वेद और लोक का द्वंद्व: तुलसी बनाम कबीर  

जयप्रकाश कर्दम

1 915

अपनी आलोचनात्मक पुस्तक ‘कबीर के आलोचक’ के द्वारा डॉ. धर्मवीर ने हिंदी आलोचना की एक नयी ज़मीन तोड़ी थी। अपनी इस पुस्तक में उन्होंने मध्यकालीन साहित्य के सबसे प्रखर, तेजस्वी और परिवर्तनकामी चेतना के कवि कबीरदास की आलोचना करने वाले रामचंद्र शुक्ल, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिओध’ आदि की तीखी आलोचना करते हुए न केवल आलोचना की परम्परागत दृष्टि का छिद्रांवेषण किया, अपितु नयी स्थापनाएँ देकर हिंदी आलोचना को समृद्ध किया। डॉ. धर्मवीर का कार्य वस्तुत: कबीर को ब्राह्मणों के चंगुल से निकालकर दलित खेमे में लाकर खड़ा करना था। आलोचना की शास्त्रीयता का प्रतिकार करते हुए उसे लोकोन्मुख बनाने का काम चर्चित आलोचक प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव ने अपनी पुस्तक ‘लोक और वेद: आपने-सामने’ में किया है।

प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव ने जिन आलोचकों को जीवन भर पढ़ा और पढ़ाया है, लोक चेतना से लैस अपनी सजग दृष्टि से उनके शब्दों की जादूगरी और पांडित्य से भलि-भाँति परिचित होना और उसकी चालाकियों को पकड़ लेना उनके लिए सहज रहा है। भाषा और भक्ति की चासनी में लपेटकर वेद-शास्त्रों की विषमता का विष लोक जीवन को खिलाना और वेद-शास्त्रों को ही सही, श्रेष्ठ और ज्ञान के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत सिद्ध करना शास्त्रीयता की परम्परा रही है।

वेदवादी चिंतकों ने जिस भक्ति को प्रधान माना है, चौथीराम यादव ने भक्ति के उसी सूत्र को पकड़कर आगे बढ़ते हुए उसे चुनौती दी है। यह बहुजन चिंतन की ब्राह्मणवाद के अखाड़े में जाकर उसे ललकार है।चौथीराम यादव ने शास्त्रीयता के बरक्स लोक पक्ष और लोक चिंतन को प्रबल रूप से प्रस्तुत किया है, इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि यह पुस्तक लोक चिंतन की शास्त्र और शास्त्रीयता को चुनौती है। प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव ने जिन आलोचकों को जीवन भर पढ़ा और पढ़ाया है, लोक चेतना से लैस अपनी सजग दृष्टि से उनके शब्दों की जादूगरी और पांडित्य से भलि-भाँति परिचित होना और उसकी चालाकियों को पकड़ लेना उनके लिए सहज रहा है। भाषा और भक्ति की चासनी में लपेटकर वेद-शास्त्रों की विषमता का विष लोक जीवन को खिलाना और वेद-शास्त्रों को ही सही, श्रेष्ठ और ज्ञान के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत सिद्ध करना शास्त्रीयता की परम्परा रही है। चौथीराम यादव ने इस शास्त्रीयता कुटिलता की तार्किक आलोचना कर उसकी सैद्धांतिकता को ध्वस्त किया है।’ उनके इन शब्दों से उनकी चेतना को समझा जा सकता है, ‘परंपरावादी विद्वानों की दिक़्क़त यह है कि वे परम्परा का मूल स्वर शास्त्रों और अन्य धर्मग्रंथों में तलाशते रहे और लोक उपेक्षित होता गया। आज भी यह भ्रम बना हुआ है कि भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप वेद-पुराण आदि धर्मग्रंथों में सुरक्षित है और वैदिक संस्कृति ही मूल संस्कृति है, जबकि उसके पास आज के समय-समाज के सवालों का कोई जवाब नहीं है।’ (लोक और वेद: आमने-सामने, पृष्ठ-11)

