रैदास के दुख का कारण राज्य का अमानवीय और शोषक चरित्र है

ईश कुमार गंगानिया

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पहला भाग 

बेगमपुरा को समझने के लिए पहले तथागत बुद्ध के प्रतीत्‍यसमुत्‍पाद के सिद्धांत पर सरसरी तौर पर नजर डालना जरूरी महसूस हो रहा है। बेगमपुरा को यदि प्रतीत्‍यसमुत्‍पाद की रोशनी में देखें तो संत रैदास दुखी हैं, उनके दुख का कारण शहर यानी राज्‍य का अमानवीय व शोषणकारी चरित्र है। रैदास के दिमाग में इसके कारण के निवारण के रूप में बेगमपुरा की अवधारणा का उदय होता है। ऐसी अवधारणा का उदय रैदास जैसे जागरूक, जिम्मेदार, संवेदनशील व विवेकशील नागरिक के ज़ेहन में होना स्‍वाभाविक है। जाहिर  है, ऐसा उन्‍हीं के साथ होता है जो धारा के विरुद्ध तैरने का साहस रखते हैं। बेगमपुरा की अवधारणा किसी व्‍यवस्‍था विशेष से पलायन की नहीं है बल्कि एक नई व्‍यवस्‍था के ब्लूप्रिंट जैसी है। रैदास जैसा साहस आज भी देखने में दुर्लभ लगता है। आज के हालात रैदास के काल से कोई ज्यादा अलग नहीं हैं। आज भी आम आदमी बुरी तरह त्रस्‍त है। न उसकी कोई सुनने वाला है, न ही उसके लिए कोई कुछ करने वाला है और न ही निकट भविष्‍य में ऐसी कोई नीयत के आसार ही नजर आते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति के पास अपने सुकून को लेकर अपने-अपने बेगमपुरा जैसे यूटोपिया हो सकते हैं।

यह जरूरी नहीं है कि वे अपने यूटोपिया को  बेगमपुरा की तरह देखते हों। लेकिन मुझे लगता है कि आज का व्‍यक्ति अपने निजी हितों या नफे-नुकसान तक सिमटा नजर आता है। इसलिए वह तभी अपने हाथ-पैर व जुबान चलाता है जब उसके निजी हित आहत होते नजर आते हैं। रैदास की तरह समाज और राष्‍ट्र के बेहतर भविष्‍य के लिए जैसे आज का व्‍यक्ति बना ही नहीं है। गौरतलब है कि व्‍यक्ति आज निजी स्‍तर पर व लोकतांत्रिक संस्‍थाओं के हिस्से के रूप में समाज व देश के व्‍यापक हितों के लिए न मुखर नजर आता है और न ही संघर्षशील ।

इसके विपरीत वह लोकतांत्रिक हितों पर कुठाराघात करने वाली ताकतों के साथ खड़ा नजर आता है। इसके दो कारण हो सकते हैं। एक – लोकतांत्रिक संस्‍थाओं से जुडे़ व्‍यक्ति की विचारधारा लोकतंत्र पर कुठाराघात करने वालों से मेल खाती हो। दो – उसने लोकतंत्र से खिलवाड़ करने वालों से समझौता कर लिया हो या अन्‍य किसी मजबूरी में उसने मूकदर्शक बने रहने की भूमिका अपना ली हों। लेकिन दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के वजूद के लिए चिंताजनक हैं और मानवता के माथे पर एक बदनुमा कलंक जैसी है। खैर…

जहां तक आज के तथाकथित आधुनिक संतों और बाबाओं का सवाल है, तो  उनमें से कुछ बलात्‍कार जैसे नए कीर्तिमान स्‍थापित कर भारतीय जेलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। कुछ सरकार का भोंपू बन अपने व्‍यापार में चार चांद लगा रहे हैं। ये प्रत्‍यक्ष व परोक्ष रूप से सत्ता के प्रचारमंत्री की भूमिका में स्‍वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं। कुछ ऐसे भी तथाकथित संत-महात्‍मा हैं जो धर्म के नाम पर समाज में सौहार्द्र और अमन-चैन स्‍थापित करने की बजाय धार्मिक उन्माद फैलाने में एड़ी से चोटी तक का जोर लगाते नजर आते हैं। हिन्‍दू धर्म के नाम पर बेवजह को न जाने कैसे-कैसे मोर्चे खोले रहते हैं। सत्ता भी इनका खुलकर इस्‍तेमाल करती है।

