उच्च शिक्षा क्यों नहीं प्राप्त कर पाते गरीब बच्चे

दीपक शर्मा

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मैं पिछले तीन वर्ष से बेसिक शिक्षा विभाग में गरीब और असहाय बच्चों को शिक्षा दे रहा हूँ। मैं उन्हें गरीब और असहाय इसलिए कह रहा हूँ कि उनके पास जूते, कपड़े,  टाई,  बेल्ट, मँहगी किताबें,  कॉपी, फीस के लिए पैसे नहीं होते हैं। स्कूली बस से जाने-आने के बारे में वे सोच भी नहीं पाते हैं। निःशुल्क राशन की सूचना मिलते ही झोला और बोरा लेकर दौड़ पड़ते हैं। ये बच्चे सरकारी खर्च से कक्षा 8 तक तक की पढ़ाई तो कर लेते हैं लेकिन इसके बाद इनमें से 75 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई खत्म हो जाती है और वे दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में दर-दर भटकने लगते हैं। ये बच्चे अपने माता-पिता के  साथ कहीं मजदूरी करते हुए तो कहीं होटल, रेस्तरां या ढाबे पर जूठे बर्तन धोते हुए दिख जाते हैं। इनमें से अधिकतर बहुजन समाज के बच्चे होते हैं।

बढ़ई, मोचीगिरी, कुम्हारगिरी,  हज़ामत या साइकिल से दूध का बाल्टा ढोना इनके शौक नहीं होते। ये लोग ऐसा इसलिए करने लगते हैं कि पैसों के अभाव में आगे इनकी शिक्षा के रास्ते बंद हो चुके होते हैं। प्रायः ये बच्चे पढ़ने-लिखने में कमजोर नहीं होते हैं, बल्कि इसलिए नहीं पढ़ पाते हैं  कि हमारे देश में आठवीं के बाद की कक्षाओं में निःशुल्क शिक्षा की व्यवस्था ही नहीं है। नवोदय या जिले भर में एक दो कॉलेजों में ये सुविधा कहीं-कहीं केवल इण्टर कॉलेज तक दिख जाती है। किंतु उन सीमित सीटों में बड़ी आबादी वाले ये अधिकतर बच्चे इस लाभ से वंचित ही रह जाते हैं।। यही कारण है कि गरीब परिवार के बच्चे कॉलेज या विश्वविद्यालय स्तर की पढ़ाई करने के लिए वहाँ तक नहीं पहुँच पाते हैं। आजादी के 75 साल बाद भी हमारे देश की शिक्षा-नीति में इन गरीब बच्चों के पढ़ने के लिए अब तक शिक्षा की उचित व्यवस्था नहीं हो सकी है। जबकि ये सब लोग जानते हैं कि देश के विकास का सबसे अच्छा और बड़ा माध्यम सिर्फ और सिर्फ शिक्षा है।

कहीं-कहीं ये भी देखने को मिलता है कि जिन बच्चों की खिलौनों से खेलने की उम्र होती है वही बच्चे मेला, हाट-बाजार में खिलौना बेचते हुए मिलते हैं। किताबों से तो उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। फिर विकास के सुनहरे सपने उन्हें कैसे दिखाई दे सकता है।

भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम 2020 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का सपना देखते थे। 14 अगस्त 2004 को भारत की आजादी के 57वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने अपने भाषण में शिक्षा पर जोर देते हुए कहा था कि  ‘भारत अगले 16 वर्षों में विकसित राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है और शिक्षा के बिना यह संभव नहीं है …. समृद्धि और विकास के लिए शिक्षा सबसे जरूरी तत्व है  ….शैक्षिक सुविधाओं तक हर व्यक्ति की पहुंच अत्यंत आवश्यक है । गाँवों और गरीब परिवार के लिए शिक्षा आसानी से उपलब्ध नहीं है। भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद का छः-सात प्रतिशत तक शिक्षा पर खर्च करना चाहिए। मैं औद्योगिक घरानों से अपील करता हूं कि सरकारी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए आगे आएं और शिक्षा के क्षेत्र में योगदान करें।

’ किंतु इस दिशा दुबारा किसी ने नहीं सोचा। देश में गरीबी और अमीरी के बीच की खाई लगातार बढ़ती ही जा रही है और सरकारी शिक्षा को निजीकरण की दिशा में ले जाने की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है।

वैसे भी सरकारी विद्यालय में 99 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे ही होते हैं। घर पर भी वे विद्यालय द्वारा दिया हुआ ड्रेस ही पहनते हैं, या नंगे-अधनंगे बदन अपना जीवनयापन करते हैं। इनके माँ-बाप दिहाड़ी-मजदूरी करते हैं, जिन्हें मेहनत के अनुसार मेहनताना तक नहीं मिलता। ऐंड्रायड मोबाइल, कम्प्यूटर जैसी उच्च तकनीकी सुविधाओं से वे कोसों दूर रह जाते हैं। ऐसे अभिभावक विश्वविद्यालय स्तर पर अपने बच्चे को पढ़ने के लिए फीस, रहने के लिए हॉस्टल और खाने के लिए मेस का प्रबंध कैसे कर सकते हैं? इस दिशा में सोचने वाले माँ-बाप के सपने हमेशा टूटते रहते हैं।

 

