टंट्या भील को समझना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन था

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

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डाबसन और टंट्या भील

एक ब्रिटिश नागरिक, डाबसन ने ब्रिटिश इण्डिया सेना में सात साल की नौकरी के बाद ग्रेट सदर्न रेलवे, छोटापुर में खलासी की नौकरी प्रारंभ की। हाल के समय में मद्रास में भयानक अकाल (1877-78) पड़ा था और रेलवे द्वारा अनाजों को ढोने के काम के चलते कर्मचारियों की भर्ती हो रही थी। डाबसन ने सेना की नौकरी के अंतिम दिनों में भील डाकू सरदार टंट्या का पीछा किया था। उनके अनुसार भीलों का इतिहास, जंगली और घुमक्कड़ कबीलों का था। वे आजीविका हेतु लूटमार करने में उस्ताद माने जाते। ब्रिटिश सरकार उन्हें काबू में रख पाने में सक्षम नहीं हो पा रही थी यद्यपि उसने बहुतायत संख्या में सेना तैनात किया था। सरकार ने विद्रोही भीलों की हत्याएं कीं। टंट्या के नेतृत्व में भीलों का विद्रोह तत्कालीन समय में समस्या बन चुका था। भारी सैन्यबल और मुफस्सिल पुलिस की आम गारद लगाने पर भी कोई खास परिणाम न निकला था। टंट्या के दुस्साहस के कारनामे, हर बार बाल-बाल बच निकलने और मुकम्मल निडरता ने भोलेभाले किसानों के बीच उसकी छवि रॉबिन हुड जैसी बना दी थी। उसके कारनामे, किस्सों और लोकगीतों में छाए हुए थे जिनमें उसका एक मनमोहक जीवन बयान किया जाता था। पीछा करने वालों को चकमा देने की चालाकी या उसे गिरफ्तार करने आए लोगों का जूता, उन्हीं के सर, बजा देने की तिकड़म की अनेक कहानियों का जन्म हुआ था। गाँवों की रैयत मजे ले-लेकर उन कहानियों का बयान करती थी। वह टंट्या भील वीर द्वारा ब्रिटिश राज की ताकत को अंगूठा दिखाने की तरकीबों पर हंस-हंसकर, अपने दुख-दर्द को भूल जाती थी।

संतरी तो रात भर तैनात रहे और डेरे की बाकायदा निगरानी की जाती रही फिर भी कमिंग्स गायब हो चुका था। जब कमिंग्स का कोई सुराग नहीं मिला तब दस्ता वापस लौट आया। छोटापुर में उनके पहुँचने के छः घंटे बाद, एक भयानक नंगा शख्स, जिसके बदन पर कई रंग पुते थे और डिजाइनें बनी हुई थीं, रेल लाइन से एक मील की दूरी पर एक नहर की मोरी में छिपा पाया गया। वह कमिंग्स था। उसके बाद फिर कभी कोई शख्स उसकी मौजूदगी में टंट्या भील के बारे में कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाया।

डाबसन बताते हैं कि टंट्या ने खुद को ‘गरीबों का रक्षक’ घोषित कर रखा था। उसने कसम खा रखी थी कि गरीबों के भले के लिए ही अमीरों का शिकार करेगा यद्यपि अमीर शिकार न मिलने पर वह दूसरों को भी लक्ष्य बना लेता था। टंट्या के अनुयायी दुस्साहसियों में भी बेहतरीन लोग थे जो अच्छा निशाना लगा सकते थे। वे एक चोट में किसी की जान ले सकते थे और गलघोंट फंदे का कुशलता से इस्तेमाल करते थे। वे भारी-भरकम और गठे बदन के, बहुत ही काले और लगभग नंगे रहने वाले लोग थे, जो रात के हमलों के दौरान किसी की पकड़ से फिसल जाने के लिए अपने बदन पर तेल मला करते थे। वे मरने-मारने की परवाह किए बगैर बेरहमी से लड़ते थे। जाने-पहचाने इलाके में, जिसमें कोई काबिले-जिक्र बाधा नहीं होती थी, वे तेजी से आगे बढ़ते थे जिससे उन पर हाथ डालना मुश्किल होता था। भीलों को टंट्या जैसे शख्स का नेतृत्व प्राप्त था जो चालाकी और तिकड़म का उस्ताद था, जो किसी फंदे से एक दूसरा फंदा बिछाकर बच निकलता था और जो किसी जासूस या गद्दार को कोई दूसरा मौका नहीं देता था, यानी एक बार गद्दारी करने पर उन्हें खत्म कर देता था। वह इस कदर भयानक बन चुका था कि उसके दोस्त और  शिकार, दोनों उसे पनाह देने और उसके मंसूबों को परवान चढ़ाने के लिए होड़ लगाते थे। संक्षेप में, टंट्या की इतनी इज्जत थी कि वह सिर्फ देवताओं से ही कम थी।

