 से 1882 तक ज्योतिबा फुले पुणे की नगरपालिका के सदस्य चुने गए। इस दौरान उन्होंने अनेक समाजो पयोगी प्रस्ताव समिति में पेश कर समाज का हित किया। दलित-पिछड़ी बस्तियों के लिए बिजली-पानी की व्यवस्था कराने का श्रेय ज्योतिबा फुले को जाता है। उन्होंने ही इसके लिए नगर पालिका समिति में जोरदार आवाज उठायी।

उन्होंने सतसार नामक पत्रिका का सम्पादन भी किया। ज्योतिबा फुले ने बाद में जिस ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की थी उसकी वैचारिकी की नींव सतसार के द्वारा ही रखी गयी थी। ‘सत्य-शोधक समाज’ वस्तुत: वर्ण-जातिगत भेदभाव, ऊंच-नीच, ब्राह्मणों द्वारा फैलाए गए झूठ, पाखण्ड, छल-कपट, ठगी, अंधविश्वास, और इनके द्वारा दलित समाज के शोषण के प्रति जागरूक बनाने का एक आंदोलन था। बहुत थोड़े समय में ही दलित समाज की आकांक्षाओं का प्रतीक और संघर्ष-चेतना का संवाहक बन गया था। ‘सत्य-शोधक समाज’ के द्वारा ज्योतिबा फुले ने कम खर्च में, ब्राह्मण-पुरोहितों के बिना सरल पद्धति से दहेज-मुक्त विवाह करवाए। इसे पुरोहितवाद के प्रतिकार के प्रथम और सफल प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। विधवाओं के पुनर्विवाह करवाए। बाल-विवाहों के दुष्परिणामों के बारे में समाज को जागृत किया।

ज्योतिबा फुले ने अपने कार्यों और लेखन के माध्यम से ब्राह्मणवाद का जितना प्रखर विरोध किया उससे वह ब्राह्मणों की आंखों की किरकिरी बन गए। अपने रास्ते से हटाने के लिए ब्राह्मणों ने ज्योतिबा फुले की हत्या के लिए दलित समाज के दो बलिष्ठ और खूंखार व्यक्तियों को तैयार किया। किंतु ज्योतिबा के विचार सुनकर उनकी हत्या करने के बजाए वे ज्योतिबा के अनुयाई बन गए। बाद में उनमें से एक ज्योतिबा का अंगरक्षक बना और दूसरा सत्य-शोधक समाज का महत्वपूर्ण कार्यकर्त्ता बना। दलित-शोषित समाज के आदर और सम्मान के पात्र हो गए थे। दलित लोग उनके एक इशारे पर कुछ भी करने के लिए तत्पर रहते थे।

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1876 से 1882 तक ज्योतिबा फुले पुणे की नगरपालिका के सदस्य चुने गए। इस दौरान उन्होंने अनेक समाजो पयोगी प्रस्ताव समिति में पेश कर समाज का हित किया। दलित-पिछड़ी बस्तियों के लिए बिजली-पानी की व्यवस्था कराने का श्रेय ज्योतिबा फुले को जाता है। उन्होंने ही इसके लिए नगर पालिका समिति में जोरदार आवाज उठायी। फिजूलखर्ची के वह सख्त विरोधी थे। नगर पालिका की फिजूलखर्ची रोकने के लिए कई व्यवहारिक सुझाव दिए।

वायसराय के पुणे आगमन पर शहर में सजावट पर हुई फिजूलखर्ची का उन्होंने यह कहकर विरोध किया था कि फिजूलखर्ची की बजाए यह धन गरीबों की शिक्षा पर खर्च किया जाना चाहिए। शराब की दुकानें बढाने के निर्णय का भी ज्योतिबा फुले ने तीव्र विरोध किया था क्योंकि यह लोगों के स्वास्थ्य और जीवन से खिलवाड़ है। पशु चिकित्सा कॉलेज का निर्माण, प्राइमरी पाठशालाओं में छात्रवृत्तियों की संख्या में वृद्धि, नए बाजार के निर्माण के पीछे उनकी उल्लेखनीय भूमिका रही। दलितों के साथ-साथ किसानों की दुर्दशा के प्रति भी ज्योतिबा फुले बहुत चिंतित रहते थे और उनकी दशा सुधारने के लिए कई उल्लेखनीय कार्य किए।

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ज्योतिबा फुले ने इस बात की सम्भावना व्यक्त की थी कि हिंदू धर्म शोषण से मुक होने के लिए हो सकता है दलित जातियां इस्लाम, ईसाई या किसी अन्य धर्म में दीक्षित हो जाएं। और ऐसा ही हुआ भी। डॉ. बाबा साहाब अम्बेडकर के नेतृत्व में 14 अक्टूबर, 1956 को कई लाख दलितों ने एक साथ बौद्ध-धर्म की दीक्षा ली। यह सिलसिला आज तक जारी है। के माध्यम से भी अपने विचारों का समाज को सजग और सचेतन बनाने का काम किया।

 लकवा लग जाने के बावजूद किताब को पूरा किया 

साठ वर्ष की आयु तथा सार्वजनिक और समाज-सुधार के क्षेत्र में निरंतर महान काम करते हुए चालीस वर्ष हो जाने पर ज्योतिबा फुले का 11 मई 1888 को मुम्बई में नागरिक अभिनंदन कर उनको ‘महात्मा’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ इस अवसर पर भेजे अपने संदेश में ज्योतिबा फुले को ‘भारत का बुकर टी वाशिंगटन’ कहकर उनका सम्मान किया।

इसके कुछ माह बाद ही जुलाई 1888 में वह लकवा रोग से ग्रस्त हो गए। उनके शरीर का दायां भाग निष्क्रिय हो गया। इसके उपरांत उनकी सक्रियता में कोई कमी नहीं हुई। उन्होंने बाएं हाथ से काम करना शुरू किया और बाएं हाथ से ही ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ पुस्तक को लिखकर पूरा किया। स्वास्थ्य अधिक बिगड़ने पर उनका उनका घर से बाहर निकलना बंद हो गया और वह बिस्तर पर ही लेटे रहने को मजबूर हो गए। इस दौरान भी उन्होंने अपनी सक्रियता बनाए रखी। और पत्रों के द्वारा लोगों के साथ सम्पर्क बनाए रखा। इस दौरान लिखे उनके पत्रों की सबसे विशेष बात यह थी कि वह प्रत्येक पत्र में सबसे ऊपर ‘सत्यमेव जयते’ लिखा करते थे।

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सत्य के प्रति ज्योतिबा फुले का आग्रह जबरदस्त था। उन्होंने संस्था बनायी-‘सत्यशोधक समाज’, जिस धर्म को उन्होंने अपनाया और पालन किया उसे नाम दिया ‘सार्वजनिक सत्यधर्म’ और पत्र लिखते समय उनके शीर्ष पर भी लिखते थे तो ‘सत्यमेव जयते’। उपचार के बावजूद लकवे की इस बीमारी से वह उबर नहीं सके। उनका स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन खराब होता गया और सन 1890 की 28 नवम्बर को  63 वर्ष की आयु में मनुष्यता के प्रखर प्रवक्ता और पोषक तथा सत्य के महान साधक, क्रांतिसूर्य ज्योतिबा फुले का निधन हो गया।

जयप्रकाश कर्दम जाने-माने चिंतक, आलोचक और कथाकार हैं।

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