स्वामी विवेकानंद, गांधी और गौभक्त 

एलएस हरदेनिया

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अत्यधिक दुःखद समाचार है कि गौहत्या के सिर्फ संदेह के आधार पर दो भोले-भाले आदिवासियों की हत्या कर दी गई।हमारे देश में किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। पिछला अनुभव यह है कि कुछ मामलों में जिन व्यक्तियों की गौहत्या के नाम पर हत्या कर दी गई थी जांच-पड़ताल के बाद वे हत्या के अपराधी नहीं पाए गए। इसी तरह जिन घरों से गौमांस मिलने का आरोप लगाकर उन घरों में रहने वालों के साथ हिंसा की गई, बाद में उनके घरों से मिला मांस गौमांस नहीं निकला।

इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि गौहत्या का समाचार मिलने पर गौभक्तों को गुस्सा आना स्वाभाविक है। और गुस्से की स्थिति में संदेही गौहत्यारों पर हिंसक हमला करना भी स्वाभाविक माना जा सकता है। परंतु हमारे शासकों, राजनीतिक नेताओं को इस बात को प्रचारित करना चाहिए कि गौहत्या का समाचार मिलते ही गौभक्त पुलिस को सूचित करें और यदि किसी मांस के गौमांस होने का संदेह है तो उसकी जांच करवाएं। पुष्टि होने के बाद ही कानूनी प्रावधानों के मुताबिक पुलिस या अन्य अधिकारियों के माध्यम संबंधित आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही करवाएं। यदि वे आक्रोश में तथाकथित गौहत्यारों की हत्या कर देते हैं तो उन्हें आजीवन कारावास या मृत्युदंड भुगतना पड़ेगा।

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बताया गया है कि सिवनी जिले में हुई हत्याओं में बजरंग दल से जुड़े लोगों का हाथ है। अधिकृत रूप से बजरंग दल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का अनुषांगिक संगठन है। संघ को चाहिए कि अपने से जुड़ी संस्थाओं के सदस्यों को आदेश दे कि वे भविष्य में हिंसक गतिविधियों से दूर रहें। अभी कुछ दिनों पहले संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने देश में बढ़ती हुई हिंसा पर चिंता प्रगट की थी। संघ का अनुशासनबद्ध संस्था होने का दावा करता है। अतः यदि डॉ. भागवत पूरी दृढ़ इच्छा से हिंसा के त्यागने का आदेश देंगे तो शायद ही संघ से जुड़ा कोई व्यक्ति उनके आदेश का उल्लंघन करने का दुस्साहस दिखाएगा।

परंतु हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश के अनेक व्यक्ति जिनके नाम के आगे संत-महंत-बाबा आदि जुड़ा है वे सार्वजनिक रूप से मुसलमानों के विरूद्ध हिंसा भड़काने की बात करते हैं। अभी हाल में ऐसे संतों की गिरफ्तारियां भी हुई हैं। यदि इस तरह के भड़काऊ भाषणों पर सख्ती से प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो देश में अराजक स्थिति निर्मित हो सकती है। घृणा फैलाने वाली इन गतिविधियों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी चिंता प्रगट की है। गौमाता को लेकर देश में आए दिन हिंसक घटनाएं होती रहती हैं। गौमाता की सुरक्षा पर महात्मा गांधी को भी चिंता थी। कोई भी व्यक्ति स्वामी विवेकानंद से बड़ा गौभक्त होने का दावा नहीं कर सकता। मैं यहां इस विषय पर इन दोनों महान व्यक्तियों के विचार उद्धत कर रहा हूं।

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स्वामी विवेकानंद के विचार :

गौरक्षा एवं इंसान की रक्षा के बारे में स्वामी विवेकानंद के विचार हमने रामकृष्ण मठ, नागपुर द्वारा प्रकाशित पुस्तक विवेकानंदजी के संग में से लिया है। इस पुस्तक के लेखक श्री शरच्चन्द्र चक्रवर्ती हैं।

गोरक्षण सभा के एक उद्योगी प्रचारक स्वामीजी के दर्शन के लिए साधु-सन्यासियों सा वेष धारण किए हुए आए। उनके मस्तक पर गेरूए रंग की एक पगड़ी थी। देखते ही जान पड़ता था कि वे हिन्दुस्तानी हैं। इन प्रचारक के आगमन का समाचार पाते ही स्वामीजी कमरे से बाहर आए। प्रचारक ने स्वामीजी का अभिवादन किया और गौमाता का एक चित्र उनको दिया। स्वामीजी ने उसे ले लिया और पास बैठे हुए किसी व्यक्ति को वह देकर प्रचारक से निम्नलिखित वार्तालाप करने लगे।

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स्वामीजी – आप लोगों की सभा का उद्देश्य क्या है?

प्रचारक – हम लोग देश की गौमाताओं को कसाई के हाथों से बचाते हैं। स्थान-स्थान पर गोशालाएं स्थापित की गई हैं जहां रोगग्रस्त, दुर्बल और कसाईयों से मोल ली हुई गोमाता का पालन किया जाता है।

स्वामीजी- बड़ी प्रशंसा की बात है। सभा की आय कैसे होती है?

प्रचारक – आप जैसे धर्मात्मा जनों की कृपा से जो कुछ प्राप्त होता है, उसी से सभा का कार्य चलता है।

स्वामीजी- आपकी नगद पूंजी कितनी है?