डाबसन जब छोटापुर पहुँचे तब टंट्या की आन-बान-शान अपने चरम पर थी। अपने मजेदार कारनामों में उसने हाल ही में एक और कारनामा जोड़ा था। सेना की एक टुकड़ी ने टंट्या को घेर लेने का भ्रम पाला था मगर वह चकमा देकर छोटापुर से दस-पंद्रह मील दूर, एक गाँव को लूट लिया था। सेना को गलत खबर मिली थी और टंट्या उनकी पहुँच से पूरे तीस मील दूर था।

यहाँ मि. गर ने एक प्रसंग का उल्लेख किया है। असिस्टेंट लोको सुपरिटेंडेंट कमिंग्स, जो रेलवे वालंटियर्स के स्थानीय दस्ते के उत्साही कप्तान थे, ने फौरन एक छोटे-से पुलिस दस्ते को जमा किया और टंट्या के गिरोह को पकड़ने  की महत्वाकांक्षी मुहिम पर निकल पड़े। आठ घंटे तक उनकी कंपनी तेजी से भूनते-तपते, जंगल से गुजरती रही और चौकन्ने टंट्या से मुड़भेड़ की उम्मीद करती रही। रात हुई तो उन्होंने थके-माँदे, निराशा के साथ डेरा डाल दिया। दिन निकला तो दस्ते ने फिर से टंट्या का पीछा शुरू किया लेकिन दस्ते को यह जानकर हैरानी हुई कि उनका अफसर यानी कमिंग्स गायब था। यह बड़े ही रहस्य की बात थी। संतरी तो रात भर तैनात रहे और डेरे की बाकायदा निगरानी की जाती रही फिर भी कमिंग्स गायब हो चुका था। जब कमिंग्स का कोई सुराग नहीं मिला तब दस्ता वापस लौट आया। छोटापुर में उनके पहुँचने के छः घंटे बाद, एक भयानक नंगा शख्स, जिसके बदन पर कई रंग पुते थे और डिजाइनें बनी हुई थीं, रेल लाइन से एक मील की दूरी पर एक नहर की मोरी में छिपा पाया गया। वह कमिंग्स था। उसके बाद फिर कभी कोई शख्स उसकी मौजूदगी में टंट्या भील के बारे में कुछ बोलने की हिम्मत नहीं कर पाया।

एक दिन मगड़ी (बेंगलुरू से 58 किलोमीटर) से छोटापुर के लिए आठ बजे की वापसी-गाड़ी से डाबसन लौट रहे थे। ट्रेन का ड्राइवर, राइली ने स्टेशन पर ब्रेक वैन से गुजरते किसी को देखा। उसने सोचा, स्वीपर होगा। डाबसन को एक बेलचा कोयला झोंकने और इंजेक्टर खोलने को कहा। तभी उसे लगा कि इंजन की दांडी को किसी ने पकड़ा है। उसे रोशनी में एक चेहरा नजर आया।

ट्रेन रवाना होने के पहले ही, ड्राइवर राइली को स्टेशन मास्टर द्वारा बताया गया था कि पड़ली (सतारा जिले का पहाड़ी क्षेत्र में पड़ने वाला स्थान) के किनारे भीलों ने आठ और नौ डाउन, को लूट लिया है। दो ट्रक भर, बिना ढका अनाज और पांच ट्रक भर अफीम से तैयार माल लूट लिया है।

