Saturday, July 13, 2024
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ब्राह्मणवादी चालों और षड्यंत्रों को डुबाने के लिए अधिक गहरा नहीं है ठाकुर का कुआं

दुर्भाग्य से राजद के एक नेता की अभद्र भाषा में व्यक्त की गई प्रतिक्रिया ने मीडिया को जानबूझकर असल मुद्दे से ध्यान भटकाने में मदद की। इस विषय में मीडिया और ‘बुद्धिजीवियों’ की प्रतिक्रिया हास्यास्पद और पाखंडपूर्ण रही है। आनंद मोहन सिंह की 'जीभ काट डालता’  कहना कुछ और नहीं, बल्कि बिहार में राजपूतों को लामबंद करने का एक प्रयास था। धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मणों ने मनोज झा की ओर से एक ऐसे मुद्दे का बचाव करने की कोशिश की है, जिसे उनके द्वारा संसद में जानबूझकर और पूरी तरह से संदर्भ से अलग जाकर उठाया गया था।

कवि ओम प्रकाश वाल्मीकि द्वारा लिखित और राज्यसभा में राजद सांसद मनोज कुमार झा द्वारा पढ़ी गई कविता ठाकुर का कुआं ने बिहार में ठाकुरों की ‘भावनाओं’ को ‘आहत’ कर दिया है। दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश और राजस्थान में ठाकुर निजी तौर पर शिकायत कर रहे हैं लेकिन राजनीतिक तौर पर कुछ नहीं कर पा रहे हैं। बौद्धिक मनोज झा की प्रतिक्रिया का बौद्धिक रूप से प्रतिकार किया जाना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्य से राजद के एक नेता की अभद्र भाषा में व्यक्त की गई प्रतिक्रिया ने मीडिया को जानबूझकर असल मुद्दे से ध्यान भटकाने में मदद की। इस विषय में मीडिया और ‘बुद्धिजीवियों’ की प्रतिक्रिया हास्यास्पद और पाखंडपूर्ण रही है। आनंद मोहन सिंह की ‘जीभ काट डालता’  कहना कुछ और नहीं, बल्कि बिहार में राजपूतों को लामबंद करने का एक प्रयास था। धर्मनिरपेक्ष ब्राह्मणों ने मनोज झा की ओर से एक ऐसे मुद्दे का बचाव करने की कोशिश की है, जिसे उनके द्वारा संसद में जानबूझकर और पूरी तरह से संदर्भ से अलग जाकर उठाया गया था। बिहार के बहुत से ‘बहुजन विशेषज्ञ’ भी इस आग में मजे ले रहे थे जबकि पूरे सवाल पर ईमानदारी से बहस की जानी चाहिए क्योंकि मनोज झा तो ‘बुद्धिजीवी’ हैं और उन्होंने यह बात ऐसे ही नहीं कह दी। आखिर उन्होंने ऐसा कहा क्यों इस पर जरूर बहस होनी चाहिए।

भाषण के बाद से ही मनोज झा बिहार के राजपूत नेताओं के निशाने पर हैं, जिनका मानना है कि यह राज्यसभा में जानबूझकर किया गया कविता पाठ था, लेकिन मीडिया में राजपूतों के हमले के बाद सभी तरह के सवर्ण विशेषज्ञों ने मनोज के समर्थन में हाथ मिला लिया। झा को ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘सामाजिक न्याय’ का प्रतीक बताया गया। मुस्लिम सेक्युलरों ने उनकी महानता की कहानियाँ लिखनी शुरू कर दी। वह निश्चित रूप से एक पढ़े-लिखे  और वाकपटु व्यक्ति हैं लेकिन असली समस्या यही है। झा द्वारा ओम प्रकाश वाल्मीकि को उद्धृत करना न केवल जानबूझकर था, बल्कि इसका उद्देश्य एक पत्थर से कई शिकार करना था। एक कुटिल व्यवस्था, जिसके आप सबसे बड़े लाभार्थी हैं, को छिपाने के लिए दलित कवि के कंधों पर रखकर बंदूक चलाना ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग की सबसे बड़ी राजनीति रही है और इसे समझना जरूरी है। राज्यसभा में  झा ने कविता पढ़ते समय शुरू में ही कहा कि यह ‘कविता’ किसी ‘जाति’ के विरुद्ध नहीं है, और फिर कहा कि हम सभी के अंदर एक ‘ठाकुर’ होता है जिसे मारने की जरूरत है। उन्होंने फिर कहा कि मीडिया, एकेडमी आदि में  हमारा जो वर्चस्व है उसके विषय में वह कहना चाह रहे थे। लेकिन यहीं पर उनकी चतुराई को समझना पड़ेगा। आखिर ओम प्रकाश वाल्मीकि ने न तो कभी इस प्रकार का कोई स्पष्टीकरण दिया कि यह कविता ठाकुरों के खिलाफ नहीं है और न ही उन्होंने कभी ऐसा कहा कि अन्य जातियों में ऐसा नहीं होता और सभी लोगों को अपने अंदर के ठाकुर को मारना चाहिए। अब सवाल यह है कि मनोज झा को अपने अंदर के ‘ठकुरत्व’ को मारना चाहिए या ब्राह्मणत्व को। मनोज झा एक ‘ जाने-माने’ कमेंटेटर हैं, मीडिया में उनके भक्त भरे पड़े हैं, और संपादकों में भी उनकी बिरादरी का बहुत बड़ा वर्चस्व है। उन्हें दुनिया को बताना चाहिए कि मीडिया, न्यायपालिका, कॉर्पोरेट जगत, बॉलीवुड, वैकल्पिक मीडिया और शिक्षा जगत में ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया और कायस्थों का प्रतिशत कितना है। दलित, ओबीसी और आदिवासियों सहित सभी जातियों के विषय में एक हकीकत सामने लाई जानी चाहिए। क्या झा यह नहीं सोचते कि इन क्षेत्रों पर ब्राह्मणों और बनियों का भारी नियंत्रण और वर्चस्व है। इसके बाद यूपी और बिहार में कायस्थों का विशेष रूप से वर्चस्व है। ठाकुर कहाँ हैं? क्या इन संस्थानों में उनका कहीं भी प्रतिनिधित्व है? खैर, उनका प्रतिनिधित्व अन्य समुदायों से काफी कम है। सवर्णों के नाम पर, यह ब्राह्मण बनिया है जो संस्थानों पर हावी है।

