हम मांग करते हैं कि सक्षम अधिकारी कानून लागू करें, उसे मार डालें और अल्लाह के कानून के अनुरूप दफना दें

ईशनिंदा कानून में मौत की सज़ा पाये ब्लॉगर मोहम्मद शेख मखैतिर से विद्या भूषण रावत की बातचीत

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मोहम्मद शेख मखैतिर

मोहम्मद चेख मखैतिर (भारतीय उच्चारण शेख महातिर) इस्लामिक देश मॉरिटानिया के रहने वाले एक अछूत समुदाय से वास्ता रखते हैं। मॉरिटानिया एक इस्लामिक गणराज्य है, जो भौगोलिक रूप से पश्चिमी अफ्रीका का एक हिस्सा है। एक समय में यह देश फ्रांस का उपनिवेश था। इस समय इस मुल्क की कुल आबादी पचास लाख के आसपास है। फ्रांस के उपनिवेश के दौरान यहाँ धर्मनिरपेक्ष कानूनों को विकसित होने का मौका मिला। इस मुल्क की एक खूबी यह भी है कि यह एक तरफ अटलांटिक महासागर तो दूसरी तरफ से पश्चिमी सहारा, अल्जीरिया, माली और सेनेगल से घिरा हुआ है। बहरहाल यह दुनिया का 28वाँ बड़ा देश है। इसका भौगोलिक विस्तार बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे भारत के पड़ोसी देशों से अधिक है।

मॉरिटानिया को आधिकारिक तौर पर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ मॉरिटानिया के रूप में जाना जाता है। यह मुल्क 1960 में फ्रांस से स्वतंत्र हो गया। मगर इस पर सैन्य तानाशाहों का नियंत्रण रहा। अपनी स्वतंत्रता की प्रारंभिक अवधि में, इस मुल्क के संस्थापक राष्ट्रपति मुख़्तार औलदददा ने यहाँ एकल राजनीतिक परिपार्टी को लागू और मजबूत किया, जिसका बाद के दिनों विरोध हुआ। सन 1978 में एक सैन्य तानाशाह तख्तापलट कर दिया गया। मॉरिटानिया के वर्तमान संविधान को 1991 में अपनाया गया और इस्लाम को राज्य-धर्म घोषित कर दिया गया। इसके साथ- साथ यह प्रावधान किया गया कि यहाँ का राष्ट्रपति सिर्फ मुसलमान ही बन सकता है। इतना ही नहीं, अप्रैल 2018 में यहाँ की राष्ट्रीय संसद ने ईशनिंदा के लिए ‘मृत्युदंड’  देने वाले कानून पारित कर दिया।

मॉरिटानिया मूल रूप से एक इस्लामी देश है जहाँ श्वेत नस्ल के मूर लोग इस देश की राजनीति और समाज पर हावी हैं। दूसरे इस्लामी समाजों की तरह, यहाँ भी मुसलमानों को दूसरे धर्म में परिवर्तित होने की अनुमति नहीं है, क्योंकि इसे ‘धर्मत्याग’ का कार्य माना जाता है, जो संगीन अपराध है। इसकी गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी सजा मृत्युदंड है। मॉरिटानिया इस्लाम के अलावा किसी अन्य धर्म के प्रचार-प्रसार की अनुमति नहीं देता है।

इस देश का कानून भले ही इस्लाम है, मगर मॉरिटानिया की ख्याति इस समय ‘गुलामी’ का सबसे बड़े गढ़ के रूप में है। यहाँ कई तरह की विचित्रताएं एक साथ मिलती हैं। मसलन कानूनी रूप से 1981 में इस मुल्क में दासता का अंत हो चुका है। इतना ही नहीं सन 2007 से दासता को अपराध घोषित कर दिया गया है। लेकिन कागज पर चाहे जो कानून बनाया गया हो असलियत यह है कि स्वतंत्र रिपोर्टों के अनुसार इस देश में अभी भी नब्बे हजार से अधिक दास हैं। हालाँकि मॉरिटानिया में गुलामी के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है लेकिन ‘छुआछूत’ और ‘जातिगत भेदभाव’ जैसे अमानवीय मुद्दों के बारे कुछ ज्यादा जानकारी बाहर नहीं आ पाती है।

कौन हैं शेख मखैतिर

मुखर अभिव्यक्ति के लिए जाने जाते हैं मोहम्मद शेख मखैतिर

शेख महातिर एक मॉरितेनियाई ब्लॉगर हैं। उनका जन्म 1983 में हुआ है। उन्होंने 2009 में अर्थशास्त्र में परास्नातक किया। अछूत समुदाय से आने के कारण उन्हें कई यातनाओं का सामना करना पड़ा। वे मुखर अभिव्यक्ति के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने सन 2013 में अपने फेसबुक पोस्ट पर इस्लाम पर कई आलोचनात्मक लेख लिखा। उनका लेख धर्म, धार्मिकता और शिल्पकारों की बेदखली (Religion, Religiosity and Craftsmen) कुछ दूसरे वेबसाइटों पर भी प्रकाशित हुआ, जिसके लिए उन्हें 2 जनवरी सन  2014 को गिरफ्तार कर लिया गया और नौआदिबौ जेल में रखा गया।

खबरों के अनुसार,  सन 2013 में  मखैतिर ने एक स्थानीय समाचार की वेबसाइट पर एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें मॉरिटानिया के कारीगरों के हाशिए पर ढकेले जाने पर दुख जताया गया और बताया गया था इस तरह की बेदखली धार्मिक कारणों से हो रही है। श्री मखैतिर ने मॉरिटानिया में कुछ समूहों के व्यवहार की तुलना पैगंबर मोहम्मद से की और बताया कि यह व्यवहार उसी तरह का हानिकारक व्यवहार है जिस तरह के व्यवहार से हज़रत मोहम्मद के समय में अल्पसंख्यक वर्ग कथित तौर पर हाशिए पर चला गया था।

