उत्तर भारत में पेरियार के बदले क्यों पूजे जाते हैं विश्वकर्मा? डायरी (17 सितंबर, 2021)  

नवल किशोर कुमार

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बंगाल और बिहार में अनेकानेक सांस्कृतिक समानताएं हैं। फिर चाहे वह खाने-पीने का मामला हो या तीज-त्यौहारों का। भाषा में भी बहुत अधिक अंतर नहीं है। हालांकि बंगाल में अपनी भाषा को लेकर सजगता अधिक है। कुछ ऐसी ही सजगता मैथिलीभाषियों में भी है। लेकिन सजगता का स्तर उतना नहीं है जितना कि बांग्लाभाषियों में। हर साल 17 सितंबर को इन दोनों राज्यों (झारखंड को भी शामिल किया जाना चाहिए) में विश्वकर्मा पूजा की धूम रहती है। कल देर शाम एक कलाकार महिला मित्र ने अपनी तस्वीरें भेजी और कैप्शन में विश्वकर्मा पूजा की बात कही।

मित्र की तस्वीर और कैप्शन को देख बचपन का एक सवाल जिंदा हो गया। असल में बचपन में विश्वकर्मा पूजा की धूम मेरे घर में भी रहती थी। उस दिन हम तीनों (पापा, भैया और मैं) घर के सभी यांत्रिक वस्तुओं को साफ करते और फिर हम सबकी पूजा करते थे। मैं तो सबसे खास ध्यान अपने पापा की साइकिल पर देता था। उसका बहुत खास संबंध था मेरे साथ। उसी साइकिल पर पापा मुझे घुमाते जो थे। मेरा लगाव इतना होता था कि साइकिल को धोने के बाद उसमें करूआ तेल (सरसों तेल) लगाता ताकि उसमें चमक आए। हालांकि तब मुझे साइकिल चलाने का शऊर नहीं था। लेकिन इससे मेरे लगाव को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

पापा बिजली महकमा में खलासी के पद पर कार्यरत थे। उनका कार्यालय पाटलिपुत्र इंडस्ट्रीय एरिया में था। वहां विश्वकर्मा पूजा धूमधाम से मनाया जाता था। तो होता यह था कि घर में पूजा करने के बाद पापा अपने कार्यालय जाते थे। लेकिन वे अकेले नहीं जाते थे। भैया और मुझे साथ ले जाते। उन दिनों चितकोहरा फ्लाईओवर नहीं था तो रेलवे गुमटी पार करनी होती थी। एक बार जब हम जा रहे थे तब एक रेलवे का इंजन गुजर रहा था। उसे फूलों से सजाया गया था। मेरे मन में सवाल आया था कि क्या इंजन को भी विश्वकर्मा भगवान ने बनाया है?

इससे भी बड़ी साजिश है भारत के गाय प्रदेश को गदहा प्रदेश बनाए रखने की ताकि लोग महान पेरियार को याद न करें। यह साजिश ही है कि पेरियार की दाढ़ी के जैसे ही विश्वकर्मा की प्रतिमाओं को भी दाढ़ी लगाई जाती है। हाथी तो खैर इसलिए ताकि आम लोगों को दिग्भ्रमित किया जा सके।

सवाल आया तो पूछ भी बैठा। पापा ने हां कहा। फिर दूसरा सवाल कि विश्वकर्मा भगवान ने और क्या-क्या बनाया है? पापा ने फिर जवाब दिया – जितनी वस्तुएं हम देख सकते हैं, सभी को बनानेवाले विश्वकर्मा भगवान ही हैं।

तब बचपन के दिन थे। बात दिमाग में बैठ गयी कि जितनी वस्तुएं हैं, सब का निर्माता विश्वकर्मा जी ही हैं। फिर तो उनके प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ गयी। उन दिनों स्कूल में धर्म की शिक्षा भी दे दी जाती थी और मेरे उपर प्रभाव यह था कि नोटबुक के पहले पन्ने पर सरस्वती माता की जय लिख देता था। जब यह बात दिमाग में बैठ गयी कि सभी के निर्माता विश्वकर्मा हैं तो एक नोटबुक के पहले पन्ने पर जय बाबा विश्वकर्मा लिख दिया।

लेकिन मुझे क्या मालूम था कि मेरे शिक्षक महोदय को मेरा ऐसा लिखना नागवार गुजरेगा। दरअसल वह अंग्रेजी का नोटबुक था और उसे मेरे हेडमास्टर रहे अरविंद प्रसाद मालाकार ने देख लिया। उन्होंने विश्वकर्मा बाबा को काट दिया और वहां लिख दिया – या देवी सर्वभूतेषू शक्तिरूपेण संस्थिता…। क्या वह गायत्री मंत्र था?