जब हम रैदास और संत परंपरा के संतों के बारे में विचार करते हैं एक अद्भुत सुकून की अनुभूति होती है। रैदास अपनी आजीविका के लिए परंपरागत जातीय पेशे से जीवन की जरूरतों का सामान जुटाते हैं यानी स्‍वाभिमान से परिपूर्ण आत्मनिर्भर जीवनयापन करते हैं। इसके साथ-साथ वे अपनी संतई के क्षेत्र में अपनी जागरूकता और तर्क-विवेक के अद्भुत कीर्तिमान स्‍थापित करते हैं। उनका चिंतन-दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना उस काल में रहा होगा जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसी ही आत्मनिर्भरता संत कबीर और इनके अन्‍य समकालीन संतों में नजर आती है।

जब भी उन्‍हें कुछ ऊल-जुलूल ब्यान दिलाने होते हैं उन्‍हें सिर्फ हरी झंडी दिखानी होती है। राई का पहाड़ बनाना समझो उनके बाएं हाथ का काम होता इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो बेचारे अपने बिलों में रहने में ही मस्‍त हैं। उनके लिए तो बूढ़ा मरे या जवान, उन्‍हें तो सिर्फ हत्‍या से काम यानी उनके मुफ्त की रोटी तोड़ने में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। उनके लिए साधु का सीधे से मायने है परजीवी संस्‍कृति का निर्वहन करना है। देश-दुनिया के हित-अहित से उनका कोई लेना-देना नहीं है। शायद इन कूपमंडूपों की देश-दुनिया के बारे में सोचने की औकात ही नहीं है। हां, एक बात जरूर है कि जहां कहीं संख्‍या या शक्ति प्रदर्शन की जरूरत होती है, वहां ये नमक का हक अदा करने से कभी पीछे नहीं हटते। खैर…

जब हम रैदास और संत परंपरा के संतों के बारे में विचार करते हैं एक अद्भुत सुकून की अनुभूति होती है। रैदास अपनी आजीविका के लिए परंपरागत जातीय पेशे से जीवन की जरूरतों का सामान जुटाते हैं यानी स्‍वाभिमान से परिपूर्ण आत्मनिर्भर जीवनयापन करते हैं। इसके साथ-साथ वे अपनी संतई के क्षेत्र में अपनी जागरूकता और तर्क-विवेक के अद्भुत कीर्तिमान स्‍थापित करते हैं। उनका चिंतन-दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना उस काल में रहा होगा जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसी ही आत्मनिर्भरता संत कबीर और इनके अन्‍य समकालीन संतों में नजर आती है। यह संत परंपरा और इसके अनुसरणकर्ताओं के लिए बेहद फख्र का विषय है।

इससे भी बड़े फख्र की यह बात है किउनमें तर्क-विवेक के साथ-साथ उनके सोचने का बड़ा कैनवास बेहद महीन और व्‍यापक है।इसमें समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति कठोर आत्मसमर्पण और ईमानदारी कूट-कूट कर भरी लगती है। परिणामस्‍वरूप, संत रैदास तत्कालीन सत्ता और  समाज के अवसरवादी लोगों द्वारा पैदा की गई अराजकता के विरुद्ध डटकर खड़े होते हैं। गौरतलब है कि जिस दुख जिसका शिकार जनसाधारण है, रैदास खुद अपने आपको इससे बाहर नहीं मानते हैं। वे चारों ओर व्‍याप्‍त तृष्णा के शिकार नहीं होते और न ही दुख में डूबकर निराश-हताश ही होते हैं। वे अपनी शक्ति को ज्ञान और ध्‍यान में व्यय करते हैं जो निर्वाण का मार्ग है।

गौरतलब है कि यहां रैदास का लक्ष्‍य यहां निर्वाण प्राप्ति नहीं बल्कि दुख पैदा करने वाली तत्कालीन परिस्थितियों से निजात पाना है। ये परिस्थितियां व्‍यक्ति के जीवनयापन और प्रगति के मार्ग में बाधक हैं। संत रैदास की नजर में इन बाधाओं का विकल्‍प कुछ और नहीं बल्कि बेगमपुरा है। बेगमपुरा का मतलब ऐसा शहर, ऐसा राज्‍य जहां व्‍यक्ति सारे गमों से दूर हो और सुखमय जीवन का निर्वाह कर सकें। बेगमपुरा की अवधारणा को प्रस्‍तुत करने वाली निम्नलिखितकविता (जिसे मेरे मित्र शीलबोधि ने इसमें प्रयुक्त कठिन शब्‍दों के सरलार्थ सहित उपलब्‍ध कराई है) के अनुसार कुछ इस प्रकार है-‍