शिक्षा पर लंबी-लंबी भाषण देने वाले शिक्षाविद, अधिकारी और नेता भी देश की इन स्थितियों से परिचित हैं। बसों में मूंगफली बेचते हुए, स्टेशनों पर भीख मांगते हुए, चौराहों पर भुट्टा भूजते हुए, फैक्ट्रियों में बिसलरी की बोतलों में पानी भरते हुए, सड़क के किनारे टाट पर सब्जी बेचते या चाट का ढेला लगाते हुए इन बच्चों को कौन नहीं देखता है। ऐसा इन्हें क्यों करना पड़ता है? यह जानने की कोशिश कितने लोग करते हैं? रिक्शा, ऑटोरिक्शा, बस चलाने वाले ड्राइवरों के पीछे की भी कहानी ऐसी ही होती है। यदि ये लोग अपने निजी, ड्राइवर, नौकर या कामवाली बाई की पारिवारिक स्थिति के बारे भी विचार कर लेते तो भी इस तरह की स्थितियों के बारे में बहुत कुछ आसानी से समझ लेते। कहीं-कहीं ये भी देखने को मिलता है कि जिन बच्चों की खिलौनों से खेलने की उम्र होती है वही बच्चे मेला, हाट-बाजार में खिलौना बेचते हुए मिलते हैं। किताबों से तो उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। फिर विकास के सुनहरे सपने उन्हें कैसे दिखाई दे सकता है।

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जेएनयू, बीएचयू जैसे विश्वविद्यालयों में फीस कुछ कम है। बच्चे संघर्ष करके वहाँ तक पहुँच जाते हैं और पढ़ाई आसानी से कर लेते हैं। किंतु अब वहाँ की भी फीस बढ़ाने की कवायद तेजी से होने लगी है। तो देश का मजदूर वर्ग यह सोचने को मजबूर है कि वह अपने बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था कैसे करे। निजी कॉलेजों में तो इतना अधिक पैसा लगता है कि मध्य वर्ग के भी कान खड़े हो जाते हैं, तो फिर निम्न वर्ग की बात ही क्या? सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाले जो बच्चे आठवीं तक घिस-पिट कर पढ़ ले रहे हैं लेकिन भविष्य में अगर सरकारी  विद्यालयों का भी निजीकरण हो जायेगा तो ये बच्चे कहाँ जायेंगे। जिनकी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। वैसे भी सरकारी विद्यालय में 99 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे ही होते हैं। घर पर भी वे विद्यालय द्वारा दिया हुआ ड्रेस ही पहनते हैं,  या नंगे-अधनंगे बदन अपना जीवनयापन करते हैं।  इनके माँ-बाप दिहाड़ी-मजदूरी करते हैं, जिन्हें मेहनत के अनुसार मेहनताना तक नहीं मिलता। ऐंड्रायड मोबाइल, कम्प्यूटर जैसी उच्च तकनीकी सुविधाओं से वे कोसों दूर रह जाते हैं। ऐसे अभिभावक विश्वविद्यालय स्तर पर अपने बच्चे को पढ़ने के लिए फीस, रहने के लिए हॉस्टल और खाने के लिए मेस का प्रबंध कैसे कर सकते हैं? इस दिशा में सोचने वाले माँ-बाप के सपने हमेशा टूटते रहते हैं।

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पिछले दो साल से कोरोना महामारी में बहुतों के रोजगार नष्ट हो जाने के कारण यह स्थिति और भी विकट हो गई है। मध्यवित्त परिवार धीरे-धीरे गरीबी रेखा के नीचे आने लगे हैं । प्राय:  निजी कॉलेजों ने बच्चों से पूरी-पूरी फीस ली है। ऑनलाइन कक्षा चलाने के लिए बच्चों के माता-पिता पर एंड्राइड मोबाइल और इंटरनेट की व्यवस्था देने का दबाव बनाए हुए हैं। ऐसी परिस्थिति में गरीब बच्चों की पढ़ाई छूटने के खतरे और भी अधिक बढ़ गए हैं, तो गरीब बच्चे उच्च शिक्षा को कैसे प्राप्त करें? यह चिंता का विषय है।

शिक्षा के प्रति केंद्र और राज्य सरकारों की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों के चलते शिक्षा को व्यापार का माध्यम बनाकर अपना धंधा चमकाने वाले लोगों के पौ बारह हैं। लेकिन यह किसी भी सचेत नागरिक के लिए आपत्तिजनक होना चाहिए।  सरकारें अभावग्रस्त बच्चों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकारी विद्यालयों के निजीकरण के बारे में न सोचें। देश की जरूरत को देखते हुये माध्यमिक एवं स्नातक-परास्नातक लेवल पर भी निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। सरकारी विद्यालयों का निजीकरण देश के विकास को उल्टे रास्ते पर धकेल देगा। मेरा मानना है कि हर जिले में कुछ कॉलेज और कम से कम एक विश्वविद्यालय ऐसा जरूर होना चाहिए जहाँ की शिक्षा-व्यवस्था बिल्कुल निःशुल्क हो।

दीपक शर्मा युवा कवि-कथाकार और शिक्षक हैं । वाराणसी में रहते हैं।

 

3 Comments
  1. हार्दिक आभार सर

  2. Ajay Kumar Gupta says

    बेहतरीन सर पढ़कर अच्छा लगा कि कोई शिक्षक सरकार की चापलूसी के अलावा इस तरफ भी ध्यान दिए हुए हैं .. स्कूलों का निजीकरण तथा उच्च विश्वविद्यालय JNU बीएचयू जैसे संस्थानों को बदनाम कर व फीस वृद्धि कर भविष्य के भी रास्तों को बंद किया जा रहा

    1. शुक्रिया ,सर

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