सवाल को तो जेहन में आना ही था। सो पूछ बैठा कि विश्वकर्मा भगवान से अधिक शक्तिशाली थीं गायत्री माता? जवाब मिला कि हां, ब्रह्मांड में उनकी ही शक्ति है। सब कुछ का संचालन वह करती हैं। विश्वकर्मा तो केवल रचयिता हैं। वे केवल निर्माण करते हैं। लेकिन चलाने का काम गायत्री माता करती हैं। उन्होंने मुझे कुछ ऐसे समझाया जैसे विश्वकर्मा राजमिस्त्री हों और गायत्री माता किसी घर की मालकिन। जिरह करने का तो सवाल ही नहीं था। दिमाग में नयी बात बैठ गयी। गायत्री माता सबसे अधिक शक्तिशाली हैं। फिर तो गायत्री मंत्र कंठस्थ कर लिया।

घर गया तो मैंने पापा से कहा कि आपको विश्वकर्मा भगवान की पूजा नहीं करनी चाहिए। यह भी कोई भगवान हैं जो दूसरों के आदेश पर काम करते हैं। मैंने हेडमास्टर साहब वाली पूरी बात बता दी।

मुझे याद है कि पापा अगले दिन मुझे लेकर स्कूल गए। वहां उन्होंने हेडमास्टर सर से कहा कि मेरे बच्चे को पढ़ाइए ना कि उसे संत बनाइए। मैं तो अनपढ़ आदमी हूं। लेकिन यह अनपढ़ ना रहे, आगे बढ़े, इसलिए तो इसका दाखिला कराया है।

फिर कॉपी के पहले पन्ने पर सब लिखना बंद हो गया। नहीं तो क्या-क्या नहीं लिखता था। सबसे अधिक तो यह कि पहला पन्ना राम का, बाकी पन्ना काम का।

हिंदी पट्टी की खास बात यह रही है कि यह जितना दूर बंगाल में हुए समाज सुधार आंदोलनों से था उतना ही दूर दक्षिण और मध्य भारत के राज्यों में हो रहे आंदोलनों से। लेकिन इतना भी दूर नहीं रहा कि प्रभावित ही नहीं हुआ। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश जो हिंदी पट्टी के दो सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य हैं, में बंगाल के राजनीतिक व सामाजिक आंदोलनों का असर पहुंचा और सती प्रथा, बाल विवाह आदि कुप्रथाएं खत्म हुईं। वहीं दक्षिण के राज्यों में हो रहे समतामूलक आंदोलन जिसके प्रणेताओं में नारायण गुरू, वासवन्ना और अयप्पन सहोदरन आदि रहे, के असर से भी उत्तर भारत अछूता न रहा सका। यह असर और अधिक सहज रूप से प्रभावी हुआ जब पेरियार ने 19वीं सदी में इस युगांतरकारी बदलाव का नेतृत्व किया।

बाद के दिनों में एक सवाल यह आया कि 17 सितंबर को ही भगवान विश्वकर्मा की पूजा क्यों होती है। कई लोगों से पूछा। एक बार तो दारोगा प्रसाद राय हाईस्कूल में मेरे शिक्षक रहे जवाहर झा सर से भी। जवाब नहीं मिला।

आज फिर वही सवाल कि 17 सितंबर ही क्यों?

