एक हैं शायर वसीम एक हैं घरेलू वसीम !

बीआर विप्लवी

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पहला हिस्सा

सामाजिक परिप्रेक्ष्य में एक जनवादी नारा है जिसमें संसाधनों की वाज़िब हिस्सेदारी की बात उठाई गई है। यह सच्चाई पूँजीवादी व्यवस्था को सहज स्वीकार्य नहीं हो सकती कि दुनिया के प्रत्येक उपलब्ध संसाधन पर केवल इंसान का ही नहीं बल्कि प्राणि-मात्र का हक़ हो। इस मिसरे का ज़हनी रुतबा इसके शायर के व्यक्तित्व की पूरी कैफ़ियत की नुमाइंदगी करता है। वह एक बात, जिसके लिए शायर की जंग समूची दुनिया के साथ है; कि जो कुछ है वह सबके लिए उपलब्ध नहीं है। इस फ़िक्र के पैरोकार प्रोफेसर वसीम बरेलवी का नाम केवल उर्दू अदब में ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय साहित्य में एक संजीदा मानवतावादी चिन्तक और सामाजिक न्याय के प्रबल पक्षधर के रूप में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका साहित्यिक सफ़रनामा इन्हीं उद्देश्यों की ज़मीन को ज़रखेज बनाने के लिए संघर्षरत दिखाई देता है। यही हिम्मत उनकी ताक़त भी है।

ऐसे चिन्तन और विचार-धारा को पूरी शिद्दत के साथ अपनी निजी ज़िन्दगी का हिस्सा बनाने वाले शायर प्रोफेसर ज़ाहिद हसन वसीम उर्फ़ वसीम बरेलवी ने साहित्य जगत में अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ी है। बड़ी सादगी के साथ, बहुत बड़े फलसफ़े को वे कितनी आसानी से शब्दों में ढालते हैं –

जो है तो सबके लिए हो ये ज़िद हमारी है

इस एक बात पर दुनिया से जंग जारी है

ऐसे फलसफ़ना मिज़ाज के शायर एवं फ़क़ीराना अंदाज़ के व्यक्तित्व के साथ गुज़रे लम्हों का ज़िक्र आते ही कई मौकों के रंगारंग चित्र एक बड़े कैनवास पर सजीव हो उठते हैं।

शायर वसीम बरेलवी और बीआर विप्लवी

जनवरी-फरवरी का महीना कुमाऊँ की घाटियों-उपत्यकाओं तथा उसकी निचली तराई के लिए घने कोहरे और शीत-लहर के प्रकोप से ग्रस्त करने वाला रहता है। सुब्हो-शाम अलाव की ज़रूरत, ठिठुरन के बावजू़त; अलग ही तरह के आनन्द से भर देती है। बरेली प्रायः ऐसे ही तराई का इलाक़ा है, जहाँ उन दिनों ऐसे सर्दियों के मौसम जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया करते थे। हालाँकि इस इलाक़े की अपनी विशिष्टताएँ भी कम नहीं हैं। उपजाऊ ज़मीन में खाने-पीने की लगभग सभी चीजे़ं मौसमी फ़सलों के रूप में बहुतायत में उपलब्ध रहती हैं। आम, अमरूद, केला, कटहल, चीकू, नीबू, सेमल, शहजन, आड़ू, चकोतरा, लीची और जामुन के पेड़ों में जब मौसमी फल लगते हैं तो उनकी अच्छी आमद से हाट-बाज़ार भरे-पड़े होते हैं। गन्ना, गेहूँ, धान, मकई आदि की फ़सलों की भारी पैदावार से इलाके़ की सम्पन्नता का सहज ही अन्दाज़ा लग जाता है। इस प्रकार के ज़रख़ेज़ इलाक़ों में शुमार बरेली में लगभग सात वर्षों का लम्बा प्रवास कई तरह के अनुभवों तथा उपलब्धियों से भरा हुआ है। इनमें सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि साहित्यिक सरज़मीन से जुड़ी बरेली-रामपुर-मुरादाबाद की अलग अदबी क्लास ने हिन्दी-उर्दू तहज़ीब से रू-शनाश कराया। दिल्ली और लखनऊ की तहज़ीबी-क्लासिकी के बीचों-बीच न केवल जुगराफिया-नज़र से बल्कि साहित्यिक तौर पर एक तरक्की पसंद तहज़ीब से यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला। यहाँ रहते हुए इस पूरे खिते की साहित्यिक बू-ओ-बास ने अपनी तरफ़ यूँ खींचा कि दिलो-ज़हन जैसे महक़ उठा हो। यह समय था ईस्वी 1998 से 2005 तक का, जब यहाँ की शेरी नशिस्तों और मुशायरों का चस्का सा लग गया। इसी क्रम में मशहूर शायर प्रो. वसीम बरेलवी से मुलाकात का मौका मिला।