बेगमपुरा सहर का नाऊं, दु:ख अंदेस  नहीं तिहिं जाऊं।।

ना तसबीस, खिराजु न मालू, खौफ न खता न तरसुजवालु।

अब मोहि खूब बतनगह पाई, ऊहां खैरि सदा मेरे भाई।

काइमु दाइमु सदा पातिसाही, दाम न, साम एक सा आही।

आवादानु सदा मसहूर, ऊहां गनी बसहिं मामूर।

तिउं-तिउं सैर करहिंजिंउभावै, हरम महल मोहिं अटकावै।

कह रैदास खलास चमारा, जो उस सहर सों मीत हमारा।

मौजूदा कविता के बारे यह कहना अनिवार्य महसूस हो रहा है कि मुझे नहीं मालूम कि यह कविता कितनी मौलिक है और कितनी नहीं। मुझे यह भी नहीं मालूम कि इसमें सारे शब्‍द मौलिक हैं या रैदास पर काम करने वाले शोधार्थियों ने अपनी सुविधानुसार इनमें कुछ हेर-फेर कर दिया है। लेकिन एक दावा अवश्य कर सकता हूं कि जब हम कविता को सार रूप में देखते हैं तो यह रैदास के चिंतन-दर्शन के रूप में काफी हद तक मुकम्मल नजर आती है।मेरे लिए इस अपरिचित शब्दावली वाली कविता को संदर्भ सहित सरल शब्दों में व्‍यक्‍त करना थोड़ा मुश्किल काम था लेकिन मैंने अपनी सामर्थ्य के अनुसार इसके साथ न्‍याय करने का भरपूर प्रयास किया है। अब मैं इसके साथ कितना न्‍याय कर पाया हूं यह अपने आप में एक अलग विचारणीय बिंदु हो सकता है।

‘बेगमपुरा’ नामक कविता स्‍पष्‍ट प्रमाण है कि संत रैदास अपने समय की शासन व्‍यवस्‍था और अपने आसपास की परिस्थितियों से बेहद असंतुष्ट थे। इससे मुक्ति के लिए संत रैदास एक ऐसे शहर यानी ऐसे देश की परिकल्पना करते हैं जो सभी प्रकार के गमों व दुखों से मुक्‍त हो। वे इसे बेगमपुरा यानी बिना गमों का शहर की संज्ञा देते हैं।  रैदास के ख्‍यालों या यूं कहें कि उनके चिंतन-मनन की दुनिया में बेगमपुरा नामक एक शहर है। यह ऐसा शहर है जहां दुख का अंदेशा तक नहीं है। इसलिए रैदास बेगमपुरा जाने की बात करते हैं। वे दुख के कारणों को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि यहां किसी प्रकार का गैर-कानूनी टैक्स (संभवत: जजिया जो गैर-मुस्लिम से जबरन वसूला जाता था और इसे अदा न कर पाने की स्थिति में व्‍यक्ति को अनेक प्रकार की यातनाओं से गुजरना पड़ता था) नहीं है और न ही यहां जमीन और माल के उत्पादन पर कोई टैक्स है। यहां वैचारिक अभिव्यक्ति की ऐसी स्‍वतंत्रता है कि बोलने से होने वालेकिसी अपराध के भय से जुबान तरसती नहीं है यानी बेगमपुरा में अपनी बात कहने के लिए या किसी संबंध में कोई प्रतिक्रिया देने के मामले में किसी से डरने की जरूरत नहीं है।

वो आगे बताते हैं कि अब मुझे अपनाने या रहने लायक एक बेहतरीन वतन का पता चल गया है। वहां सभी मेरे भाई अमनचैन से रह सकते हैं। वहां पर किसी एक कौम को शासन नहीं है और न ही वहां कोई भेदभाव ही चलता है। जैसाकि हमारे यहांकाम और दाम का निर्धारण शासक की कौम की इच्छानुसार चलता है जिसमें कदम-कदम पर छल-कपट की भरमार है। यहां कौम के शासन व छल-कपट से संत रैदास का आशय जातीय ऊंच-नीच व धार्मिक भेदभाव हो सकता है। जिस शहर की बात संत रैदास बात कर रहे हैं उनकी मान्‍यता है कि वहां व्‍यक्ति के योगदान की कदर होगी और अच्‍छे कार्य के लिए व्‍यक्ति को पुरस्‍कार व शौहरत मिलेगी। इसलिए वे आगे बताने हैं कि यह ऐसी व्‍यवस्‍था होगी जहां गुणवान और मर्मज्ञ लोगों का निवास होगा।