ठाकुरों को सबसे दुष्ट और क्रूर लोगों के रूप में चित्रित किया गया है। जाति आधारित सिनेमा की ऐसी सबसे वीभत्स कहानियों में खलनायक या तो ठाकुर हैं या यादव। पिछले दो दशकों से मुस्लिम नामों को भी खलनायक और अपराधियों के रूप में सूची में शामिल किया गया है और ईमानदार जातियां कौन हैं ? ये जातियां हैं जिनके सदस्य गरीब किन्तु ईमानदार और चरित्रवान होते हैं। उन्हें हमेशा ‘पंडित जी’ ‘शर्मा जी’, सक्सेना, तिवारी, श्रीवास्तव, खन्ना, पांडे, कपूर आदि कहा जाता है। ये ऐसी जातियाँ हैं जो स्वतः सम्मान के साथ आती हैं। आखिर इन फिल्मों के लेखक कौन हैं? यह देखते ही आपको स्वतः पता चल जाएगा कि नैरेटिव कौन और कैसे बनाते हैं। किसी को ईमानदार दिखाने के लिए एक खलनायक की जरूरत होती है और मुंबइया सिनेमा ने यह काम बखूबी किया है। ब्राह्मणों को ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘उदारवादी’ के रूप में पेश करने के लिए वे ठाकुरों को मुख्य खलनायक के रूप में आसानी से ढूंढ लेते हैं। सच तो यह है कि ठाकुरवाद या ठाकुरशाही ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणशाही के अलावा और कुछ नहीं है। अधिकांश समय, ठाकुरों ने केवल ब्राह्मणवादी व्यवस्था को मजबूत करने के लिए काम किया है और इसका परिणाम यह है कि उन्हें सबसे बड़ा खलनायक चित्रित किया जाता है जैसे कि जाति व्यवस्था का आविष्कार ब्राह्मणों द्वारा नहीं बल्कि ठाकुरों द्वारा किया गया था। ओम प्रकाश वाल्मीकि की कविता पढ़ने का विचार कुछ और नहीं, बल्कि यही था कि आप प्रगतिशील बनें और ब्राह्मणवाद का पाप वास्तव में दूसरों के सिर पर न थोपा जाए।

प्रश्न यह नहीं है कि ठाकुर जाति व्यवस्था में लिप्त नहीं हैं या जाति पदानुक्रम में विश्वास नहीं करते हैं या जातिगत भेदभाव नहीं करते हैं। वर्णव्यवस्था में तो अधिकांश समाज चल ही रहा है और तभी शिकायत करता है जब स्वयं फँसता है। अन्यथा अपने से नीचे वाले को दबा देने में ही तो पूरी ताकत लगती है और अपार खुशी मिलती है। पिछले साल राजस्थान के एक स्कूल की कहानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सनसनी बन गई थी, जहां एक शिक्षक द्वारा, जो राजपूत या ठाकुर समाज से आता है, एक दलित लड़के को ‘उनका पानी का मटका’ छू लेने के कारण इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई। यह खबर देश भर मे चली। इसे उदाहरण दे-दे कर इस तरह बताया जाता है जैसे भारतीय समाज में यह अप्रत्याशित घटना हो। हालांकि राजपूत यह कहते हैं कि ऐसी घटनाए लगातार हो रही हैं और दूसरी जातियां भी करती हैं लेकिन कोई खबर नहीं बनती। दरअसल दलितों पर हो रहे अत्याचारों के विषय में हर एक जाति यही कह रही है कि उसका अत्याचार दूसरी से कम है लेकिन यह  बात सच है कि अत्याचार सभी कर रहे हैं।

