Sunday, April 14, 2024
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गलवान में झंडा-झंडा(डायरी 5 जनवरी, 2022) 

पत्रकारिता के अनुभवों में जो एक अनुभव शामिल नहीं है, वह ‘युद्ध पत्रकारिता’ है। मैंने आपदाओं की रिपोर्टिंग की है, सरकारों के बनने-बिगड़ने की रिपोर्टिंग की है और क्राइम और नाटक आदि के बारे में भी लिखा है। लेकिन वार रिपोर्टिंग का न तो मौका मिला है और ना ही पहले कभी चाव था। दरअसल, […]

पत्रकारिता के अनुभवों में जो एक अनुभव शामिल नहीं है, वह ‘युद्ध पत्रकारिता’ है। मैंने आपदाओं की रिपोर्टिंग की है, सरकारों के बनने-बिगड़ने की रिपोर्टिंग की है और क्राइम और नाटक आदि के बारे में भी लिखा है। लेकिन वार रिपोर्टिंग का न तो मौका मिला है और ना ही पहले कभी चाव था। दरअसल, युद्ध को लेकर मेरे मन में खूब सारे सवाल भी उठते थे। लगता था जैसे युद्ध भी एक इवेंट की तरह होते हैं, जिन्हें स्पांसर किया जाता है। अब यह अलग बात है कि युद्ध में जवान मारे जाते हैं। फिर चाहे वे किसी भी देश के ही क्यों न हों और युद्ध से कोई समस्या का समाधान होता है, इसका बेहतर उदाहरण नहीं मिलता।

खैर, वार रिपोर्टिंग करनेवाले पत्रकारों को देखा है। उनकी रपटें भी पढ़ी हैं। न्यूज चैनलों के ऊपर विश्वास न तो पहले था और ना ही अब है। वह कब क्या दिखा देंगे और क्या छिपा लेंगे, पता ही नहीं चलता। परंतु, एक बात तो है कि वार रिपोर्टिंग होती बहुत जबरदस्त है। यह इसके बावजूद कि अपकी खबरें निष्पक्ष नहीं होतीं। सामान्य तौर पर सेना स्वयं से जुड़ी खबरों पर निगाह रखती है।

[bs-quote quote=”इसमें एक खबर है- ‘गलवान में भारतीय सेना के नए साल के जश्न की तस्वीरें सामने आईं।’ यह बेहद दिलचस्प खबर है। खबर को जिस अंदाज में लिखा गया है, उससे वार रिपोर्टिंग के जायके का अनुमान लगा सकते हैं। खबर की पहली ही पंक्ति है– ‘सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों ने मंगलवार को नए साल के जश्न के हिस्से के रूप में पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी में एक बड़ा तिरंगा पकड़े भारतीय सेना के जवानों की तस्वीरें जारी की।'” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मेरे एक परिचित पत्रकार हैं। एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि उन्होंने वार रिपोर्टिंग का प्रशिक्षण लिया हुआ है। मैंने पूछा कि यह प्रशिक्षण आपको दिया किसने तो उन्होंने कहा कि इंडियन आर्मी के द्वारा खास तरह का वर्कशॉप चलाया जाता है। इस दौरान पत्रकारों को सेना के अधिकारी बताते हैं कि वार रिपोर्टिंग कैसे की जाती है। हालांकि मैं अपने परिचित का जवाब सुनकर हंसा– अधिकारी सिखाते हैं पत्रकारों को पत्रकारिता, यह तो बेहद दिलचस्प है।

मेरी बात समझने के बाद मेरे वह परिचित भड़क गए। खैर, उनका भड़कना अपनी जगह वाजिब है।

मैं तो आज दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता को देख रहा हूं। इसमें एक खबर है- ‘गलवान में भारतीय सेना के नए साल के जश्न की तस्वीरें सामने आईं।’ यह बेहद दिलचस्प खबर है। खबर को जिस अंदाज में लिखा गया है, उससे वार रिपोर्टिंग के जायके का अनुमान लगा सकते हैं। खबर की पहली ही पंक्ति है– ‘सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों ने मंगलवार को नए साल के जश्न के हिस्से के रूप में पूर्वी लद्दाख में गलवान घाटी में एक बड़ा तिरंगा पकड़े भारतीय सेना के जवानों की तस्वीरें जारी की।’

मतलब यह कि उक्त तस्वीर को किसने जारी किया है, उसकी जानकारी आपको खबर में नहीं मिलेगी। मुमकिन है कि यह तस्वीर भारतीय सेना ने ही जारी किया हो, लेकिन खबर में इस बात का उल्लेख नहीं है। इसके पहले एक जनवरी, 2022 को चीन की पीएलए (चीन की सेना को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी कहते हैं) ने एक तस्वीर जारी की थी। उसमें यह दिखाया गया था कि पीएलए के जवानों ने गलवान में भारतीय सीमा में चीनी झंडा फहराया था। इसे लेकर भारतीय सेना पर भी सवाल उठे और भारत सरकार पर भी। लोगों ने कहा कि वर्तमान भारत सरकार अपनी सरहदों की सुरक्षा करने में नाकाम रही है।

अब इसका जवाब तथाकथित रूप से भारतीय सेना द्वारा दिया गया है और वह भी तीन दिनों के बाद। यह अटपटा सा नहीं लगता है आज के जमाने में जबकि सूचना क्रांति का युग है? एक तरह की सफाई देने की कोशिश के माफिक।

खैर, जनसत्ता द्वारा प्रकाशित खबर है बेजोड़। इसे यदि हास्य रस की चाशनी में डूबोया हुआ कोई अति स्वादिष्ट मिठाई कहें तो अतिश्योक्ति नहीं।

फिलहाल तो मैं अपनी एक कविता को पढ़ रहा हूं, जो मेरी जेहन में कल रात ही आई-

सच कहना अपराध नहीं है
सच सुनना अपराध नहीं है
सच लिखना अपराध नहीं है
सच पढ़ना अपराध नहीं है।

लेकिन सच क्या है
इसे ग्रंथों में मत खोजो
या फिर किसी के मरने पर
जो तुम कोरस स्वर में गाते हो– राम नाम सत्य है,
वह भी सच नहीं है।

सच वह है जो सामने है
सच वह है जिसे साजिशन छिपाया गया है
सच वह है जो तुम्हारे पास है
सच वह है जो हमारे पास है।

सच कोई बेबीलोन का ठूंठ पेड़ नहीं है
या फिर मिस्र के पिरामिडों में
किसी राजा के साथ
दफन कोई स्वर्णाभूषण नहीं है सच।

सच कहने के लिए
अपनी मां की योनि के बदले
ब्रह्मा के मुंह से पैदा लेने की जरूरत नहीं
सच कहने के लिए
बस चाहिए इतना कि
तुम सच कहो।

सच कहना देशद्रोह नहीं है
अगर है तो
वह देश-देश नहीं
कोई बाजार है।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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