मुझे लगता है कि इसका जवाब मुझे मिल गया है। यह एक तरह की साजिश है भारत के सभी श्रमजीवियों से उनका श्रेय हड़पने की। जैसे ही हम यह मानते हैं कि हर वस्तु का निर्माता विश्वकर्मा है तो हम उन सभी की मेहनत को भूल जाते हैं जिसके कारण वह वस्तु है। जैसे कि मैं अपने घर के लिए किसी विश्वकर्मा को श्रेय नहीं देता। मुझे अब भी वे लोग याद हैं जिन्होंने मेरा घर बनाया है। फिर चाहे वह पुराने घर के राजमिस्त्री रहे बिशु मांझी हों या फिर अभी नये घर के राजमिस्त्री अंकित चौधरी।

इससे भी बड़ी साजिश है भारत के गाय प्रदेश को गदहा प्रदेश बनाए रखने की ताकि लोग महान पेरियार को याद न करें। यह साजिश ही है कि पेरियार की दाढ़ी के जैसे ही विश्वकर्मा की प्रतिमाओं को भी दाढ़ी लगाई जाती है। हाथी तो खैर इसलिए ताकि आम लोगों को दिग्भ्रमित किया जा सके।

वही ई वी रामासामी पेरियार, जो भारत के उन दार्शनिकों में अग्रणी हैं और जिनके विचारों का प्रभाव पूरे भारत में आज महसूस किया जा रहा है। फिर चाहे वे दक्षिण के राज्य हों या फिर मध्य भारत  या उत्तर भारत। उत्तर भारत को हिंदी पट्टी के रूप में रेखांकित भी किया जाता रहा है। इस हिंदी पट्टी की खास बात यह रही है कि यह जितना दूर बंगाल में हुए समाज सुधार आंदोलनों से था उतना ही दूर दक्षिण और मध्य भारत के राज्यों में हो रहे आंदोलनों से। लेकिन इतना भी दूर नहीं रहा कि प्रभावित ही नहीं हुआ। खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश जो हिंदी पट्टी के दो सबसे महत्त्वपूर्ण राज्य हैं, में बंगाल के राजनीतिक व सामाजिक आंदोलनों का असर पहुंचा और सती प्रथा, बाल विवाह आदि कुप्रथाएं खत्म हुईं। वहीं दक्षिण के राज्यों में हो रहे समतामूलक आंदोलन जिसके प्रणेताओं में नारायण गुरू, वासवन्ना और अयप्पन सहोदरन आदि रहे, के असर से भी उत्तर भारत अछूता न रहा सका। यह असर और अधिक सहज रूप से प्रभावी हुआ जब पेरियार ने 19वीं सदी में इस युगांतरकारी बदलाव का नेतृत्व किया।

हमारी भूमि ज्ञान की भूमि है; हम टैंक और मंदिर बनाते हैं; जबकि अन्य देशों में लोग अंतरिक्ष में उड़ते हैं और पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित करते हैं। अन्य देशों में अकेले ज्ञान का सम्मान किया जाता है और उसी पर भरोसा किया जाता है और उसी को हर खोज का मूल आधार माना जाता है। लेकिन, इस देश में लोग केवल ईश्वर में, धर्म में और इसी तरह के बकवास वाले अनुष्ठानों और समारोहों में विश्वास करते हैं।

यह असर किस तरह का था, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि बिहार में त्रिवेणी संघ के दस्तावेजों में पेरियार के विचार प्रमुखता से शामिल किए गए हैं। यह बात तब की है जब आज के जैसे सूचना क्रांति नहीं हुई थी, संचार के साधन अत्यंत सीमित थे और शिक्षा का प्रभाव भी अत्यंत ही सीमित था। दरअसल त्रिवेणी संघ का गठन  30 मई, 1933 को बिहार के शाहाबाद जिले के करगहर में हुआ। इसके संस्थापकों में सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और जे. एन. पी. मेहता प्रमुख रहे। दलित और पिछड़े वर्गों के इस संगठन ने राजनीतिक और सामाजिक हस्तक्षेप किया। हालांकि राजनीति में इस संघ को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और 1940 तक आते-आते त्रिवेणी संघ अतीत बन गया। परंतु, सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में इसने जो असर किया, वह आज भी महसूस किया जा सकता है। त्रिवेणी संघ ने ही जो विचारधारा और वैचारिक उर्जा पैदा की, उसने आजादी के बाद  में  बहुजनवाद और सामाजिक न्याय की राजनीतिक तैयार की, जिसमें  रामस्वरूप वर्मा, ललई सिंह यादव, जगदेव प्रसाद, कर्पूरी ठाकुर, कांशीराम, लालू प्रसाद अलग-अलग रूपों में फले-फुले।