पदानुक्रमिक वर्ण व्यवस्था की गंदी सच्चाई को छुपाने के लिए हास्यास्पद आख्यान

पूरे ‘विवाद’ को मीडिया ने बड़ी चतुराई से एक तरह के फैसले में बदल दिया है, जहां मनोज झा को ‘संत’ और ‘बुद्धिजीवी’ के रूप में पेश किया गया है और ओम प्रकाश वाल्मीकि और उनकी ‘अमर’ पंक्तियां अब दलित साहित्य का चेहरा हैं। ऐसा कहा जाता है कि वाल्मीकि की ठाकुर का कुआं अब कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। यह ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग द्वारा, यह दिखाने का एक गौरवपूर्ण संदर्भ है कि वे योग्यता का कितना सम्मान करते हैं। ओम प्रकाश वाल्मीकि निश्चित रूप से एक सुप्रसिद्ध कवि थे लेकिन उत्तर भारत के ब्राह्मणवादी मीडिया ने उनके ‘ठाकुर का कुआँ ‘ को दलित आंदोलन की प्रतिनिधि कविता और वाल्मीकि को दलित आंदोलन के एकमात्र कवि के रूप में पेश किया है। ब्राह्मण सेकुलर हमें सुझाव दे रहे हैं कि वाल्मीकि इतने महान हैं कि उनकी कविता ठाकुर का कुआँ 18 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। एक कविता की महानता यह है कि उसे 18 विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जा रहा है और कई भाषाओं में इसका अनुवाद किया जा रहा है। क्या ‘ठाकुर का कुआँ’ दलित आंदोलन के अम्बेडकरवादी परिप्रेक्ष्य को प्रतिबिंबित करता है या यह सिर्फ ब्राह्मणवादी परिप्रेक्ष्य को दर्शाता है? कहीं न कहीं उन्हें आगे की पूछताछ से बचाता है? सवाल यह है कि अम्बेडकरी आंदोलन के कितने लोगों को ऐसे प्रोमोट किया जाता है। ओम प्रकाश वाल्मीकि को सभी जानते हैं लेकिन एडवोकेट भगवान दास के विषय में तो दलितों को ही नहीं पता, जिन्होंने दलित प्रश्न को न केवल संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार काउन्सिल में उठाया अपितु बाबा साहब के साहित्य को भी सरकार के छपवाने से पहले इकट्ठा कर के छ्पवाया। मतलब यह कि हम उस दलित साहित्य को पढ़ेंगे जिसे मानुवादी विशेषज्ञ हमें बताएं। आखिर अम्बेडकरी आंदोलन के प्रमुख योद्धाओं के विषय में कितनी जानकारी हमारे मनुवादी मीडिया और उसमे छपने वाले विशेषज्ञों ने दी है। जाहिर है, ऐसे अखबारों में तो संपादकों की मर्जी के ही आलेख आएंगे। इसलिए किन दलितों को पढ़ना है और किनको किनारे लगाना है, इसका फैसला भी ये संपादक और विशेषज्ञ ही करेंगे।

दलित आंदोलन या बेहतर कहें तो अंबेडकरवादी आंदोलन एक दर्शन है जिसने पदानुक्रमित वर्ण व्यवस्था और मनु धर्मशास्त्र पर सवाल उठाए। बाबा साहेब अम्बेडकर का वर्ण व्यवस्था का विश्लेषण ब्राह्मणों के विशेषाधिकारों और उनके द्वारा कायम श्रेणीबद्ध असमानता के इर्द-गिर्द घूमता था। ब्राह्मणवादी बौद्धिक अभिजात वर्ग कभी भी अंबेडकर, फुले, पेरियार की ब्राह्मणवादी ग्रंथों और व्यवस्था की आलोचना को पचा नहीं सके और यही कारण है कि वे उन लोगों को बढ़ावा देते हैं जो या तो अपनी कहानियाँ और अनुभव लिखते हैं और अन्य जातियों के बीच छोटे विरोधाभासों को प्रमुख या मुख्य विरोधाभास या स्रोत के रूप में परिवर्तित करते हैं। इसलिए वर्ण व्यवस्था पर सवाल उठाने के बजाय हम व्यक्तिगत रूप से लड़ना शुरू कर देते हैं। मैं पूछना चाहता हूं कि भारत में कितने विश्वविद्यालयों ने बाबा साहेब की कृति ‘जाति का उन्मूलन’ या ‘बुद्ध और उनका धम्म’ को अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है? कितने स्कूल हमारे छात्रों को बाबा साहब की 22 प्रतिज्ञाएं सिखाते हैं? आज के कितने ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने इसके बारे में लिखा है। ब्राह्मण बुद्धिजीवी गांधीवादी पद्धति के माध्यम से ब्राह्मणवाद को उजागर करते हैं। लेकिन बाबा साहेब अम्बेडकर से वे चुपचाप बचने की कोशिश करते हैं। जब बसपा पहली बार उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई तो पार्टी पेरियार मेले का आयोजन करना चाहती थी और मामला गरमा गया। ब्राह्मण-बनिया मीडिया ने पेरियार के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किया, जिससे बसपा को मेला और पेरियार को अपने प्रतीक के रूप में वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा। हम सब जानते हैं, बसपा में अब बाबा साहब, ज्योतिबा फुले, श्री नारायणगुरु , छत्रपति शाहूजी महाराज और मान्यवर कांशीराम हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में सवर्ण प्रतिक्रिया के डर से पेरियार को सावधानीपूर्वक इससे दूर रखा गया है।

वीपी सिंह का फाइल फोटो।

वीपी सिंह द्वारा मंडल कमीशन रिपोर्ट को लागू करना आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा मोड़ था। यह हमारी संसद और संस्थानों में ब्राह्मणवादी आधिपत्य को एक खुली चुनौती थी। वह ब्राह्मण-बनिया मीडिया की निन्दा, बदनामी और लांछन का निशाना बने। इस हद तक कि आज तक, वह भारत के सबसे अधिक नफरत किये जाने वाले प्रधानमंत्रियों में से एक हैं। उन्हें सामान्य श्रेणी के लोगों द्वारा  हेय दृष्टि से देखा जाता है। विडंबना यह है कि मनोज झा, जनेश्वर मिश्रा और सतीश चंद्र मिश्रा के विपरीत ठाकुरों ने खुद उन्हें छोड़ दिया, जो पार्टियों के साथ बने रहे। सामान्य तौर पर ब्राह्मण शामिल होने से बचते थे और फिर भी अपने समुदायों के साथ ‘सम्मानित’ बने रहते थे। सामाजिक न्याय की पार्टियां भी उन्हें याद नहीं करतीं सिवाय डीएमके के।