अंतरराष्ट्रीय आक्रोश के बावजूद मॉरिटानिया सरकार ने ‘धर्मत्याग’ और ‘निन्दा’ के लिए ‘मृत्युदंड’ सुनिश्चित करने के लिए कानून में संशोधन किया। इस दंड संहिता के अनुच्छेद 306 में यह प्रावधान किया गया है कि धर्मत्याग या ईशनिंदा के दोषी किसी भी मुस्लिम को पश्चाताप के आधार पर क्षमादान की संभावना होने के बावजूद बिना गिरफ्तारी के मौत की सजा दी जाएगी। संशोधन के पूर्व भी इस कानून में धर्मत्याग और ईशनिंदा के लिए मौत की सजा मुकर्रर की गई थी लेकिन पश्चाताप के मामलों में जेल की सजा की जरूरी थी। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय की ओर से इस कानून की निंदा की गई और इसको निरस्त करने का आह्वान किया गया।

लिंक देखें :

https://www.ohchr.org/EN/NewsEvents/Pages/DisplayNews.aspx?NewsID=23186&LangID=E

कपड़े में सिलाई-बुनाई का काम

23 दिसंबर सन  2014 को मखैतिर को एक स्थानीय अदालत ने ‘कथित’ ईशनिंदा के लिए मौत की सजा सुनाई। 24 अप्रैल 2016 तक मौत की सजा को बरकरार रखा गया। हालाँकि उस मुल्क में 1987 से किसी को भी मृत्युदंड नहीं दिया गया है, फिर भी धार्मिक नेता, विशेष रूप से इमामों और मौलवियों द्वारा सरकार पर मखैतिर को फांसी देने का लगातार दबाव डाला जाता रहा। समाचार एजेंसी रॉयटर की रिपोर्ट के अनुसार 13 नवंबर 2014 को इमामों और उलेमाओं के हवाले से यह मांग की गई – ‘हम मांग करते हैं कि सक्षम अधिकारी कानून लागू करें, उसे मार डालें और उसे अल्लाह के कानून के अनुरूप दफना दें।’ लेकिन लंदन स्थित संगठन ह्यूमनिस्ट इंटरनेशनल ने उनकी बिना शर्त रिहाई के लिए अभियान चलाया और जिनेवा में मानवाधिकार परिषद में एक अपील पेश किया। ह्यूमनिस्ट इंटरनेशनल की वेबसाइट के अनुसार, ‘ह्यूमनिस्ट्स इंटरनेशनल की ओर से इस मामले पर अक्सर निगरानी रखी गई और अभियान चलाया गया। अपील में कहा गया है कि वह इस सज़ा-ए-मौत की निंदा करता है। जिनेवा के मानवाधिकार आयोग ने मौत की इस सज़ा का लगातार विरोध और आलोचना किया।

यह मामला आयोगों की प्राथमिकता में शामिल था। उसकी कहानी ‘ह्यूमनिस्ट्स इंटरनेशनल फ्रीडम ऑफ थॉट’ रिपोर्ट में चित्रित की गई। इतना ही नहीं, आयोग मॉरिटानिया पर दबाव डालने के लिए बैक चैनल के प्रयासों का भी इस्तेमाल करता रहा । नवंबर 2018 में आयोग गैर-सरकारी संगठनों के एक गठबंधन में शामिल हो गया। यह गठबंधन मखैतिर की रिहाई की मांग कर रहा था।

हैरानी की बात यह है कि 9 नवंबर, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सज़ा को पलटते हुए उसे दो साल के जेल की सज़ा में बदल दिया। जेल से रिहा होने के दिन, उसका सैन्य बल द्वारा अपहरण कर लिया गया। मखैतिर दो साल तक अपहृत रहे। 27 अप्रैल  2018 को इस कानून को और भी ज्यादा सख्त कर दिया गया। अब ईशनिंदा और धर्मत्याग वाले मामलों में बिना पश्चाताप का मौका दिए मौत का प्रावधान कर दिया गया।

आश्चर्य की सारी सीमाओं को धता बताते हुए मखैतिर को 29 जुलाई  2019 को रिहा किया गया और बड़े नाटकीय ढंग से सेनेगल भेज दिया गया। वह आखिरकार 3 अगस्त 2019 को फ्रांस पहुंचे। ऐसा नहीं था कि उनकी मुक्ति अपने आप हो गई। उनका कहना है कि यह अंतरराष्ट्रीय दबाव था, जिससे सरकार को उन्हें रिहा करने और उन्हें फ्रांस जाने की अनुमति देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस दबाव के अंतर्गत उन्हें तुरंत आवश्यक वीजा प्रदान किया था। मॉरिटानिया के सुरक्षा बलों ने सुनिश्चित किया कि वह एक दिन के लिए भी मॉरिटानिया में न रहें। इसी कारण उन्हें आनन-फानन में फ्रांस के लिए रवाना कर दिया गया।

मोहम्मद शेख मखैतिर अब फ्रांस में रह रहे हैं लेकिन उनका परिवार गहरे संकट में जी रहा है। उनके पिता ने सब कुछ खो दिया और परिवार पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया। उस मुल्क में नागरिक अधिकार वाले संगठन भी डर के कारण इस तरह का मुद्दा नहीं उठाते हैं।