ट्रेन चल दी थी। अंधेरी रात के ग्यारह बज रहे थे। बेढब, ऊबड़-खाबड़ इलाके से होकर कांखता-कूंखता इंजन आगे बढ़

तफंगों (उनेामजे) की गोलियाँ कड़कीं। कुछ गोलियां इंजन और ब्रेक वैन से भी टकराईं। उसके बाद एक भारी-भरकम काला आदमी कूदकर इंजन की सीढ़ियों पर पहुँचा और एक ही छलांग में डाबसन के सामने आ गया। डाबसन ने उसे एक ही झलक में पहचान लिया। कड़ियल बदन, भारी मगर चुस्त अंगों और लोचदार पुट्ठों, उम्दा हुलिया और अधिकार से सम्पन्न व्यक्तित्व ने बतला दिया कि वह टंट्या भील था।

रहा था। चोटी पर चढ़ने के बाद अगले पंद्रह घंटे तक गाड़ी आसानी से आगे बढ़ती रही। फुटप्लेट पर लाल धधक के सामने खड़ा डाबसन, इंजन की भट्टी में कोयला झोंके जा रहा था। सतपुड़ा पहाड़ियों के बाद खानदेश में प्रवेश कर गयी थी ट्रेन। हरे-भरे मैदान और साफ-सुथरे गाँव आ गए थे जो मिट्टी की मोटी और निकासदार दीवारों से घिरे हुए थे। दूर, एक समृद्ध, अंतहीन दिखाई देने वाला मैदान, भोंडे ढंग से बसा हुआ अंकाई गाँव (सतमाला पहाड़ियों में बसा नासिक जिले का एक स्थान) था जो पिछले जमाने के पिंडारी गिरोहों का ढलानदार, दुर्गम गढ़ था। घंटा दर घंटा गाड़ी बिना रुके दौड़ती रही। चोटी की तलहटी में स्थित ‘वाली’ गाँव आ गया था जहाँ उनको रुकने का सिग्नल दिया गया था। स्टेशन मास्टर ने पास आकर राइली को बताया कि आगे भील लुटेरे हैं। डाबसन कोयला झोंके जा रहा था फिर भी इंजन गति नहीं पकड़ रहा था। थोड़ी दूर चलने के बाद इंजन ठहर गया। भीलों ने पटरी पर तेल पोत रखा था जिससे ट्रेन बढ़ नहीं पा रही थी। थोड़ी देर बाद पहियों ने फिर जकड़ बनाई और गाड़ी बहुत कम रफ्तार से चलनी शुरू हुई। सामने की काली पहाड़ी पर काले साये (भील) तेजी से और खामोश डोल रहे थे, और उनसे भी ऊपर, दूसरे लोग जमा थे कि गाड़ी पास से गुजरे तो उस पर टूट पड़े। इंजन फिर घरघराया और ठीक उसी पल इंजन की छत से होता एक बड़ा पत्थर, धम और छन की आवाज के साथ डाबसन के पैर के पास आकर गिरा। राइली को लगा कि अब हम मारे जाएंगे। तभी डाबसन ने पत्थर को फुटप्लेट से हटाकर नीचे गिरा दिया। वह सोचने लगा कि कहीं टंट्या भील तो उनके बीच नहीं है? गाड़ी अब रेंगती हुई आगे बढ़ रही थी। पीछे की तरफ खुले डब्बों पर काले साये (भील) पहले ही चढ़ चुके थे और गेहूँ के बोरे लाइन की दूसरी तरफ फेंके जा रहे थे। डाबसन ने ड्राइवर को बताया कि, ‘जब वह सेना में था, एक बार टंट्या को देखा है। पहाड़ियों के पार, दूर के एक गाँव की गुमटी में उसे देखा था। सेना को पता चला कि  टंट्या वहीं छिपा हुआ है। जवानों की आधी कंपनी से कहा गया कि एक-एक झोंपड़े की और हर छिपने वाली जगह की हर मुमकिन तलाशी लें। मैं और ब्लैक मैकाफ्री, रेजीमेंट का सबसे बड़ा पियक्कड़ और सबसे बुरा लड़ाकू, एक झोंपड़े को खंगाल रहे थे। हमने एक बूढ़े, बहुत बूढ़े आदमी को एक गंदे कंबल में लिपटा और एक कोने में सिमटा पाया गोया कि वह मरने के करीब हो। मैकाफ्री ने उसका झोंटा पकड़ लिया और उसे अंधेरे और बदबू से बाहर खींचकर दिन की रोशनी में ले आया। वह टंट्या था। हम दोनों हैरान रह गए। सबसे ज्यादा मैकाफ्री हैरान हुआ क्योंकि वह चीखता रहा और नीचे की ओर अपने लंबे चाकू के एक ही वार से टंट्या ने उसे जहन्नुम रवाना कर दिया। पेट ऐसा साफ किया, गोया बारीकी से काटा गया हिरन हो। मैं दौड़कर वहाँ पहुँचूं, इससे पहले ही टंट्या यह जा, वह जा।’