यह 1990 के दशक की बात है जब ब्राह्मण संपादक ‘दलित’ लेखन को बढ़ावा देने के नाम पर मूल रूप से ऐसे आख्यानों की तलाश में थे जो उनसे ध्यान भटका सकें और अन्य समुदायों के विरोधाभासों को सामने ला सकें। कई अम्बेडकरवादियों ने इस बात को मानने से इनकार कर दिया लेकिन उनमें से कई चीजों को स्वीकार करने के लिए तैयार थे। वह भारत में अभूतपूर्व राजनीतिक उथल-पुथल का दौर था। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह भारत में राजनीति को नये सिरे से परिभाषित कर रहे थे। न केवल मंडल रिपोर्ट को स्वीकार किया गया बल्कि सरकार ने बौद्धों को अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया, जिसकी मांग लंबे समय से लंबित थी। इसके अलावा अंबेडकर जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा और संसद के अंदर बाबा साहेब की बड़ी तस्वीर लगाना सरकार द्वारा लिए गए अन्य फैसले थे जिनका काफी असर पड़ा। भारत के संविधान की रक्षा करते हुये वीपी सिंह सरकार सदन के पटल पर गिर गई। इसने लालकृष्ण आडवाणी को अयोध्या की ओर अपनी रथयात्रा की अनुमति नहीं दी और उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने और तबाही मचाने से पहले उन्हें बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया।

इतिहास पर गौर से देखने पर पता चलेगा कि मीडिया और सवर्ण हिंदुओं ने वीपी सिंह को किस तरह गालियां दीं। वे संपादक, स्तंभकार, विशेषज्ञ, लेखक, जिन्होंने कभी वीपी को राष्ट्र के रक्षकों में से एक बताया था और कहा था कि ‘राजा नहीं फकीर है, देश की तक़दीर है’वे ही मण्डल लागू होते ही उन्हें ‘राजा नहीं रंक है, देश का कलंक है’ कहने लगे। भारत के इतिहास में कोई भी अन्य सवर्ण राजनीतिक नेता वी.पी. सिंह की तरह हिंदू उच्च जातियों का निशाना नहीं बना। ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग , धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी, दक्षिणपंथी, वामपंथी, सबने उन्हें बदनाम करने के लिए हाथ मिला लिया। वीपी सिंह को मीडिया और अकादमिक जगत में कभी 1/10 का भी समर्थन नहीं मिला जिस तरह मनोज झा को मिल रहा है। ऐसा लगता है कि मीडिया ने इसे उठा लिया है और जानबूझकर इसका इस्तेमाल करना चाहता है। झा एक कविता से सामाजिक न्याय के ‘चैंपियन’ बन गए जबकि मंडल के साथ अपना करियर दांव पर लगाने वाले वीपी सिंह आज भी खलनायक हैं। कुछ दिनों पहले मैं फ़तेहपुर में था। एक कॉलेज में गया था जिसका उद्घाटन वीपी सिंह ने किया था और वहां वीपी सिंह की एक तस्वीर भी नहीं थी। उस निर्वाचन क्षेत्र में वीपी सिंह का कोई स्मारक तक नहीं है, जिसका उन्होंने दो बार प्रतिनिधित्व किया था। वह तिंदवारी विधानसभा क्षेत्र से जीतकर मुख्यमंत्री बने थे। इसके विपरीत, फ़तेहपुर शहर में पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में अपना सबसे अच्छा और सबसे बड़ा सार्वजनिक पार्क है। अब चाहे वाजपेयी खुद को पंडित कहें या न कहें, लेकिन ब्राह्मण चाहे उदारवादी हों या सांप्रदायिक, वामपंथी हों या दक्षिणपंथी, अटल जी उनके सम्माननीय हैं। यह जातिगत विशेषाधिकारों के अंतर को दर्शाता है। इस संसदीय क्षेत्र से दो बार स्थानीय सांसद और प्रधानमंत्री रहे वीपी सिंह की स्मृति में कुछ नहीं है, लेकिन अटल जी के पास एक बड़ा पार्क है। जाहिर है, ठाकुरों ने उन्हें छोड़ दिया और दूसरों ने उन्हें गले नहीं लगाया।

देवरिया संकट और ब्राह्मण विशेषाधिकार

कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले से एक भयावह घटना सामने आई है। जमीन विवाद में दो परिवारों ने एक-दूसरे के छह सदस्यों की हत्या कर दी। प्रेमचंद यादव का अपने पड़ोसी सत्य प्रकाश दुबे से जमीन का विवाद चल रहा था। घटना वाले दिन दुबे ने सुबह यादव को अपने घर बुलाया।  उनके बीच विवाद हुआ और प्रेमचंद यादव पर जानलेवा हमला करके मार दिया गया। जैसे ही यह खबर पूरे गांव में फैली, यादव के पड़ोसियों ने दुबे के घर पर हमला कर दिया और उसके परिवार के पांच सदस्यों की हत्या कर दी।

इसके बाद उत्तर प्रदेश के नेता और मीडिया अपनी नैतिकता भूल गए और ब्राह्मणवादी हितों के अनुसार रिपोर्ट करने लगे। ब्राह्मण सभाओं, विधायकों ने इस तरह प्रचार करना शुरू कर दिया जैसे कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण सबसे अधिक प्रताड़ित जाति हो। सत्य प्रकाश दुबे के आवास पर हुई प्रेमचंद यादव की हत्या को हर कोई भूल गया या नजरअंदाज कर दिया। बीजेपी के ब्राह्मण विधायक धमकी भरे भाषण दे रहे हैं और चाहते हैं कि यादव का घर तोड़ दिया जाए। अब, यह समझना महत्वपूर्ण है कि बुलडोजर हमारी न्यायिक प्रक्रिया का प्रतिस्थापन नहीं हो सकता है। बुलडोजर न्याय की मुख्य बात यह है कि यह उन भ्रष्ट अधिकारियों को दोषमुक्त कर देता है जिनके संरक्षण में यह ‘अवैधता’ पनपती है। उस व्यक्ति को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। दूसरे, अपने पुरुष सदस्यों की गलती का खामियाजा परिवार के बच्चे और महिलाएं क्यों भुगतें। यदि हत्या आपराधिक कृत्य है तो दुबे परिवार को, उनके घर पर बुलडोजर चलाने से क्यों बचाया जाना चाहिए। मुद्दा यह है कि यह जांच और अदालत के मामले हैं जबकि बुलडोज़र प्रणाली न्यायिक प्रक्रिया को पटरी से उतारने के अलावा और कुछ नहीं है।