हमने केवल भारत और दक्षिण एशिया में ही सोचा था

मेरे साथ एक साक्षात्कार में मोहम्मद शेख मखैतिर ने कहा कि पश्चिमी दुनिया में गुलामी और नस्लवाद के बारे में पर्याप्त समझ है, फिर भी वे इस बात से अनजान हैं कि अफ्रीका में अस्पृश्यता और जाति व्यवस्था मौजूद है उन्होंने कहा कि मॉरिटानिया में अछूतों और दास वर्गों की स्थिति अत्यंत कठिन है। दुर्भाग्य  यह है कि इस तरह की परिस्थितियाँ पश्चिमी गोरों के कारण नहीं पैदा हुई हैं। बल्कि इन कठिन हालात के जिम्मेदार सह-धार्मिक  श्वेत अरब के लोग हैं। सितम यह है इस पूरे वाकये के लिए केवल धर्म जिम्मेदार नहीं है। धर्म के साथ-साथ जातीय पहचान भी इस शोषण में योगदान करती है। कमोबेश ऐसी ही स्थिति भारतीय उपमहाद्वीप में भी है, जहाँ धर्म से अधिक शक्तिशाली जाति की पहचान है। इस उदाहरण से यह निष्कर्ष निकलता है कि जैसे-जैसे दुनिया भर में नस्लवाद, जातिवाद और गुलामी के मलबे का पर्दाफाश होता जाएगा, वैसे-वैसे धर्म के इर्द-गिर्द चक्करघिन्नी करने वाली मर्यादाएं और विमर्श अर्थहीन हो जाएंगे। दुनिया के हर कोने में धर्म ने इस प्रकार की गंदगियों की पहरेदारी की है और कर रहा है। धर्म और सामाजिक गंदगियों की यह जुगलबंदी भारत के ब्राह्मणवादी अभिजात वर्ग, यूरोप, अमेरीका के श्वेत प्रभु वर्ग और अफ्रीका के अभिजात मुस्लिम वर्ग में खूब फल-फूल रही है।  इसलिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की मर्यादा और हर जगह लागू करने की आवश्यकता है ताकि अतीत के बदसूरत अवशेष स्थायी रूप से दफन हो जाएं।

मोहम्मद शेख मखैतिर को उनकी ‘कथित’ ईशनिंदा वाली टिप्पणी के कारण ‘मृत्युदंड’  की सज़ा मिली है।  वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के दबाव से मौत की सजा से तो बच गए, मगर बेवतनी का दंश झेल रहे हैं। मखैतिर फ्रांस में कहीं रह रहे हैं। वह अपने वतन मॉरिटानिया नहीं लौट सकते, क्योंकि उनके वतन के इस्लामिक कट्टर मौलवी उन्हें मारना चाहते हैं। मोहम्मद अछूत समुदाय से हैं जिनकी स्थिति गुलामों से भी बदतर है। आधिकारिक तौर पर दासता को समाप्त करने के बावजूद, मॉरिटानिया उन सबसे बड़े देशों में से एक है, जहाँ अभी भी दासता मौजूद है।

प्रस्तुत है साक्षात्कार

मॉरिटानिया में छुआछूत गुलामी से भी बुरी है   

आपने हाल ही में मॉरिटानिया में दासता और जातिगत भेदभाव की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में अपना पक्ष रखा। आपने अपनी प्रस्तुति में दिखाया है कि मॉरिटानिया उन देशों में शुमार होता है जहां मानवाधिकार रक्षकों को ईशनिंदा और धर्मत्याग को कानून के तहत गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना करना पड़ता है। जेल में उनकी क्या स्थिति है? क्या उन कैदियों को उनके परिवार का समर्थन मिलता है या वे भी सामाजिक रूप से अलग-थलग हैं?

अंतरात्मा के आवाज़ सुनने वाले मानवाधिकार के रक्षक और गुलामी के विरोधी मॉरिटानिया की जेलों में दुखद परिस्थितियों में रहते हैं। यह सितम यहीं नहीं ठहरता। उन कैदियों को सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ता है। उनके परिवार वाले भी उनका साथ न देने के लिए अभिशप्त हैं। वहाँ के कठमुल्लों का मानना है कि जो परिवार ईशनिंदा या धर्मत्याग वाले काफ़िरों का साथ निभाते हैं या उनसे रब्त-जब्त रखते हैं, वे सभी परिवार अविश्वसनीय और अल्लाह के प्रति गैर-वफादार हैं। ऐसे परिवारों का सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से बहिष्कार करना चाहिए। मैंने संयुक्त राष्ट्र के सामने यह जिक्र किया कि तमाम बंदियों में से एक को जब रिहा कर दिया गया, तो उसने खुद को अलग-थलग और बिना काम के पाया।  वह प्राथमिक स्कूल में शिक्षक के रूप में काम कर रहा था, लेकिन मौलवियों ने सरकार पर दबाव डाला कि उसे सरकारी सेवा से अलग कर दिया जाए, क्योंकि उनका मानना था कि धर्मनिरपेक्ष सोच रखने वाला कोई भी व्यक्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए खतरा है और उसे शैक्षिक संगठन का हिस्सा नहीं होना चाहिए।

आपको कथित ईशनिंदा और धर्मत्याग के लिए मॉरिटानिया में छह साल की जेल का सामना करना पड़ा है। क्या आप हमें बता सकते हैं कि आपने क्या लिखा जिसके लिए आपको गिरफ्तार किया गया था?

सन 2013 के अंत में, मैंने मॉरिटानिया में दासता और सामाजिक वर्ग पर एक लेख लिखा था। चूंकि मॉरिटानिया की शासन प्रणाली इस्लाम पर आधारित है। वहाँ के कानूनों का स्रोत इस्लामी शरिया है। मैंने अपने लेख में मॉरिटानिया में दासता की उत्पत्ति की बात को उजागर किया था। और यह बताया था कि दासता का इस्लाम धर्म के साथ घनिष्ठ संबंध है। मैंने इसके मुतालिक कई उदाहरण प्रस्तुत किए। इनमें से अधिकांश उदाहरण पैगंबर मुहम्मद के युग और उनके द्वारा लागू की जाने वाली कुछ प्रथाओं से लिए गए थे। लेख के बाद उलेमा और वहाँ की पुरानी व्यवस्था ने लेख को अमानवीयता और पैगंबर मुहम्मद की न्याय व्यवस्था की छवि को खराब रूप में प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। परिणामस्वरूप, मुझ पर ईशनिंदा का आरोप लगाया गया और मुझे जेल में डाल दिया गया। मुझे मौत की सज़ा सुनाई गई। मौलवियों द्वारा मेरी पत्नी को तलाक देने का फरमान सुनाया गया और जबरन उसकी शादी किसी अन्य व्यक्ति से कर दी गई।

आप पर क्या आरोप थे और आपको कब गिरफ्तार किया गया?