प्रचारक- मारवाड़ी वैश्य सम्प्रदाय इस कार्य में विशेष सहायता देता है। वे इस सत्कार्य में बहुत-सा धन प्रदान करते हैं।

स्वामीजी- मध्यभारत में इस वर्ष भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा है. भारत सरकार ने घोषित किया है कि नौ लाख लोग अन्नकष्ट से मर गए हैं। क्या आपकी सभा ने इस दुर्भिक्ष में कोई सहायता करने का आयोजन किया है?

प्रचारक- हम दुर्भिक्षादि में कुछ सहायता नहीं करते. केवल गोमाता की रक्षा करने के उद्देश्य से यह सभा स्थापित हुई है।

स्वामीजी- आपके देखते-देखते इस दुर्भिक्षादि में आपके लाखों भाई कराल काल के चंगुल में फंस गए। आप लोगों के पास बहुत नगद रूपया जमा होते हुए भी क्या उनको एक मुट्ठी अन्न देकर इस भीषण दुर्दिन में उनकी सहायता करना उचित नहीं समझा गया?

प्रचारक – नहीं, मनुष्य के कर्मफल अर्थात पापों से यह दुर्भिक्ष पड़ा था। उन्होंने कर्मानुसार फलभोग किया। जैसे कर्म हैं वैसा ही फल हुआ है।

प्रचारक की बात सुनते ही स्वामीजी के क्रोध की ज्वाला भड़क उठी और ऐसा मालूम होने लगा कि उनके नयनप्रान्त से अग्निकण स्फुरित हो रहे हैं। परंतु अपने को संभालकर वे बोले, “जो सभा-समिति मनुष्यों से सहानुभूति नहीं रखती, अपने भाईयों को बिना अन्न मरते देखकर भी उनकी रक्षा के निमित्त एक मुट्ठी अन्न से सहायता करने को उद्यत नहीं होती तथा पशु-पक्षियों के निमित्त हजारों रूपये व्यय कर रही है, उस सभा-समिति से मैं लेशमात्र भी सहानुभूति नहीं रखता। उससे मनुष्य समाज का विशेष कुछ उपकार होना असंभव-सा जान पड़ता है। “अपने कर्मफल से मनुष्य मरते हैं” इस प्रकार की बातों में कर्मफल का आश्रय लेने से किसी विषय में जगत में कोई भी उद्योग करना व्यर्थ है। यदि यह प्रमाण स्वीकार कर लिया जाए तो पशु-रक्षा का काम भी इसी के अंतर्गत आता हैं। तुम्हारे पक्ष में भी कहा जा सकता है कि गोमाताएं अपने कर्मफल से कसाईयों के पास पहुंचती हैं और मारी जाती हैं – इससे उनकी रक्षा का उद्योग करने का कोई प्रयोजन नहीं है।”

प्रचारक कुछ लज्जित होकर बोला – “हां महाराज, आपने जो कहा वह सत्य है, परंतु शास्त्र में लिखा है कि गौ हमारी माता है।”

स्वामीजी हंसकर बोले- “जी हां, गौ हमारी माता है यह मैं भलीभांति समझता हूं। यदि यह न होती तो ऐसी कृतकृत्य संतान और दूसरा कौन प्रसव करता?”

प्रचारक इस विषय पर और कुछ नहीं बोले। शायद स्वामीजी की हंसी प्रचारक की समझ में नहीं आई। आगे स्वामीजी से उन्होंने कहा, “इस समिति की ओर से आपके सम्मुख भिक्षा के लिए उपस्थित हुआ हूं।”

स्वामीजी- मैं साधु-सन्यासी हूं। रूपया मेरे पास कहां है कि मैं आपकी सहायता करूं? परंतु यह भी कहता हूं कि यदि कभी मेरे पास धन आए तो मैं प्रथम उस धन को मनुष्य सेवा में व्यय करूंगा। सबसे पहले मनुष्य की रक्षा आवश्यक है- अन्नदान, धर्मदान, विद्यादान करना पड़ेगा। इन कामों को करके यदि कुछ रूपया बचेगा तो आपकी समिति को दे दूंगा।”

इन बातों को सुनकर प्रचारक स्वामीजी का अभिवादन करके चले गए। तब स्वामीजी ने कहा, “देखो, कैसे अचम्भे की बात उन्होंने बतलायी! कहा कि मनुष्य अपने कर्मफल से मरता है, उस पर दया करने से क्या होगा? हमारे देश के पतन का अनुमान इसी बात से किया जा सकता है। तुम्हारे हिन्दू धर्म का कर्मवाद कहां जाकर पहुंचा? जिस मनुष्य का मनुष्य के लिए जी नहीं दुखता वह अपने को मनुष्य कैसे कहता है?” इन बातों को कहने के साथ ही स्वामीजी का शरीर क्षोभ और दुःख से सनसना उठा।

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गोवध के मुद्दे पर गांधी के विचार :

गोवध के मुद्दे को गांधीजी दोनों धर्मों (हिन्दू और मुसलमान) बीच शत्रुता का सबसे बड़ा कारण बताते हैं। यह समस्या किसी भी रूप में हिंसा की शक्ल न ले इसके लिए गांधी दोनों पक्षों को समझाते हैं। वह हिन्दुओं से कहते हैं कि वह अपने मुसलमान भाइयों को अपने धर्म में गाय के महत्व के बारे में समझाने का प्रयास करें और कहें कि वो इसका वध न करें, यदि फिर भी कोई मुसलमान यह मानने को तैयार न हो तो गांधी कहते हैं, ”यदि मैं गाय के प्रति अतिरिक्त करुणा भाव से भरा हुआ हूं तो मैं उसकी रक्षा के लिए अपनी जान दे दूंगा पर अपने भाई की जान नहीं लूंगा।”

एल एस हरदेनिया वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल में रहते हैं।

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