भील विद्रोह की ऐतिहासिक घटनाओं की बिखरी कड़ियों को जोड़ता महत्वपूर्ण दस्तावेज़

विद्या भूषण रावत

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भारत में इतिहासकारों के खिलाफ प्रमुख आरोपों में से एक स्वतंत्रता संग्राम में हाशिए के लोगों की भूमिका की उपेक्षा और जानबूझकर हाशिये से बाहर करना है। अक्सर हमें ‘बताया‘ किया जाता था कि स्वतंत्रता आंदोलन के कुछ नायक‘ और कुछ खलनायक‘ थे और फिर इतिहास‘ की राजनीतिक लड़ाई‘ लड़ने वाले इतिहासकार थे जो अपने-अपने तरीकों से इसकी व्याख्या कर रहे थे और दिलचस्प बात यह है कि वे सभी एक ही खित्ते के हैं। दोनों में से किसी ने भी वास्तव में इस बात की परवाह नहीं की कि भारत जैसे विशाल देश का इतिहास या ऐतिहासिक आंकड़ों को प्रस्तुत करने का अलग-अलग दृष्टिकोण हो सकता है। इतिहास दरअसल घटनाओं के बारे में जानकारी देता है न कि हम व्यक्तिगत रूप से क्या पसंद  या नापसंद करते हैं। तथ्य यह है कि इतिहास वर्तमान में हमारे भविष्य‘ को तय करने के लिए सबसे शक्तिशाली हथियार बन गया है। किसका इतिहास‘ सबसे प्रामाणिक है और किसका डुप्लीकेट हैइसके बारे में दावे और जवाबी दावे हैं, लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतिहासकारों की नज़र से दलितों-आदिवासियों के संघर्ष गायब क्यों हो गए? दूसरा यह कि हम दलितों-आदिवासियों के इतिहास को जानने के लिए बने-बनाए खाँचे या चश्मे का ही क्यों देखते हैं? क्यों उनकी स्वायत्तता को स्वीकार नहीं कर पाते? स्वयं उन्हें ही उनकी बातों और इतिहास को टटोलने की आज़ादी क्यों नहीं? इससे भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या इतिहास सिर्फ एक पक्ष या अन्य के दस्तावेज़ पर आधारित हो सकता है? क्योंकि हम जानते हैं कि दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया तो अंग्रेजों ने शुरू की तो फिर अंग्रेजों से पहले क्या हमारा इतिहास नहीं था?  यदि था तो उसकी जानकारी कैसे लें? मुझे लगता है कि दलित-आदिवासी इतिहास- कथाओं को समझने के लिएलोक-कथाएँ और जीवंत कहानियां भी  महत्वपूर्ण उपकरण बन जाते हैं।

