Monday, June 24, 2024
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पचास साल के शोध के बाद आया विश्लेषण, पूरी नींद लेना जरूरी है, ताकि दिल बेकाबू न हो

नई दिल्ली (भाषा)। नींद में व्यवधान रोजमर्रा की घटनाओं पर हमारी प्रतिक्रिया को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। नींद की कमी और मनोदशा (मूड) पर 50 वर्षों तक किए गए अध्ययन के विश्लेषण में यह जानकारी सामने आई है। अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक एक या दो रातें नींद बाधित होना, अधिक समय तक जगे रहना […]

नई दिल्ली (भाषा)। नींद में व्यवधान रोजमर्रा की घटनाओं पर हमारी प्रतिक्रिया को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। नींद की कमी और मनोदशा (मूड) पर 50 वर्षों तक किए गए अध्ययन के विश्लेषण में यह जानकारी सामने आई है।

अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक एक या दो रातें नींद बाधित होना, अधिक समय तक जगे रहना या कम नींद खुशी, उत्साह और संतुष्टि की भावना को क्षीण कर सकती है। इसके साथ ही यह भावनात्मक रूप से उत्तेजित करने वाली स्थितियों में उन्हें सुन्न कर सकता है।

अमेरिका के ह्यूस्टन विश्वविद्यालय सहित विभिन्न संस्थानों के अनुसंधानकर्ताओं ने अध्ययन में यह भी पाया कि नींद की दिनचर्या में इस तरह की गड़बड़ी से अनुसंधान में हिस्सा लेने वालों में चिंता के लक्षण बढ़ गए, जैसे कि हृदय गति तेज होना और व्याकुलता। अनुसंधान के ये नतीजे 154 अध्ययन में कुल 5,715 प्रतिभागियों के आंकड़ों के विश्लेषण से निकाले गए हैं।

अमेरिका के मोंटाना स्टेट यूनिवर्सिटी में सहायक प्रोफेसर और साइकोलॉजिकल बुलेटिन जर्नल में प्रकाशित अध्ययन की सह-प्रथम लेखिका कारा पामर ने कहा, ‘‘बड़े पैमाने पर नींद से वंचित लोगों में व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए इस अनुसंधान के नतीजे काफी महत्वपूर्ण हैं।’’

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उन्होंने कहा, ‘‘उद्योगों और कम नींद वाले क्षेत्रों में काम करने वालों को नींद की कमी होने का खतरा है। इसलिए पहले उत्तरदाताओं, पायलटों और ट्रक चालकों के लिए नीतियां बनानी और अपनानी चाहिए ताकि वे दिन के कामकाज और कल्याण के जोखिमों को कम करने के लिए नींद को प्राथमिकता दें।

पामर ने कहा कि अध्ययन आज तक प्रयोगात्मक नींद और भावना अनुसंधान का सबसे व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि यह इस बात का पुख्ता सबूत है कि नींद में व्यवधान से इनसान की भावनात्मक कार्यप्रणाली पर नकारात्मक असर पड़ता है।

अनुसंधानकर्ताओं ने बताया कि इन सभी 154 अध्ययनों में, वैज्ञानिकों ने प्रतिभागियों की एक या अधिक रातों की नींद में खलल डाला, या उन्हें अधिक समय तक जगाए रखा, या उन्हें सामान्य से कम सोने की अनुमति दी, या पूरी रात समय-समय पर जगाया गया।

उन्होंने कहा कि पिछले अध्ययनों में से प्रत्येक ने नींद में बदलाव के बाद कम से कम एक भावना-संबंधी मानदंड को मापा, जैसे कि प्रतिभागियों की स्वयं-रिपोर्ट की गई मनोदशा, भावनात्मक उत्तेजनाओं के प्रति उनकी प्रतिक्रिया, और अवसाद और चिंता के लक्षणों के उपाय।

अंत: अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि नींद में इस तरह के व्यवधान से प्रतिभागियों में खुशी और संतुष्टि जैसी सकारात्मक भावनाएं कम महसूस हुईं और चिंता के लक्षण बढ़ गए।

अनुसंधानकर्ताओं ने पूर्व के अध्ययनों के आधार पर नतीजा निकाला कि 30 प्रतिशत से अधिक वयस्क और 90 प्रतिशत तक किशोर पर्याप्त नींद नहीं लेते हैं।

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