लोक’ की अपनी बहुत पुरानी और समृद्ध परम्परा रही है। लोक की परम्परा आदिग्रन्थ और ज्ञान के सर्वाधिक प्रामाणिक स्रोत कहे जाने वेदों की परम्परा से कहीं बहुत पुरानी है। जब कोई धर्म नहीं था, धर्मशास्त्र नहीं था, वेद नहीं थे, तब भी लोक था। वेदों में भी लोक ही है। वेदों में वह सब हो सकता है जो लोक में है, किंतु लोक में ऐसा भी बहुत कुछ है जो वेदों में नहीं है। लोक, वेद से अधिक समृद्ध हैं। लोक की अपनी मान्यताएँ, विश्वास और चेतना-स्रोत रहे हैं। लोक में सरलता, सहजता, सद्भाव और समभाव है। वह इस दंभ से सर्वथा मुक्त है कि वह सर्वश्रेष्ठ, सर्वज्ञाता और महान है। लोक में दिखायी देनी वाली असमानता और भेदभाव की भावना लोक के अपने चरित्र और चेतना की उद्भूति नहीं वरन यह वेद और शास्त्रों की देन है। वेदवादी परम्परा में ब्रह्म, ब्राह्मण और वेद सर्वोपरि हैं। यूँ भी कह सकते हैं कि वेदवाद का ही दूसरा नाम ब्राहमणवाद है। वर्ण-व्यवस्था और ब्राह्मणवाद एक-दूसरे के पर्याय हैं। वेद-शास्त्रों की यह परम्परा वर्ण-जाति-व्यवस्था के विरोध को कदापि स्वीकार नहीं करती है, इसलिए वर्ण-जाति-व्यवस्था का विरोध करने वाले कवियों को हिंदी के आलोचकों ने स्वीकारोक्ति और सम्मान के साथ इतिहास में कोई जगह नहीं दी है। वेदों के प्रति आस्था और विश्वास तथा वर्ण-व्यवस्था का पालन आज धर्म के विषय बने हुए हैं, इसलिए हिंदी के आलोचकों के बारे में चौथीराम यादव का यह कहना बहुत सही है कि ‘अकारण नहीं है कि धार्मिक संकीर्णता से ग्रस्त रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा दोनों सिद्धों-नाथों की जाति-व्यवस्था विरोधी प्रतिरोध की सांस्कृतिक परम्परा को हिंदी से बाहर कर देना चाहते हैं ताकि यह सिद्ध करने में आसानी हो कि हिंदी साहित्य पर बौद्ध धर्म का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।’(वही, पृष्ठ-14)

इतिहास साक्षी है कि सिंधु घाटी सभ्यता से पहले का भारत का कोई इतिहास हमारे सामने नहीं है, जिसके तथ्यों की जाँच-परख और समीक्षा, विवेचना की जा सके। बौद्ध धर्म और परम्परा का इतिहास है, वेद-पुराण और अन्य धर्म ग्रन्थों में जो कुछ लिखा है वह इतिहास नहीं, किस्से, कहानियाँ और किंवदंतियाँ हैं। उनके कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं हैं। यदि कहीं इतिहास होता है तो उसकी कड़ियाँ मिलती हैं, किस्से-कहानियों और किंवदंतियों की कोई ऐतिहासिक कड़ियाँ नहीं मिलती हैं। समाज को गुमराह कर अपनी बात थोपने के लिए एक कहानी को दूसरी कहानी से जोड़कर इतिहास बनाने और वास्तविक इतिहास को दबाने की चेष्टा अवश्य की जा सकती है और बहुत से चतुर लोग समय-समय पर ऐसा करते रहे हैं।जिस तरह इतिहास और किंवदंतियां एक नहीं हो सकतीं, उसी तरह बौद्ध और ब्राह्मण परम्पराएँ एक नहीं हो सकतीं। चौथीराम यादव जी ने भक्ति परम्परा के संदर्भ में इस तथ्य की सही पहचान की है। उनके अनुसार, ’निर्गुण और सगुण दो परस्पर विरोधी विचारधाराएँ हैं, एक वर्णाश्रम धर्म की विरोधी है तो दूसरी उसकी समर्थक, एक शास्त्रनिरपेक्ष है तो दूसरी शास्त्र-सापेक्ष।’ (वही, पृष्ठ-18) इसी बात को और स्पष्ट करते हुए वह लिखते हैं, ’ब्राह्मण परम्परा और बौद्ध परम्परा तथा सगुण परम्परा और निर्गुण परम्परा, परस्पर विरोधी परम्पराएँ हैं, इनमें सामंजस्य कैसे हो सकता है।’ (वही, पृष्ठ-22)

वेदवादी लेखकों, चिंतकों पर पौराणिकता इस तरह हावी रही है कि प्रायः पौराणिक मत को ही वे लोकमत मानने और मनवाने के आग्रही रहे हैं। उन्हें प्रत्येक मत और परम्परा में वेद-पुराण और उनकी परम्परा ही दिखायी देती है। इससे अलग कुछ और वे नहीं देख पाते हैं। सत्य और समज्जस्य भी उनको वेद-पुराणों में ही मिलता है, लोक में नहीं। वेदवादी चिंतन की सबसे बड़ी  कमज़ोरी यह है कि वह तर्क न करके श्रुति को महत्व देता है, और स्वयं को सिद्ध न करके आरोपित करना चाहता है। सत्य के नकार और असत्य के स्वीकार की इस परम्परा को भारतीय चिंतन की बड़ी त्रासदी कहा जा सकता है। यह अनायास नहीं है कि ‘पूरे भक्तिकाल का मूल्याँकन करने के लिए आचार्य शुक्ल ने अपनी आलोचना के प्रतिमान, दो विरुद्धों का सामंजस्य करने वाले रामचरित मानस और तुलसीदास की विचार पद्धति के आधार पर ही निर्मित किए हैं किंतु शुक्ल जी की आलोचना में सामंजस्य का परिणाम यह हुआ कि पौराणिक मत ही लोकमत और वर्णधर्म ही लोकधर्म बन गया।’ (वही, पृष्ठ-35)