मुझ पर धर्मत्याग और ईशनिंदा का आरोप लगाया गया। और इस आरोप में मुझे दो जनवरी 2014 को जेल भेज दिया गया।

आप कैसे रिहा हुए? जेल में आपके साथ कैसा व्यवहार किया गया? क्या आपको प्रताड़ित किया गया ?

सन 2019 के अंत में मुझे रिहा कर दिया गया। यह रिहाई छह साल एकांत कारावास में बिताने के बाद मिली थी। जेल की स्थिति बहुत कठोर थी। आप इसी से अनुमान लगा लें कि कभी-कभी बिना स्नान के सात महीने निकल जाते थे। वहाँ भयानक मनोवैज्ञानिक दबाव था। मैं गिरफ्तारी के एक साल बाद भी परिवार से मिलने का हकदार नहीं था।

हमारे पाठकों को समझाएं कि इस्लामी कानून के तहत ईशनिन्दा और धर्मत्याग का क्या अर्थ है?

इस्लामी कानून में धर्मत्याग का सीधा-सा मतलब है कि एक व्यक्ति इस्लाम धर्म से अपने प्रस्थान या अलग होने की घोषणा करता है। ईशनिंदा का दूसरा अर्थ है। इसके अंतर्गत धर्म और धर्म के प्रतीकों की आलोचना करना, एक दर्शन को त्यागना और दूसरे दर्शन को अपनाना शामिल है। इस तरह के कृत्य इस्लामी कानून में अस्वीकार्य हैं। इसका सीधा-सा अर्थ है कि ज़िहाद और गुलामी जैसे इस्लामी दृष्टिकोणों से इनकार किया जा रहा है। या जो निर्धारित किया गया है उससे बाहर जाकर महिला अधिकारों की मांग की जा रही है। इनकार और मांग के ये दोनों तरीके इस्लाम धर्म के त्याग की कोटि में आते हैं। इनके लिए मांग अधिकार इस्लामी कानून, और दो शर्तें एक परिणाम साझा करती हैं, जो इस्लाम का परित्याग है।

हमने सुना है कि मॉरिटानिया में गुलामी प्रथा व्यवहार में है। कृपया बताएं कि यह कैसे काम करती है। वहाँ किस प्रकार की गुलामी है? साथ ही यह भी बताएं कि कौन मालिक है और कौन गुलाम। मॉरिटानिया में कितने लोग गुलामके रूप में सेवा करते हैं?

मॉरिटानिया में गुलामी प्राचीन प्रथा है जो इस्लाम के प्रवेश के बाद से शुरू हुई। ज़िहाद अभियानों के दौरान बने कैदी इस्लामी कानूनों के अनुसार गुलाम माने जाते हैं, जैसा कि ‘आईएसआईएस’ अभियानों के बाद यज़ीदियों के साथ हुआ था। वैसा मॉरिटानिया में हुआ। इस्लामिक ज़िहाद की सेना द्वारा बनाए गए गुलाम गुलामी में जीते रहे। उनके बाद उनके बच्चों पर गुलामी का जुआ डाल दिया गया। सरिया कानून में गुलामी की विरासत का प्रावधान है। इसलिए वहाँ आज भी गुलामी जारी है।

गुलामों के ‘मालिक’ अरब मूल के गोरे हैं, और गुलाम अफ्रीकी या बर्बर मूल के काले और भूरे हैं। दासों के प्रतिशत पर कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है क्योंकि सरकार ऐसा कोई सर्वे नहीं करती है। हालांकि, मोटे तौर पर कुछ आंकड़े हैं। वॉक फ्री संगठन द्वारा घोषित किए गए ऑकड़ों के अनुसार, अनुमान लगाया गया कि दासों का अनुपात आबादी का 10% से 20% के बीच होगा।

मैंने आपके देश में ह्वाइट मूर और ब्लैक मूर के बारे में भी सुना है। ये शर्तें क्या हैं और किससे संबंधित हैं?

‘मौर / मूर’ मॉरिटानिया से संबंधित हैं। हम मॉरिटानिया के अरबों को ‘मौर-ब्लैक’ कहते हैं, और ‘मौर-नोइर’ का उपयोग अफ़्रीकी मॉरिटानियाई लोगों के लिए करते हैं।

भारत के संदर्भ में हम मानते हैं कि जाति व्यवस्था एक तरह की खोज है। हमारे मुल्क में यह एक ऐसी खोज है, जो एक समुदाय को जन्म के आधार आभासी दासता की बेड़ियों में जकड़ लेती है। और दूसरी जाति विशेष को जन्म के आधार पर अधिकारसंपन्न बनाती है। भारत में चार वर्ण हैं। सारे वर्णों को वर्ण व्यवस्था के अनुसार आचरण करना पड़ता है। आप बताएं कि मॉरिटानिया में जाति व्यवस्था कैसे काम करती है। वहाँ कितनी जातियाँ हैं ? क्या वे अधिकारों में एक समान हैं या उनमें भारत की तरह ‘क्रमिक असमानता’ की मौजूद है?

मॉरिटानिया में तीन जातियां हैं। पहली और प्रभु वर्गों की जाति है ‘बेडेन’। दूसरी जाति  हैं ‘हैराटिन’। यह दासों की जाति है। और तीसरी जाति है  ‘मालमाइन’। मालमाइन अछूत वर्ग की जाति है। मैं इसी तीसरी ज़मात वाली जाति से हूँ। हमारे यहाँ धार्मिक और सामाजिक मानक के आधार पर क्रमिक असमानता की स्थिति व्यवहार में है।

मॉरिटानिया में ‘भूमि’ और ‘संसाधन’ का मालिक कौन है? भूमिहीन समुदाय कौन लोग शामिल हैं?