जहां तक हाशिये पर पड़े लोगों के ुद्दे का सवाल है, उसकी जानकारी और दस्तावेज़ीकरण के मामले में सुभाष चंद्र कुशवाहा इतिहास के एक अत्यंत महत्वपूर्ण अन्वेषक के रूप में उभरे हैं। वह उन सभी के लिए एक अति आवश्यक दस्तावेज़ लेकर आए हैं जो भील जनजाति के संघर्षो के इतिहास पर आगे अध्ययन करने के इच्छुक हैं। उनकी पुस्तक भील विद्रोह : संघर्ष के सवा सौ साल हिंद युग्म  द्वारा हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस किताब में उनके 125 साल के इतिहास का वर्णन किया गया है। उनके दस्तावेज़ीकरण का एक बड़ा हिस्सा भारत के साथ-साथ विदेशों में भी विभिन्न अभिलेखागारों में ऐतिहासिक दस्तावेजों के रूप में सुरक्षित है। इस किताब में सुभाष ने 1800 से 1925 के बीच की अवधि को कवर किया हैइनमें ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्रों के साथ-साथ विभिन्न अभिलेखागार में उपलब्ध विभिन्न दस्तावेजों या अखबारों में प्रकाशित ख़बरों और दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया है। ऐसा नहीं है कि इससे पहले भीलों का इतिहास अस्तित्वमें नहीं रहा हैलेकिन इस किताब के तथ्यों में एक ऐतिहासिक सच्चाई है। इसमें आपको उस अवधि से संबंधित दस्तावेज़ीकरण मिल जाएगा। आपको यह अभिलेखागार में नहीं मिल सकता हैलेकिन लोककथाओं में मिल सकता है। उन स्थानों पर जाकर लोगों से बात करने यहां तक कि पुराने स्मारकोंसंरचनाओं, पारंपरिक गीतों, उत्सवों, स्थानीय कहानियों और मुहावरों इत्यादि में इसका मौलिक स्रोत मिलेगा। दलितों और आदिवासियों को  इतिहास की तथाकथित मुख्यधारा के इतिहास लेखन परियोजनाओं से बाहर कर दिया गया है। इस बात की ओट लेकर ऐसा किया गया है कि इंका मौलिक दस्तावेज़’ या डाटा उपलब्ध नहीं हैं। सुभाष चंद्र कुशवाहा ने बिखरे हुये बिंदुओं को जोड़ने का बहुत श्रमसाध्य कार्य किया है। नए इतिहासकारों को इस पर आगे अधिक अन्वेषण करना चाहिए। उन स्थानों और लोगों तक पहुंचकर और मजबूती से किया जाना चाहिए जो इस इतिहास की विषयवस्तु हैं। यानी भील समुदाय के बुजुर्गों, उन क्षेत्रों जहाँ क्रांति या विद्रोह हुए, पुराने राज परिवारों के दस्तावेजों, ऐतिहासिक इमारतों आदि का सर्वेक्षण-अन्वेषण कर जो आदिवासी पक्ष को और मजबूती दे जिन्हें मुख्यधारा इतिहासकारों ने अपने ‘शोध में स्थान नहीं दिया। 

सुभाष बताते हैं कि भील हमारी पदानुक्रमित जाति व्यवस्था के शिकार रहे हैं और अंग्रेजों के आने से पहले राजपूतों के राजसी कुलों द्वारा भीलों के साथ  क्रूरता बरती गयी और उनका अपराधीकरण किया गया। भील खानदेश के साथ-साथ मध्य भारत के मालिक थेलेकिन राजपूत आक्रमणकारियों‘ द्वारा उन्हें जंगल में धकेल दिया गया थाहालांकि कैप्टन ई बार्न्स और थॉमस एमिली यंग द्वारा द जर्नल ऑफ सोसाइटी ऑफ आर्ट‘ में फरवरी  8 , 1907  को लिखे गए एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेख को पढ़ने से पता चलता है कि 1550 तक झाबुआ अकबर द्वारा राजपूतों को दिया गया एक भील साम्राज्य था। पूरा लेख व्यापक रूप से वर्णनात्मक है जो दर्शाता है कि कैसे अंग्रेजों ने समुदायों को समझने के लिए डाटा का उपयोग किया थालेकिन उनके काम में केवल डाटा के अलावा और भी बहुत कुछ था। 1931 की जनगणना, जो जाति के आधार पर की गई थीअंग्रेजों की विद्वता का पर्याप्त उदाहरण देती है और जाति और जातीयता सहित विभिन्न कोणों के माध्यम से भारत की विविधता को समझने का प्रयास करती है। बार्न्स कहते हैं कि पेशवाई ब्राह्मणों और मराठों ने भीलों के साथ बहुत अधिक क्रूरता दिखाई जिसके कारण खानदेश और गुजरात-बॉम्बे प्रेसीडेंसी में भील विद्रोह बढ़ा। वह राजपुताना में मराठा अत्याचार की बात रखते है।

सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कालानुक्रमिक रूप से कथा को बुना है और वे हमें उन क्षेत्रों को समझने में मदद करते हैं जहां भील रहते थे।  खानदेश और भीलों पर एक पूरा अध्यायजहां मुगलों और साथ ही मराठों ने भीलों को नियंत्रित करने के लिए लड़ाई लड़ी। 1798 में पेशवा के रूप में बाजीराव के आरोहण के साथखानदेश ने विभिन्न भील जागीरदारों के पतन को देखा और बाद में अराजकता बढ़ी। यह बताया गया है कि पेशवा सबसे क्रूर शासक बने रहे जिन्होंने वास्तव में भीलों का अपराधीकरण किया। उतने ही क्रूर मराठा भी थे। भील राजपूत संबंधों की चर्चा पुस्तक में अच्छी तरह से की गई हैलेकिन यह भी स्वीकार किया जाता है कि भीलों का भिलाला‘ समुदाय राजपूत पुरुषों और भील महिलाओं के बीच संबंधों से उत्पन्न हुआ या इसके विपरीत। भिलाला अपने वंश के कारण खुद को दूसरों से श्रेष्ठ मानते थे लेकिन अन्य भील ऐसा नहीं सोचते।

अंग्रेजों ने महसूस किया कि पश्चिमी भारत के ब्राह्मण शासकों ने क्रूरता के कारण भीलों का अपराधीकरण कर दिया जिसके फलस्वरूप पूरे क्षेत्र में अराजकता फ़ैल गयी। इस पुस्तक में भील-भूमि में अराजकता की कहानी को बहुत अच्छी तरह से वर्णित किया गया है। 1818 तकअराजकता अपने चरम पर थी जब अंग्रेजों ने खानदेश पर नियंत्रण कर लिया और  उन्हें पांच हजार से अधिक सैनिकों के साथ 80 कुख्यात गिरोहों (ये मेरे शब्द नहीं बल्कि पुस्तक के अनुसार) का सामना करना पड़ा। अंग्रेज यह अच्छी तरह से जानते थे कि खानदेश में अराजकता को नियंत्रित करना मुश्किल होगा जब तक कि भीलों को विश्वास में नहीं लिया जाता। उन्होंने महसूस किया था कि भील क्षेत्रों में अराजकता मूल रूप से पेशवाओं और मराठों द्वारा शुरू की गई अपराधीकरण प्रक्रिया के कारण हैइसलिए अंग्रेजों ने पुनर्ग्रहण की नीति‘ पर ध्यान केंद्रित कियान कि विनाश की नीति पर, जैसा कि पिछले शासन के दौरान था। अप्रैल 1827 तक खानदेश भील कॉर्प का जन्म हुआ क्योंकि इस क्षेत्र में शांति बहाल हो गई थी। श्री कुशवाहा ने इस अध्याय मध्य भारत के भीलों के खिलाफ अंग्रेजों की नीति में विस्तार से उदाहरण दिया है कि इस क्षेत्र में लूटपाट और डकैती आदि कैसे शुरू हुई थी। यह समझना भी  महत्वपूर्ण है कि अंग्रेजों को लगा कि भील उनके लिए उपयोगी हो सकते हैं क्योंकि वे बहादुर और वफादार थे।

 खानदेश और मध्य भारत में भील विद्रोहअध्याय अत्यंत जानकारीपूर्ण है क्योंकि यह भीलों के लुटेरों और विद्रोहियों के गिरोह में बदलने के कारणों का विश्लेषण करता है।भील इसलिए विद्रोह करने को तत्पर रहते थे क्योंकि पुराने राज्यों ने उन्हें बड़े पैमाने पर सूखे और अकाल के समय में लावारिस छोड़ दिया थाजिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे और सहायता के अभाव में वे मजबूर थे। भील अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति और शोषण के कारण विद्रोही हो रहे थे। अकाल में वे अपनी मौत देख रहे थे फिर भी सम्मानपूर्वक मारे गए कभी हारे नहीं। 1823 मेंखानदेश से भेजे गए 232 में से 172 भील कैदियों की यात्रा के दौरान मृत्यु हो गईजो उनके प्रति पुलिस के व्यवहार को दर्शाता है।