आज के समय में समरसता शब्द का बहुत प्रयोग किया जा रहा है। यह शब्द राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा के साथ जुड़ा और उसकी सोसल इंजीनियरिंग से निकला शब्द है। तुलसी दास के लिए प्रयुक्त सामज्जस्य और समन्वय जैसे शब्द भी लगभग वही अर्थ देते हैं जो अर्थ समरसता से निकलता है। चौथीराम यादव इसे बहुत अच्छी तरह समझते हैं। तुलसीदास के सामज्जस्य और समन्वयवाद के बारे में उनका यह कहना बहुत सही है कि ‘रामचरित मानस में शास्त्र भी है और लोक भी, वर्णधर्म है और लोकधर्म भी, पौराणिक पुनर्जागरण है तो लोक जागरण का किंचित स्वर भी। इन परस्पर विरोधी युग्मों का सामंजस्य कैसे हो सकता है? समन्वय का दर्शन अपने आप में बड़ा ख़तरनाक दर्शन है।’ (वही, पृष्ठ-35) असमानता के बने रहते समन्वय या समरसता का कोई अर्थ नहीं है। ‘दोनों का मेल नहीं हो सकता। न शूद्र का ब्राह्मण से और न निर्गुण मत का सगुण मत से।’ (पृष्ठ-91)

निम्न जातियों को किसी साकार ईश्वर की आवश्यकता या उस पर निर्भरता नहीं रही है। सगुण, साकार ईश्वर का अतित्व उनके लिए उसी समय ख़त्म हो गया था जब अस्पृश्य कहकर उनका मंदिर में प्रवेश वर्जित कर दिया गया था। उनका, मूर्तियों के बिना केवल प्रतीकों से काम चलता रहा है। उनका ईश्वर तो सब जगह कण-कण में, घट-घट में व्याप्त है, उनके अंदर समाया हुआ है। वेद-शास्त्रों की परम्परा सगुण की उपासक रही है। उसके लिए उनके आराध्य या ईश्वर का रूप और आकार होना ज़रूरी है। साकार ही सगुण होता है। ईश्वर का साकार रूप अर्थात मूर्तियाँ मंदिर के अंदर ही प्रतिष्ठित होती हैं। निम्न जातियों द्वारा साकार के बजाए निराकार की उपासना मंदिर प्रवेश के निषेध की प्रतिक्रिया में उपजी वर्ण-व्यवस्था एवं सामंती शोषण के विरोध की चेतना थी। इसे इस रूप में भी देख सकते हैं कि सिद्ध, नाथ और संत कवि निर्गुण चिंतन एवं उपासना के द्वारा निम्न जातियाँ को उच्च जातियों के वर्चस्ववाद के विरुद्ध स्वयं को संगठित कर रहे थे। यही कारण है कि सगुण धारा के सभी संत उच्च जातियों के हैं तथा निर्गुणधारा के संत निम्न जातियों के हैं। आलोचक चौथीराम यादव की चेतना इस तथ्य को पहचानती है। वह कहते हैं, ’निर्गुण भक्ति आंदोलन ऊपर से भले धार्मिक आवरण में लिपटा प्रतीत होता हो, मूलत: वह सामाजिक-आर्थिक शोषण के विरुद्ध कृषि एवं औद्योगिक उत्पाद से संबद्ध हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों की दलित जनता का क्रांतिकारी संघर्ष था। इसके उन्नायक मुख्यत: दलित एवं पिछड़े समाज से आने वाले दस्तकार, कारीगर, शिल्पकार और छोटे व्यापारी थे।’ (वही, पृष्ठ-26)

इस पुस्तक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है रामचंद्र शुक्ल की इतिहास दृष्टि की आलोचना।  यूँ तो पुस्तक में रामचंद्र शुक्ल, और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी से लाकर रामविलास शर्मा तक, सब की आलोचना की गयी है, किंतु निशाने पर मुख्यत: रामचंद्र शुक्ल ही रहे हैं। कारण, शुक्ल जी हिंदी साहित्य के पहले इतिहास लेखक हैं, परवर्ती इतिहास लेखकों ने उनके द्वारा लिखित इतिहास में ही जोड़-घटा किया है। चौथीराम यादव ने हिंदी साहित्य का सर्वप्रथम इतिहास लिखने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि का गहरा विश्लेषण चौथीराम यादव ने किया है। सूर, तुलसी, और कबीर, इन तीनों के बारे में आचार्य शुक्ल की टिप्पणियों का उल्लेख और विश्लेषण करते हुए उन्होंने अपनी आलोचना को पुष्ट किया है। तुलसीदास को उच्च आसान पर स्थापित करने के उपक्रम में आचार्य जी कबीर सहित निर्गुण कवियों को नकारते या गिराते चले जाते हैं। एक स्थान पर आचार्य शुक्ल को उद्ध्रत करते हुए वह लिखते हैं, ‘सगुण धारा की भारतीय धारा की पद्धति के भक्तों में कबीर, दादू आदि के लोकधर्म विरोधी स्वरूप को यदि किसी ने पहचाना तो गोस्वामी जी ने। उन्होंने देखा कि उनके वचनों से जनता की चित्तवृत्ति में एक घोर विकार की आशंका है जिससे समाज विशृंखल हो जाएगा, उसकी मर्यादा नष्ट हो जाएगी।’ (वही, पृष्ठ-45)