मॉरिटानिया में भूमि पर स्वामित्य प्रभु वर्ग अर्थात बेडेन की है। हॉ कुछ पूर्व दास जमीन के बहुत छोटे हिस्से के मालिक हैं। जहाँ तक “मालमाइन/अछूत” वर्ग की बात है, तो  उनके पास कुछ भी नहीं है।

हमने सुना है कि पूरी दुनियॉ में कहीं भी इस्लामी समाज भेदभाव नहीं करता है। इस समाज में जाति व्यवस्था नहीं है, लेकिन आपका देश हमें एक अलग तस्वीर देता है। क्या आप हमें बता सकते हैं कि समुदायों को उनकी ‘जातियों’ के आधार पर किस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है ?

देखिए वर्ग इस्लामी धर्म के केंद्र में है। कुरान की कई आयतें इसकी पुष्टि करती हैं। इतना ही नहीं, इस संदर्भ में पैगंबर की कई हदीसें हैं, जिन्हें मैं अच्छी तरह से जानता हूं। हालांकि कई मौलवी और उलेमा इसे नकारने की कोशिश करते हैं। आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस्लामी व्यवस्था समाज को तीन वर्गों में बाँटती है, जिनमें से पहला स्वामी का है, दूसरा ‘मावली’ का वर्ग है और उसके बाद दासों का वर्ग आता है। मॉरिटानिया ने अपने सामाजिक/धार्मिक व्यवस्था में तीन बुनियादी परतों का निर्माण किया है। इन संदर्भों का मैंने पिछले प्रश्न में उल्लेख किया है। वह बँटवारा इस प्रकार है –

1- बेडेन = प्रभु वर्ग, 2- हैराटिन = गुलाम और 3- मालमाइन = अछूत

हमारे यहाँ जो ‘मालमाइन’ जाति है उसका निकटतम उदाहरण भारत में दलित जाति है। हालांकि दोनों में कई अंतर भी हैं।इस मामले में यह भी कहना है कि मालमाइन की नियति बहिष्कृत और वंचित रहना है।  आप देखते होंगे कि दुनिया की गुलाम कौमें जब एक बार मुक्त हो जाती हैं, तो मान लिया जाता है कि सारी समस्याओं का अंत हो गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस तरह की मुक्ति के प्रवचन खूब सुनाई पड़ने लगते हैं। जहां तक ​​अछूत वर्गों का सवाल है, तो उनकी हकीकत और भी कड़वी है, क्योंकि अछूतों के बारे में जो चर्चा होती है, उसे ज्यादातर मानवाधिकार मंचों पर सुनाने और पहुँचाने वाला कोई नहीं मिलता।

आपके देश में छुआछूत की प्रथा है? इसका व्यवहार कैसे किया जाता है? ‘अछूत’ कौन हैं और उनका ‘व्यवसाय’ अर्थात उनका काम क्या है ?

लकड़ी का कार्य करते हुए

अछूतों को जिस तरह वंचित किया जाता है, उसके कई रूप हैं, जिनमें सबसे प्रमुख और पहला धार्मिक प्रकृति का है। इस प्रकार की वंचनाएं धार्मिक कहानियों से स्थापित हो पाती हैं। यह कहानियाँ पुनरुत्थान से संबंधित रहती हैं। इन कहानियों में वंचितों की शिक्षा आदि को लेकर प्रावधान नहीं रहता। यदि कोई इन कहानियों का विरोध करे, तो उस पर धार्मिक अवमानना का आरोप लग सकता है, जिसकी कोई सुनवाई अदालत में भी नहीं हो पाती है।

मॉरिटानिया के अछूत वर्ग को बहुत सीमित काम करने की अनुमति है। जिन कार्यों की अनुमति है, उनमें प्रमुख हैं – लोहार का कार्य, बढ़ईगीरी और सामाजिक रूप से हीन माने जाने वाले कुछ दूसरे तरह के काम। हमारे यहाँ मालमाइन का अर्थ भी बताया गया है। हमारे यहाँ यह मान्यता है कि जो लोग सेवा करने  का काम करते हैं, वे मालमाइन हैं। हमारे मुल्क में मालमाइन लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता है। इन चुटकलों में हमें नीच, पाखंडी और झूठा बताया जाता है। हमारे यहाँ प्रभु वर्ग के लोग सुबह-सुबह हमारे मालमाइन लोगों का मुँह नहीं देखना चाहते, क्योंकि प्रभु-वर्ग में मान्यता है कि मालमाइन लोगों का मुँह देखना अशुभ है।

क्या आपने कभी एक व्यक्ति के रूप में ‘अस्पृश्यता’, जातिगत भेदभाव या नस्लीय भेदभाव का सामना किया है? यदि हां, तो कृपया हमारे साथ साझा करें और आपने इसका सामना कैसे किया यह भी बताएं।

मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे कई मान्यताओं और रूढ़ियों से पीड़ित रहा हूँ। इन मान्यताओं के आधार पर हमें वंचित रखा जाता है। और हमारे साथ असमानता और अन्याय किया जाता है। मैंने मॉरिटानिया में जो किया, वह कार्य चाहे जितना महत्वपूर्ण था, मगर मेरा दावा प्रभु वर्ग वाले पदों पर कभी नहीं हो सका। मेरी सारी योग्यताएं और उपलब्धियाँ उनके सामने हमेशा बौनी और बेमानी रहीं। मैं अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर होने के बावजूद प्रभु-वर्ग के सामने दोयम दर्जे का रहा और समझा गया, क्योंकि सामाजिक रूप से मैं उनसे बहुत पीछे था। मैंने पिछले प्रश्न के उत्तर में कुछ बुरे अनुभवों को साझा किया है। मुझे इस बात का भी दुख है कि मानवाधिकार संगठन भी इस दिशा में अक्सर बोलना पसंद नहीं करते। ऐसे संगठनों द्वारा गुलामी पर तो बात होती है, मगर छुआछूत पर वे मौन धारण कर लेते हैं। इसी कारण से मेरा यकीन अब मानवाधिकार संगठनों से उठ चुका है।