बरेली की वह शाम अभी तक ज़हन में ज्यों की त्यों बसी हुई है, जिसमें वसीम साहब से पहली मुलाक़ात हुई थी – रेलवे कालोनी इज़्ज़तनगर में एक वरिष्ठ रेलवे अधिकारी के आवास पर छोटी सी कवि-गोष्ठी के आयोजन में । उन दिनों उक्त अधिकारी तथा उनकी पत्नी के विशेष कविता प्रेम के कारण ही ऐसा सुखद संयोग बन पड़ा। प्रोफेसर साहब से मिलने की चिर-आकांक्षी तमन्ना पूरी होने की खुशी तो थी ही साथ ही साथ भविष्य में उनकी अधिक कुर्बत हासिल कर पाने की कामना भी बलवती होने लगी थी। यह समय सन्1999 ई॰ का था। मशहूर गीतकार किशन सरोज, ग़ज़लकार के.के.सिंह मयंक, तथा गोरखपुर के युवा कवि देवेन्द्र आर्य भी आमंत्रित थे। कार्यक्रम के प्रेरणास्रोत थे-श्री विजय कुमार भार्गव जो इज़्ज़तनगर में मंडल रेल प्रबंधक भी थे। इस अवसर पर सबने कविताओं का भरपूर आनन्द लिया। मेरी ख़ास उपलब्धि थी – प्रो॰ वसीम बरेलवी के साथ वह यादगार मुलाक़ात। मिलकर लगा कि जैसे हम एक दूसरे को वर्षों से जानते हों। उनकी आँखों की चमक में अपने लिए एक विशेष प्रेम और वात्सल्य देख कर कुछ अलग संतोष की अनुभूति हुई। इसके बाद तो उनसे दुबारा मुलाक़ात के लिए टेलीफोन पर कई बार वक़्त लेने की कोशिश करता रहा, किन्तु उनकी व्यस्तताओं के कारण ऐसा सुयोग लगभग आठ-दस माह बाद ही बन पाया।