जाहिर है कि रैदास का काल जातीय व धार्मिक छल-कपट से परिपूर्ण रहा होगा और वहां न व्‍यक्ति के योगदान को महत्‍व होगा और न ही गुणवान और मर्मज्ञ लोगों की कद्र ही रही होगी। साफ है कि उस काल में श्रेष्ठता व निकृष्टता का पैमाना भी कौम के आधार पर तय होता होगा। जाहिर है यहां कौम का संबंध इस्लामी शासकों से है। बाबा साहब स्‍वयं ब्राह्मणों के ऐसे ही दोहरे मानदंडों को बात अनेक बारविस्‍तार से और उदाहरण सहित कर चुके हैं। कह सकते हैं कि रैदास को ऐसी खामियों के नायाब विकल्‍पके रूप में बेगमपुरा की घोषणा करनी पड़ी।

‘बेगमपुरा’ नामक कविता स्‍पष्‍ट प्रमाण है कि संत रैदास अपने समय की शासन व्‍यवस्‍था और अपने आसपास की परिस्थितियों से बेहद असंतुष्ट थे। इससे मुक्ति के लिए संत रैदास एक ऐसे शहर यानी ऐसे देश की परिकल्पना करते हैं जो सभी प्रकार के गमों व दुखों से मुक्‍त हो। वे इसे बेगमपुरा यानी बिना गमों का शहर की संज्ञा देते हैं। रैदास के ख्‍यालों या यूं कहें कि उनके चिंतन-मनन की दुनिया में बेगमपुरा नामक एक शहर है। यह ऐसा शहर है जहां दुख का अंदेशा तक नहीं है। इसलिए रैदास बेगमपुरा जाने की बात करते हैं। वे दुख के कारणों को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि यहां किसी प्रकार का गैर-कानूनी टैक्स (संभवत: जजिया जो गैर-मुस्लिम से जबरन वसूला जाता था और इसे अदा न कर पाने की स्थिति में व्‍यक्ति को अनेक प्रकार की यातनाओं से गुजरना पड़ता था) नहीं है और न ही यहां जमीन और माल के उत्पादन पर कोई टैक्स है।

रैदास का दुख इतने तक सीमित नहीं था। इसलिए रैदास ने अपने दुख के शमन के लिए इच्छानुसार सैर या भ्रमण करने की स्‍वतंत्रता की बात आगे बढ़ाई। संभवत: वहां सैर और भ्रमण की वैसी सुविधा नहीं होंगी जैसी संत रैदास व्‍यक्ति के लिए जरूरी समझते थे। आज इस भ्रमण और सैर का संबंध भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के रूप में व्‍यक्‍त उस अवधारणा से मेल खाता है, जिसके अनुसार देश के प्रत्‍येक नागरिक को अपने देश में कहीं भी आने-जाने, जमीन-जायदाद खरीदने और निवास करने की आजादी है। संत रैदास इस भ्रमण या सैर की अवधारणा को विस्‍तार देते हुए कहते हैं कि बेगमपुरा में इबादतगाह में किन्‍हीं महलों जैसी किलेबंदी नहीं होगी। यानी शासक और धर्मगुरु किन्‍हीं विशेषाधिकारों से लैस नहीं होंगे वे सभी आम आदमी की पहुंच से बाहर नहीं होंगे।

अपनी कविता के अंत में रैदास बड़े आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान को जग जाहिर करते हुए बताते हैं कि यह कोई और नहीं कह रहा है बल्कि खलास चमारा यानी विशुद्ध रूप से एक चमार जाति का सामान्‍य व्‍यक्ति कह रहा है और यह दावा कर रहा है कि जो व्‍यक्ति ऐसे शहर के पक्ष में है वही हमारा मीत है। जो इसके पक्ष में नहीं हैं यानी जो बर्बर सत्ता या अलौकतांत्रिक समाज के साथ हैं, वे हमारे मीत नहीं हैं।मुझे ऐसा लगता है यहाँ मसला रैदास केप्रिय, चहेतेया कृपापात्र हो जाने तक सीमित नहीं है। यह मीत हो जाना रैदास जैसी विचारधारा की ब्रोडर यूनिटी का हिस्‍सा हो जाना है जिसके दम पर सत्ता पर दबाव बनाया जा सके और अन्यायपूर्ण व्‍यवस्‍था को हतोत्‍साहित किया जा सके।