कृपया अपनी यात्रा, अपने माता-पिता, अपने बचपन और अपने संघर्षों को हमारे साथ साझा करें।

मेरा जन्म 1983 में हुआ। हम तीन भाई-बहन हैं (दो बहनें और एक भाई)। सबमें सबसे बड़ा मैं हूं। मुझे पढ़ने का मौका मिला। मेरी शुरुआती पढ़ाई धार्मिक तौर-तरीकों से हुई। मुझे कुरआन और शरिया की कई किताबें कंठस्थ हो गईं। शुरुआती पढ़ाई के बाद मैं स्कूल में प्रवेश किया। मेरी पढ़ाई चलती रही, जब तक मैंने अर्थशास्त्र में परास्नातक नही कर लिया। विश्वविद्यालय में पहुँचने पर मेरे विचार बदलने लगे। राजधानी में स्थित विश्वविद्यालय में पढ़ने के कारण मेरी दोस्ती किताबों से हो गई। मैं अपनी सामाजिक हैसियत से असंतुष्ट था। इसीलिए मैं विकल्प की तलाश में शा। यही कारण है कि मैं वामपंथी छात्र आंदोलन में शामिल हो गया। इस आंदोलन से जुड़ने के बाद मैं अपनी समस्याओं को सही तरीके से समझने लगा था। अब मैं जान चुका था कि मेरे सामने दो मुद्दे हैं पहला अछूतों का मुद्दा और दूसरा गुलामी का मुद्दा। मैं इन दोनों समस्याओं से मुक्त होने के लिए लेखन को बतौर हथियार उपयोग करने का निर्णय लिया। तबसे मैं लगातार उस समय तक लिखता रहा, जब तक सन 2013 के अंत में मुझे फॉसी की सजा नहीं सुना दी गई।

स्कूल का शिक्षण कार्यक्रम और वहाँ व्यवस्था कैसी थी ? क्या स्कूल में ‘धार्मिक’ नैतिकता क्या सिखाई जाती थी? क्या स्कूलों और वहाँ की शिक्षालयों में व्यक्ति के साथ उसके जन्म के आधार पर भेदभाव होता है?

स्कूल प्रणाली मूल रूप से धार्मिक व्यवस्था पर आधारित है। स्कूलों का मुख्य कार्य बच्चों को यह सिखाना है कि दुनिया दो भागों में विभाजित है: पहला मुस्लिम और दूसरा काफ़िर।  इतना ही नहीं वहाँ इन दोनों भागों के तनाव और नफरतों को भी रटाया जाता है। वहाँ कानूनी रूप से किसी भी मेल-मिलाप पर पाबंदी नहीं है। परंतु वास्तविकता यह है कि निम्नवर्ग वालों के मुहल्लों पर ध्यान नहीं दिया जाता है। अर्थात उन्हें नीचा माना जाता है।

आपके देश में न्याय प्रणाली कितनी ‘स्वतंत्र’ है। क्या न्याय में ‘दास समुदायों’ का प्रतिनिधित्व है?

देश में न्यायिक स्वतंत्रता बिल्कुल नहीं है, और ‘निम्न’ सामाजिक वर्गों (गुलामों और अछूतों) लोगों की उपस्थिति न्यायिक संस्थानों और अभियोजन में नगण्य है। मालमाइन/अछूतों का मुद्दा उठाने के बाद सरकार ने सन 2015 की शुरुआत में उन्हें एक पद पर नियुक्त करना शुरू किया।

 आपके देश में कुछ आईआरए कार्यकर्ताओं पर मलिकी कानून की किताबों को “जलाने” का आरोप लगाया गया है। ये कानून क्या हैं और उन्होंने उन किताबों को क्यों जलाया? उन कार्यकर्ताओं के साथ क्या हुआ?

देखिए मलिकी किताबें गुलामी के दस्तावेज हैं। ये पुस्तकें गुलामी को वैध बनाती हैं और दास व्यापार को नज़र रखती हैं। इसलिए उन्होंने इसे जला दिया। इस ऑपरेशन को अंजाम देने वाले ज्यादातर लोग अभी भी गुलामी विरोधी अखाड़े में खड़े हैं।

मॉरिटानिया में आज कितने कार्यकर्ता ईशनिंदा और धर्मत्याग के आरोपों का सामना कर रहे हैं?

पिछले अठारह महीनों में, इन आरोपों के आधार पर 12 से अधिक लोगों को जेल में बंद किया गया है। कई लोग न्यायालय में सुनवाई का सामना कर रहे हैं। बचे कार्यकर्ताओं के खिलाफ़ कई नए मामले तैयार किेए जाने की संभावना है।

आप कब और कैसे ह्यूमनिस्ट इंटरनेशनल से जुड़े ? क्या आप मानवतावादी हैं? क्या आपको लगता है कि मानवतावाद में ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ के नाम पर सभी उपेक्षितों के हक में और सभी धार्मिक भेदभावों के खिलाफ लड़ने की ताकत है?

अपनी स्थिति बताते हुए कारीगर

जब मैं जेल में था, तबसे मैं ह्यूमनिस्ट इंटरनेशनल को जानता हूं। इसके लिए क़ासिम ग़ज़ाली का बहुत-बहुत आभार। उन्होंने गाढ़े वक्त में मेरे परिवार का साथ दिया। यह मेरे मामले में प्रत्यक्ष रुचि लेने वाला पहला संगठन है। बेशक, मैं खुद को एक मानवतावादी के रूप में प्रस्तुत करता हूं। तमाम कठिनाइयों के बावजूद, मेरा मानना ​​है कि एक मानवतावादी ही इस दुनिया में जो कुछ भी आवश्यक है, वह सब हासिल कर सकता है।

ह्यूमनिस्ट इंटरनेशनल द्वारा किए गए कार्य कितने महत्वपूर्ण हैं?