पुस्तक तश्नगी का रास्ता उन्हें भेंट करने के बहाने ही यह मुलाक़ात सम्भव हो पायी थी। बात-चीत  बहुत देर तक नहीं चली – कदाचित औपचारिकता निर्वाह ने बेबाक़पन नहीं आने दिया। झिझक, संकोच और अजनबीयत के भाव प्रायः साहित्यिक चर्चाओं से कुछ सीखने-सिखाने के माहौल में बाधा तो बनते ही हैं। इतना अवश्य था कि मेरी इब्तिदाई शाइरी में शायद उन्होंने सामाजिक चेतना की तड़प के लिए वैचारिक ऊर्जा का कुछ संज्ञान लिया। इसके साथ ही ग़ज़लों में बहरों की पाबन्दी पर ज़्यादा ध्यान देकर मश्क़ करने तथा शेरो-सुखन के पुराने साहित्य को हृदयंगम करने की सलाह भी दी। ग़ज़लों में मीटर या बहर की पाबंदी को महत्वपूर्ण बताते हुए उनसे रदीफ़, क़ाफ़िया, रुक्न, तक्ख़्तीय तथा ग़ज़ल के अरूज़ के बारे में जो प्रारम्भिक जानकारी मिली उसने इस  शेरी सफ़र को नई रौशनी देने का काम किया। ऐसी मुलाक़ातें प्रायः प्रेरणा-प्रोत्साहन देकर व्यक्तिगत स्तर पर एक मज़बूत आत्मविश्वास से भर देने वाली होती हैं जिन्हें लम्बे समय बाद तक याद किया जाता है।  शाइरी की तकनीकी बारीकियों की यह सीख समेटे जब वापस लौटा तो पहले से कुछ अधिक विस्तृत दृष्टिकोण लेकर। उर्दू रवायत की यह ज्ञान परम्परा दीगर भाषाओं में नहीं है। इसलिये भी शाइरी की दुनिया में पहला क़दम रखते हुए इस फ़न के तमाम पारम्परिक और वर्तमान परिदृश्य से परिचित होना ज़रूरी होता है। इन्हीं को हिन्दी देवनागरी की शक्लो-सूरत को बनाने-सँवारने में लगाना शायद शायरी और ग़ज़लों की दुनिया के लिए एक ज़रूरी आवश्यकता भी है। जैसे किसी ने हाथ पकड़ कर अँधेरे से  निकाल रौशनी के तरफ़ का रास्ता बता दिया हो। कुछ यूँ ही इस साहित्यिक यात्रा की दुश्वारियाँ सहल होती गईं।

इस छोटी सी मुलाक़ात ने जो हौसला दिया था, उसने ग़ज़लों की बुनावट और कहन में लगातार तब्दीली और सुधार करते हुए इन पर बार-बार मश्क़ करते रहने की शक्ति एवं प्रेरणा दिया। फिर क्या था, कुल नब्बे ग़ज़लों को एकत्र करने में अधिक वक़्त नहीं लगा तथा उन्हें पुस्तकाकार बनाने की योजना कार्यावनित होने लगी। चिन्तन-मनन एवं सलाह-मशविरा लेकर अन्तिम सुधार का काम सन् 2002 में पूरा हो पाया। जल्दी ही इन ग़ज़लों को संग्रह रूप में प्रकाशनार्थ भाई अरुण माहेश्वरी ने सहमति  दे दी तथा यह पाण्डुलिपि वाणी प्रकाशन के हवाले कर दी गई। सन् 2004 में सुबह की उम्मीद नाम से इस ग़ज़ल संग्रह को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित कर दिया। इस ग़ज़ल संग्रह के विमोचन का संयोग-सौभाग्य भी प्रो. वसीम बरेलवी के हाथों ही बना। उसी वर्ष दिसम्बर की कड़कती ठंड के बावज़ूद, इज़्ज़तनगर रेलवे आवासीय परिसर में इस पुस्तक का विमोचन सम्पन्न हुआ। इसके दूसरे सत्र में एक स्मरणीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरे का आयोजन भी हुआ जिसमें बरेली, रामपुर, मुरादाबाद, बदायूँ तथा आस-पास के नामचीन कवियों-शायरों ने शिरकत की तथा अपने कलाम से इसे ऐतिहासिक बना दिया। इज़्ज़तनगर-बरेली के लेखक-चिन्तक-बुद्धिजीवी वर्ग का बड़ी तादाद में जमावड़ा था। इसमें गीतकार किशन सरोज, कवि एवं ग़ज़लकार