 अगर यह कहा जाए कि बेगमपुरा की घोषणा सत्ता व समाज परिवर्तन का एक घोषणा-पत्र जैसा है तो इसे पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। दरअसल, उस जमाने में तख्तापलट जैसी परिस्थितियां नहीं थी और न ही किसी विदेशी सहयोग जैसा प्रचलन ही उस जमाने था। अगर ऐसी थोड़ी-बहुत कुछ संभावनाएं थी भी तो वे संत रैदास जैसे व्‍यक्तियों की पहुंच से बाहर थी। स्‍पष्‍ट है कि ‘बेगमपुरा’ शहर या राज्‍य की अवधारणा तक सीमित नहीं है जहां संत रैदास जाना चाहते हैं। मेरी प्रबल मान्‍यता है कि यह संत रैदास की सत्ता व बर्बर समाज को अप्रत्यक्ष चुनौती थी।

इस हकीकत से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि बिना सत्ता परिवर्तन के बेगमपुरा जैसी लोकतांत्रिक व लोक-कल्‍याणकारी व्‍यवस्‍था संभव नहीं है। इसलिए कहने में संकोच नहीं कि संत रैदास ने बेगमपुरा शहर की कल्‍पना ही नहीं की थी बल्कि सत्ता व समाज परिवर्तन ब्लूप्रिंट तैयार किया था। ऐसे ब्लूप्रिंट की आज भी जरूरत है और इसे हकीकत का जामा पहनाने की भी, लेकिन लगता है कि आज की पीढ़ी ने गुलामी को दिल से अंगीकार कर लिया है और उसमें संत रैदास जैसा सपना देखने तक की कुव्वत शेष नहीं रह गई है।

मुझे लगता है कि पाठकों को यह भी जानना जरूरी है कि बेगमपुरा की अवधारणा का जन्‍म यूं ही बैठे-बिठाए मौज-मस्‍ती में क्षणिक ही हो गया होगा। इस बिंदु पर सहमति-असहमति के अनेक पक्ष हो सकते हैं लेकिन मैं मेरी निजी मान्‍यता है कि बेगमपुरा संत रैदास की लम्‍बे अरसे से दुख को झेलने का परिणाम है। संत रैदास द्वारा प्रस्‍तुत इसके विकल्‍प कोलम्‍बे चिंतन-मनन के परिणाम के रूप में देखा जाना चाहिए। इस दुख यानी अव्यवस्थाको समझने के लिए संत रैदास के विभिन्‍न मुद्दों पर अभिव्‍यक्‍त विचार से रूबरू होना पड़ेगा।

दास पराधीनता को पाप के रूप में देखते हैं, एक अपराध के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि पराधीन व्‍यक्ति से कोई प्रीत नहीं करता है। जाहिर है, पराधीन व्‍यक्ति सभी प्रकार के भेदभाव का शिकार होता है। अपनी पीड़ा को मुखरता प्रदान करते हुए संत रैदास कहते हैं कि गुलाम व्‍यक्ति का कोई धर्म नहीं होता यानी उसके धर्म, उसकी मान्यताओं की कोई कद्र नहीं होती। गुलाम व्‍यक्ति को हमेशा छोटा समझा जाता है। इसी पराधीनता के चलते संत रैदास बेगमपुरा में जमीन पर टैक्‍स, माल के उत्पादन पर टैक्‍स और सबसे अधिक पीड़ादायक टैक्स है ‘जजिया’।

बेगमपुरा को बर्बर सत्ता के तख्‍तापलट का रूप अख्तियार करने के पीछे संत रैदास की जो पहली पीड़ा है वह जातिवाद के दंश को लेकर है। समाज की तथाकथित निचली जातियां यह दंश हिन्दुओंके स्‍तर पर ही नहीं झेलती थी बल्कि  मुसलमानों के स्तर पर भी झेलने को बाध्य थी। इस जातीय दंश को संत रैदास कुछ इस प्रकार बयां करते हैं-