आचार्य शुक्ल की आलोचना करते हुए यादव जी लिखते हैं, ‘तुलसीदास ने जो देखा सो देखा, उसे देखकर आचार्य शुक्ल ने कुछ और भी देखा जिसे देखने से तुलसीदास भी चूक गए थे। वह यह कि सगुण भक्ति भारतीय है और निर्गुण भक्ति आभारतीय, जबकि कबीर और तुलसी दोनों निर्गुण और सगुण में कोई भेद नहीं मानते। दूसरी बात यह कि वर्णाश्रम के प्रति अश्रद्धा पैदा करने वाले कबीर आदि के जात-पात विरोधी विचारों से किस जनता की चित्तवृत्ति में घोर विकार की आशंका है? शिक्षित जनता या अशिक्षित जनता? स्वयं शुक्ल जी के अनुसार, ‘इस पंथ (निर्गुण) का प्रभाव शिष्ट और शिक्षित जनता पर नहीं पड़ा, पर अशिक्षित और निम्न श्रेणी की जनता पर इन संत-महात्माओं का बड़ा भारी उपकार है।’ (वही, पृष्ठ-45) कबीर के उपकार को ख़ासतौर से रेखांकित करते हुए वह उनकी निर्गुण भक्ति को बहुत आवश्यक कार्य मानते हैं और स्वीकार करते हैं कि मनुष्यत्व की सामान्य भावना को आगे करके निम्न श्रेणी की जनता में उन्होंने आत्मगौरव का भाव जगाया और उसे भक्ति के ऊँचे से ऊँचे सोपान की ओर बढ़ाने के लिए बढ़ावा दिया। आचार्य शुक्ल की इस विरोधाभासी दृष्टि की आलोचना करते हुए चौथीराम यादव यह महत्वपूर्ण सवाल करते हैं कि ‘एक नाज़ुक मोड़ पर बहुत बड़े जनसमुदाय को सही मार्ग दिखाने वाले, जनता में आत्मगौरव का बोध जगाने वाले और भक्ति के ऊँचे से ऊँचे सोपान की ओर बढ़ाने की प्रेरणा देने वाले कबीर के क्रांतिकारी विचार आख़िर किस जनता की चित्तवृत्ति में विकार पैदा कर रहे हैं? कहीं यह वही जनता तो नहीं जिसे कबीर सौ साल पहले फटकार चुके थे? और उस फटकार में पंडितों की फटकार भी शामिल थी जिसकी चर्चा आचार्य शुक्ल सिद्धों, नाथों और कबीर के मूल्याँकन में बार-बार करते हैं, बाक़ायदा शीर्षक लगाकर-‘पंडितों की फटकार।’ (पृष्ठ-46)

चौथीराम यादव की आलोचना दृष्टि तुलसीदास को शास्त्र की परम्परा और सूरदास को लोक परम्परा के पोषक के रूप में देखती है, और यह भी कि शास्त्र की परम्परा वर्ण-व्यवस्थावादी है और लोक परम्परा वर्ण-जाति व्यवस्था की विरोधी है। तुलसीदास और सूरदास पर तुलनात्मक टिप्पणी करते हुए वह कहते हैं, ’सूर की भक्ति में सेवा, श्रद्धा और पूज्य भाव की अपेक्षा समतामूलक प्रेमभाव की प्रमुखता है, जबकि तुलसीदास की शास्त्रसम्मत भक्ति दास्य भाव की भक्ति है जो स्वामी और सेवक के सामंती आदर्श को पुष्ट करती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि रामचरितमानस में दोहरी व्यवस्था क़ायम की गयी है जिससे वर्णाश्रम धर्म और भक्ति साथ-साथ चलते दिखायी देते हैं।’ (वही, पृष्ठ-48) यद्यपि सूर और तुलसी दोनों ही पौराणिक अवतारों को अपनी रचनाओं का नायक बनाते हैं, किंतु इसके उपरांत सूरदास की भक्ति में उनको मानवीय समानता के बीज दिखायी देते हैं जबकि तुलसीदास की भक्ति असमानता की पोषक दिखायी देती है। वह लिखते हैं, ’सूरदास ने पौराणिक अवतारवाद से उतनी ही प्रेरणा ली है जितनी वह जात-पांत विरोधी भक्ति के अनुकूल पड़ती थी, और तुलसीदास ने समतामूलक भक्ति को वहीं तक स्वीकार किया है जहाँ तक वह शास्त्रानुकूल हो सकती थी। ज़ाहिर है कि सूर के लिए भक्ति मुख्य थी तो तुलसी के लिए शास्त्र। अवतारवाद को सिद्धांतत: स्वीकार करने के बावजूद सूरदास के सामाजिक विचार और उनकी भक्ति का स्वरूप, दोनों तुलसी की अपेक्षा कबीर के अधिक निकट प्रतीत होते हैं।’(वही, पृष्ठ-36)