भील विद्रोह

पहला भील विद्रोह 1804 में पेशवाओं के खिलाफ हुआ था। जैसा कि पहले भी उल्लेख किया गया है कि वे भीलों को क्रूर और अपराधी बना रहे थे। अंग्रेजों के सत्ता में आने से पहले भीलों ने स्थानीय सरदारों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जातिवादी राजाओं और महाराजाओं ने  उनका  शोषण किया और भीलों ने उनका जमकर विरोध किया। पुस्तक में नादिर सिंह भील (1802-1820), गुमानी नायक (1819-1820), चील नायकदशरथ (1820) और कानिया विद्रोहहिरिया भील, (1822) और भारी भील (1824) जैसे महत्वपूर्ण नायकों का दस्तावेज है। मुल्हेर (नासिकमहाराष्ट्र) की 1825 की ऐतिहासिक लड़ाई से लेकर 1846 में कुंवर जीवा वसावा तक की कई अन्य कहानियां हैंजो यह भी बताती हैं कि कैसे अंग्रेजों ने भीलों को धार्मिक आधार पर विभाजित करने की कोशिश की क्योंकि मुस्लिम भील स्वभाव से अधिक आक्रामक और विद्रोही थे।

लेकिन भारत में आदिवासी विद्रोह की पहचान करने के लिए दो महत्वपूर्ण बातों को समझने की जरूरत है और यह भी कि अंग्रेजों के मन में वास्तव में उनके लिए सॉफ्ट कॉर्नर क्यों था? पहली बात तो यह कि आदिवासी अपनी जमीन को बाहरी लोगों से बचाने के लिए लड़ रहे थे और उनके लिए चाहे वह भारतीय बाहरी हों या अंग्रेज इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। हालाँकिअंग्रेज भी उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना चाहते थे। भारत में आदिवासियों ने अपनी जीवन शैली और प्राकृतिक संस्कृति को बदलने के किसी भी प्रयास के खिलाफ हमेशा विद्रोह किया है। अंग्रेज वन संसाधनों का दोहन करना चाहते थे और अपने नागरिकता के एजेंडे‘ को हर जगह आगे बढ़ाना चाहते थे। लोगों और संसाधनों की पहचान करने के उद्देश्य से जनगणना कार्य शुरू किया गया ताकि सब कुछ प्रलेखित हो। 1852 मेंजलगांव क्षेत्र में भूमि सर्वेक्षण का आदेश दिया गया था क्योंकि ईस्ट इंडिया कंपनी अपने नए राजस्व मॉडल के माध्यम से आगे बढ़ना चाहती थी। वन उनके लिए आय पैदा करने वाला या राजस्व पैदा करने वाला मॉडल था। स्थानीय संसाधनों के शोषण के खिलाफ 1853 और 1858 में अंग्रेजों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विद्रोह हुआ था। इसमें एक दिलचस्प बात यह है कि शेष भारत भी ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विद्रोह कर रहा था लेकिन उन लोगों द्वारा हमेशा आदिवासियों और दलितों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता था जो अंग्रेजों से भेदभाव का दुखड़ा रो रहे थे। यही विडंबना थी कि दलितों और आदिवासियों के बीच शुरुआती गुस्सा और विद्रोह मुख्य रूप से उन सामंतों के खिलाफ था जो उनका शोषण कर रहे थे और उनके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार कर रहे थे। सुभाष चंद्र कुशवाहा इस पहलू को अपनी दो महत्वपूर्ण कृतियों चौरी चौरा विद्रोह और स्वतंत्रता आंदोलन और अवध किसान विद्रोह में पहले ही ला चुके हैं, और साथ ही इतिहास का दूसरा पक्ष देते हैं जिसे इतिहासकारों द्वारा उपेक्षित किया गया है। ये सभी आंदोलन गांधी और कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रवादी युद्ध के नारे में थम गएजिसने उन्हें आत्मसात कर लिया और पूरे मुद्दे को ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ाई के रूप में बदल दिया। स्थानीय सामंती शोषण और जातिवादी संस्कृति की उपेक्षा करना गांधी के आंदोलन की सबसे बड़ी कमी थी। हालांकि उन्होंने जाति व्यवस्था पर हमला किए बिना प्रतीकात्मक रूप से अस्पृश्यता‘ के मुद्दे को संबोधित करने की कोशिश कीजिसने इसे पूरी तरह प्रहसन बना दिया।