देवरिया एक ग्रामीण जिला है जहां बहुसंख्यक समुदाय ओबीसी, दलित और मुस्लिम हैं। अक्टूबर 2020 में एक उपचुनाव के दौरान, देवरिया सदर में रोचक मुकाबला देखने को मिला। मीडिया ने इसके बारे में कभी नहीं लिखा लेकिन मैंने इस पर एक छोटा सा अंश लिखा। इसे नीचे दे रहा हूँ।

‘एक छोटा सा उदाहरण यह साबित कर देगा कि राजनीतिक दल वास्तव में हाशिये से आने वाले अपने ही नेताओं को कैसे किनारे कर देते हैं। देवरिया उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण जिलों में से एक है। यह एक बड़ा जिला था जिसे विभाजित किया गया था और कुशीनगर, जहां बुद्ध की मृत्यु हुई थी, को सुश्री मायावती ने मुख्यमंत्री रहते हुए बौद्ध स्थल को बढ़ावा देने के लिए अलग कर दिया था। देवरिया जिले में 17 लाख से अधिक मतदाता हैं, जिनमें 52% ओबीसी, 14% मुस्लिम, 15% अनुसूचित जाति के मतदाता हैं। ‘सामान्य’ या सवर्ण मतदाता 19% हैं लेकिन जिले की राजनीति में सवर्णों विशेषकर ब्राह्मणों और कायस्थों का वर्चस्व है। अब देवरिया सदर में आज मतदान होने जा रहा है क्योंकि यह सीट उसके निर्वाचित प्रतिनिधि जन्मेजय सिंह राजपूत की मृत्यु के कारण खाली हो गई थी, जिनकी इस साल अगस्त में मृत्यु हो गई थी। अब इस बार मैदान में सभी प्रमुख पार्टियों ने मात्र ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया है। चाहे बीजेपी हो, समाजवादी पार्टी हो, बीएसपी हो या कांग्रेस। इन सभी को दूसरे समुदायों से ‘उपयुक्त’ उम्मीदवार नहीं मिल सके। क्या यह जातिवाद नहीं है?

बीजेपी ने डॉ. सत्य प्रकाश त्रिपाठी को मैदान में उतारा है, जबकि समाजवादी पार्टी ने ब्रह्मा शंकर त्रिपाठी को टिकट दिया है और बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार अभयनाथ त्रिपाठी हैं। कांग्रेस प्रत्याशी श्री मुकुंद भास्कर मणि त्रिपाठी हैं। क्या हम सभी को इसका वर्णन नहीं करना चाहिए? राजनीतिक दल इतने संशयपूर्ण तरीके से कैसे कार्य कर सकते हैं कि वे लोगों को चुनने का अधिकार भी नहीं देते, जबकि देवरिया शायद ही किसी गैर-सवर्ण उम्मीदवार को चुनने में अक्षम रहा हो। ऐसी क्या मजबूरी है कि राजनीतिक दल विभिन्न समुदायों और उनके मुद्दों को लामबंद करने के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं?  मुसहरों, मछुआरों यहां तक कि पिछड़े मुसलमानों की बड़ी संख्या के साथ देवरिया सबसे पिछड़े जिलों में से एक है। इसके बावजूद चार प्रमुख दलों के राजनीतिक नेतृत्व ने शायद ही कभी इस बारे में सोचा हो। क्या ऐसा इसलिए है क्योंकि सवर्ण बुद्धिजीवी और उनके राजनीतिक आका किसी भी बात को हल्के में नहीं ले रहे हैं। राजनीतिक ताकतों की ऐसी क्या मजबूरी है कि उन्होंने ब्राह्मणों को चुना और वह भी एक खास किस्म के लोग जिन्हें ‘त्रिपाठी’ कहा जाता है।

तो, हम किसी और दिन इस पार्टी या उस पार्टी की जीत का जश्न मना सकते हैं, लेकिन ‘केक’ ब्राह्मणों के पास  होगा, चाहे वह बीजेपी हो, एसपी हो, बीएसपी हो या कांग्रेस हो। क्या यह नया ‘ज्ञानोदय’ है या ब्राह्मणवाद को पुनर्जीवित करने का तरीका या हमारी पार्टियाँ वैचारिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुकी हैं। मैं यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि पार्टियों को सवर्णों या ब्राह्मणों को टिकट नहीं देना चाहिए। मैं केवल यह सुझाव दे रहा हूं कि सभी पार्टियां एक विशेष समुदाय में उपयुक्त उम्मीदवार कैसे खोजें? फिर वह जातिगत विचार कहां है जिसके बारे में हम सब इतना बोलते हैं? क्या यह ब्राह्मणों का ‘तुष्टीकरण’ नहीं है ?