चौथीराम यादव सूरसागर में गोपी-उद्धव संवाद को लोक और शास्त्र के बीच सार्थक संवाद के रूप में देखते हैं, जिसमें परस्पर वाद-विवाद भी है। उनका कहना है कि ‘इस पूरे संवाद में सूरदास गोपियों के साथ लोक के पक्ष में खड़े हैं, शास्त्र (उद्धव) के पक्ष में नहीं।’(वही, पृष्ठ-36) यहाँ विचारणीय है कि उद्धव कृष्ण के संदेशवाहक हैं, इसका तात्पर्य यह है कि उद्धव के शब्दों में जो शास्त्र बोलता है वह परोक्ष रूप से कृष्ण ही बोलते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि कृष्ण शास्त्रों के पक्षधर हैं। कृष्ण शास्त्रों के पक्षधर हैं और राम शास्त्र के अनुसार चलने वाले उनेक रक्षक हैं, तो दोनों के बीच अंतर क्या है? यहाँ यह प्रश्न उठना अस्वाभाविक नहीं है कि शास्त्रीय परम्परा के पोषक इन दोनों नायकों में से किसी का भी लोक के वेद-विरोधी चिंतन और परम्पराओं के साथ कितना जुड़ाव हो सकता है?

शास्त्रीय परम्परा के साथ सबसे बड़ी दिक़्क़त यही है कि यह प्रगतिशील होने या दिखने की कोशिश करती है लेकिन वर्णधर्म को नहीं छोड़ती है। स्वामी और दास (या सेवक) वाली भक्ति समानता की विरोधी है। दास्य भाव की भक्ति समानता का छद्म या पाखंड रच सकती है समानता को स्वीकार नहीं कर सकती। शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन को भारतीय दर्शन के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी क़दम माना जाता है। किंतु वह भी वर्णवाद का समर्थन करता है। ’शंकराचार्य का क्रांतिकारी अद्वैत सिद्धांत वर्णवाद का समर्थन करने के कारण कोरा सिद्धांत बनाकर रह गया था।’ (पृष्ठ-54)। गांधी ने भी यही किया था। एक ओर वह अस्पृश्यता-उन्मूलन और अछूतोद्धार की बात कर रहे थे और दूसरी ओर वर्ण-व्यवस्था का समर्थन कर रहे थे। वर्ण-व्यवस्था को जीवित रखकर अस्पृश्यता और ऊंचनीच के भेदभाव को समाप्त नहीं किया जा सकता है। अपनी इस विरोधाभासी चेतना के कारण ही गांधी अस्पृश्यों को कभी स्वीकार्य नहीं हो सके। उनका ‘हरिजन-प्रेम’ और अस्पृश्यता उन्मूलन की अपील सवर्णो के भी एक बड़े वर्ग को गले से नीचे नहीं उतरा और वह, मुखर रूप में भले ही नहीं रहा हो, गांधी का विरोधी हो गया था। इस तरह गांधी, ब्राह्मण और दलित, दोनों के द्वारा ही अस्वीकृत हुए। द्वंद्व हमेशा ख़तरनाक होता है। द्वंद्व वह नाव है जो कभी भी कहीं भी डुबो सकती है। द्वंद्वात्मक विचार समाज को भ्रमित करने के अलावा कोई राह नहीं दिखा सकते।