पुस्तक का दूसरा भाग राजपूतानारेवकांता और माही कांता एजेंसी पर केंद्रित है जो हमें राजपूताना के राजपूतों और भीलों के विश्लेषण के साथ क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के बारे में जानकारी देता है। राजपूतों और भीलों के बीच जटिल संबंध थे।  शायद इतिहासकार इस मुद्दे पर विशेष रूप से राजस्थान में आगे काम कर सकते हैं जहां राजपूत अपनी ऐतिहासिक विरासत के बारे में विशेष रूप से ध्यान रखते हैं और महाराणा प्रताप का एक अत्यंत उदार शासक और भीलों के मित्र के रूप में उल्लेख करते हैं। रेवकांता गुजरात में एक एजेंसी थी और बॉम्बे प्रेसीडेंसी में माही कांता जहां  बड़ी संख्या में भील रहते थे और भील जागीरदारों के खिलाफ कार्रवाई की ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विद्रोह करते थे। 1820 में सैन्य कार्रवाई को शायद ही कोई सफलता मिली और दिसंबर 1823 तक ही कुछ हद तक विद्रोह को रोकने में सक्षम हो पाए।

1804 में बड़ौदा भील विद्रोह से शुरू होने वाले राजपुतानारेवाकांता और माही कांता भील विद्रोह के प्रतीक या नायकों पर एक अलग अध्याय है। जग्गा रावत (1817-1830) उन नायकों में से पहला विद्रोही था जिन्होंने राजपूत राजाओं की अधीनता को खारिज कर दिया और 27 फरवरी 1826 को  गिरफ्तार कर लिया गया। वह 1830 तक कैद रखा गया था।एक और दिलचस्प दस्तावेज़ दल्लादेवाओंकार रावत और अनूपजी भील के नेतृत्व में बांसवाड़ा विद्रोह (1872-1875) है। इसमें बेहतर तरीके से समझाया गया है कि 1868 में बांसवाड़ा राज्य और अंग्रेजी के बीच हुए समझौते को भीलों को दबाने और उन क्षेत्रों में प्राकृतिक रिजर्व का दोहन करने का अधिकार मिला। 1881 के मेवाड़ भील विद्रोह का एक संक्षिप्त लेकिन दिलचस्प विवरण भी हैलेकिन 1913 में डूंगरपुर प्रांत के मानगढ़ टेकरी में गोविंद गुरु की वीरतापूर्ण लड़ाई का विस्तार से वर्णन किया गया है और कैसे अंग्रेजों ने अंततः इस क्षेत्र में भीलों को बेअसर कर दिया। यह स्पष्ट था कि भील शोषण के खिलाफ विद्रोह कर रहे थे और दास श्रम करने से इनकार कर रहे थे। शराब के साथ ही शाकाहारएकाधिकार और दहेज के खिलाफ अभियान चलाया गया।

टांट्या भील

पुस्तक के तीसरे भाग मेंतांत्या भील का रेखाचित्र से परिपूर्ण एक जीवनी दी गई हैजिसे विदेशी मीडिया द्वारा द ग्रेट इंडियन मूनलाइटर के रूप में संदर्भित किया गया था। वह एक ही साथ एक विद्रोही और सबसे क्रूर व्यक्ति भी था।  उसकी छवि रॉबिन हुड की थी क्योंकि वह गरीबों के लिए मसीहा था। लेकिन पुलिस मुखबिरों, गद्दार साथियों और स्वयं को पकड़ने की घात लगाए अंग्रेज़ अफसरों के लिए साक्षात काल था। 1842 में जन्मे टांट्या ने बचपन से ही शोषण देखा क्योंकि उसकी पुश्तैनी संपत्ति को स्थानीय सामंत द्वारा अवैध रूप से जब्त कर लिया गया था। उसकी देखभाल करने वाले को टांट्या ने मार डाला था। उसे 1873 में गिरफ्तार किया गया और एक साल की कैद हुई। टांट्या ने शोषकों के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखी और कई बार जेल के अंदर और बाहर रहा। 1878 से 1888 तक टांट्या के खिलाफ डकैती के 400 से अधिक मामले थे लेकिन वह कभी पकड़ा नहीं गया। पुलिस हमेशा उसके रिश्तेदारों और परिवार के अन्य सदस्यों को परेशान करती थी। टांट्या अंत में 11 अगस्त, 1889 को गिरफ्तार किया गया था । 4 और 19 अक्टूबर, 1889 को जबलपुर में सत्र न्यायाधीश लिंडसे नील ने उसे मौत की सजा सुनाई गई थी। 4 दिसंबर, 1889 टांट्या भील को  जेल के अन्दर  फांसी पर लटका दिया गया था। यद्यपि इस पुस्तक में टांट्या भील पर एक बड़ा अध्याय है लेकिन सुभाष चंद्र कुशवाहा उस पर एक अलग पुस्तक लिख रहे हैं।