मीटर गेज का छोटा सा स्टेशन खटीमा है जिसके आस-पास के जंगलों से होकर वनवसा का रास्ता जाता है। यह जंगल दुधवा नेशनल पार्क के विस्तृत वन-प्रान्तर का ही एक हिस्सा है जो आगे जिम कार्बेट नेशनल पार्क के जंगलों से जोड़ता है। इस जंगल में बसा हुआ छोटा सा कस्बा वनबसा एक बड़ी फ़ौजी छावनी का केन्द्र है। खटीमा से बरेली लौटते हुए रास्ते में नानकमता का भव्य गुरुद्वारा दूर से ही अपनी झक सफे़द चमक बिखेरता नज़र आता है। वहाँ के हलवे का प्रसाद तो हथेलियों को देशी घी से तर कर देता है।

तथा अन्य कई साहित्यिक-सांस्कृतिक हस्तियाँ इसकी ग़वाह बनीं।

वसीम बरेलवी साहब के साथ होली-दीवाली, ईद-बकरीद तथा रमजान की इफ़्तार पार्टियों के मौके पर बिला नागा जो मुलाक़ातें होती थीं; उन यादों में एक साथ मिल-बैठ कर खाए-खिलाए स्वादिष्ट व्यंजनों के स्वाद से बढ़कर, घंटों होने वाली चर्चाएँ आज भी सजीव हैं। टूटी मस्जिद, गढै़या क़िला के उस जमुना प्रसाद मार्ग की संकरी सी गलीनुमा सड़क पर मिलने वालों के लिए वाहन रखने की जगह तक बमुश्किल मिल पाती थी। स्थानीय कमिश्नर, जिलाधिकारी, डी.आई.जी., जिला जज़, मंत्री, लेखक, पत्रकार, डाक्टर, इंजीनियर, वकील,ईद, बकरीद के ऐसे मौक़ों पर मुबारकबाद देने आ जाते। सिवइयों का दौर चलता रहता। बीच-बीच में वसीम साहब की देशी-विदेशी यात्राओं के संस्मरण भी सुनने को मिलते रहते। रात बारह बजे के पहले तो यह सिलसिला ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता था। उन यादों की मिठास से आज भी जी भर आता है।

उनके साथ पारिवारिक सम्बन्धों में इतनी प्रगाढता आती गई कि हमारे बच्चे भी एक दूसरे से घुल-मिल गये। बेटी मुनज्जा और बेटा मौजू तो दो दिनों तक पीलीभीत, टनकपुर के प्राकृतिक पर्यटन में  हमारे साथ रहकर उस वातावरण में यूँ खोये रहे कि उन्हें अपने माँ-बाप की याद ही नहीं आई। पहली बार इन्हें माँ-बाप से दूर किसी दूसरे के साथ छोड़ा गया था। यह भी आपसी विश्वास तथा प्रेम की एक बानगी है। बच्चों के साथ शारदा बैराज के पास नहरों का बाइफरकेशन तथा जंगल से होकर गार्जिया टेम्पल का सुहाना सफ़र आज भी हमारे ज़हन में बसा हुआ है। नदी की तेज धार के बीच ऊँचे पर्वतीय टीले पर चढ़कर नदी एवंवहाँ के वन-प्रान्तर को निहारना एक अलग तरह के आनन्द से भर देता है। बड़े बैराज के पार नेपाल सीमा लगती है जहाँ से नेपाली जन-जीवन का एक जायज़ा तो मिल ही जाता है। मीटर गेज का छोटा सा स्टेशन खटीमा है जिसके आस-पास के जंगलों से होकर वनवसा का रास्ता जाता है। यह जंगल दुधवा नेशनल पार्क के विस्तृत वन-प्रान्तर का ही एक हिस्सा है जो आगे जिम कार्बेट नेशनल पार्क के जंगलों से जोड़ता है। इस जंगल में बसा हुआ छोटा सा कस्बा वनबसा एक बड़ी फ़ौजी छावनी का केन्द्र है। खटीमा से बरेली लौटते हुए रास्ते में नानकमता का भव्य गुरुद्वारा दूर से ही अपनी झक सफे़द चमक बिखेरता नज़र आता है। वहाँ के हलवे का प्रसाद तो हथेलियों को देशी घी से तर कर देता है। लंगर छकते हुए हमारे साथ बच्चों को अत्यंत रोमांच भरे आनंद का अनुभव हुआ। कहते हैं कि यहाँ गुरु नानक देव स्वयं ही पधारे थे। उनके द्वारा पुनर्जीवित पीपल का पेड़ आज अपनी घनी छाया से परिसर को शुद्ध हवा तथा शीतल छाया दे रहा है। मन्दिर के पीछे का सरोवर रंग-बिरंगी मछलियों की तैराकी से मन बहलाने का एक अलग ही माध्यम है। सेवादारों और कीर्तनियों की तन्मयता में शामिल होकर एकात्मता महसूस करते हुए वहाँ कुछ देर चुप-चाप बैठना कितना सुकून देता है। इस यात्रा से जुड़े,मौजू-मुनज्जा; आज भी इसकी चर्चा करते नहीं अघाते। किच्छा के रास्ते बरेली-काठगोदाम मार्ग पर बहेड़ी की मुंगौड़ियों का स्वाद आज भी मुँह में पानी ला देता है।

