तीनों कृषि कानूनों की वापसी : किसानों की जीत या सरकार की हार

अपर्णा , कार्यकारी संपादक, गाँव के लोग

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आज भारत सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। साल भर से चल रहे किसान आन्दोलन को आज खत्म करने की मंशा से गुरुनानक जयंती के अवसर की आड़ लेकर कानूनों को वापस लेने की घोषणा अचानक लग सकती है लेकिन यह अचानक नहीं है बल्कि आने वाले चुनावों की रणनीति के लिए बढ़ाया गया एक कदम है। पिछले दिनों बीजेपी की  उपचुनावों में हुई हार और आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश और पंजाब में होने वाले चुनावों को देखते हुए यह बड़ा फैसला लिया गया है। पिछले सात सालों की विकास यात्रा की रिपोर्ट कार्ड अब जनता के पास है। कोरोना के समय की अव्यवस्था और दवा-ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतें ,देश के कई हिस्से में हुए साम्प्रदायिक दंगों में मारे गये लोग, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम और महंगाई ने लोगों को वास्तविक स्थिति से रूबरू करवा दिया है। यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई कि यदि अब ये जनता के साथ खड़े नहीं हुए तो (भले ही कुछ दिनों के दिखावे के लिए ही) हमेशा के लिए इन्हें बैठना पड़ेगा। किसान आन्दोलन में मारे गए 700 किसान जिनके परिवार सड़क पर आ गए उनके सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। गौरतलब है कि पंजाब और उत्तर प्रदेश में 75 प्रतिशत आबादी खेती-किसानी से जुड़ी है। राज्य के चुनाव की दो-तिहाई सीटों पर हार-जीत यही किसान तय करते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने एक रणनीति के तहत कृषि क़ानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। हालांकि सैकड़ों अनसुलझे सवालों की तरह यह सवाल भी उलझ गया है कि अदानी के बड़े-बड़े गोदामों यानी साइलों का क्या होगा?

जब तक तीनों कृषि बिल संसद में रद्द नहीं होंगे तब तक किसान आंदोलन जारी रहेगा। इससे पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी की बात पर किसी को अचानक भरोसा नहीं रह गया है। क्या पता यह कोई सर्जिकल स्ट्राइक हो!

मोदी ने अपने सम्बोधन में कहा, ‘आज गुरु नानकदेव जी का प्रकाश पर्व है। यह समय किसी को भी दोष देने का नहीं है। आज मैं आपको, पूरे देश को यह बताने आया हूं कि हमने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने का निर्णय लिया है। इस महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में हम तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे।’

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में यह जानकारी भी दी कि जीरो बजट खेती की तरफ प्रभावी कदम उठाने के लिए एक कमिटी के गठन का फैसला किया गया है। उन्होंने कहा, ‘आज ही सरकार ने कृषि क्षेत्र से जुड़ा एक और फैसला लिया है। जीरो बजट खेती, यानी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए, देश की बदलती आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर, क्रॉप पैटर्न के वैज्ञानिक तरीके से बदलने के लिए, एमएसपी को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए, ऐसे सभी विषयों पर भविष्य को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने के लिए एक कमिटी का गठन किया जाएगा।’

इसके बरक्स सरकार के इस कदम को लेकर किसान मामलों के प्रति संवेदनशील लोगों में संशय की स्थिति है। जिस तरह से सरकार ने किसान आंदोलन को खत्म करने की साजिशें की थीं उनको देखते हुये मोदी के इस निर्णय के प्रति अविश्वास बना हुआ है। हालांकि संयुक्त किसान मोर्चे ने अभी इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी है। फिर भी योगेंद्र यादव ने इसे किसान की जीत नही बल्कि किसान के अस्तित्व की जीत कहा है। राकेश टिकैत ने संसद में इसकी वापसी पर मुहर लगाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि ‘जब तक तीनों कृषि बिल संसद में रद्द नहीं होंगे तब तक किसान आंदोलन जारी रहेगा। इससे पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी की बात पर किसी को अचानक भरोसा नहीं रह गया है। क्या पता यह कोई सर्जिकल स्ट्राइक हो!

जो भी हो। इसे किसानों की जीत ही कहा जाएगा क्योंकि तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार इसे तोड़ नहीं पाई और अंततः उसे खुद पीछे हटना पड़ रहा है।

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