टांट्या भील जो मध्य प्रदेश में टांट्या नायक के रूप में विख्यात है

भारत में भील विद्रोह के इतिहास को समझने के लिए यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण हैहालांकि मैं कहना चाहूंगा कि यह आनेवाली पीढ़ियों के लिए विस्तार से जानने के लिए एक प्रस्थान बिंदु है। यह पुस्तक उन लोगों के संघर्षों को समझने का  प्रयास है जिन्हें जानबूझकर इतिहास के पन्नों से गायब कर दिया गया। इस पुस्तक से नए शोधकर्ताओं को नए विचार ओर परिकल्पनाएं मिल सकती हैं जिन पर वे आगे शोध कर सकते हैं, खासकर उन स्थानों और लोगों से मिलकर विभिन्न कड़ियों को जोड़ सकते हैं जो ‘दस्तावेजों’ के अभाव होने के नाम पर इतिहास में दर्ज़ नहीं हो पायी हैं। चूंकि इस पुस्तक के अधिकांश दस्तावेज़ या संदर्भ विभिन्न अभिलेखागार या अंतर्राष्ट्रीय मीडिया से निकलते हैंइसलिए जरूरी है कि इसका एक आदिवासी पक्ष भी होना चाहिए।  और यह पता लगाने के लिए कि इनमें से कुछ स्थानों का दौरा करना और क्षेत्र के मौखिक इतिहास का दस्तावेज़ीकरण करना अच्छा होगा। इससे हमें, विशेष रूप से ब्रिटिश काल से पहले और साथ ही उस अवधि के दौरान कथा का दूसरा‘ पक्ष मिल सकता है। सुभाष चंद्र कुशवाहा इन मुद्दों पर पिछले कई सालों से लगन और स्वेच्छा से काम कर रहे हैं। यह उनका उत्साह और वैचारिक निष्ठा ही है जिसके कारण उन्हें विभिन्न अभिलेखागारों और पुस्तकालयों में बिखरी बातों के दस्तावेजीकरण का यह अत्यंत कठिन कार्य करने की प्रेरणा मिली। विश्वविद्यालयों और संस्थानों के शोधकर्ताओं को अब इसको आगे बढ़ाते हुये आदिवासी इतिहास की तह तक जाना चाहिए ताकि इसको उचित सम्मान मिल सके। झारखण्ड के विषय में यह काम कुमार सुरेश सिंह ने किया जिन्होंने बिरसा मुंडा और उनके आन्दोलन का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया। भील और अन्य समुदायों पर कार्य को आगे बढाते हुए हमें इस मिशन में  निष्ठापूर्वक लगने की जरूरत है। काम कठिन इसलिए है क्योंकि सत्ताधारियो की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है और स्वैच्छिक तौर पर यह काम वैचारिक रूप से मज़बूत लोग ही कर सकते हैं। इस पुस्तक की सफलता इसी बात में निहित है कि यह हमें तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने और आदिवासी समुदायों और उनसे जुड़े विद्वानों को आगे ऐसे शोध में लगने के लिए प्रेरित करेगी। ताकि वे इसमें अपनी उन हकीकतों को ला सके जिनका दस्तावेजीकरण आधिकारिक रूप से भले नहीं हुआ होगा लेकिन वे आदिवासियों के गीत, गायन, कहानियों आदि में मौजूद हैं। 

सुभाष चन्द्र कुशवाहा को एक और महत्वपूर्ण कार्य के लिए पुनः शुभकामनाएँ और यह उम्मीद कि वे ऐसे ही सवालों को उठाते रहेंगे और नए इतिहासिकारों के लिए बड़ी चुनौती बनें।  हमें जनोपयोगी और शोधपरक साहित्य उपलब्ध हो। 