मेरी समझ यह है कि ब्राह्मणों को वापस अपने पाले में लाने के लिए देवरिया यूपी की राजनीति का प्रतीक बन गया है। ब्राह्मण राज्य की आबादी का 11% हैं और यह माना जाता है कि दलितों के बाद वे एक बड़ा हिस्सा हैं, लेकिन इससे भी अधिक उनका ‘प्रभाव’ शक्तिशाली है। भाजपा और कांग्रेस ब्राह्मणों और उनके वर्चस्व की पारंपरिक पार्टियाँ हैं। समाजवादी और बसपा की ब्राह्मण वोटों के लिए होड़ इस अहसास से आती है कि सत्ता तक उनकी राह ब्राह्मणों की ‘सद्भावना’ के बिना असंभव होगी, यही एकमात्र कारण है। काश हमारे पास सामाजिक आंदोलनों में फुले-अंबेडकर-पेरियार की विरासत होती जो राजनीतिक शक्तियों का मार्गदर्शन कर सकती थी, न कि इसके विपरीत। उत्तर प्रदेश में निश्चित रूप से एक मजबूत अम्बेडकरवादी आंदोलन था लेकिन दुर्भाग्य से इस समय यह आंदोलन बसपा का मार्गदर्शन करने की स्थिति में नहीं है जबकि समाजवादी पार्टी के पास ऐसे संगठन नहीं हैं जो फुले-अम्बेडकर-पेरियार की विरासत के बारे में बात कर सकें। शायद, उत्तर प्रदेश में मुख्यधारा की पार्टियाँ राजनीतिक उद्देश्यों के लिए पेरियार से परहेज करेंगी और ऐसा हमारी राजनीतिक ताकतों की अराजनीतिक प्रकृति के कारण होता है।’

( https://countercurrents.org/2020/11/when-elections-come-upper-castes-rule-the-roost/ )

 

अभी उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में पिछड़े वर्ग के दो भाइयों, जो विश्वकर्मा समुदाय से आते हैं,  की हत्या वहाँ  के दबंग किसी शुक्ला ने कर दी लेकिन मजाल क्या कि उत्तर प्रदेश में कोई हंगामा हुआ हो। अमेठी में पिछड़े वर्ग के एक व्यक्ति की दो भाइयों ने, जो ब्राह्मण वर्ग से आते हैं, पीट पीट कर हत्या कर दी। अक्सर ये कहा जाता है कि ब्राह्मण अपराधी नहीं होते और वे कहीं भी हिंसा में नहीं है। देवरिया में भी हिंसा के पूरे आरोप प्रेमचंद यादव पर हैं हालांकि देवरिया पुलिस ने अब बताया है कि दुबे के परिवार की हत्या यादव के ड्राइवर मिश्रा ने की है। लेकिन दुबे को महान बताने के लिए ब्राह्मण सभाएँ एकत्र हो रही हैं। ये वैसे हो रही हैं जैसे गैंगस्टर विकास दुबे के एन्काउनर के बाद हवा उड़ाई गई कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों के ऊपर अत्याचार हो रहा है। हकीकत यह है कि सत्ता केवल मंत्रिपरिषद या विधानसभा मे भागीदारी नहीं अपितु मीडिया, जूडिशियरी, एकेडेमिया और ब्यूरोक्रेसी में भागीदारी का है। इस विषय में उत्तर प्रदेश सरकार जातिगत आंकड़ा जारी करे तो अच्छा होगा।

पानी अस्पृश्यता का सबसे बड़ा स्रोत है

हम सभी जानते हैं कि भारत एक ‘श्रेणीबद्ध असमानता’ पर आधारित समाज है। जैसा कि बाबा साहेब अम्बेडकर ने कहा था। यह श्रद्धा का आरोही क्रम और तिरस्कार का अवरोही क्रम है। पानी एक मौलिक अधिकार है लेकिन भारत में यह छुआछूत और भेदभाव का सबसे बड़ा स्रोत है। ओम प्रकाश वाल्मीकि केवल ‘ठाकुर का कुआं’ के बारे में बोलते हैं, जबकि यह एक सच्चाई है कि ग्रामीण भारत में अधिकांश जातियां पानी की शुद्धता में विश्वास करती हैं और अन्य समुदायों के लोगों को अपने नल/हैंडपंप से पानी पीने की अनुमति नहीं देती हैं।

प्रत्येक जाति दूसरों से शीर्ष पर रहने का आनंद लेती है। हाल ही में, उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर की यात्रा पर, मैं बांदा फ़तेहपुर सीमा पर यमुना केन संगम के पास एक गाँव में गया जहाँ मेरी मुलाकात अमरजीत से हुई जो बाल्मीकि समुदाय से हैं और भीम सेना के मुखिया हैं।

चित्र साभार गूगल।

चिल्लाघाट में एक स्थानीय कनेक्शन की तलाश में हम पास के गाँव में गए। बाल्मीकि परिवार गांव के अंतिम छोर पर हैं। हम परिवार से मिले और उन्होंने हमारे साथ अपनी दुर्दशा साझा की। घर पुराना और अधूरा था क्योंकि उनके पास इसे पूरा करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे। इतने सारे लोगों का जीना मुश्किल हो गया था। कोई काम न होने और खेती की ज़मीन न होने से घर में चीज़ें मुश्किल हो जाती हैं। वाल्मीकियों को कोई दूसरा काम नहीं मिलता। गाँव में मुसलमानों, धोबियों और केवटों की बड़ी आबादी है, लेकिन दुर्भाग्य से ये सभी समुदाय आक्रामक रूप से जातिवादी-संस्कृति का पालन करते हैं और वाल्मिकियों के खिलाफ भेदभाव करते हैं। यदि कोई दूसरे समुदाय के व्यक्ति से छू जाता है तो उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और उन्हें अपमानित किया जाता है। ढाबे वाले डिस्पोजल गिलास में चाय देते हैं और उसे खुद उठाने के लिए फर्श पर रख देते हैं। नाई उनके बाल नहीं काटता। वे लगभग 20 किलोमीटर दूर ललौली जाते हैं जहां नाई को उनकी जाति नहीं पता होती है। नाई  सबसे अधिक उत्पीड़ित समुदायों में से एक हैं, फिर भी जब उन्हें अवसर मिलता है तो वे भी ब्राह्मणवादी पदानुक्रम में व्यवहार करते हैं।