मेरा मानना ​​​​है कि ह्यूमनिस्ट इंटरनेशनल द्वारा किए गए सभी कार्य बहुत महत्वपूर्ण हैं। अफ्रीका के साहेल-सहारन क्षेत्र के हाशिए के समाज एक व्यक्ति के रूप में मुझे लगता है कि ह्यूमनिस्ट इंटरनेशनल मानव अधिकारों का एकमात्र संगठन है जो उपेक्षित और वंचित समाज पर ध्यान देता है।

गुलामी, जातिवाद और जातिगत भेदभाव के बारे में आप अंतरराष्ट्रीय समुदाय से क्या कहना चाहेंगे? क्या आप मानते हैं कि इन सामाजिक बुराइयों को मानवता के खिलाफ अपराध घोषित किया जाना चाहिए और इनका अंतरराष्ट्रीय कानून के माध्यम से गंभीरता से निपटारा किया जाना चाहिए?

मैं अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील करना चाहता हूँ कि किसी भी मानव समुदाय के अधिकार अविभाज्य हैं, उन्हें कम करना अनैतिक है। किसी भी मानव समुदाय के साथ दोहरा मापदंड अपनाना घृणित कृत्य है। मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि मानव अधिकारों से राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हम तमाम अंतरराष्ट्रीय समुदायों से ना-उम्मीद होने के कगार पर हैं। क्योंकि हम देख रहे हैं कि तमाम अंतरराष्ट्रीय समुदाय बड़ी शक्तियों का मुँह ताकने लगे हैं। मैं तमाम अंतरराष्ट्रीय समुदायों से अंत में यही कहना चाहता हूं कि मानव अधिकारों को न्यून करना न्याय संगत नहीं है।

मैंने पढ़ा है कि 1987 के बाद से मॉरिटानिया सरकार ने किसी को मौत की सज़ा नहीं दी है। क्या मृत्युदंड से संबंधित कोई निर्णय नहीं लिया गया था, या सरकार ने मृत्युदंड को समाप्त कर दिया था?

यह सच है कि 1987 से मॉरिटानिया नें मृत्युदंड को निलंबित करने का फैसला लिया। लेकिन इसने कुछ मामलों में सज़ा को लागू करने से नहीं रोका है, जैसाकि 1990 में हुआ था। जब दर्जनों लोगों को मौत की दी गई। नतीजतन, मॉरिटानिया द्वारा सजा का निलंबन केवल आंशिक निलंबन था। वहाँ हर समय मृत्युदंड लागू रहा। ऐसा इसलिए है क्योंकि इसे रोकने वाला कोई कानून है ही नहीं।

मॉरिटानिया में काफिरों के लिए सबसे लोकप्रियसज़ा क्या है?

मॉरिटानिया में तथाकथित ‘काफिरों’ के लिए, जिन दंडों का प्रवाधान सामाजिक हैसियत से सुनिश्चित किए जाते हैं, वे इस प्रकार हैं कि यदि संबंधित व्यक्ति जो न्याय के लिए भेजा गया है, यदि वह अकेला है और प्रभु वर्ग से है, तो उसकी यह सामाजिक हैसियत हमेशा उसका साथ निभाएगी। उसकी सज़ा आसान होगी। परंतु यदि दास और अछूत वर्ग का व्यक्ति है तो उसके साथ बहुत कठोर व्यवहार किया जाता है।

यदि यह सजा किसी ऐसे व्यक्ति को मिली है, जिसका परिवार है, तो वह प्रभावित होता है। प्रभु वर्ग के परिवारों को इस मुद्दे से बिल्कुल भी सरोकार नहीं रहता है यानी उनके परिवारों पर दबाव नहीं डाला जाता। लेकिन जो व्यक्ति गुलामों और अछूतों के परिवार से हैं, उन परिवारों पर प्रबल दबाव डाला जाता है और उन्हें मजबूर किया जाता है कि वे सज़ा पाने वाले सदस्य से पूरी तरह संबंध तोड़ लें।

फायरिंग दस्ते के सामने जब आपको मौत की सजा सुनाई गई तो तत्काल कैसा ख्याल मन में आया। क्या यह सज़ा का क्रूरतम रूप था?

मौत की सज़ा का क्षण वह अजीब और असाधारण रूप से क्रूर था। मेरी सज़ा से लोग खुश हो रहे थे। किसी के पास मेरे लिए सहानुभूति नहीं थी। जब मैंने अपनी बाईं ओर देखा, तो  वहाँ बचाव पक्ष के वकील की सीटें पूरी तरह से खाली थीं, क्योंकि उस समय मेरे पास कोई वकील नहीं था। सुरक्षा गॉर्डों ने मुझे वापस काल कोठरी में डाल दिया। जेल मैं सारी परिस्थितियों पर विचार करने लगा और खुद को इस निश्चय पर स्थिर किया कि मुझे हर स्थिति में मजबूत रहना होगा।

आपको आपकी रिहाई का कारण क्या लगता है ?  आपको मॉरिटानिया की हुकूमत ने माफीदी या अंतरराष्ट्रीय दबाव ने काम किया?

लकड़ी को तराशती हुई महिला कारीगर

मुझे लगता है कि मेरी रिहाई का एकमात्र कारण अंतरराष्ट्रीय दबाव था।

आप फ्रांस कैसे आए? क्या सरकार ने आपकी मदद की?

अपनी रिहाई के दिन मैं मॉरिटानिया सैन्य सुरक्षा की देखरेख में सेनेगल के लिए मॉरिटानिया से निकल रहा था, वहां मैंने फ्रांसीसी दूतावास से संपर्क किया। फ्रांसीसी दूतावास ने मुझे फ्रांस जाने का वीजा मुहैया करा दिया।

आपके घरवाले कैसे हैं?  उनका जीवन डर के साये में है या वे अच्छे से गुजारा कर रहे हैं?