एक अजनबी व्यक्ति हमारी टैक्सी के एकदम सामने आकर शीशे से झाँकता हुआ चिल्ला पड़ा- ‘अरे ! यह तो वसीम बरेलवी साहब हैं।’ पास आकर उसने हाथ बढ़ाकर वसीम साहब के हाथों को लगभग चूमता हुआ आदरपूर्वक उनका अभिवादन किया। ऐसा दृश्य देखकर हम आश्चर्य-मिश्रित खु़शी से लबरेज थे।

जुलाई दो हजार पाँच – उमस का आलम है। रौशनी के बल्बों, ट्यूब-लाइटों से टकराते कीट-पतिंगे, कीड़े-मकोड़े, इन्हें लगभग घेरे हुए हैं। शायर अकील नोमानी जी की पहल पर आयोजित मुशायरे के एक कार्यक्रम में हम नवाबगंज के ब्लाक-कार्यालय-प्रांगण में जुटे हैं। वसीम बरेलवी साहब के साथ होना और कविता पाठ करना – इन दोहरे प्रफुल्लित करते एहसासों के साथ एक कामयाब मुशायरा पढ़कर हम लोग रात के एक बजे बरेली वापस लौटे हैं। रास्ते भर कविता और शाइरी पर चर्चा होती रही है। इसमें सक्रिय भागीदारी करते भाई पवन कुमार, जो वहाँ के उप जिला मजिस्ट्रेट  तथा एक अच्छे शाइर भी हैं, बीच-बीच में अपनी ताज़ा ग़ज़लों से भी नवाज़ रहे हैं।

फरवरी दो हजार पाँच – बेटी मुनज्जा की शादी का माहौल है। मैरिज-लॉंन, बरेली में साहित्यकारों, प्रकाशकों, पत्रकारों, कवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और दोस्त-अहवाब का मेला सा लगा है। गहमा-गहमी है। मुझे अतिथियों से मिलते हुए वसीम साहब के साथ ही साथ रहना है। दूल्हे मियां का पैतृक निवास गाज़ीपुर में बुजुर्गाकला होने के नाते भी समधी भाई हमारे क़रीबी हैं। आकाशवाणी रामपुर से मुहम्मद मौज़ रामपुरी जी आए हैं। उन्हें कैन्सर की शिकायत है। दवा चल रही है। वे अपने इस दुःख में भी सुखद माहौल का सृजन करते हैं – अपना शेर – मसअला ये भी तो है दुनिया का, कोई अच्छा है तो अच्छा क्यों है सुनाकर दुनियावी चिन्ताओं और वहशीपन को बख़़़ूबी उजागर करते हैं। मशहूर साहित्यकार सुधीर विद्यार्थी के साथ कई वरिष्ठ साहित्यकारों से मुलाक़ात का भी मौक़ा मिला है। शादी के बाद भी समधी जी से बातें-मुलाक़ातें अभी तक जारी हैं।