सफाई कर्मचारी समुदाय के लिए कोई अवसर नहीं है। वे उत्पीड़ितों में सबसे अधिक उत्पीड़ित हैं। जाति जनगणना और सरकारी सेवाओं में विभिन्न जातियों की जातिवार जानकारी जारी करने की आवश्यकता है। उत्तर प्रदेश में वालमीकि, डोम, मुसहर, बांसफोर की उपस्थिति सरकारी सेवाओं, विशेषकर गैर-स्वच्छता नौकरियों में उपेक्षित रहती है। उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व न्यूनतम है। अब समय आ गया है कि सरकार और सामाजिक वैज्ञानिक बहिष्कार की इस राजनीति और संस्कृति पर ध्यान केंद्रित करें जिसने इन समुदायों को हमारी सत्ता संरचना से बाहर रखा है। इन समुदायों के लिए सभी स्तरों पर 5% कोटा की आवश्यकता है।

कुछ साल पहले, मैं देवरिया जिले की एक डोम बस्ती में गया था, जिन्होंने मुझसे शिकायत की थी कि उनकी सबसे बड़ी समस्या पानी की अनुपलब्धता है। मैं तो बस घूम रहा था, 8 फीट सड़क के ठीक उस पार मुसहर बस्ती थी। मैंने सोचा था कि दोनों एक साथ बैठेंगे क्योंकि दोनों हाशिए के समुदायों में सबसे अंतिम सिरे पर रहने वाले समुदायों से हैं। डोमों की संख्या कम थी जबकि मुसहरों की संख्या अधिक थी। मैंने पूछा कि पानी से जुड़ा मामला क्या है? डोम जाति के आदमी ने मुझे बताया कि मुसहर लोग उन्हें मुसहर बस्ती के अंदर लगे हैंडपंप से पानी की बाल्टी भरने की इजाजत नहीं देते हैं। मैंने सोचा कि वह मजाक कर रहा होगा और पता लगाने के लिए आगे बढ़ गया। फिर हमने मुसहर महिला के साथ विवाद देखा, जिसने कहा कि उसने कभी दोन जाति के लोगों को पानी देने से मना नहीं किया। उन्होंने इसका विरोध करते हुए सुझाव दिया कि वह उन्हें हैंडपंप छूने की अनुमति नहीं देती है। जब मैंने मुसहर महिला से कारण पूछा तो उसने कहा कि जब वह पानी मांगता है तो मैं अपनी बाल्टी से पानी डाल देती हूं लेकिन उसे हैंडपंप छूने नहीं देती, क्योंकि डोम नीच जाति होते हैं। मैंने महिला को डांटते हुए कहा कि जब बाकी लोगों ने तुम्हारे साथ ऐसा ही किया तो क्या हुआ?

इस तरह की और भी कई कहानियाँ हैं। राजस्थान में एक स्कूल शिक्षक द्वारा एक दलित लड़के को पीट-पीटकर मार डालने की घटना अकेली नहीं है और अधिकांश स्थानों पर दलित छात्रों को इस भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अब सवाल ये है कि इस मसले को कैसे सुलझाया जाए। शायद इसका एक ही रास्ता है कि भारत के संविधान को लागू किया जाए और संवैधानिक मूल्यों को हमारे जीवन के नैतिक मूल्य बनाया जाए।

आप वैचारिक रूप से ऐसे भेदभाव से कैसे लड़ते हैं?