इस घटना को सुन, राइली का चेहरा पीला पड़ चुका था। वह भीलों को माल गिराने में व्यस्त देख रहा था। उसी क्षण तफंगों (उनेामजे) की गोलियाँ कड़कीं। कुछ गोलियां इंजन और ब्रेक वैन से भी टकराईं। उसके बाद एक भारी-भरकम काला आदमी कूदकर इंजन की सीढ़ियों पर पहुँचा और एक ही छलांग में डाबसन के सामने आ गया। डाबसन ने उसे एक ही झलक में पहचान लिया। कड़ियल बदन, भारी मगर चुस्त अंगों और लोचदार पुट्ठों, उम्दा हुलिया और अधिकार से सम्पन्न व्यक्तित्व ने बतला दिया कि वह टंट्या भील था।

दोनों एक-दूसरे को खड़े-खड़े घूरते रहे, जब तक कि मौत का खेल, खेलने के लिए तैयार डाबसन ने लपककर बेलचा उठाकर टंट्या पर हमला नहीं कर दिया। उसके बाद तो जो कुछ हुआ, उसके लिए न तो डाबसन तैयार रहा होगा न कोई और। हमले से बचकर टंट्या ने खुद को नीचे गिरा दिया और गिड़गिड़ाते हुए रहम की भीख माँगने लगा। उसने कहा ‘मारो मत, साहब, मैं आपके आगे हथियार डाल रहा हूँ और महारानी की शरण में दिए जाने की गुजारिश करता हूँ। हमारे अपने लोगों ने मुझे गैंग से बाहर निकाल दिया है। मेरे गैंग वाले मेरे खून के प्यासे हो गये हैं। सरकार से मुझे इंसाफ और रहम की उम्मीद है। अपने लोगों से नमकहरामी और कत्ल के अलावा कोई उम्मीद नहीं। बख्स दो हमको! देखो मुझको, बिना हथियार के आपकी कैद में हूँ। हाथ जोड़ता हूँ, गाड़ी मत रोकना, नहीं तो मेरे गैंग वाले मुझको पकड़ लेंगे। मुझसे बताया गया है कि टंट्या को जिंदा पकड़ने पर भारी इनाम रखा गया है।’

डाबसन ने इनाम के बारे में सोचा और उसकी आंखें चमक उठीं। टंट्या को जिंदा पकड़ने पर सरकार ने 30,000 रुपये का इनाम रखा था, और उसकी लाश पर इसके आधे का। टंट्या को हाकिमों के हवाले करने पर पैसा मिलता, शोहरत भी मिलती, और शायद आराम की कोई नौकरी भी। यह तो तय था कि वह डाकू सरदार पस्त हो चुका था। उसके अपने बयान के मुताबिक, उसके अनुयायियों ने उससे बगावत कर दी थी। उनके कातिल हाथों से बचने के लिए टंट्या की बदहवास कोशिश से पहले गोलियों का जो तूफान उठा था, उसे डाबसन ने सुना था। उसे लगा कि खेल खत्म हो चुका है और टंट्या का सितारा डूब रहा है। डाबसन ऐसा शख्स था जो डर से अनजान था और उसने अपनी जिंदगी के इस सबसे सुनहरे मौके को फौरन लपक लिया। बेहद डरावना चेहरा लेकर डाबसन हाथ में बेलचा लिए आगे बढ़ा और अपने चित्त पड़े कैदी पर पांव रखकर खड़ा हो गया।