वसीम साहब के साथ गुज़ारे गये चंद दिनों की यादों में – इज़्ज़तनगर रेलवे अस्पताल में श्रीमती विप्लवी का एक बड़े आपरेशन के लिए लगातार दो-तीन घंटे आपरेशन थियेटर में होना तथा बाहर वसीम साहब के साथ इंतज़ार करते हुए हम लोगों के ज़हनी सदमेमें उनकी सान्त्वना अब तक मौज़ूद है। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावज़ूद उनका यहाँ मौजूद रहना अपने आप में एक रिकार्ड है। उनकी यह आत्मीयता और करुणा कभी भी भुलाई नहीं जा सकती। बाद के दिनों में मेरी लखनऊ पोस्टिंग के दौरान जब वे चारबाग रेलवे स्टेशन पर बने माइक्रोवेव टावर वाले रेस्ट हाउस में अकील नोमानी जी के साथ आकर रुके तो वह भी एक यादगार मुलाकात थी। उस रात हम लोग वसीम साहब के साथ देर रात तक शाइरी पर चर्चा करते रहे तथा इससे जुड़े उनके कई सुझाव तथा संस्मरणों ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया। दूसरे दिन आज़ाद पार्क के कवि सम्मेलन और मुशाइरे में उन्होंने मशहूर शायर शह्रयार, मुनव्वर राना, पापुलर मेरठी आदि से मुलाक़ात कराई। प्रसिद्ध फिल्म उमराव जान की ग़ज़लों के शाइर शह्रयार किसी  परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनके कलाम सुनना और उनके रूबरू होना दोनों ही क़िस्मत की बात है। हाँलाकि इस मुशायरे में पधारे कई अन्य शाइरों से मेरी मुलाक़ात उन्होंने लखनऊ के सरकारी सर्किट हाउस में पहले ही करा दी थी।

दक्षिण पूर्व रेलवे कोलकाता में पदस्थापना के दौरान वसीम साहब को गार्डन रीच -रेलवे कालोनी के ट्रांजिट हाउस में स्वागत करने का मौक़ा मिला। रमजान का महीना चल रहा था। मैं वहाँ अकेला ही रह रहा था। परिवार लखनऊ में था। रोज़े में इफ्तार इत्यादि का जो कुछ मामूली इन्तज़ाम हुआ वे उसी से प्रसन्न थे। हर हाल में संतुष्ट रहने वाले इंसान के साथ जीवन जीने के कई बेशक़ीमती गुर सीखने को मिले। एक वाक्या तब हुआ जब एक दिन हम कलकत्ता के एक पुराने इलाके़ कोल्हुआ-कुम्हारान से गुज़र रहे थे। भीड़ के कारण टैक्सी रुकती-चलतीसरक रही थी। एक अजनबी व्यक्ति हमारी टैक्सी के एकदम सामने आकर शीशे से झाँकता हुआ चिल्ला पड़ा- ‘अरे ! यह तो वसीम बरेलवी साहब हैं।’ पास आकर उसने हाथ बढ़ाकर वसीम साहब के हाथों को लगभग चूमता हुआ आदरपूर्वक उनका अभिवादन किया। ऐसा दृश्य देखकर हम आश्चर्य-मिश्रित खु़शी से लबरेज थे। वास्तव में ऐसी शख़्सियत के मालिक वसीम बरेलवी के साथ हमने इस तरह के वाक्यात कई दफ़े देखे हैं। इसी इलाक़े के एक पुराने बाज़ार में जब हम एक शू-वीयर की दुकान पर थे, दुकानदार ने अपनी जे़हन पर ज़ोर डाला और पहचानते हुए सवाल किया – ‘आप वसीम बरेलवी साहब तो नहीं हैं?’ इफ़्तार का वक़्त हो चला था इसलिए हम लोग जल्दी ही अपनी मेजबान तथा डा॰ कैसर की बहन बेबी के घर पहुंचे।

