Tuesday, April 16, 2024
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यूपी सरकार से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूछा ट्रांसजेंडर के लिए 10 साल में कितने शौचालय बनाये

प्रयागराज। ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग सार्वजनिक जीवन में किस शौचालय का इस्तेमाल करें? महिला शौचालय या पुरुष शौचालय? क्योंकि आम जीवन में ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर बहुत भ्रामक और भयावह स्थिति है। महिला या पुरुष दोनों में से किसी भी शौचालय का इस्तेमाल करने पर उनकी गरिमा का हनन होता है। क्योंकि उनकी जेंडर आईडेंटिटी […]

प्रयागराज। ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग सार्वजनिक जीवन में किस शौचालय का इस्तेमाल करें? महिला शौचालय या पुरुष शौचालय? क्योंकि आम जीवन में ट्रांसजेंडर समुदाय को लेकर बहुत भ्रामक और भयावह स्थिति है। महिला या पुरुष दोनों में से किसी भी शौचालय का इस्तेमाल करने पर उनकी गरिमा का हनन होता है। क्योंकि उनकी जेंडर आईडेंटिटी को लेकर समाज बँटा हुआ है। उन्हें लेकर न तो महिला समाज सहज और संवेदनशील हैं न ही पुरुष समाज। ऐसे में उन्हें सबसे ज़्यादा दिक्कत सार्वजनिक शौचायल के इस्तेमाल के समय पेश आती है। क्योंकि उन्हें सार्वजनिक जीवन में महिला या पुरुष शौचायल का इस्तेमाल अक्सर नहीं करने दिया जाता है।

इसी मसअले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि उन्होंने पिछले 10 साल में (सुप्रीम कोर्ट द्वारा साल 2014 में ट्रांस जेंडर को मान्यता देने के बाद) थर्ड जेंडर के लिए कितने शौचायल बनवाये हैं। बता दें कि इस संवेदनशील मुद्दे को लेकर विधि के छात्रों की एक जनहित याचिका दायर किया है। जिस पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पूछा है कि 10 सालों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ? अब मामले में अगली सुनवाई 12 जुलाई को होगी।

ह्यूमन राइट्स लीगल नेटवर्क के साथ मानवाधिकार का प्रशिक्षण ले रहे विभिन्न विश्वविद्यालयों के विधि छात्रों ने वरिष्ठ अधिवक्ता कमल कृष्ण रॉय के मार्गदर्शन में यह जनहित याचिका दायर किया है। याचिकाकर्ताओं में विधि छात्र विशाल द्विवेदी, दर्शन गुप्ता, शशांक दीक्षित, ईशी द्विवेदी,  कुलदीप कुमार, विद्यम शुक्ला और आशीष रंजन शामिल हैं। ये सभी भारती विद्द्यापीठ पुणे, एमिटी नोएडा, शम्भु नाथ लॉ कॉलेज, इलाहाबाद के विधि के छात्र है। याचिका दायर करने से पहले विधि छात्रों ने थर्ड जेंडर के स्वास्थ्य अधिकारों और उनके लिए विशिष्ट शौचालयों के निर्माण के लिए सुप्रीम कोर्ट के 2014 में दिए गए आदेश के अनुपालन को लेकर ज़मीन पर जा जाकर सर्वे किया। इस सर्वे में प्रयागराज जंक्शन, रेलवे स्टेशन, सिविल लाइंस रोडवेज बस स्टॉप जैसे पब्लिक प्लेसेज पर जाकर सर्वे किया और जानना चाहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रयागराज में थर्ड जेंडर के लिए कुल कितने टॉयलेट बने हैं। लेकिन नतीजा निराशाजनक रहा, जब उन्होंने पाया कि प्रयागराज जिले में थर्ड जेंडर के लिए एक भी अलग शौचालय  नहीं बनाया गया है।

जनहित याचिका दायर करने वाली टीम के लीडर विशाल द्विवेदी ने मीडिया को बताया है कि उन लोगों ने जब थर्ड जेंडर के लोगों से इस बारे में पूछताछ किया तो उन लोगों ने बताया कि पुरुषों के लिए और महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों पर अलग शौचालय बने हैं। ऐसे में वह लोग किस टॉयलेट में जाएं। पुरुष में या महिला में? क्योंकि उन्हें न तो पुरुष माना जाता है और न ही महिला।

शशांक दीक्षित ने मीडिया से जानकारी साझा करते हुए आगे बताया कि इसके बाद उन लोगों ने अपनी सर्वे रिपोर्ट के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहिन याचिका दाख़िल की। उस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस एमसी त्रिपाठी और जस्टिस गजेंद्र कुमार की खंडपीठ ने प्रदेश सरकार और नगर निगम से थर्ड जेंडर समुदाय के लिए अब तक किये गये कार्यों का लेखा-जोखा (स्टेटस रिपोर्ट) मांगा है। कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई 12 जुलाई को करेगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में ‘NALSA बनाम भारत संघ’ के केस में ट्रांसजेंडर को थर्ड जेंडर के रूप में मान्यता प्रदान करते हुए कहा था इन्हें संविधान में दिए गए अभी अधिकारों को प्राप्त करने का अधिकार होगा। इसके साथ सुप्रीम कोर्ट ने शर्ड जेंडर के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने तथा उसके लिए विशिष्ट शौचालय बनाने के लिए केंद्र, राज्य सरकार व स्थानीय निकायों को आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को आये आज लगभग 10 साल बीत गये हैं लेकिन अभी तक प्रयागराज में एक भी अलग शौचायल थर्ड जेंडर समुदाय के लिए सरकार ने नहीं बनवाया है।

बता दें 2011 जनगणना के हिसाब से देश में थर्ड जेंडर समुदाय की कुल आबादी 5 लाख है। जबकि प्रयागराज में थर्ड जेंडर की कुल आबादी 8000 से ज्यादा है। पर संवैधानिक दर्ज़ा हासिल करने के दस साल बाद भी इन्हें एक अदद शौचालय तक नही दिया गया है। जिसके चलते इन्हें हर स्तर पर अपमानजनक स्थितियों व भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

थर्ड जेंडर समुदाय के लिए पहला सार्वजनिक शौचालय मुंबई की एकता हिन्द सोसायटी ने गोवंडी के शिवाजीनगर इलाके में पहला सार्वजनिक शौचालय साल 2016 में बनाया गया। एक ट्रांसजेंडर बताती हैं कि अक्सर सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल करते हुए वो पशोपेश में रहती हैं कि महिला शौचालय का इस्तेमाल करें या पुरुष शौचायल। वो बताती हैं कि अक्सर पुरुष शौचालय में उन्हें बुरी नज़रों से देखा जाता है जबकि महिला शौचालय में ट्रांसजेंडर होने के नाते अपमानित होना पड़ता है। कई बार महिलायें बेवजह हल्ला मचाने लगाती हैं जिसके चलते उन्हें असहज स्थितियों से दो चार होना पड़ता है।

सुशील मानव भदोही  स्थित गाँव के लोग डॉट कॉम के संवाददाता हैं।

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