 भील विद्रोह : संघर्ष के सवा सौ साल – सुभाष चंद्र कुशवाहा, प्रकाशक: हिंद युग्म, पृष्ठ: 352, कीमत: 249 रुपये 

vidhya vhushan

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    भील विद्रोह के महत्वपूर्ण किंतु गुमनाम नायकों तथा अत्याचारी निरंकुश राजाओं/सामंतों सहित ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ विद्रोह और संघर्ष करने वाले जनजाति वर्ग के लाखों वीर सपूतों के बलिदान और योगदान को मुख्य धारा के तथाकथित आधुनिक इतिहासकारों ने या तो पूरी तरह से उपेक्षा की है अथवा जिक्र भी किया है तो एक – दो पैराग्राफों/पृष्ठों में ही सतही तौर पर निपटा दिया है। किंतु सुभाषचंद्र कुशवाहा जी ने अपनी गहन शोधवृत्ति, लगन, तमाम अभिलेखागारों एवं पुस्तकालयों से अंग्रेजी /अन्य भाषाओं में उपलब्ध किंतु बिखरे हुए प्रमाणिक दस्तावेजों, स्थानीय इतिहास और वहां के लोकगीतों आदि में वर्णित कथ्यों का अध्ययन कर वास्तविक और यथार्थपरक इतिहास और उसके सच्चे नायकों के कृतित्व को अपनी इस किताब के माध्यम से सामने लाने का अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। उनका यह उपक्रम उनकी स्पष्ट वैचारिकी, हद दर्जे की लगन, देश समाज के वंचित समुदायों/जनजातियों के हितों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का वह उदाहरण है जिसकी हिंदी बेल्ट में आज के दौर में मिसाल मिलना दुर्लभ बात है। इस अनुकरणीय एवं महत्वपूर्ण कार्य के लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम होगी।
    विद्या भूषण रावत ने इस किताब की गहन, विस्तृत और पठनीय समीक्षा प्रस्तुत की है। उन्होंने पुस्तक के सभी अध्यायों के मूल कथ्योंं को संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए निष्कर्षों पर सटीक टिप्पणियां और सार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने इतिहास लेखन की अब तक चली आ रही प्रविधियों की सीमाओं और एकांगिता पर कड़े किंतु वाजिब सवाल उठाए हैं। उनका यह प्रश्न बिलकुल सटीक है कि हमारा इतिहास मूलतः उन घटनाओं/नायकों पर केंद्रित है जो मुख्य रूप से सत्ता द्वारा दर्ज किए गए दस्तावेजों पर ही आश्रित है और समाज के तथाकथित उच्च वर्ग से ताल्लुक रखता है। इसमें अनुसूचित जातियों और जनजातियों के करोड़ों मूल निवासियों का इतिहास लगभग अनुपस्थित है। इसी को सामने लाने का कार्य सुभाषचंद्र कुशवाहा जैसे धुन के पक्के किंतु गिने चुने अध्येता अपने श्रम एवं सीमित संसाधनों से कर रहे हैं। विद्या भूषण रावत जी का यह कथन भी बिल्कुल वाजिब है कि भारत के सही इतिहास/गुमनाम किए गए नायकों और समुदायों के वास्तविक इतिहास को सामने लाने के लिए किए गए सुभाष चंद्र कुशवाहा के ये अभिनव कार्य प्रस्थान बिंदु समान है। अब और कई लेखकों/विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं आदि को इसे आगे ले जाने का कार्य करना चाहिए ताकि हमारी नई पीढ़ी देश के सही इतिहास से परिचित हो सके।

    समग्र रूप से कहा जा सकता है कि भील विद्रोह के इतिहास पर सुभाष चंद्र कुशवाहा जी की यह अनूठी किताब है। विद्या भूषण रावत जी ने इस किताब की बहुत बढ़िया और विवेचनापूर्ण समीक्षा प्रस्तुत की है। इस स्तुत्य कार्य के लिए लेखक के साथ साथ समीक्षक भी बधाई के हकदार हैं।

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