जात-जात में जात है, ज्यों केलन में पात।

रैदास न मानुष्य जुड़ सके, ज्यों लौ जात न जात।।

जात-जात के फेर महि, उरझीरहई सब लोग।

मानुषता को खात है, रैदास जात का रोग ।।

 उपरोक्त लाइनों में संत रैदास द्वारा व्‍यक्‍त जातियों की विभीषिका को आसानी से समझा जा सकता है। वे जातीय संरचना की तुलना केले पत्तों से करते हैं। जब हम केले एक पत्ते को अलग करते रहते हैं तो दूसरा निकल आता है फिर तीसरा और नए पत्ते निकलने का सिलसिला निरंतर चलता रहता है। संत रैदास का जातियों को केले के पत्तों से तुलना करने का आशय जातियों की संरचना को अंतहीन व कॉम्‍प्लेक्‍स संरचना के रूप में देखना था। संत रैदास कहते हैं कि मनुष्‍य का पूरा जीवन जाति के प्रपंचों में उलझ कर रह जाता है और यह जाति का रोग इंसान से उसकी इंसानियत छीनकर उसे हैवान बनाता है। जाति की तत्कालीन परिस्थितियों के चलते संत रैदास मनुष्‍य को मनुष्‍य बनाए रखने और मनुष्यता के संरक्षण के लिए बेगमपुरा जैसे सत्ता और समाज परिवर्तन जैसे टूल की खोज करते हैं।

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एक ओर  यहां जाति की पराधीनता है। संत रैदास इसके अतिरिक्‍त एक दूसरी पराधीनता की बात करते हैं जो जाति की समस्‍या के साथ-साथ अन्‍य बड़ी समस्‍याओं का जन्‍म देती है। यह समाज द्वारा पोषित नहीं बल्कि राजनीतिक सत्ता द्वारा थोपी गई पराधीनता होती है। इसके अपने अनेक प्रकार के खतरे हैं, मुसीबतें हैं। संत रैदास राजनीतिक पराधीनता को कुछ इस प्रकार साझा करते हैं-

पराधीन पाप है जान लेहू रे मीत।

‘रैदास’ दास पराधीन सो कौन करै है प्रीत ।।

पराधीन कौ दीन क्या, पराधीन बे-दीन।

रैदास दास पराधीन कौ, सबहि समझै हीन ।।

उपरोक्त पंक्तियों से स्‍पष्‍ट है कि रैदास पराधीनता को पाप के रूप में देखते हैं, एक अपराध के रूप में देखते हैं। वे कहते हैं कि पराधीन व्‍यक्ति से कोई प्रीत नहीं करता है। जाहिर है, पराधीन व्‍यक्ति सभी प्रकार के भेदभाव का शिकार होता है। अपनी पीड़ा को मुखरता प्रदान करते हुए संत रैदास कहते हैं कि गुलाम व्‍यक्ति का कोई धर्म नहीं होता यानी उसके धर्म, उसकी मान्यताओं की कोई कद्र नहीं होती। गुलाम व्‍यक्ति को हमेशा छोटा समझा जाता है। इसी पराधीनता के चलते संत रैदास बेगमपुरा में जमीन पर टैक्‍स, माल के उत्पादन पर टैक्‍स और सबसे अधिक पीड़ादायक टैक्स है ‘जजिया’।

यह टैक्‍स सत्ताधारी इस्‍लामिक मजहब के अतिरिक्‍त दूसरे मजहब के लोगों से लिया जाता था जिसकी अदायगी न होने की स्थिति में व्‍यक्ति को अनेक प्रकार से शारीरिक व मानसिक यातनाओं का सामना करना पड़ता था। इस टैक्‍स को गरीब हिन्दुओं के इस्लाम में धर्मांतरण के औजार के रूप में देखा जाता है। दूसरे धर्मों को लूट के दम पर कमजोर व अस्थिर करने के रूप में देखा जा सकता है। इस संदर्भ में इस हकीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि गुलाम के रूप में जब व्‍यक्ति का कोई मान-सम्‍मान नहीं था उसके कार्यों का सम्‍मान कैसे हो सकता है। संत रैदास पराधीनता के उत्पन्न सारी पीड़ाओं से मुक्ति का मार्ग बेगमपुरा में तलाशते हैं।

ईश कुमार गंगानिया जाने-माने कवि और लेखक हैं। 

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