डाबसन ने राइली से कहा कि सिगनल की परवाह न करे। टंट्या ज्यादा अहम है मगर राइली ने उसकी मूर्खतापूर्ण बात न मानी और गाड़ी रोक दी। तभी मुड़कर डाबसन ने देखा कि टंट्या फरार हो चुका था। साथ ही साथ डाबसन का कोट जो वहाँ लटका हुआ था और उसमें चाँदी की एक घड़ी भी थी, जिसे डाबसन ने महज पंद्रह दिन पहले 75 रुपये में खरीदा था, वह गायब था।

डाबसन ने टूटी-फूटी देसी भाषा में कहा, ‘मैं तुम्हारी जिंदगी बख्श दूंगा बशर्ते यहाँ चुप बैठो और कोई बदमाशी न करो। जरा भी हरकत की तो मेरे हाथों मारे जाओगे और अगर कूदने की कोशिश की तो तय है कि चलती गाड़ी के पहियों के नीचे पिस जाओगे।’

टंट्या कोयले के ढेर के पास उकड़ूं बैठ गया, सर झुकाकर बाहों पर टिका लिया और एकदम बेजान मूरत बन गया। डाबसन ने एक आंख अपने काम पर रखी और एक अपने शिकार पर। वह मन ही मन सोच रहा था कि एक झटके में तीस हजार मिल जाएंगे।

छोटापुर पहुँचने में अब सिर्फ एक घंटे का सफर बाकी था, लेकिन डाबसन ने इतनी रफ्तार कायम रखी कि गाड़ी बीस मिनट पहले ही पहुँच जाए। इस यात्रा के दौरान टंट्या ने एक उंगली भी नहीं हिलाई और कुछ समय से डाबसन को उसकी स्थिर सांसों से ऐसा लगने लगा था कि वह सो चुका है।

उसे तब बहुत खुंदक हुई जब उसने देखा कि छोटापुर का बाहरी सिग्नल उसे रोक रहा था। वह सोच रहा था कि गाड़ी रुकी तो टंट्या हाथ से निकल जाएगा। डाबसन ने राइली से कहा कि सिगनल की परवाह न करे। टंट्या ज्यादा अहम है मगर राइली ने उसकी मूर्खतापूर्ण बात न मानी और गाड़ी रोक दी। तभी मुड़कर डाबसन ने देखा कि टंट्या फरार हो चुका था। साथ ही साथ डाबसन का कोट जो वहाँ लटका हुआ था और उसमें चाँदी की एक घड़ी भी थी, जिसे डाबसन ने महज पंद्रह दिन पहले 75 रुपये में खरीदा था, वह गायब था।

डाबसन जब स्टेशन पहुँचा तो पाया कि पंद्रह मिनट बाद एक्सप्रेस गाड़ी से कुछ भील पकड़कर लाये गये थे। उन्हें सुबह, पड़ली नदी-तट के सिरे पर गिरफ्तार किया गया था और अब जेल भेजा जा रहा है।

(प्रस्तत प्रसंग ‘टंट्या भीलः द ग्रेट मूनलाइटर ऑफ इण्डिया, नामक पुस्तक का अंश है जो शीघ्र ही हिन्दयुग्म से प्रकाशित हो रहा है। इस प्रसंग को पहली बार आस्ट्रेलियाई अखबार, लीडर (मेलबर्न, विक्टोरिया) ने शनिवार, 5 मई 1906 को प्रकाशित किया गया था। एक भारतीय डाकू के खिलाफ साहस के कारनामे शीर्षक से प्रकाशित, सात किस्तों में विभिन्न्न  प्रसंगों को प्रकाशित किया गया था। शेष किस्तों को उक्त पुस्तक में पढ़ा जा सकता है।)

सुभाष चन्द्र कुशवाहा जाने-माने कथाकार और इतिहासकार हैं।

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