इस त्रिवेणी संघ की वैचारिकी में पेरियार के विचार शामिल रहे। इसकी पुष्टि त्रिवेणी संघ का बिगुल में होती है। इसमें उल्लेखित है कि ‘जिस तरह बड़े-बड़े और शक्तिशाली राष्ट्र साम्राज्यशाही का पोषण कर छोटे-छोटे राष्ट्रों को हड़पे जा रहे हैं तथा बड़े-बड़े पूंजीपति बेचारे गरीब किसानों और मजदूरों का खूब शोषण कर अपना-अपना तोंद फुलाये जा रहे हैं, ठीक उसी तरह धर्म के ठेकेदार अपना तोंद फुलाने के लिए, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, नरक-स्वर्ग तथा मोक्ष आदि के अड़ंगे लगा-लगा जनता को कूपमंडूक बना-बना, उनकी आंखों में धूल झोंक दिन-दोपहर लूट रहे हैं, जिसे हम कहते हैं- धार्मिक साम्राज्यवाद। जो साम्राज्यशाही तथा आर्थिक साम्राज्यवाद से भी अधिक लोकतंत्र के लिए भयावह है, क्योंकि किसी भी उत्थान में धर्म की ईंट पर दीवार चुनी जाती है।’

हम पाते हैं कि त्रिवेणी संघ, जिसने समाज के खास तबके के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक वर्चस्ववाद को खुली चुनौती दी, उसके पीछे वही विचार थे, जो पेरियार के विचार थे। जबकि परिस्थितियां बिलकुल जुदा थीं। भौगोलिक दूरी के अलावा भाषायी विभिन्नता एक बड़ी समस्या थी। लेकिन त्रिवेणी संघ के बिगुल में पेरियार के विचार शामिल रहे। फिर यही विचार रामस्वरूप वर्मा के द्वारा स्थापित अर्जक संघ के मूल में शामिल रहे। आज भी बिहार और उत्तर प्रदेश में अर्जक संघ को मानने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं और वे भारतीय समाज में व्याप्त वर्चस्ववाद को खारिज करते हैं।

सवाल यह है कि पेरियार के वे कौन-से विचार हैं जो उन्हें आज हिंदी पट्टी में प्रासंगिक बना रहे हैं। जाहिर तौर पर यह महज एक सवाल नहीं है। यह अनेक प्रश्नों का समुच्चय है जिसमें हिंदी पट्टी के समाज में व्याप्त भेदभाव, उत्पादन के संसाधनों का असमान वितरण और धार्मिक व सांस्कृतिक वर्चस्ववाद से जुड़े सवाल शामिल हैं।

दरअसल, पेरियार ने भारतीय समाज की सबसे बड़ी व्याधि को पहचान लिया था। उन्होंने भारतीय दर्शन में शामिल चमत्मकारवाद को खारिज किया था। वे मानते थे कि ‘मनुष्य को इस दुनिया में अन्य प्राणियों से बेहतर माना जाता है। क्योंकि, उसने ज्ञान का उपयोग करते हुए काफी उन्नति की है। लेकिन, हमारे देशवासियों की स्थिति इस ज्ञान का उपयोग न करने के कारण बेहद खराब हो रही है। यह बताते हुए कि हमारी भूमि ज्ञान की भूमि है; हम टैंक और मंदिर बनाते हैं; जबकि अन्य देशों में लोग अंतरिक्ष में उड़ते हैं और पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित करते हैं। अन्य देशों में अकेले ज्ञान का सम्मान किया जाता है और उसी पर भरोसा किया जाता है और उसी को हर खोज का मूल आधार माना जाता है। लेकिन, इस देश में लोग केवल ईश्वर में, धर्म में और इसी तरह के बकवास वाले अनुष्ठानों और समारोहों में विश्वास करते हैं।’ (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ पेरियार ई.वी.आर., संयोजन : डॉ. के. वीरामणि, प्रकाशक : दि पेरियार सेल्फ-रेसपेक्ट प्रोपेगंडा इंस्टीट्यूशन, पेरियार थाइडल, चेन्नई)