देव और असुर दोनों एक दूसरे के समानांतर और विरोधी संस्कृतियाँ हैं। दोनों संस्कृतियों के बीच संघर्ष की एक लम्बी परम्परा है। देवासुर संग्राम से लेकर राम, कृष्ण आदि देव संस्कृति के नायक और संरक्षकों द्वारा रावण, कंस आदि अनेकानेक राक्षकों/असुरों की हत्या इसके प्रमाण हैं। देव अर्थात ब्राह्मण स्वयं को सर्वोच्च, श्रेष्ठ और समस्त धरा का स्वामी मानने और मनवाने का आग्रही रहा है। अर्थात वह सब पर अपना वर्चस्व बनाकर रखना चाहता है। जो उसका वर्चस्व स्वीकार करते हैं वे उसके मित्र हैं और जो स्वीकार नहीं करते हैं, वे शत्रु हैं। असुर या राक्षस उनका वर्चस्व स्वीकार नहीं करते हैं और उनके वर्चस्व का प्रतिकार करते हैं इसलिए उनकी हत्या और संहार किया जाता है। असुरों/ राक्षसों की हत्या और संहार पर देवताओं द्वारा पुष्प-वर्षा की जाती है। यह असुरों पर देवों की विजय नहीं, अपितु असुर संस्कृति पर देव संस्कृति की विजय अथवा वर्चस्व का जयघोष है। रामचरित मानस में असुरों की हत्या पर देवताओं द्वारा पुष्प वर्षा के अनेक उदाहरण हैं, जिसमें सबसे अधिक पुष्प वर्षा रावण की मृत्यु होने पर की जाती है। रावण की हत्या और पूरी लंका को जलाकर ख़ाक कर देना असुर संस्कृति के ध्वंश का प्रतीक है।देव अथवा ब्राह्मण  में वर्चस्व का दंभ इतने गहरे तक व्याप्त है कि वेद भी वही है और लोक भी वह ख़ुद को ही मानता है। जो उसका मित्र है वह लोक का मित्र है, जो उसका विरोधी है वह लोक का भी विरोधी है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल रामचरित मानस और तुलसी की प्रशंसा करते हुए इस विचार को बल प्रदान करते हैं। चौथीराम यादव के शब्दों में, ’सब मिलाकर देखा जाए तो राम-रावण के प्रतीकात्मक संघर्ष का निहितार्थ वर्चस्व की संस्कृति बनाम प्रतिरोध की संस्कृति का संघर्ष है जिसमें तमाम जातीय विजातीय परम्पराओं की जय-पराजय की स्मृतियाँ समाहित हैं। वर्चस्ववादी संस्कृति की रक्षा और प्रतिरोध की संस्कृति का नकार ही रामकथा का पौराणिक लक्ष्य है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम इस वर्चस्ववादी संस्कृति के महानायक हैं।’ (पृष्ठ-60)

तुलसीदास, रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा ये तीनों वेदांत के पक्के प्रेमी हैं।——-रामविलास शर्मा अपनी परम्परा में बुद्ध की चिंतन परम्परा को स्वीकार ही नहीं करते हैं।’ (पृष्ठ-67) इतना ही नहीं वैदिक-पौराणिक परम्परा में उनकी गहरी आस्था है। वेद-पुराणों में ही उनको नवीनता और नवजागरण के बीज दिखायी देते हैं। रामचंद्र शुक्ल में फिर भी थोड़ी बहुत गुंजाइश थी, वामपंथी विचारधारा से जुड़े रामविलास शर्मा अपने वैदिक-पौराणिक प्रेम में उनसे भी कई क़दम आगे दिखाए देते हैं। बुद्ध से लेकर अम्बेडकर तक, उन्होंने सबको ख़ारिज किया है। जबकि बुद्ध और अम्बेडकर दोनों ने अपने-अपने समय में बड़ी वैचारिक एवं सांस्कृतिक क्रांतियां की हैं। मानवीय शोषण के विरुद्ध इन क्रांतियों से बड़ा कौन सा जागरण हो सकता है, जो समाज को शोषण के विरुद्ध संघर्ष करने और उससे मुक्त होने के लिए जागृत करे? चौथीराम यादव के ये शब्द इस तय की पुष्टि करते हैं-‘बुद्ध का इतना बड़ा जागरण जो देश को ही नहीं, सारी दुनियाँ को नवजागृत कर रहा है, वह आपके हिंदी नवजागरण में क्यों नहीं समाहित है? —-रामविलास शर्मा को बुद्ध का नवजागरण क्यों नहीं दिखायी दिया। इसका कारण यह है कि बुद्ध का नवजागरण जाति-व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था के ख़िलाफ़ था। इस नवजागरण की चेतना ब्राह्मणवादी अकादमी पर प्रहार कर रही थी।’ (पृष्ठ-68)

लोक और वेद के बीच प्रारम्भ से ही तनाव, टकराव और संघर्ष रहा है। वेद अपने ज्ञान, भाषा और शब्दावली से आक्रांत कर लोक पर अपना वर्चस्व बनाकर रखने का आग्रही रहा है जबकि सह-अस्तित्व में विश्वास रखने वाले लोक ने निरंतर उसे नकारा और अस्वीकारा है। वेद की परम्परा इसी कारण लोक को अपनी विरोधी और दुश्मन की तरह देखने लगती है। लोक में कहीं न कहीं परस्पर मिल बैठने और बाँटकर खाने की प्रवृत्ति रही है। यह अलग बात है कि लोक के सह-अस्तित्व में भी समानता का भाव है। वैदिक-पौराणिक परम्परा का प्रतिकार करने के बावजूद लोक, वैदिक-पौराणिक परम्परा से प्रभावित है। इसी के चलते आर्थिक असमानता के साथ-साथ जातिगत  ऊंचनीच, भेदभाव और अस्पृश्यता लोक में विद्यमान है। निम्न जातियाँ सामाजिक समानता के लिए निरंतर संघर्ष करती रही हैं। सिद्ध, नाथ और निर्गुण संत कवियों की वाणी इसका प्रबल प्रमाण है। इसे रैदास के इन शब्दों से सहज रूप से समझा जा सकता है-‘ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट बड़े सब सम बसें, रैदास रहै प्रसन्न।’ कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह एक समाजवादी समाज की संकल्पना है, जिसका वैदिक-पौराणिक परम्परा की सगुण भक्ति में सर्वथा अभाव है।