समय के साथ अम्बेडकरवादी बहुजन दार्शनिकों ने इसकी पहचान जाति आधारित वर्ण व्यवस्था के रूप में की है। चाहे वह बाबा साहेब अंबेडकर हों, ज्योतिबा फुले हों, पेरियार हों, श्री नारायण गुरु हों या कबीर, रैदास या कोई अन्य कवि दार्शनिक हों, उन्हें लगता था कि वर्ण व्यवस्था ही इसका मूल कारण है। अंबेडकरवादी आंदोलन स्पष्ट था, क्योंकि यह ब्राह्मणवादी अभिजात्यवाद को उजागर करता रहा और अधिकांश समय इसके साथ जुड़ने से इनकार करता रहा। सैकड़ों पत्रिकाएँ निकाली गईं और इस अम्बेडकरवादी बहुजन साहित्य का उद्देश्य दलित-बहुजन समुदायों से जुड़ना था। 1990 के दशक के मध्य में जब समाजवादी पार्टी और बसपा ने हाथ मिलाया तो मंडल के बाद मीडिया में यह चलन बहुत बदल गया। हमारे यहां नारे थे ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’। यह वह समय है जब शत्रुतापूर्ण मनुस्ट्रीम मीडिया ने लोकप्रिय कल्पना में अंबेडकरवादी आंदोलन के प्रसार को रोकने के लिए समय के साथ काम करना शुरू कर दिया । सपा बसपा गठबंधन उनके लिए घातक था और अगर यह अधिक समय तक रहता तो आज स्थिति कुछ और होती। उस गठजोड़ को तोड़ने के लिए मीडिया में एक नई थ्योरी फैलाई जा रही थी कि ब्राह्मण नहीं बल्कि अन्य जातियाँ ही दलितों पर अधिक अत्याचार और शोषण करती हैं, इसलिए कुछ कवियों और साहित्यकारों को मीडिया में थोड़ी-थोड़ी जगह दी जाने लगी। सामाजिक न्याय का नाम, विशेष अवसरों पर कुछ कॉलमों को छोड़कर, मीडिया में दलित, ओबीसी, आदिवासियों की उपस्थिति लगभग खाली ही रही। यह सर्वविदित था कि उनके लिए कोई जगह नहीं थी। साथ में यह प्रचारित किया गया  कि दलितों को सबसे ज्यादा नुकसान ब्राह्मणों ने नहीं बल्कि दूसरे समुदायों ने पहुंचाया है। प्रारंभ में, उन्होंने ओबीसी को निशाना बनाया और उन कहानियों को सामने लाया जहां दलितों के खिलाफ ओबीसी हिंसा बड़े पैमाने पर थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह हिंसा ग्रामीण भारत में कृषि संबंधों के कारण हुई। नई थीसिस ने ब्राह्मणों को दलितों का सहयोगी बना दिया। इससे उत्तर प्रदेश में बसपा के ब्राह्मण-दलित गठबंधन का मार्ग प्रशस्त हो रहा था। जो लोग मीडिया में छपना चाहते थे, उनके लिए ब्राह्मण-बनिया संपादकों को खुश रखने का यह एक बेहतरीन सिद्धांत था। हम सभी उत्तर प्रदेश में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के बारे में जानते हैं, जिसमें बीएसपी ‘बहुजन हिताय’ से ‘सर्वजन हिताय’ की ओर बढ़ रही है और सतीश चंद्र मिश्रा इसका प्रमुख ब्राह्मण चेहरा बन गए। पेरियार को पार्टी के प्रतीक चिन्हों की सूची से हटा दिया गया और पार्टी ब्राह्मणों को खुश करने के लिए अपने रास्ते से हट गई। आज उस प्रयोग’के लगभग बीस साल बाद, बसपा उस स्थिति में वापस आ गई है जहां वह ब्राह्मणों के पार्टी छोड़ने के साथ थी। मीडिया में दलितों की मौजूदगी कुछ कॉलमों तक ही सीमित रही और वह भी ब्राह्मण बनिया संपादकों की मनमर्जी पर। जब राहुल गांधी ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में कितने ओबीसी, दलित और आदिवासी पत्रकार थे, तो एक भी हाथ नहीं उठा। यही आज के मीडिया की हकीकत है।

बहुजनों के शोषण का मूल कारण पूंजीवाद का पुरोहितवाद के साथ गठजोड़ है या जिसे ज्योतिबा फुले ने सेठजी-भटजी के रूप में अपने प्रसिद्ध ‘किसान का कोड़ा’ और ‘गुलामगीरी’ में बखूबी वर्णित किया है, उसे समझने के लिए। ये दो उत्कृष्ट कृतियाँ हम सभी के लिए आवश्यक हैं।

आज ठाकुरों या राजपूतों या क्षत्रियों को लगता है कि वे ब्राह्मणवादी बुद्धिजीवियों के निशाने पर हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ठाकुर कितनी बार सबसे वंचित समुदाय के साथ खड़े हुए हैं? जो ठाकुर हाशिये पर पड़े लोगों के साथ खड़े थे, वे अपने समुदाय में खलनायक बन गये। वीपी सिंह, अर्जुन सिंह और कुछ हद तक दिग्विजय सिंह को धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय की ताकतों का पक्ष लेने के कारण अत्यधिक तिरस्कृत किया गया। आज राजपूत जातियां हिन्दुत्व के सबसे बड़े समर्थक के रूप में खड़ी हुई है और ये भूल गई हैं कि उनके युवाओ को भी रोजगार चाहिए और व्यवस्था में भागीदारी चाहिए। ठाकुरों के कुछ नेता अवश्य मजबूत हो गए और राजनीति में अचानक उनकी सीटें बढ़ गई हों लेकिन सत्ता का बाकी प्रतिस्थानों मे उनकी भागीदारी लगभग न्यूनतम हो गई। जब आपकी कहानी लिखने वाले दूसरे होंगे तो आपकी महानता का बखान तो नहीं करेंगे बल्कि वर्णव्यवस्था की पूरी बुराइया चालाकी से राजपूतों के सर पर मढ़ कर अपना बचाव करेंगी।

मांडले जेल में रहने के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लगा कि बौद्ध धर्म भारत में विकसित नहीं हो सकता क्योंकि यह क्षत्रियों जैसे समुदाय को आकर्षित नहीं कर सकता। हर जगह बौद्ध धर्म का विकास हुआ क्योंकि वहाँ के एक या दो शक्तिशाली समुदाय इसमें शामिल हो गए। क्षत्रियों को या तो इसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी या वे वैचारिक रूप से ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग के इतने वशीभूत थे कि परशुराम द्वारा अपने पूर्वजों के वध के बावजूद वे उन ताकतों की सेवा करते रहे जो वर्णवादी व्यवस्था में उनका इस्तेमाल करते रहे। आज भी समय है कि वर्णवादी व्यवस्था का विरोध कर राजपूत एक मानववादी समाज का निर्माण करें और अपने आप को दलित-पिछड़े-आदिवासियों के आंदोलनों के साथ जोड़े इसी मे नए समाज का निर्माण हो पाएगा।

विद्या भूषण रावत वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्त्ता और लेखक हैं । 

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  1. वाह विद्या भूषण जी का एक आँखें खोल देने वाला उचित विश्लेषणात्मक लेख

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