मेरा परिवार मॉरिटानिया के अंदर बहुत कठिन परिस्थितियों में रहता है। वहाँ वे सामाजिक अलगाव और श्रम की कीमत न पाने के हालात का सामना कर रहे हैं। वे सामाजिक सेवा से वंचित हैं।

पूरी दुनिया में लोग गोरे यूरोपीय और अफ्रीकी-अमेरिकियों का  संदर्भ देते हुए नस्लवाद के बारे में बात करते हैं, लेकिन आपके देश ने इसका सामना गोरे अरबों के साथ किया है। हममें से अधिकांश ने पढ़ा है कि इस्लाम जन्म या जाति के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है?

इस्लाम में  ऐसे कई नियम हैं, जो सामाजिक स्तरीकरण और भेदभाव को पनपने का मौका देते हैं। भेदभाव करने वाले नियमों की नींव कुरान की आयतों और हदीसों पर टिकी हुई है। उदाहरण के लिए इस  हदीस को देखें : जब परमेश्वर ने सृष्टि की रचना की, तो उसने जिब्रैल को भेजा। जिब्रैल ने लोगों को दो भागों में विभाजित किया: अरब और गैर-अरब। परमेश्वर अरब वालों के साथ था*

*संदर्भ: अलमौएजम अल-अवस्ते वॉल्यूम। 4 पेज 135.

स्नातक स्तर पर अर्थशास्त्र में छात्रों के लिए एक छात्रवृत्ति थी। यह छात्रवृत्ति उस छात्र को दी जाती थी जो लेखांकन में उच्चतम ग्रेड प्राप्त करता था। मैंने इस छात्रवृत्ति के बारे में ध्यान से विचार किया और अर्थशास्त्र में विशेषज्ञता हासिल करने का फैसला किया। मैंने अन्य विषयों की तुलना में लेखांकन पर ध्यान देना शुरू किया। अंतिम परीक्षा में मैंने लेखांकन में पूर्ण ग्रेड प्राप्त किया।

हदीस द्वारा इस्लाम में सामाजिक स्तरीकरण के कई दूसरे उदाहरण भी हैं।

यह कैसे संभव था कि सबसे हाशिए के समुदायों में से एक में पैदा होने के बावजूद, आप अच्छी शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम हो पाए। आपके माता-पिता क्या काम करते थे?

यह कहा जा सकता है कि मैं उसी सामाजिक वर्ग के अन्य लोगों की तुलना में बहुत भाग्यशाली था, क्योंकि मेरे पिता 1960 की स्वतंत्रता के बाद फ्रांस द्वारा स्थापित कुछ शैक्षिक कार्यक्रमों की बदौलत शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो पाए थे। इसके कारण मुझे पढ़ने-लिखने का मौका मिला।

मेरे पिता एक प्रशासक थे। मेरे परिवार के उत्पीड़न के क्रम में उन्हें सारे अधिकारों से वंचित कर दिया गया। जहां तक ​​मेरी मां का सवाल है, वह एक बेघर गृहिणी थीं।

क्या जन्म के आधार पर कभी आपके साथ स्कूल या कॉलेज में भेदभाव किया गया है? यदि हाँ तो वह कैसा था?

बेशक! मैंने अपने स्कूली जीवन और विश्वविद्यालयी शिक्षा के सभी स्तरों पर बहुत भेदभाव, अन्याय और नस्लवाद का सामना किया है। मॉरिटानिया की सामूहिक चेतना में अच्छी तरह से स्थापित जो कहावतें हैं वह कहती हैं कि ‘मालमिन’ बेऔकात होते हैं। पढ़े-लिखे होने पर भी उनकी औकात नहीं बढ़ती है। हर बार जब मैंने किसी परीक्षा में उच्च अंक प्राप्त किया तो शिक्षक ने मेरा स्वागत इन्हीं मुहावरों से किया। मुझे प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने मुझे बताया कि मैं निचले स्तर की सेवा के लिए बना हूँ। पढ़ कर भी मैं निचले स्तर की ही सेवा करूँगा।

स्नातक स्तर पर अर्थशास्त्र में छात्रों के लिए एक छात्रवृत्ति थी। यह छात्रवृत्ति उस छात्र को दी जाती थी जो लेखांकन में उच्चतम ग्रेड प्राप्त करता था। मैंने इस छात्रवृत्ति के बारे में ध्यान से विचार किया और अर्थशास्त्र में विशेषज्ञता हासिल करने का फैसला किया। मैंने अन्य विषयों की तुलना में लेखांकन पर ध्यान देना शुरू किया। अंतिम परीक्षा में मैंने लेखांकन में पूर्ण ग्रेड प्राप्त किया। 20 में से 20 अंक हासिल किया। विश्वविद्यालय के इतिहास में यह  यह पहला मौका था। लेकिन अंत में झटका लगा, और मैं इस अधिकार से वंचित हो गया क्योंकि मैं ‘मालमिन’ ज़मात से था। यह छात्रवृत्ति दूसरे छात्र को दी गई। लेखा में उसका ग्रेड मुझसे कम था, लेकिन अपनी सामाजिक हैसियत के लिहाज से वह ऊँचे ग्रेड का था। वह प्रभु-वर्ग से था।

क्या आप लौटने का इरादा रखते हैं?

बेशक, मैं वापसी का इरादा रखता हूं।  इसके लिए कोई सटीक समय नहीं है, और मैं देश और विदेश में कई मॉरिटानियाई लोगों के संपर्क में हूं। हम देश को नस्लवादियों के हवाले नहीं छोड़ेंगे।

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

इस साक्षात्कार का अन्ग्रेजी से हिन्दी अनुवाद जाने-माने कहानीकार और लेखक जनार्दन ने किया है। संप्रति जनार्दन इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं। 

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