मध्यकाल में सूफ़ी काव्य में स्त्री संवेदना के प्रति जो सजगता दिखायी देती है वह बाद में आकर लुप्त सी हो जाती है। आधुनिक काल में राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रश्नों के साथ स्त्री संवेदना को भी हिंदी साहित्य में अभिव्यक्ति मिली। वर्तमान समय में दलित के साथ स्त्री विमर्श भी साहित्य का केंद्रीय विमर्श है। दलित और स्त्री दोनों की संवेदना और विमर्श के साहित्य ने एक नए सौंदर्य बोध को जन्म दिया है। जिसमें एक ओर जाति और पुरुष सत्ता से मुक्ति की कामना, छटपटाहट और संघर्ष है तो दूसरी ओर स्वतंत्र-सुखी एवं स्वावलंबी जीवन के सपने और जिजीविषा है।

रामचंद्र शुक्ल और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना में एक मूलभूत अंतर यह है कि रामचंद्र शुक्ल तुलसी को अपना प्रिय कवि मानते हैं जबकि हज़ारी प्रसाद द्विवेदी कबीर को। चौथीराम यादव के अनुसार, ‘आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी, मुक्तिबोध, नामवर सिंह की परम्परा है। यह परम्परा भाववादी दर्शन से ग्रस्त नहीं है। यह वैदिक परम्परा के समानांतर चलने वाली दूसरी परम्परा-मानवतावादी, जाति-व्यवस्था विरोधी परम्परा है।’ (पृष्ठ-68) इस तथ्य का एक पहलू यह भी है कि नामवर सिंह अपने अंतिम दिनों में घोर जातिवादी दिखायी दिए। दलितों के आरक्षण का विरोध करते हुए वह यहाँ तक कह गए कि यदि आरक्षण बना रहा तो एक दिन ठाकुरों के लड़कों को भीख माँगे की नौबत आ जाएगी। मुक्तिबोध हों या नामवर सिंह ब्राह्मणवाद विरोधी हैं, क्योंकि क्षत्रीय होने के कारण वह ब्राह्मण का वर्चस्व और श्रेष्ठता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। किंतु निम्न जातियों पर अपनी श्रेष्ठता और वर्चस्व रखना चाहते हैं, इसलिए जाति-व्यवस्था का कभी प्रबल विरोध नहीं किया।सच तो यह है कि प्रगतिशील परम्परा भी न वेद का गहराई से विरोध करती है और न ही वर्ण-व्यवस्था से टकराती है। अपितु अपनी अवधारणाओं को पुष्ट करने के लिए वैदिक-पौराणिक संदर्भों का आलम्ब लेती है। कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदी आलोचना पर जातिवाद हावी है। यह इस छोटे से उदाहरण से देखा जा सकता है कि ‘रामचंद्र शुक्ल के प्रिय कवि गोस्वामी तुलसीदास है, रामविलास शर्मा के प्रिय कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ है और नामवर सिंह के प्रिय कवि गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ हैं, जो कि क्षत्रीय थे। जाति के अलावा आलोचना का दूसरा आधार विचारधारा रहा है। वैदिक अथवा दक्षिणपंथी विचार परम्परा के आलोचकों को उस परम्परा के पोषक साहित्यकार प्रिय रहे तो प्रगतिशील अथवा वामपंथी आलोचकों को उस परम्परा के अनुरूप लिखने वाले लेखक और कवि प्रिय रहे। दलित न वैदिक परम्परा के समर्थक रहे और न ही वामपंथ के साथ बहुत अधिक जुड़ाव रहा, इसलिए दलित साहित्यकार और उनकी रचनाएँ आलोचकों की दृष्टि से प्रायः ग़ायब हैं। यह कम चौंकाने वाला तथ्य नहीं है कि बच्चन सिंह द्वारा लिखित ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ में दलित साहित्य का कोई उल्लेख नहीं है, जबकि उस समय तक हिंदी में दलित साहित्य एक बड़े आंदोलन के रूप में अपनी पहचान बना चुका चुका था और एक महत्वपूर्ण विमर्श के रूप में हिंदी साहित्य के केंद्र में था। हाँ, दूसरे संस्करण में अवश्य उसमें दलित साहित्य पर कुछ पृष्ठ जोड़े गए हैं।

सारी सामाजिक विसमताओं की जड़ में वैदिक वर्ण-व्यवस्था है, जो ब्राह्मण की श्रेष्ठता और वर्चस्व को थोपती है। और इसके लिए समाज को विभाजित करती है। इसी श्रेष्ठता और वर्चस्व का प्रतिकार कर समानता का मानवीय समाज स्थापित करने का आंदोलन बुद्ध से लेकर सिद्ध, नाथ, संत और आधुनिक काल में ज्योतिबा फुले और अम्बेडकर ने किया। दलित साहित्य का आंदोलन इसी परम्परा को आगे बढा रहा है। वेद-पुराण की ब्राह्मणवादी परम्परा के पास इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं है कि ‘जब एक ही ब्रह्म की सत्ता सभी जीवों में व्याप्त है तो कैसा हिंदू, कैसा मुसलमान, कैसा ब्राह्मण, कैसा शूद्र, कैसा ऊँच, कैसा नीच?’ (पृष्ठ-88)