पुरानी इमारत में पहली मंजिल का पुश्तैनी मकान था जिसके भूतल पर किसी सैम्पू बनाने वालों का कुटीर उद्योग था। बहन बेबी ने बताया कि उनके शौहर के वाल्दैन यहाँ सन उन्नीस सौ पच्चीस से रह रहे हैं। बहरहाल वहाँ आयोजित इफ्तार में हमने तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों का आनन्द लिया। मेरे लिए वेजीटेरियन खाने की अलग व्यवस्था थी। वहाँ के घरेलू वातावरण में ऐसा लगा कि हम बरेली में ही बैठे बातें कर रहे हैं। चलते समय तोहफ़े में दी गई सूखी सेवइयों की याद आज भी हमारे जे़हन में है।

बहन बेबी की आँखों में जो चमक तथा प्रेम मिश्रित ख़ुशी थी उसे लफ़्जों में बयान करना नामुमक़िन है।

कोलकता की उनकी अगली यात्रा यहाँ आयोजित कवि-गोष्ठी के सिलसिले में दो हज़ार सात के सितम्बर महीने में हुई। रमजान के महीने में यूँ भी यात्रा में कई तरह की कठिनाइयाँ होती हैं किन्तु इसके बावजू़द भी उनका रोज़ा बदस्तूर जारी रहता है। बदकिस्मती से उन्तीस सितम्बर को ट्रेन लेट थी जिससे वसीम साहब आ रहे थे। हाबडा स्टेशन प्लेटफार्म पर पहुँचते ही इफ़्तार का वक़्त हो गया। उन्हें लेने आए हुए लोगों में किसी ने भी इस बात का ध्यान नहीं रखा था, नतीज़तन उन्हें पानी पीकर ही रोज़ा तोड़ना पड़ा था। हालाँकि उन्हें लेने आए लोगों में कोलकाता मारवाड़ी युवा मंच के प्रमोद शाह भी स्टेशन पर पहुँचे थे। वसीम साहब के साथ में गीतकार डा. सुरेश भी सपत्नीक पधारे थे। दूसरे दिन का कार्यक्रम कोलकाता भारतीय संस्कृति संसद के तत्वाधान में एक कवि गोष्ठी के रूप में बिड़ला मन्दिर गड़िया हाट के सभागार में आयोजित था। यहाँ जाने से पहले हमलोगों को भारतीय कला परिषद के साल्ट लेक कार्यालय में ले जाया गया था। जहाँ हिन्दी की मासिक पत्रिका वागर्थ का कार्यालय है। वहाँ कुछ वक़्त गुज़ारकर हम लोग गोड़िया हाट के पूर्व निर्धारित गोष्ठी स्थल पर पहुँच गये, जहाँ शायर शीन क़ाफ़ निजाम तथा गीतकार डा. सुरेश पहले से ही मौजूद थे। दो घंटे तक कविता और शाइरी में डूब कर लोगों ने साहित्य का आनन्द लिया। अगले दिन हम एक बार फिर एस्प्लेनेड अर्थात धर्मतल्ला बाज़ार के इलाके़ में मारवाड़ी संगठन द्वारा आयोजित एक अन्य कवि गोष्ठी में मिले। वहाँ भी कोलकाता के आयोजकों तथा श्रोताओं ने एक कामयाब कार्यक्रम का आनन्द उठाया। वसीम साहब उस रात आयोजकों के विशेष अनुरोध पर साल्ट लेक के शाह जी के आवास पर ही ठहरे। अगले दिन उन्हें ट्रेन पर विदा करते हुए हम सब भाव-विह्वल थे।

 

 

 

1 Comment
  1. Yogesh Nath Yadav says

    वसीम बरेलवी एक शानदार शायर।

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