पेरियार का मानना था कि ‘तर्कवाद से पैदा हुआ ज्ञान ही असली ज्ञान है। क्या महज किताबी– ज्ञान ज्ञान हो सकता है? क्या कोई रट्टा लगाकर प्रतिभाशाली हो सकता है? ऐसा क्यों है कि उच्चतम बौद्धिक प्रतिभा वाले शिक्षित व्यक्ति और वे भी, जो विशेष रूप से विज्ञान में डिग्री-धारी हैं; एक पत्थर को देवता मानकर उसके आगे दंडवत होते हैं? क्यों विज्ञान में महारत हासिल करने वाले विद्वान भी अपने पापों को धोने के लिए खुद को गंदे पानी से मलते हैं? क्या उनके द्वारा पढ़े गए विज्ञान और गोबर तथा गोमूत्र के मिश्रण से अभिषेक करने के बीच कोई संबंध है?’ (वही)

बुद्धिवाद के प्रस्तोता पेरियार कहते थे कि ‘मनुष्य को केवल विश्वास के आधार पर नहीं, बल्कि विवेक के आधार पर किसी बात पर विश्वास करना चाहिए। उसे देखना चाहिए कि जिस बात पर वह विश्वास कर रहा है, वह विवेकसम्मत भी है या नहीं। तभी वह एक आदिम अवस्था से मानव कद की ओर बढ़ता है।’ (वही)

त्रिवेणी संघ का गठन 30 मई, 1933 को बिहार के शाहाबाद जिले के करगहर में हुआ। इसके संस्थापकों में सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और जे. एन. पी. मेहता प्रमुख रहे। दलित और पिछड़े वर्गों के इस संगठन ने राजनीतिक और सामाजिक हस्तक्षेप किया। हालांकि राजनीति में इस संघ को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और 1940 तक आते-आते त्रिवेणी संघ अतीत बन गया। परंतु, सामाजिक बदलाव के क्षेत्र में इसने जो असर किया, वह आज भी महसूस किया जा सकता है। त्रिवेणी संघ ने ही जो विचारधारा और वैचारिक उर्जा पैदा की, उसने आजादी के बाद में बहुजनवाद और सामाजिक न्याय की राजनीतिक तैयार की

दरअसल, यही वे विचार हैं जो हिंदी पट्टी के राज्यों में एक समय महत्त्वहीन माने जाते रहे। सामंती शासन व्यवस्था इस अवस्था को बनाए रखने का पक्षधर था। हालांकि प्रेमचंद के साहित्य में ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं कि बुद्धिवाद का जो सिद्धांत पेरियार ने रखा था, उसके आधार पर समाज को देखने की परिपाटी शुरू हो गई थी। इसका एक प्रमाण है प्रेमचंद की अंतिम कहानी कफन। यह कहानी 1935 में प्रकाशित हुई और इसमें प्रेमचंद ने तर्कवाद के आधार पर समाज के बदलते नजरिए को दर्शाने की कोशिश की। फिर पेरियार की वैचारिकी फणीश्वरनाथ रेणु की कालजयी रचना मैला आंचल में देखने को मिलती है जो कि 1954 में प्रकाशित हुई। इसमें बदलते समाज की व्याख्या रेणु ने जड़ मान्यताओं के बदले पेरियार के बुद्धिवाद के आधार की।

राजनीति में पिछड़ों-शूद्रों का संघर्ष अब प्रभावी हो रहा है। इसकी पूष्ठभूमि में भी पेरियार के विचारों की झलक मिल जाती है। याद करिए 1970 का दशक जब बिहार में जगदेव प्रसाद ने नारा दिया था – सौ में नब्बे शोषित हैं, दस पर नब्बे का शासन नहीं चलेगा। उनके इस नारे में पेरियार की वैचारिकी भी शामिल रही। और यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि आज हिंदी पट्टी के अनेक राज्यों की सत्ता पिछड़ों के हाथ में है।

महान पेरियार हमें आप पर गर्व है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं। 

3 Comments
  1. राज says

    बहुत अच्छा लेख महोदय

  2. […] उत्तर भारत में पेरियार के बदले क्यों प… […]

  3. Gulabchand Yadav says

    बहुत बढ़िया लेख। अच्छा और तार्किक विश्लेषण। बधाई।

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