अनित्य और परिवर्तनशील जगत में सब कुछ परिवर्तनशील है। समय के साथ हर चीज़ बदलती है। जीवन और जगत में जो कुछ भी है, वह यहीं उत्पन्न होता है और यहीं नष्ट होता है। इसलिए ईश्वर या परमात्मा जैसी कोई शाश्वत सत्ता नहीं होती। ईश्वर नहीं तो उसके अवतार भी नहीं। कोई अवतार जन्म नहीं लेता, व्यक्ति या जीव जन्म लेता है। वह व्यक्ति यदि वर्ण-धर्म का रक्षक और वर्ण-धर्म विरोधियों का संहार करने के लिए सामने आए तो कबीर या रैदास जैसे वर्ण-धर्म विरोधी को वह कैसे स्वीकार्य हो सकता है। ‘ऐसी आत्महंता आस्था से रैदास भी परहेज़ करते थे और कबीर भी।’ (पृष्ठ-104)

निर्गुण संतों की तरह सूफ़ी संतों ने भी मानव समानता, प्रेम और सद्भाव पर बल दिया। सूफ़ी सम्प्रदाय के संतों की दरगाह और मज़ारों पर सभी धर्मों, जातियों, सम्प्रदायों के लोग चादर चढ़ाते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि सूफ़ी मत का किसी मत, सम्प्रदाय से कोई विरोध या विवाद नहीं रहा, अपितु सभी धर्मों, जातियों, सम्प्रदायों के बीच एकता, प्रेम और भाईचारा स्थापित करना उसका उद्देश्य रहा। समतामूलक समाज के निर्माण में सूफ़ी मत का योगदान महत्वपूर्ण है। सूफ़ी संतों की कविता में निर्गुण संतों जैसी आक्रामकता और प्रतिरोध का स्वर नहीं है। क्योंकि ‘कबीर और रैदास ने घृणा की सीमा तक फैले हिंदू समाज के जिस जाति-भेद का दंश झेला था, सम्भवत: वैसा दंश जायसी आदि सूफ़ी कवियों को न झेलना पड़ा हो। शेख़ और मोमिन का भेद तो वहाँ भी था लेकिन हिंदू समाज जैसी सामाजिक संकीर्णता वहाँ नहीं थी।’ (पृष्ठ-112)

स्त्री और दलित प्रश्नों की भी पुस्तक में विवेचना की गयी है। दलित जातिसत्ता से पीड़ित रहे हैं तो स्त्री पुरुषसत्ता की शिकार रही है। जातिसत्ता के लिए दलित निम्न और हीन हैं तो पुरुषसत्ता के लिए स्त्री निम्न और हीन है। दलित और स्त्री दोनों ही वंचित, उपेक्षित और शोषित हैं, एक समाज में और दूसरी घर की चारदीवारी के अंदर। जाति और पुरुष दोनों ही वर्चस्ववादी सता हैं। भारतीय समाज में ये दोनों एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं। मध्यकाल में सूफ़ी काव्य में स्त्री संवेदना के प्रति जो सजगता दिखायी देती है वह बाद में आकर लुप्त सी हो जाती है। आधुनिक काल में राष्ट्रीय स्वाधीनता के प्रश्नों के साथ स्त्री संवेदना को भी हिंदी साहित्य में अभिव्यक्ति मिली। वर्तमान समय में दलित के साथ स्त्री विमर्श भी साहित्य का केंद्रीय विमर्श है। दलित और स्त्री दोनों  की संवेदना और विमर्श के साहित्य ने एक नए सौंदर्य बोध को जन्म दिया है। जिसमें एक ओर जाति और पुरुष सत्ता से मुक्ति की कामना, छटपटाहट और संघर्ष है तो दूसरी ओर स्वतंत्र-सुखी एवं  स्वावलंबी जीवन के सपने और जिजीविषा है।

अनेक प्रश्नों से जूझती, टकराती और समाधान खोजती यह पुस्तक कई प्रश्न भी छोड़ती है।  एक महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि रामभक्ति शाखा के अंतर्गत एक भी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण कवि मुसलमान और निम्नजातीय शूद्र वर्गों से नहीं आया, जबकि कृष्णभक्ति शाखा के अंतर्गत रसखान और रहीम आदि मुसलमान कवि हुए हैं? समाज में आज भी वर्णधर्म की संस्कृति का वर्चस्व क्यों है? स्त्री शरीर से अलग भी कुछ है, इसे कब समझा जाएगा?

लेखक प्रसिद्ध दलित साहित्यकार और दलित साहित्य वार्षिकी के संपादक हैं। दिल्ली में रहते हैं

Dated : 28 June, 2021

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  1. […] वेद और लोक का द्वंद्व: तुलसी बनाम कबीर … […]

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